पुरालेख

घर का रोना-हास्य व्यंग्य कविता (ghar ka rona-vyangya kavita

छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
……………………………….
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Advertisements

होली के रंग में मेकअप बिगड़ जायेगा-हास्य व्यंग्य कविताएँ (holi ke rang hasya kavita ke sang-hindi haasya kavitaeen)

एक लड़की ने दूसरी से पूछा
‘क्या होली पर तुम्हारा
प्रेमी भी रंग खेलने आयेगा
मैं भी उसका मूंह काला करूंगी
जब वह तुमसे मिलने आयेगा’

दूसरी ने कहा
‘आने को तो वह कह रहा था
पर मैंने बाहर जाने का
बहाना कर मना कर दिया
क्योंकि वह मुझे देखता है मेकअप में
अगर रंग डालेगा तो सब बिगड़ जायेगा।
बदल सकती है उसकी नजरें
जब मेरी असली सूरत देख जायेगा।
वैसे भी तुमने देखा होगा
टीवी और अखबारों में प्रेमियों की
चर्चा नहीं नहीं होती
मेकअप से मिला प्यार नहीं टिक सकता
पानी की धार इतनी तेज होती
होली का एक दिन उससे दूर रहने पर
मेरा यह प्यार बच जायेगा।
……………………..
इंटरनेट पर होली के रंग
दोस्तों के अंदाज-ए-बयां में नजर आते है।
कोई एक जैसी टिप्पणी सभी दरवाजों पर फैंकते
कोई साथ में पाठ भी चिपका जाते हैं।
चलता कोई नहीं दिखता
पर भागमभाग सभी करते नजर आते
लाल,गुलाबी,पीले और हरे रंग
दिल नहीं बहला पाते जितना
उससे अधिक दोस्तों की अदाओं के रंग
अधरों पर मुस्कान बिखेर जाते हैं।

………………………………

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता

चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना
भला कौनसी अक्लमंदी है
सब कुछ करते हैं हम
अपने नाम के लिए
लेते हैं इसका और उसका नाम
हम करतार नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी हर पर अपना काम
लिखा हो यही मानते हैं
आजाद लगती हैं अक्ल
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को
निभाने के लिए समाज की बंदी है

भोर में ही शुरू शोर -हिन्दी कविता साहित्य

अभी हुई है भोर
शुरू कर दिया उन्होने शोर
कैसे न होंगे दिन भर बोर

जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था
वहाँ लगा रहे हैं दिमाग पर जोर
कुछ सीखना था प्रात:
परमात्मा का नाम लेकर
डाल दिया मुहँ में रोटी का कोर
आदमी सुख तो चाहता है
पर दिल में उसके अहसास के लिए
कोई कोना बाकी नहीं है
चारों तरफ भरा है शोर
—————————

रौशनी और अँधेरे का व्यापार-हास्य कविता

वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
यादों पर ग्रहण लग जाता है
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि
कौनसा सा वादा बरसाया जाये
किस याद को लोगों के दिमाग
से भुलाया जाये
तमाम के लगाते नारे रचकर
हवाई किला किया जाता है खडा
जो कभी खुद नहीं चलते
उसके दरवाजे कितने भी हों आकर्षक
रास्ता एक कदम बाद ही
दीवार से टकरा जाता है
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए
अभिनय करते हुए जजबातों के
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए
अँधेरे का डर दिखाकर
अपना करते हैं व्यापार
कहते हैं कि दूध का जला
छांछ भी फूंक कर पी जाता है
पर यहाँ तो आदमी कई बार
जलने के बाद भी आदमी
फिर पीने के लिए जीभ जलाने आ जाता है
———————————————————

अँधेरे न होते तो
रौशनी का व्यापार कौन करता
रोशनी ही न होती अंधेरों से कौन डरता
जिन्दगी इसी घूमते पहिये का नाम है
एक करता जेब खाली दूसरा भरता
————————————–
नोट-यह पत्रिका कहीं भी लिंक कर दिखाने की अनुमति नहीं है. दीपक भारतदीप, ग्वालियर