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आदर्श की बातें-हिन्दी शायरी

गनीमत है इंसान के पांव
सिर्फ जमीन पर चलते हैं,
उस पर भी जिस टुकड़े पर जमें हैं
उसे अपना अपना कहकर
सभी के सीने तनते हैं,
हक के नाम पर हर कोई लड़ने को उतारू है।
अगर कुदरत ने पंख दिये होता तो
आकाश में खड़े होकर हाथों से
एक दूसरे पर आग बरसाते,
जली लाशों पर रोटी पकाते,
आदर्श की बातें जुबान से करते
मगर कोड़ियों में बिकने के लिये तैयार सभी बाजारू हैं।
——–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

आचरण निजी मामला है-हास्य व्यंग्य

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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अपनों की परवाह नहीं, परायों के लिए दीवानापन -व्यंग्य आलेख

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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शब्द लिखना और पढ़ना एक नशा होता है-आलेख

लिखना और पढ़ना एक आदत है और यह अधिक शिक्षित में भी हो सकती है और कम शिक्षित में भी। चाहे किसी भी भाषा मं लिखने या पढ़ने का प्रश्न हो उसका इस बात से कोई संबंध नहीं है कि कोई पढ़ा लिखा अधिक पढ़ता है या कम पढ़ा लिखा। कई ऐसे लोग है जिन्होंने केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त किया पर वह कथित सामाजिक और जासूसी उपन्यास जमकर पढ़ते हैं पर कई ऐसे हैं जो बहुत पढ़ लिखकर ऊंचे पद पर पहुंच गये और अब इस बात की शिकायत करते हैं कि -उनको पढ़ने का समय नहीं मिलता।’

कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि ठेले पर सब्जी वाला लड़का भी फुरसत में कुछ न कुछ पढ़ता दिख जाये और उसके पास पढ़ा लिखा आदमी सब्जी खरीदने जाये। वहां उसे पढ़ता देख वह सोचता है कि ‘अच्छी फुरसत मिलती है इस सब्जी को पढ़ने की।
जिसे शब्द पढ़ने में आनंद आता है उसको चित्र देखकर भी मजा नहीं आता। पढ़ने वालों को किसी चित्र से कम उसके साथ लिखे शब्दों को पढ़ने में आनंद आता है। फिर आखिर पत्र-पत्रिकाओं में फोटो क्यों लगाये जाते हैं?’

अपनी मेहनत और पैसा बचाने के लिये। पता नहीं इस विषय पर लोग क्या सोचते हैं? पत्र पत्रिकाऐं अपने यहा प्रकाशनों में फोटो लंबे चैड़े लगाती हैं पर शब्द होते हैं कम। बहुत बड़ा हीरो और हीरोइन का साथ में चिपके हुए फोटो और अक्षर कुल दस ‘प्रेम के चर्चे गर्म; चार अक्षर शीर्षक के और छह अक्षर की खबर। किसी खाने की चीज के बनाने की विधि बतायी जाती है पचास शब्दों में और फोटो होता है डेढ़ पेज में। तय बात है कि संपादक अपनी मेहनत बचाता है और प्रकाशक अपना पैसा!’

पत्र पत्रिकाओं के संपादक और प्रकाशक हमेशा ही इस देश में पूज्यनीय रहे हैं पर वह पाठकों को अपना भक्त नहीं मानते। उनके लिये भगवान है विज्ञापन। जहां तक लेखकों का सवाल है तो उनकी हालत तो मजदूर से भी बदतर है। पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों के गठजोड़ का मानना है कि ‘लिख तो कोई भी सकता है।’
इसी सोच के परिणाम यह है कि वह किसी ऐसे लेखक में रुचि नहीं रखते जो केवल लिखता हो बल्कि उनकी नजर में वही लेखक श्रेष्ठ है जो थोड़ा प्रेक्टिकल (व्यवहारिक) हो यानि चाटुकारिता में भी दक्ष हो।’
इसी कारण हिंदी में प्रभाव छोड़ने वाला न लिखा गया और लिखवाया गया। फिल्म और पत्रिकारिता में मौलिक लेखकों को अभाव है। नकल कर सभी जगह काम चलाया जा रहा है और कहते क्या हैं-हिंदी में अच्छा लिखने वाले कम है।’

बहुत समय यानि अट्ठाईस वर्ष पहले एक नाठककार ने अपने भाषण में कहा था कि-िहंदी में नाटक लिखने वाले कम हैं।’

उस समय अनेक कथित हिंदी साहित्यकार यह सुन रहे थे पर किसी ने कुछ नहीं बोला पर उस इस आलेख का लेखक का कहना चाहता था कि-‘‘हिंदी मेें कहानी लिखी जाती है एक नाटक की तरह जिसमें वातावरण और पात्र इस तरह बुने जाते हैं कि नाटक भी बन जाये। फिर रामायण और महाभारत के बारे में कोई क्या कह सकता है। वह ऐसी रचनायें रही है जिन पर अनेक नाटक और फिल्म बन चुकी हैं। उस समय प्रेमचंद की एक कहानी पर एक नाटक इस पंक्तियों का लेखक स्वयं देखकर आया था। वहां कहा इसलिये नहीं क्योंकि उस समय दिग्गजों के सामने एक नवयुवक की क्या हिम्मत होती?’

अपनी पूज्यता का भाव हिंदी के लेखकों के लिये हमेशा दुःखदायी रहा है। वह जब थोड़ा पुजने लगते हैं तो अपनी असलियत भूल जाते हैं और उनको लगता है कि वह हो गये संपूर्ण लेखक। तमाम तरह के साहित्येत्तर सहयोग के कारण वह अपने इहकाल में पुज जाते हैं पर बाद में उनको कोई याद नहीं करता। हां, कुछ ऐसे लोग जो स्वयं लिखना नहीं जानते उनकी रचनाओं को दूसरे लेखकों के मुकाबले प्रकाशन जगत में लाते हैं ताकि वह प्रसिद्ध नहीं हो सके। कुकरमुत्तों जैसी हालत है। जो लेखक नहीं है वह चालू है और लेखक होने का ढोंग कर पुराने लेखकों की रचनायें क्लर्क बनकर लाते हैं और जो लेखक हैं वह सीधे सादे होते हैं और फिर हिंदी भाषी समाज उनके प्रति गंभीर नहीं है।

परिणाम सामने हैं कि हिंदी में एसा कुछ नहीं लिखा और जो पढ़ने को मिल रहा जिसे विश्वस्तरीय मानना कठिन है। हिंदी में जो लेखक मौलिक लेखन कर रहे हैं वह एक तरह के नशेड़ी है और जो पढ़े रहे है वह भी कोई कम नहीं हैं। मुश्किल यह है कि पश्चिम से प्रभावित यहां के पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों का गठजोड़ इस बात से कोई मतलब नहीं रखता। इस देश में नीतियां ऐसी हैं कि नये आदमी को कहीं स्थापित होने का अवसर नहीं है यही कारण फिल्म,साहित्य,पत्रकारिता और व्यवसाय के क्षेत्र और परिवार को पनपने का अवसर नहीं मिल पाता। पत्र पत्रकायें छापी जाती हैं पर पाठक के लिये नहीं बल्कि विज्ञापनदाताओंं के लिये। संपादक यह नहीं सोचता कि पाठक को चित्र पसंद आयेंगे कि नहंी बल्कि वह शायर सोचता यह है कि मालिक और उसके परिवार को पत्रिका पंसद आना चाहियै। तय बात है कि कोई भी पत्र पत्रिका केवल फोटो से ही चमक सकती है। अब यह कौन किसको बताये कि शब्द पढ़ने वाले चित्र नहीं पढ़ा करते? उनको नशा होता है शब्द पढ़ना और लिखना। ऐसे नशेडि़यों को अच्छा पढ़ने और लिखने के लिये जो संघर्ष करना पड रहा है उस पर फिर कभी।
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ब्रहमाण्ड का रहस्य जानने का प्रयास नाकाम तो होना ही था-व्यंग्य

महामशीन के रूप में चर्चित महादानवीय मशीन का प्रयोग अब रुक गया है। अगर आज के सभ्य समाज में महिमा मंडित विज्ञान के भ्रम का चरम रूप देखना है तो इस मशीन को देखा जा सकता है। बात अगर ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानने की है तो वह केवल पंचतत्वों की कार्य परिधि में नहीं देखा जा सकता है। छठा तत्व है वह सत्य जो इनमें प्रविष्ट होकर फिर निकल गया पर यह पांच तत्व-आकाश, प्रथ्वी,जल,वायु, अग्नि-उसके बचे अंशों से विस्तार पा गये। इस संबंध में पहले ही अपने लेख में कह चुका हूं कि वह सत्य तत्व विज्ञान के किसी भी प्रयास से यहां नहीं लाया जा सकता। उसे कभी देखा तो नहीं पर अनुभव किया जा सकता है और उसके लिये एक ही उपाय है ध्यान। ध्यान में ही वह शक्ति है जो उस सत्य की अनुभूति की जा सकती है।

दरअसल ज्ञान के बाद जो विज्ञान की कार्य शुरु होता है उसमें उपयोग किये जाने वाले साधन शक्तिशाली होते हैं पर वह यही प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तुओं से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। ब्रह्माण्ड के जन्म का रहस्य भारतीय अध्यात्म ग्रंथों में वर्णित है साथ ही यह भी कि उस सत्य की महिमा और वर्णन अत्यंत व्यापक है जिसे कोई ज्ञानी ही अनुभव कर सकता है। ब्रह्माण्ड का रहस्य ने जिन पांच तत्वों से अपनी मशीन बनाई उसमें वह छठा तत्व कभी भी शामिल नहीं कर सकते अतः उन्हें अपने ज्ञान से ही उसका रहस्य समझना होगा। बेकार में इतना धन और परिश्रम कर रहे हैं।

मैंने अपने लेख में लिखा था कि अब वर्तमान में वैज्ञानिकों के पास बस एक ही बड़ा लक्ष्य रह गया है कि वह सूर्य की ऊर्जा का संग्रह करने वाला कोई ऐसा संयत्र बनायें जिससे पैट्रोल और परमाणु सामग्री के बिना ही वर्तमान विश्व का संचालन हो। वैसे उन्होंने अभी तक जो साधन बनाये हैं वह अधिक उपयोग नहीं है इसलिये विश्व अभी पैट्रोल पर अधिक निर्भर है। इस संबंध में मेरा लिखा गया लेख पुनः प्रस्तुत है।

ब्रह्माण्ड को जानने के लिये महादानव का प्रयास-व्यंग्य आलेख hasya vyangya
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महामशीन का महाप्रयोग हो गया। कुछ समय तक उसे महादानव कहकर भी प्रचारित कर प्रचार माध्यमों ने आम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। संभवतः लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था इसलिये उसका नकारात्मक प्रचार कर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने उस महामशीन का नाम प्रतिष्ठित किया। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि नाम करने के लिये बदनाम होने को भी कुछ लोग तैयार हो जाते हैं। कहते हैं कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है‘। शायद इसी तर्ज पर तमाम तरह की बातें की गयीं।

भारतीय संचार माध्यमों को भी अपने लिये चार दिन तक खूब सक्रियता दिखाकर अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का सुंदर अवसर मिला। विज्ञान की फतह-हां, यही शब्द प्रयोग किया है प्रचार माध्यमों ने उस सफल प्रयोग के लिये। पहले महादानव अब महादूत बन गया लगता है। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि पहले किसी को दानव बनाओ फिर देवदूत। इससे किसी विषय को लंबा खींचने का अवसर तो मिलता ही है उससे वह व्यक्ति भी संतुष्ट हो जाता है जिससे बदनाम किया गया पर ऐक बेजान मशीन को जिस तरह प्रचारित किया गया उसे प्रचार के बाजार में सक्रिय लोगों की तारीफ करने का मन करता है।

अब बात करें उस महादानव या महामशीन की जिसे आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गयी है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पति के रहस्य को जानना चाहते हैं। आश्चर्य है कि जो विषय विज्ञान की परिधि से कोसों दूर है वह उस पर काम कर रहे हैं। दुनियां की कोई शय उस रहस्य को नहीं देख सकती। जीवन से पहले और मृत्यु के बाद के रहस्य विज्ञान की शक्ति से बाहर हैं। उन्हें वही ज्ञानी जान सकता है जिसने अपनी इस देह से तपस्या की हो। यह काम हमारे ऋषि और मुनि कर चुके हैं। उन्होंेने इस ब्रह्माण्ड की उत्पति का रहस्य पहले ही बता दिया है।

उसकी संक्षिप्त कहानी इस तरह है कि सत्य बरसों तक ऐसे ही पड़ा हुआ था। उसे इतना समय व्यतीत हो गया कि वह स्वयं को असत्य समझने लगा तब वह प्रयोग करने निकला। पांच तत्व (प्रथ्वी,आकाश.जल.आकाश.और वायु) कणों के रूप में-जिन्हें आधुनिक भाषा में अणु भी कह सकते हैं-उसके समक्ष पड़े हुए थे। वह उनमें दाखिल हो गया तो उस देखने, सुनने सूंघने, और स्पर्श करने का अवसर मिला। वह इन तत्वों से निकल आया पर उसके अंश इसमें छूट गये और वह पांचों तत्व बृहद रूप लेते गये। उनके आपसी संपर्क से ब्रहमाण्ड का सृजन हुआ। यह कथा व्यापक है और इस पर चर्चा आगे भी की जा सकती है।

हमारे देश के ज्ञानी महापुरुषों ने पहले ही इसे जान लिया है। अब विज्ञान की बात करे लें। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों तक ही कार्य कर सकता है। उन्होंने इस महाप्रयोग में जिन भी चीजों का उपयोग किया वह कहीं न कहीं इसी धरती पर मौजूद हैं। यानि पांच तत्वों में एक तत्व। फिर जल, वायु और अग्नि का भी उन्होंने उपयोग किया होगा। चलो यह भी मान लिया। उन्होंनें आकाशीय तत्व के रूप में गैसों का भी प्रयोग किया होगा। हां, इसके बिना सब संभव नहीं है। मगर वह सत्य का तत्व जो निर्गुण, निराकार, और अदृश्य है उसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। उसे कोई छू नहीं सकता, उसे कोई देख नहीं सकता और जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है उस सत्य तत्व का प्रयोग केवल कोई तपस्वी ही कर सकता है। उस सत्य तत्व की केवल अनुभूति की जा सकती है और उसके लिये ध्यान और योग की प्रक्रिया है। जो इन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं वही उसकी अनुभूति कर पाते हैं।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति इस सत्य का जानता है फिर यह कौनसे ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने का प्रयास कर रहे है। यह अलग बात है कि अंग्रेजी की शिक्षा पद्धति ने लोगों को अपना अध्यात्मक भुला दिया है पर फिर भी कुछ लोग हैं जो इस सत्य का धारण किये रहते हैं। आधुनिक विज्ञान मंगल और बृहस्पति तक पहुंच गया है। हो सकता है वह सूर्य तक भी पहुंच जाये। वह ब्रह्माण्ड के अंतिम सिरे तक पहुंच जाये पर वह सत्य उसे नहीं दिखाई देगा। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के साथ ही विज्ञान का भी पोषक है। श्रीमद्भागवत गीता में विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। क्योंकि धर्म की रक्षा के लिये अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग अवश्यंभावी होता है इसलिये विज्ञान का विरोध करना तो मूर्खता है पर उसकी सीमाऐं हैं यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
हमारे देश ने एक समय योग साधना और ध्यान को नकार दिया था। पश्चिम से आयातित इलाज को ही प्राथमिकता दी जाने लगी। अब यह रहस्य तो सभी जगह उजागर है कि आधुनिक चिकित्सा के पास रोग को रोकने की क्षमता है पर मिटाने की नहीं। इसलिये अब डाक्टर ही अपने मरीजों को योगसाधना करने का मशविरा देते हैं। यानि भारतीय ज्ञान की अपनी महिमा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिम विज्ञान ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया है जबकि उसका तो कोई वजन है ही नहीं। आदमी मर जाता है तो उसका इतना वजन इसलिये कम हो जाता है क्योंकि कुछ हवा पानी म्ृत्यु के समय निकल जाता है। भारतीय और पश्चिम के विज्ञान बारंबार कहते हैं कि उनको ं ब्रह्माण्ड का रहस्य जानना है मगर पांच तत्वों के मेल से बने इस ब्रह्माण्ड को जानने के लिये क्या वैज्ञानिकों से किसी छठे तत्व को भी अपने प्रयोग को शामिल किया था। अरे, भई वह छठा तत्व किसी की पकड़ में नहीं आ सकता।

दुनियां का सबसे बड़ा प्रयोग-यही नाम उसे दे रहे हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों के पास कोई काम नहीं बचा है। हमारे हिसाब से वैज्ञानिकों के पास एक काम है जिस पर वह नाकाम हो रहे हैं। वह यह कि बिना तेल के कार,स्कूटर,वायुयान और घर की बिजली जल सके इस पर उनको काम करना चाहिये। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसकी तरफ अनेक वैज्ञानिक इशारा करते हैं। अगर वैज्ञानिको को करना ही है तो ऐसे यंत्र बनाये जो कि सूर्य से इस धरती पर आने वाली ऊर्जा का संयच तीव्र गति से कर सकें और बिना तेल और लकड़ी के लोगों का खाना बन सके। अभी तक तो धरती पर मौजूद तेल,गैस और अन्य रसायनों के भंडारों से ही सारा संसार चल रहा है। मतलब यह कि अभी धरती पर ही विजय नहीं पायी और आकाश में ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने चले हैं। अनेक लोग बिचारे रोज अखबार और टीवी इसलिये ही खोलकर देखते हैं कि कहीं कोई ऐसी चीज बनी गयी क्या जिससे बिना तेल और बिजली के उनका काम चल सके। स्कूटर चलाने के लिये अभी भी पैट्रोल पंप पर जाना पड़ता है और गैस के लिये फोन करना पड़ता हैं। कंप्यूटर चलाने के लिये लाईट खोलना पड़ती है। यह सब सौर ऊर्जा से हो जाये तो फिर माने कि विश्व के वैज्ञानिकों ने तरक्की की है।

जहां तक इन पश्चिमी वैज्ञानिकों की बात है वह अनेक तरह के अविष्कारों से नये नये साधन बना चुके हैं पर ऊर्जा के मामले में फैल हैं। परमाणु ऊर्जा का नाम बहुत है पर उसे केवल बम की वजह से जाना जाता है जो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये थे। अगर उससे कुछ बिजली बनी भी है तो वह कोई समस्या का हल नहीं हैं। बात तो तब मानी जाये जैसे स्कूटर हर कोई आदमी चला लेता है वैसे ही उसके पास ऐसे साधन भी हों कि वह घर बैठे ही सूर्य से ऊर्जा एकत्रित कर उसे चला सके। कहीं ऐसा तो नहीं पश्चिम के वैज्ञानिक केवल उसी स्तर तक काम करते हों जहां तक आम आदमी सुविधाओं का दास बने और स्वतंत्र रूप से विचरण न कर सकें। इस महाप्रयोग का प्रचार कितना भी हो पर वह छठा तत्व-जिसे वैज्ञानिक जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे-विज्ञान के कार्य करने की परिधि से बाहर है, यह बात तय है।
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