पुरालेख

इंटरनेट पर लिखते और देखते बीत गये तीन वर्ष-हिन्दी संपादकीय (hindi editorial three year)

अंतर्जाल पर लिखते हुए तीन वर्ष का समय हो गया। कहना कठिन है कि अपना उद्देश्य कहां तक प्राप्त किया। वैसे ही लिखने को लेकर अपनी सफलता या असफलता का विचार नहीं किया। न ही इस बात पर विचार किया कितने लोगों ने पढ़ा? अलबत्ता अपने जीवन में लिखना शुरु करने से आज तक एक बात का अनुभव किया कि इस संसार में ऐसे मित्र लेखन के क्षेत्र में ही मिलते हैं जो आपके प्रशंसक और आलोचक होने के साथ ही व्यक्तिगत रूप से हितैषी होते हैं। अंतर्जाल पर छद्म नामों को लेकर समस्या न हो तो यह कहना सरल है कि यहां भी इस लेखक को बहुत अच्छे मित्र अधिक संख्या में मिले। कम से कम एक बात में उन्होंने निभाया कि ‘जबरन सफल’ बनाने का कोई प्रयास न कर नये प्रयोगों के लिये प्रेरणा तो दी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभी अपनी सफलता के दावे करना मूर्खता होगी तो अपनी असफलता को लेकर कुंठा पालना उससे भी अधिक मूर्खता! इस लेखक के पांच ब्लाग गूगल की पैज रैंक में चार अंक ले चुके हैं।
1.शब्द लेख सारथी पत्रिका
2.दीपक बापू कहिन
3.ई-पत्रिका
4.शब्द पत्रिका
5.शब्द लेख पत्रिका
कुल बीस ब्लाग/पत्रिका में 12 अन्य तीन अंक लिये हुए हैं। पांच ब्लाग का चार अंक में होना शायद इतना अधिक सफल होना न लगे-क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने को लेकर अनेक भ्रम है-मगर अपने लेखकीय कर्म से एक बात अनुभव कर ली है कि अंग्रेजी पर बहुत कुछ समाग्री इस अंतर्जाल पर है पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ब्लाग या वेबसाईटें हिन्दी से अधिक पाठक जुटाती हैं। ब्लाग/वेबसाईटें की रैंक बताने वाली एक वेबसाईट पर इस लेखक का एक ब्लाग साहित्य श्रेणी में है जो कल चतुर्थ वरीयता तक पहुंचा था और उसके पीछे 106 ब्लागों में बहुत सारे अंग्रेजी के थे। हिन्दी की एक व्यवसायिक वेबसाईट भी उसके बहुत पीछे थी। इस रैंकिंग वाली साईट पर अपने ब्लाग पंजीकृत करने पड़ते हैं इसलिये जो पंजीकृत नहीं है उनसे मुकाबला करना ठीक नहीं हैं पर इतना जरूर है कि हिन्दी के ब्लाग को अंग्रेजी से बढ़त नहीं मिलेगी यह सोचना भी गलत है-इससे यह बात समझ में आती है। इसी वेबसाईट पर अन्य श्रेणियों में भी इस लेखक के ब्लाग पंजीकृत हैं और उन्होंने अंग्रेजी ब्लागों पर बढ़त बनायी है।
अगर देश के हिन्दी विद्वान या संगठित क्षेत्रों की संस्थायें हिन्दी ब्लाग लेखक को अदना समझ रही हैं तो यह उनका अल्पज्ञान है। आधुनिक काल के लेखकों को लेकर भले ही संगठित प्रकाशन संस्थायें अभी भी आशावादी बनी हुईं हैं पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि वैश्विक काल में दाखिल हो चुकी हिन्दी के लिये अब भी स्वर्ण काल या भक्ति काल की रचनायें ऊर्जा प्रदान करेंगी और आधुनिक काल के लेखकों की रचनायें यहां अधिक सफल नहंी होती दिख रही बल्कि अंतर्जाल पर ‘गागर में सागर’ भरने वाले नये लेखक ही अब उसे आगे ले जायेंगे और यकीनन वह उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।
एक रोचक किस्सा है जिसका संबंध अंतर्जाल पर लिखने को लेकर ही है। एक अखबार अक्सर इस लेखक के अध्यात्मिक ब्लाग से रचनायें उठाकर अपने यहां बिना नाम के छाप रहा था। यह अखबार लेखक के घर भी आता था। एक दिन लेखक की नज़र अध्यात्मिक स्तंभ की तरफ गयी तो यह देखकर दंग रह गया था कि वह जस की तस इस लेखक के ब्लाग से उठायी गयी थी। तब इस लेखक ने अन्य दिनों अंक भी चेक किये। उसी अखबार में प्रकाशित एक लेख में उसके स्तंभकार ने ओबामा और गांधी जी पर नोबल पुरस्कार पर लिखे गये इस लेखक के तीन लेखों के अनेक अंशों को जस की तस नहीं छापा तो शब्दों का हेरफेर भी अधिक नहीं थी। दो अक्टूबर गांधी जयंती को लेकर भी इस लेखक के लेख केे अंशों का उसमें उपयोग किया गया था।
इस लेखक ने उसके संपादक को फोन किया। संपादक ने अध्यात्मिक विषयों को लेकर कहा-‘यह तो अच्छी बात है कि आपके संदेशों का प्रसारण सभी जगह हो रहा है।’
इस लेखक ने कहा-‘उससे हम नहीं रोक रहे, मगर लेखक का नाम तो दें।’
उसने बड़ी मासूमियत से कहा-‘उसे वैसे के वैसे नहीं लिया होगा। कुछ तो शब्दों में हेरफेर होगा।’
इस लेखक को हंसी आ गयी। उसने कहा-‘नहीं, वैसे के वैसे ही उठाये गये हैं।
संपादक ने कहा-‘ठीक है! हमने अपने संबंधित संपादक को मना कर देंगे कि वह आपके लेख न ले। ले तो नाम छापे। वैसे हम उसे मना ही कर देंगे कि आपके लेख की कापी न करे।’
उसके बोलने से किसी को दुःख होता पर इस लेखक को हंसी आयी। उस मासूम संपादक ने प्रकाशन माध्यमों में ब्लाग लेखकों की सोच का ज्ञान दिया था और इस मामले में उसे गुरु कहना ठीक रहेगा।
उसकी ईमानदारी पर तारीफ करना चाहिये कि फिर उसने अभी तक ऐसा नहीं किया। अलबत्ता इस लेखक ने उस स्तंभकार की शिकायत नहीं की क्योंकि यह उस संपादक की या अखबार की जिम्मेदारी नहीं थी। फिर स्तंभकार का नाम तो याद रहेगा। अब इस समस्या पर संपादक या स्तंभकार को दोष देना भी गलत लगता है क्योंकि मानवीय प्रवृत्तियों पर भी विचार करना चाहिये। वह संपादक और स्तंभकार मेरी तरह ही सामान्य वर्ग के होंगे। अपने रोजगार से जुड़े होने के कारण शायद वह अंतर्जाल के बारे में इतना नहीं जानते होंगे। जैसा प्रचार माध्यम प्रचारित कर रहे हैं वैसे ही लोग अपने विचार बनाते हैं। यह स्वतंत्र दिखने वाले प्रचार माध्यम क्या हैं, इस पर बहस इस लेख में नहीं करना है पर उनके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद बड़े बड़े लेखक हुए हैं पर बताईये किसने कोई अमरकृति दी है और दी है तो भला वह इनसे जुड़ा रहा है? अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का नियम है कि उतना ही पढ़ो जितना रोजगार के काम आये। जितना पढ़ो उतना ही सोचो वरना कहीं के नहीं रहोगे। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तयशुदा प्रारूप है जिस पर सभी चले रहे हैं और नये प्रयोगों से हर कोई घबड़ाता है। दूसरी बात यह है कि जिसके पास भी थोड़ी बहुत शक्ति है वह उसका उपयोग करना चाहता है। किसी दूसरे को बढ़ाने की मनोवृत्ति अब नहीं रही जिस तरह तीन साल इस लेखक को लगे हैं उतने शायद ही अन्य कोई बर्बाद करना चाहे-क्योंकि इसके लिये यह जरूरी है कि आपका नियमित रोजगार होना चाहिये।
फिल्म, टीवी चैनल और पत्रकारिता में मौलिक लेखकों का अभाव है तो चिंतक के नाम शून्य। चिंतक कौन हैं? जो पुराने विचारों को ही आगे बढ़ा रहे हैं पर नये संदर्भों में व्याख्या करने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की जरूरत है वह कितनों में है? दरअसल हिन्दी में तत्काल कमाने की चाहत ने इसे आर्थिक संरक्षण से परे कर दिया है और जो मिल रहा है वह कोई नया प्रयोग करने की इजाजत नहीं देगा पर अंतर्जाल पर इसकी गुंजायश है अगर आप धन कमाने की इच्छा की बजाय लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। वैसे भी समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिफाफा भेजकर थक जाने से अच्छा है कि यहां टंकित कर थका जाये। इसके अलावा एक बाद दूसरी भी है कि अगर आप किसी पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर हैं तो आपको समाचार पत्र पत्रिकाओं में स्थान नियमित रूप से मिल सकता है वरना तो एकाध बार छपे फिर भूल जाओ। समाचार पत्र पत्रिकाओं में पत्रकार के रूप में कार्यरत लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है यह बात अंतर्जाल पर ही उनके लेखों से पता लगता है पर क्या कोई अन्य प्रकाशन उनको अपने यहां स्थान देगा? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप शिखर पुरुष नहीं हैं तो हिन्दी में लिखकर ही आप लोकप्रिय न हों यह जाने अनजाने पूंजी बाजार ने तय कर लिया है। अंतर्जाल इस चक्र को तोड़ने जा रहा है। एक आम ब्लाग लेखक को कब तक अदना समझेंगे? नयी पीढ़ी के लेखक इधर आयेंगे तब क्या होगा? संभव है कि आगे चलकर लिखने वाले अंतर्जाल पर ही वैसे लिखना प्रारंभ करें जैसे कि पुराने लेखक अपने शैक्षणिक कागजों पर करते थे।
उस स्तंभकार को गुरु मानना चाहिये जिसने इस लेखक के अंश लेकर यही प्रमाणित किया कि ऐसा चिंतन वह नहीं कर सकता था भले ही उसका नाम चमक रहा हो। पाठक इसे अतिश्योक्ति न समझें। गांधीजी, नोबल और ओबामा पर लिखे गये लेख देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि उसमें लिखी गयी बातें पहले किसी ने नहीं लिखी थी। देश का विभाजन और उसके बाद हुई हिंसा पर बहुत लिखा गया पर यह किसने लिखा कि अंग्रेज और उनके पिट्ठुओं की यह योजना थी कि गांधी के देश में हिंसा हो ताकि लोगों को बतायें कि इसका संदेश एक धोखा है। उनको डर था कि वह उनके इष्ट देव की जगह गांधी जी पूरे विश्व में पुजने लगेंगे और इसलिये वह इस देश को हानि पहुंचाकर गांधी जी को महत्वहीन करना चाहते थे।
अखबारों में छपने का मोह वैसे ही नहीं रहा। इतना छप चुके पर यहां लिखने का मतलब यह था कि समझदार लोगों को अपने मन की बात बतायें ताकि उनका विस्तार होता रहे। चिंतन के बारे में क्या कहें? लिखता और सोचता कोई और है हम टाईप करते हैं। एक दृष्टा की तरह जीने की आदत होती जा रही है। हमारे एक निजी मित्र एल.एन. त्रिवेदी ने -जिन्होंने बाद में अनुरक्ति के नाम से ब्लाग बनाया-कहा था कि ‘तुम तो चिंतन लिखा करो कविताओं में मजा नहीं आता।’
सबसे पहले ब्लाग का नाम ही रखा था ‘चिंतन’। उस दिन अंतर्जाल के एक मित्र श्री रवीद्र प्रभात ने भी ‘गंभीर चिंतन’ में हमें विशिष्ट ब्लागर मान लिया तो डर गये। जल्दी अपने को संभाल लिया क्योंकि हम दृष्टा की तरह देखने लगे थे। त्रिवेदी जी और प्रभात जी के बीच में जो था हम उसे देख रहे थे। प्रसंगवश समय पास करने तथा ब्लाग/पत्रिका को अपडेट करने के लिये लिखी गयी कविताओं ने भी कम रंग नहीं जमाया। ऊपर वर्णित पांच ब्लाग में से आखिरी चार वर्डप्रेस के हैं और उनको ऊंचाई पर पहुंचाने में अध्यात्मिक लेखन और इन्हीं कविताओं ने पहुंचाया है। किसी से कोई शिकायत नहीं है। प्रचार माध्यमों में काम रहे पत्रकारों से बस यह आशा करता हूं कि मेरे लेखक को प्रोत्साहित करें तो अच्छा ही है। एक दो अखबार ने अध्यात्मिक ब्लाग छापा है। इसलिये सभी पत्रकार, लेखक, तथा पाठक मित्रों आभार व्यक्त करता हूं। तीन वर्ष पूरे होने पर बस इतना ही।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप

यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।

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4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका

5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

शब्दों पर नियंत्रण-हिन्दी व्यंग्य (control of word-hindi satire

एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लिए  कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त  करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता

सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
…………………….
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।

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पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
………………..

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घर का रोना-हास्य व्यंग्य कविता (ghar ka rona-vyangya kavita

छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
……………………………….
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चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath

नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
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वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita

फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

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रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

…………………………
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गलतियाँ, अपराध और लिंगभेद-आलेख

भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता। अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।
दोनों किस्से टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला। उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया। पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी। वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी। वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर। वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे। तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला। ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है। वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है? लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।
पुलिस अधिकारी यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’

इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा। क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं। दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है। ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये। कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये। इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।
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रात के पिटे पैदल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

गुजु उस्ताद सुबह ही दिख गया। पहले हम उसके मोहल्ले में रहते थे अब कालोनी में मकान बना लिया सो उससे दूर हो गये, मगर हमारे काम पर जाने का रास्ता उसी मोहल्ले से जाता है। गुजु उस्ताद को भी हमारी तरह क्रिकेट देखने का शौक था पर इधर क्रिकेट मैचों पर फिक्सिंग वगैरह के आरोप लगे तो हम इससे विरक्त हो गये पर गुजु उस्ताद का शौक लगातार बना रहा।
हम रास्ते पर खड़ा देखकर कई बार उसे नमस्कार कर निकलते तो कई बार वही कर लेता। कई बार दोनों ही एक दूसरे को देखकर मूंह फेर लेते हैं। हां, क्रिकेट मैच के दिन हम अगर जरूरी समझते हैं तो रुक कर उससे बात कर लेते हैं। आज भी रुके।
वह देखते हुए बोला-‘हां, मुझे पता है कल भारत हार गया है और तुम जरूर जले पर नमक छिड़कने का काम करोगे। देशभक्ति नाम की चीज तो अब तुम में बची कहां है?’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो? हम तुम्हें पहले भी बता चुके हैं क्रिकेट खेल में हमारी देशभक्ति को बिल्कुल नहीं आजमाना। हां, यह बताओ कल हुआ क्या?’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘तुमने मैच तो जरूर देखा होगा। चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये। आंखें कितनी बूढ़ी हो जायें सुंदरी देख कर वही नजरें टिकाने से बाज नहीं आती।’
हमने कहा-‘नहीं मैच तो हम देख रहे थे। पहले लगा कि भारतीय टीम है पर जब तीसरा विकेट गिरा तो ध्यान आया कि यह तो बीसीसीआई की टीम है। अब काहे की देशभक्ति दिखा रहे हो? इस तरह मूंह लटका घूम रहे हो जैसे कि तुम्हारा माल असाबब लुट गया है। क्या यह पहला मौका है कि बीसीसीआई की टीम हारी है?’
गुजु उस्ताद-‘यार, पिछली बार बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपनी टीम विश्व विजेता बनी थी और अब उसकी यह गत! देखते हुए दुःख होता है।’
हमने चैंकते हुए कहा-‘अपनी टीम! इससे तुम्हारा क्या आशय है? अरे, भई अपना राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। यह तो बीसीसीआई यानि इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम है। हार गयी तो हार गयी।’
गुजु उस्ताद-‘काहे को दिल को तसल्ली दे रहे हो कि हाकी राष्ट्रीय खेल है। हमें पता है तुम कभी हाकी खेलते थे पर साथ ही यह भी कि तुम ही लंबे समय तक क्रिकेट खेल देखते रहे। 1983 में विश्व कप जीतने पर तुमने ही अखबार में इसी भारतीय टीम की तारीफ में लेख लिखे थे। बोलो तो कटिंग लाकर दिखा दूं। हां, कुछ झूठे लोगों ने इस खेल को बदनाम किया तो तुम बरसाती मेंढक की तरह भाग गये। मगर यह क्रिकेट खेल इस देश का धर्म है। हां, इसमें तुम जैसे हाकी धर्म वाले अल्पसंख्यक जरूर हैं जो मजा लेने के लिये घुस आये और फिर बदनाम होता देखकर भाग खड़े हुए।’
हमने कहा-‘यह किसने कहा क्रिकेट इस देश का धर्म है?’
गुजु उस्ताद ने हमसे कहा-‘क्या टीवी देखते हो या नहीं। एफ. एम. रेडियो सुनते हो कि नहीं? सभी यही कह रहे हैं।
हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि कल हमने बीसीसीआई टीम का तीसरा विकेट गिरते ही मैच बंद कर दिया। सोचा सुबह अखबार में परिणाम का समाचार देख लेंगे। मगर आजकल थोड़ी पूजा वगैरह कर रहे हैं इसलिये सोचा कि क्यों सुबह खराब करें। अगर बीसीसीआई की टीम हार गयी तो दुःख तो होगा क्योंकि यह देश से भाग लेने वाली अकेली टीम थी। पिछली प्रतियोगिता में तो अपने देश से चार पांच टीमें थी जिसमें भारत के खिलाड़ी भी शामिल थे तब देखने का मन नहीं कर रहा था। इस बार पता नहीं क्यों एक ही टीम उतारी।’
गुजु उस्ताद-‘महाराज, यह विश्व कप है इसमें एक ही टीम जाती है। यह कोई क्लब वाले मैच नहीं है। लगता है कि क्रिकेट को लेकर तुम्हारे अंदर स्मृति दोष हो गया है। फिर काहे दोबारा क्रिकेट मैच देखना काहे शुरु किया। लगता है तुम विधर्मी लोगों की नजर टीम को लग गयी।’
हमने कहा-‘वह कल टीवी में एक एंकर चिल्ला रही थी ‘युवराज ने लगाये थे पिछली बार छह छक्के और आज उस बालर को नींद नहीं आयी होगी‘। हमने यह देखना चाहा कि वह बालर कहीं उनींदी आंखों से बाल तो नहीं कर रहा है पर वह तो जमकर सोया हुआ लग रहा था। गजब की बालिंग कर रहा था। फिर युवराज नहीं आया तो हमने सोचा कि शायद टीम में नहीं होगा। इसलिये फिर सो गये। चलो ठीक है!’
गुजु उस्ताद ने घूर कर पूछा-‘क्या ठीक है। टीम का हारना?’
हमने कहा-‘नहीं यार, सुना ही बीसीसीआई की टीम अब प्रतियोगिता से बाहर हो गये इसलिये अब नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। कल भी बारह बजे सोया था। आज देर से जागा हूं। वैसे तुम ज्यादा नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र भी बहुत हो चली है। यह क्रिकेट तो ऐसा ही खेल है। कुछ नाम वाला तो कुछ बदनाम है।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘देखो! अब आगे मत बोलना। मुझसे सहानुभूति जताने के लिये रुके हो?मुझे पता है कि बाहर से क्रिकेट का धर्म निभाते नजर आते हो पर अंदर तो तुम अपनी हाकी की गाते है। अगर कोई शुद्ध क्रिकेट खेलने वाला होता तो उसे बताता मगर तो तुम हाकी वाले और कुछ कह दिया तो हाल ही कहोगे कि ‘हम हाकी खेलने वाले अल्पसंख्यक हैं इसलिये क्रिकेट वाले हम पर रुतबा जमाते हैं।’
हमने कहा-‘यार, सभी खेल धर्म तो एक ही जैसे है। सभी खेल स्वास्थ्य और मन के लिये बहुत अच्छे हैं। हम तो खेल निरपेक्ष हैं। आजकल तो शतरंज भी खेल लेते हैं।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात नहीं मानता। मुझे याद है जब क्रिकेट की बात मेरा तुम्हारा झगड़ा हुआ था तब मैं तुम्हें मारने के लिये बैट लाया तो तुम हाकी ले आये। इसलिये यह तो कहना ही नहीं कि क्रिकेट से तुम्हारा लगाव है।’
हमने सोचा गुजु उस्ताद बहुत अधिक अप्रसन्न होकर बोल रहे थे। तब हमने विषयांतर करते हुए कहा-‘पर अपनी टीम तो बहुत अच्छी है। हारी कैसे?’
गुजु उस्ताद बोले-‘तुम जाओ महाराज, हमने रात खराब की है और तुम दिन मत खराब करो। अभी तो नींद से उठे हैं और फिर हाकी धर्म वाले की शक्ल देख ली।’
हमने चुपचाप निकलने में वहां से खैर समझी। हमने सोचा रात के यह पिटे हुए पैदल कहीं चलते चलते वजीर जैसे आक्रामक बन गये तो फिर झगड़ा हो जायेगा। सच बात तो यह है कि गुजु उस्ताद ही वह शख्स हैं जिन पर हम क्रिकेट से जुड़ी कटोक्तियां कह जाते हैं बाकी के सामने तो मुश्किल ही होता है। लोग गुस्सा होने पर देशभक्ति का मामला बीच में ले आते हैं। हालांकि यह सब बाजार का ही कमाल है जो क्ल्ब के मैचों के वक्त देशभक्ति की बात को भुलवा कर बड़े शहरों के नाम पर भावनायें भड़काते हुए अपना माल बेचता है तो विश्व कप हो तो देश के नाम पर भी यही करता है। मगर भावनायें तो भावनायें हैं। हम ठहरे हाकी वाले-जहां तक देश का सवाल है तो उसमें भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है फिर काहे झगड़ा लेते फिरें।
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ईमानदारी पर सम्मेलन -हास्य व्यंग्य

दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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भारत के शिक्षित लोगों का बौद्धिक अंतर्द्वंद्व -आलेख

भारत का शिक्षित वर्ग हमेशा ही मानसिक द्वंद्व में फंसा दिखता है जो पश्चात्य सभ्यता के समर्थन और विरोध में उस समय अभिव्यक्त होता है जब कोई खास दिन हैं-जैसे वैलंटाईन डे, फ्रैंड्स डे और मदर फादर डे। दरअसल यह अंतद्वंद्व इसलिये दृष्टिगोचर होता है क्योंकि दो तरह के सस्कारों के साथ ही शिक्षित वर्ग बचपन से आगे बढ़ता है। एक तरफ उसको घर में अपने प्राचीनतम संस्कारों के साथ जीवन व्यतीत करना होता है पर अपने शैक्षणिक स्थानों में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान उसे पश्चात््य संस्कृति का सामना भी करना होता है। स्थिति यह है कि घर में शायद कोई नववर्ष न कहता हो पर वह बाहर जाकर अनेक लोगों के साथ उसकी औपचारिकता निभाता है। एक तरफ विदेशी तरफ संस्कृति का विरोध करने वाले दूसरी तरफ अपने बच्चों को किश्चियन कान्वेंट स्कूलों में भेजने को लालायित रहते हैं। क्या यह मूर्खतापूर्ण बात नहीं है कि एक तरफ आपने बच्चे को अंग्रेजी में दक्ष देखना चाहते हैं दूसरी तरफ आप उसकी संस्कृति से उसे परे देखना चाहते हैं। सच बात तो यह है भाषा का भाव से गहरा संबंध होता है और अगर आप यह चाहते हैं कि अंग्रेजी में बच्चा दक्ष हो और हिंदी में पैदल रह जाये तो फिर भारतीय सस्कृति में उसके रचे बचे होने की आशा नहीं करना चाहिये।
इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक गतिविधियों का आर्थिक आधारों से गहरा संबंध है। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था दो स्वरूपों में बंट चुकी है-एक परंपरागत और दूसरी आधुनिक। चाहे लाख विकास का दावा कर लिया जाये पर अभी भी हमारे देश के लोगों के रोजगार का आधार परंपरागत आधारों-कृषि,पशुपालन,लघु उद्योग तथा छोटे व्यवसाय-पर टिका है। हम जिस बेरोजगारी की बात करते हैं वह शिक्षित वर्ग में ही अधिक है। परंपरागत आधारों वाली अर्थव्यवस्था के अधिकांशतः स्त्रोत शहरों में बहुत छोटे हैं या उससे दूर हैं। इसके विपरीत आधुनिक आधारों वाले आर्थिक स्त्रोत- माल, कारखाने, बैंक, कंपनियां तथा अन्य कार्यालय-शहरों में स्थित हैंं और उनकी चमक दमक लोगों को आकर्षित करती हैं। इस आधुनिक अर्थव्यवसथा में नौकरी पेशा लोग अपनी हैसियत के अनुसार आधुनिक संस्कृति से जुड़कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं और उसे देखकर परंपरागवादी लोग अपनी चिंतायें कहीं शांति तो कहीं उग्रता से व्यक्त करते हैं। तमाम तरह के अखबार और टीवी चैनल-अब अंतर्जाल पर वेबसाईट और ब्लाग लेखक भी-इस पर क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहन देते हैं। इसमें कोई आपत्ति नजर नहीं आती पर ऐसे में रचनात्मकता का दायरा सिमट जाने से उन लोगों को कष्ट होता है जो व्यापक दृष्टिकोण रखने के साथ ही वास्तविकताओं को समझने वाले हैं। कहने के कहा जाता है कि यह नयी पीढ़ी का ढंग है पर वास्तविकता यह है कि उसका संबंध केवल आधुनिक व्यवस्था से जुड़े लोगों तक ही सीमित है जबकि परपंरागत अर्थव्यवस्था से जुड़ी पीढ़ी इस पाश्चात्य संस्कृति से अभी भी कोसों दूर है भले ही उसकी शिक्षा आधुनिक स्कूलों में हुई है।

एक मजेदार बात यह है कि हम कहते हैं कि बाजार अपने लाभ के लिये केवल पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार कर रहा है पर यह भी एक तरह का भ्रम है। असल बात यह है कि हमारे अंदर अपनी संस्कृति और संस्कार इस तरह बचपन में भर गये होते हैं कि हमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार तो दिखाई देता है पर अपनी सभ्यता का बाजारीकरण कभी नहीं दिखता। जैसे ही वैलंटाईन बीता वैसे ही अनेक प्रचार माध्यम बंसत के गुणगान पर उतर आये। अनेक बार राखी दिवाली और होली के अवसर पर क्या हमारे देश के प्रचार माध्यम कोई कसर नहीं उठाये रखते। फिर जब कोई खास अवसर नहीं है तब अनेक चमत्कारी स्थानों का वर्णन पढ़ने और देखने को मिलता है। ज्योतिष का कार्यक्रम तो सभी चैनल चलाते हैं और अखबारों में इस संबंध में स्तंभ हम लोग बरसों से ही देखते आ रहे है। हम अपने धर्म, संस्कार और संस्कृति के बाजारीकरण की अनुभूति इसलिये नहीं कर पाते क्योंकि हम उसकों नित्य देखने के आदी हो गये हैं। इसके विपरीत पश्चात्य संस्कृति के पर्व कभी कभार आते हैं। अब जैसे मदर डे और फदर डे की बात ही लें। हमारे यहां माता पिता का सम्मान प्रतिदिन किया जाने वाला व्यवहार है। इसके लिये किसी दिन की अनिवार्यता नहीं है। व्यक्ति निर्माण में गुरु, माता पिता और दादा दादी का बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। इतना ही नहीं व्यक्ति का निर्माण करने वाले सभी लोग सतत इसके लिये प्रयासरत रहते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति और संस्कारों के नष्ट होने की कल्पना करना व्यर्थ है। खासतौर से तब जब हमारा आर्थिक आधार अभी भी परंपरागत स्त्रोतों के इर्दगिर्द ही सिमटा हो। आप देखें कि चारों तरफ औद्योगिक मंदी का समय है पर हमारे परंपरागत स्त्रोत उससे परे दिखाई देते हैं। हालांकि औद्योगिक मंदी आने वाले समय में देश के लिये खतरनाक साबित होगी पर परंपरागत स्त्रोत अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम हैं और उनको कहीं से सहायता भी नहीं मिलने वाली है।

पिछले पंद्रह दिनों से पाश्चात्य सभ्यता को लेकर हुई बहस अब वैलंटाईन डे के बाद थम गयी है। यही कारण है कि अब बसंत, महाशिवरात्रि और होली पर चर्चायें शुरु हो गयी हैं। तय बात है कि इसके पीछे भी बाजार का उद्देश्य है। सच कहा जाये जिस बाजार पर हम अपनी सस्कृति को तहस नहस होने का आरोप लगाते हैं वही उसे बचाने के लिये भी आगे आता है। यह अर्थव्यवस्था और संस्कृति का खेल है जिसे समझने की जरूरत है।
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समस्याओं का प्रचार-हास्य व्यंग्य कविताऐं

जब हो जायेगा देश का उद्धार-व्यंग्य क्षणिकाएँ
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मिस्त्री ने कहा ठेकेदार से
‘बाबूजी यह पाईप तो सभी चटके हुए हैं
कैसे लगायें इनको
जनता की समस्या इससे नहीं दूर पायेगी
पानी की लाईन तो जल्दी जायेगी टूट’
ठेकेदार ने कहा
‘कितनी मुश्किल से चटके हुए पाईप लाया हूं
इसके मरम्मत का ठेका भी
लेने की तैयारी मैंने कर ली है पहले ही
तुम तो लगे रहो अपने काम में
नहीं तो तुम्हारी नौकरी जायेगी छूट’
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समस्याओं को पैदा कर
किया जाता है पहले प्रचार
फिर हल के वादे के साथ
प्रस्तुत होता है विचार

अगर सभी समस्यायें हल हो जायेंगी
तो मुर्दा कौम में जान फूंकने के लिये
बहसें कैसे की जायेंगी
बुद्धिजीवियों के हिट होने का फार्मूला है
जन कल्याण और देश का विकास
कौन कहेगा और कौन सुनेगा
जब हो जायेगा देश का उद्धार

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तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य
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वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
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चाणक्य नीति: अधिकारी कभी इच्छा और लोभ से मुक्त नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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