ईमानदारी पर सम्मेलन -हास्य व्यंग्य


दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग
‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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