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गरीब की खुशी पर रोते-हिन्दी व्यंग्य कविता (garib ki khushi par rote-hindi vyangya kavita)

अपनी खुशी पर हंसने की बजाय
दूसरे के सुख रोते
इसलिये इंसान कभी फरिश्ते नहीं होते।
मुखौटे लगा लेते हैं खूबसूरत लफ़्जों का
दरअसल काली नीयत लोग छिपा रहे होते।
दौलत के महल में बसने वाले
खुश दिखते हैं,

 मगर  गरीब की पल भर की खुशी पर वह भी रोते।
सोने के सिंहासन पर विराजमान
उसके छिन जाने के खौफ के साये में
जीते लोग
कभी किसी के वफादार नहीं होते।
———–

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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तरक्की और कामयाबी-हिन्दी शायरी

अपनी मदद खुद कर सको, उतना ही आगे जाना।
तरक्की और कामयाबी के ख्वाब में यूं न खो जाना।।
बिकते हैं सपने बाज़ार में, मु्फ्त का खेल दिखाकर,
तरक्की के रास्ते चल, उधार के जाल में न फंस जाना ।।
———–
मोहब्बत शादी के अंजाम
तक आशिक और माशुका
शायद इसलिये पहुंचाते हैं
क्योंकि जिस्म की हवस मिटते ही
साथी के बेवफा होने से डर जाते हैं।
———

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता

सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
…………………….
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।

………………………………
पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
………………..

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अपने दर्द से छिपना हर इन्सान की होती आदत -व्यंग्य कविता

उसने कहा कवि से
‘तू क्यों कविता लिखता है
सारे जमाने का दर्द समेट कर
अपने शब्दों में
अपनी ही पीड़ाओं से स्वयं छिपता है
बजती होंगी तेरी कविताओं पर
सम्मेलनों में तालियां
पर पीठ पीछे पड़ती है गालियां
कई लोगों के साथ तेरे शब्दों का भंडार भी
कूड़े के ढेर में दिखता है
भला शब्दों के सहारे भी
कभी दुनियां का सच टिकता है
जो तू कविता लिखता है’

कहा कवि ने
‘हर इंसान की तरह मेरी भी आदत है
अपने दर्द से छिपना
पर मैं हंसता नहीं किसी का दर्द देखकर
बात तो अपनी ही कहता हंू
शब्दों में वही होता है जो मैं सहता हूं
भले ही लगे दूसरे के दर्द पर लिखना
कवियों पर लोग फब्बितयां कसते हैं
पर खुद अपनी पीड़ाओं के आंसू
अंदर पीते हुए
दूसरे के दर्द पर सभी हंसते हैं
फिर अपने ही बुने जाल में फंसते हैं
लोग छिप रहे हैं अपने पापों से
अपनी ही हंसने की इच्छाओं के पूरे होने की
उम्मीद कर रहे हैं दूसरे के स्यापों से
अगर हल्का हो जाता है उनका दर्द
तो देते रहें कवियों का गालियां
फिर सम्मेलनों में वही बजाते हैं तालियां
पर कवि अपनी बात से किसी को नहीं रुलाते
अपने आंसु छिपाकर दूसरे को हंसाते
भाग रहा है जमाना अपने आप से
खौफ खाता है एकालाप से
लोगों को नहीं आती दिल की बात कहने की कला
इसलिये कवियों की कवितायें लगती हैंं बला
अपना दर्द दूसरे का बताकर
कवि अपना बोझ हल्का कर जाते हैं
बोझिल लोग इसलिये उनसे चिढ़ खाते हैं
दर्द बहुत है
इसलिये कवि भी बहुत लिखते हैं
शिकायत बेकार है लोगों की
दर्द का व्यापार करने की
उनकी बदौलत ही तो
बाजार में दर्द बिकता है
इसलिये कवि लिखता है

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