अधर्मी व्यक्ति की तरक्की देखकर विचलित न हो-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख

                        विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच्चत्तम शिखर पर कोई सामान्य मनुष्य नहीं पहुंच सकता।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से अमीर नहीं बन सकता। अंग्रेजों  ने अनेक देशों में राज्य किया।  वहां से हटने से पूर्व  अपने तरह की व्यवस्थायें निर्माण करने के बाद ही किसी देश को आजाद किया।  यही कारण है सभी देशों में आधुनिक राज्यीय, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के शिखर पर अब सहजता से कोई नहीं पहुंच पाता।  यही कारण है कि उच्च शिखर पर वही पहुंचते हैं जो साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार की नीतियां अपनाने की कला जानते हैं। याद रहे यह नीतियां केवल राजसी पुरुष की पहचान है। सात्विक लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह उस राह पर चलें। वैसे भी शिखर वाली जगहों पर राजसी वृत्ति से काम चलता है। ऐसे में उच्च स्थान पर पहुंचने वालों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह निष्काम भाव से कर्म तथा निष्प्रयोजन दया करें। 

मनु स्मृति में  कहा गया है कि

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अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।

            हिन्दी में भावार्थ-अधर्मी व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों के कारण भले ही उन्नति करने के साथ ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखे पर अंततः वह जड़ मूल समेत नष्ट हो जाता है।

            राजसी पुरुषों का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में जो तेजी से विकास होता है उसे देखकर सात्विक प्रवृत्ति के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। खासतौर से युवा वर्ग को शिखर पुरुषों का जीवन इस तरह का तेजी से विकास की तरफ बढ़ता देखकर उनके आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।  जिनकी प्रकृति सात्विक है वह तो अधिक देर तक इस पर विचार नहीं करते पर जिनकी राजसी प्रवृत्ति है वह अपना लक्ष्य ही यह बना लेते हैं कि वह अपने क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंचे। न पहुंचे तो  कम से कम किसी बड़े आदमी की चाटुकारिता उसके नाम का लाभ उठायें।  यह प्रयास सभी को फलदायी नहीं होता। सच बात तो यह है कि कर्म और और उसके फल का नियम यही है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। देखा यह भी जाता है कि उच्च शिखर पर येन केन प्रकरेण पर पहुंचते हैं उनका पतन भी बुरा होता है।  इतना ही नहीं भले ही बाह्य रूप से प्रसन्न दिखें आंतरिक रूप से भय का तनाव पाले रहते हैं।  अतः दूसरों का कथित विकास देखकर कभी उन्हें अपना आदर्श पुरुष नहीं मानना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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मुफ्त में हमदर्द नहीं मिलता-हिंदी व्यंग्य कविता

हमें मंजिल पर वह क्या पहुंचायेंगे जिनकी चाल में बेईमानी है,

आसरा क्या देंगे बेबसों को बेदखल करने की जिन्होंने ठानी है,

हर शहर में बड़ी बड़ी इमारतों के जंगल खड़े हैं,

जिनके दिल पत्थर के हैं वही कहलाते जज़्बातों के ठेकेदार बड़े हैं,

नये से पुराने होते सामान में लोग खूब खुशी नचते पा रहे हैं,

तरक्की की दीवार के पीछे अपराध पुण्य बनकर बचते जा रहे हैं,

ज़माने में चर्चा  है कि आकाश से उतरकर धरती पर जरूर आयेंगे,

बिखेर देंगे बिना दाम लिये बहार रोती सूरतों को जमकर हंसायेंगे,

कहें दीपक बापू अपना दिल बहलाना खुद ही सीख लो

मुफ्त में कोई हमदर्द नहीं मिलता यह सच्चाई हमने जानी है।

————— 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का प्रायोगिक प्रयास

यह विडियो प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा रहा. अगर पाठकों और दर्शकों पसंद आया तो आगे भी ऐसे प्रयास होते रहेंगे। यह एक महानुभाव के अनुरोध पर प्रस्तुत किया जा रहा है. http://youtu.be/VvdgZmhxN8A

भारतीय योग दर्शन-समाधि से क्लेशों का नाश होता है

                 भारतीय पतंजलि योग विज्ञान अत्यंत व्यापक है और इसे पूरी तरह बिना समझे कोई गुरु जैसी पदवी की योग्यता धारण नहीं कर सकता। योगसाधना की चरमस्थिति समाधि है। संसार, देह और अन्य सभी प्रकार के भौतिक पदार्थों के अस्तित्व के आभास से रहित होना ही समाधि है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि देह के क्लेशों से रहित होकर आत्मा में ही अपना ध्यान स्थापित करना भी योग का सर्वश्रेष्ठ रूप है।
योग साधना का यह आशय कतई नहीं है कि आसन या प्राणायाम कर ही इतिश्री समझ लें। यह दोनों तो आष्टांग योग के दो भाग मात्र हैं। इसका अंतिम भाग समाधि है जहां तक पहुंचने के लिये प्राणायाम तथा आसन तो मार्ग मात्र हैं। शून्य में स्थापित होने पर ही समाधि की अवस्था समझना चाहिए।
        पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
                       ——————
               तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।।
        ‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर में ध्यान लगाना क्रिया योग है।’
               समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।
          ‘यह समाधि की सिद्धि करने वाला और अविद्या जैसे क्लेशों का नाश करने वाला है।’
                अविद्यास्मितारागद्वेषभिनिवेशाः क्लेशः।
           ‘अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह सभी क्लेश हैं।
           तत्वज्ञान होने पर ही मनुष्य को इस संसार का पूर्ण आंनद मिल सकता है। इसलिये क्रिया योग करना आवश्यक है। क्रिया योग का आशय तप, स्वाध्याय और परमात्मा के नाम का स्मरण करना है। प्राणयाम तथा योगासन से शरीर और मन में स्फूर्ति आती है तब किसी रचनात्मक कर्म की प्रेरणा स्वतः प्राप्त होती है। देह में विचर रही ऊर्जा किसी सकारात्मक कर्म के लिये प्रेरित करती है। ऐसे में तप और स्वाध्याय के माध्यम से क्रिया योग कर संसार को समझा जा सकता है। नये विषयों की खोज, अनुसंधान और शोध के लिये प्रयत्नशील होना चाहिए भले ही इससे शरीर को थोड़ा कष्ट पहुंचे। यह प्रयास तप करने जैसा ही होता है। संबंधित ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी स्वाध्याय की भूख को जिज्ञासा से उपजी भूख को भी शांत करना चाहिए। इसी क्रिया योग से ही योग साधना के अभी तक उद्घाटित न किये गये रहस्यों को भी समझा जा सकता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior
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इंसान की फितरत-हिन्दी कविताएँ

कभी उनके पाँव
तन्हाई की ओर तरफ चले जाते हैं,
मगर फिर भी भीड़ के लोगों के साथ गुजरे पल
उनको वहाँ भी सताते हैं,
कुछ लोग बैचेनी में जीने के
इतने आदी होते कि
अकेले में कमल और गुलाब के फूल भी
मुस्कराहट नहीं दे पाते हैं।
———-
जहां जाती भीड़
कभी लोग वहीं जाते हैं,
दरअसल अपनी सोची राह पर
चलने से सभी घबड़ाते हैं।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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अपने अपने बयान-हिन्दी शायरी

ज़िंदगी का फलसफा अभी तक कोई समझा नहीं
मगर कामयाबी के तरीके हर कोई बता रहा है।
खामोशी हर मर्ज की दवा है,मगर मुश्किल है
अपने बेकार बयानों से हर कोई हमें सता रहा है।
दुनिया की दौलत की पीछे दौड़ रहा आदमी
खुद को जमाने का पहरेदार जाता रहा है।
कहें दीपक बापू कब्जे की ज़मीन और चुराये पौधे
इंसान अपने लिए मालिक का खिताब लगा रहा है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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दौलत, ताकत और शौहरत की आग-हिन्दी व्यंग्य कविता

दौलत को सलाम है,
हुकूमत के आगे ही झुका हर इंसान
चाहे खास है या आम है,
क्या करे कमजोर हाथ
जहां ताकत से होता काम है।
कहें दीपक बापू
जिनको लग गयी है
दौलत, ताकत और शौहरत की आग,
फिर जाता है उनका दिमाग
हों जाती है उनकी जमाने से दूरी,
हँसे देखकर दूसरे की बेबसी और मजबूरी,
दूसरे की बेचैनी में ढूंढते हैं चैन,
नींद नहीं पाते उनके भी नैन,
उछलें चाहे जितना
मिल जाता है एक दिन मिट्टी में उनका भी नाम।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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