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सच के नाम पर सजा झूठ-हिन्दी शायरी

हिन्दी साहित्य,समाज,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,hindi shaitya,sher,shतमाम रस्में निभाकर भी
हम क्या पाते हैं,
पुराने बयान पर आंखें बंद कर यकीन के साथ
यूं ही जिंदगी में चले जाते हैं।
इंसानों की सोच पर बंधन डाले हैं
सर्वशक्तिमान के संदेश की किताबें लिखने वालों ने
हम हंसते हुए बंधे क्यों चले जाते हैं,
कभी बहाओ अपनी अक्ल की धारा
देखना फिर उसमें
सच के नाम पर सजे कितने झूठ बहते नज़र आते हैं।
————-
ताउम्र गुज़ार दी निभाते हुए रस्में
खाते रहे आकाश की कसमें,
पर बैचेन रहे हमेशा यहां।
अपनी अक्ल से
अगर हाथ हिलें नहीं,
पांव कभी चले नहीं,
आंखों से कभी नहीं निहारा,
कान अपनी इच्छा से सुने न बिचारा,
तब मिलता भला चैन कहां।
———–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
———-
मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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कर्जे और किश्तों में जिंदगी-आलेख और कविता (loan and lifr-hindi article and poem)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।

 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
—————–
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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सुख का किश्तों पर मिलना-हास्य कविताएँ (sukh kishton men-hasya kavitaen)

आंधी चलकर फिर रुक जाती है
धरती हिलती नहीं भले कांपती नजर आती है।
मौसम रोज बदलते हैं
उससे तेज भागते हैं, आदमी के इरादे
पर सांसें उसकी भी
कभी न कभी उखड़ जाती हैं
फिर भी जिंदगी वहीं खड़ी रहती है
भले अपना घर और दरवाजे बदलती जाती है।
………………………
उधार के आसरे जीने की
ख्वाहिशें अपनी ही दुश्मन बन जाती हैं।
किश्तों में मिला सुख
भला कब तक साथ निभायेगा
किश्तें ही उसे बहा ले जाती हैं।

……………………….
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जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

…………………………
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क्यों जंग का बिगुल बजा रहे हो-हिन्दी शायरी

कमरों में बंद दौलत लूटकर
लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर।
उसकी चकाचैंध में
रौशनी खो बैठे उनके नूर।
अल्मारी में बंद किताबों को
जलाकर कर रख कर दिया
तलवारों से बहाकर खून की नदियां
राहगीरों को दर-ब-दर कर दिया
तुम उनकी यादों को संजोकर
क्यों जंग का बिगुल बजा रहे हो
किसलिये अपने लहू को रंग की
तरह सजा रहे हो
जबकि तुम उनको किताबें पढ़कर ही
जानते हो
जिंदगी की बिसात पर
प्यादों की तरह पिटे बादशाहों को
सिकंदर मानते हो
अपने ही अंधेरे इतिहास में
बेकार है कुछ ढूंढने की कोशिश कराना
अपनी सोच का चिराग क्यों नहीं जलाते
जिसकी रौशनी पहुंचे बहुत दूर।।

………………………….

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सब चलता है-हास्य व्यंग्य कविताएँ

हम खड़े हैं जहां
छू रहा है चारों तरफ से
डीजल और पेट्रोल का धुआं।
कोई बात नहीं
सब चलता है
यह भी चलेगा
गर्व करो इस पर
आखिर है यह विकास का कुआं।
………………………….
उसने नकली घी दिया
इसने नकली नोट दिया।
इस तरह नकल के युग में भी
ईमानदारी को जिंदा किया।
……………………
अपनी बूढ़ी मां को
गंभीर हालत में चिकित्सक के पास
ले जाते हुए उन्होंने अपने बेटे से कहा
‘बेटा! अब तो तुम्हारी दादी का
समय आ गया लगता है।
अपनी मां और बहिन के साथ
तुम भी घर का ध्यान रखना
किस्मत ही जिद्द पर अड़ी हो तो
अलग बात है
वरना तो डाक्टर के नर्सिंग होम में
दाखिले का पर्चा ही
श्मशान में दाखिले के टिकट की तरह लगता है।’

…………………………

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झूठ भी सच की तरह सजाते-व्यंग्य कविता

हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच की तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए हैं
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी है
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

———————————————–
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप ग्वालियर

धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएँगे-व्यंग्य कविता

उनकी अदाओं को देखकर
वफाओं का आसरा हमने किया.
उतरे नहीं उम्मीद पर वह खरे
फिर भी कसूर खुद अपने को हमने दिया.
दिल ही दिल में उस्ताद माना उनको
अपनी बेवफाई से उन्होंने
वफ़ा और यकीन को मोल हमें बता दिया.
————————
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए
कदम कदम पर जंग लड़ते लोग
किसी को भरोसा कैसे निभाएँगे.
मयस्सर नहीं जिनको चैन का एक भी पल
किसी दूसरे की बेचैनी क्या मिटायेंगे.
वादे कर मुकरने की आदत
हो गयी पूरे ज़माने की
नीयत हो गयी दूसरे के दर्द पर कमाने की
ऐसे में कौन लोग किसके खिलाफ
धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएंगे.
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कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा-व्यंग कविता

वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा
हवस की मोहब्बत का पैमाना उससे बढ़ेगा
टूटे बिखरे लोगों का मन
मोहब्बत के नाम से ही फड़केगा
खरीददार बहुत हैं जज्बातों के
असल में नहीं मिलते जो
इसलिये तस्वीरों से उनका दिल मचलेगा
बाजार में सजाते हैं सौदागर
मोहब्बत के पैगाम
उसी से ही चलता है उनका काम
ख्वाब दिखाकर ही मिल जाता उनको दाम
अपनी हकीकत से भागते हैं लोग
झूठे दिखावे से उनक चेहरा महकेगा
अगर सच से रखते हो वास्ता
तो नहीं है तुम्हारा रास्ता
मन में चैन रहेगा और दिल में सुकून
पर कोई आदमी तुम्हारे पास नहीं फटकेगा

……………………………..

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कुछ पल आंसू बहाने के बाद सब भूल जाते हैं-हिंदी शायरी

अच्छा लगता है दूसरों की
जंग की बात सुनकर
पर आसान नहीं है खुद लड़ना
दूसरों के घाव देखकर
भले ही दर्द उभरता है दिल में
पर बहता हो जब अपना खून
तब इंसान को दवा की तलाश में भटकना

अपने हथियार से दूसरों का
खूना बहाना आसान लगता है
पर जब निशाने पर खुद हों तो
मन में खौफ घर करने लगता है
दूसरों के उजड़े घर पर
कुछ पल आंसू बहाने के बाद
सब भूल जाते हैं
पर अपना उजड़ा हो खुद का चमन
तो फिर जिंदगी भर
उसके अहसास तड़पाते हैं
बंद मुट्ठी कुछ पल तो रखी जा सकती है
पर जिंदगी तो खुले हाथ ही जाती जाती है
क्यों घूंसा ताने रहने की सोचना
जब उंगलियों को फिर है खोलना
जंग की उमर अधिक नहीं होती
अमन के बिना जिदंगी साथ नहीं सोती
ओ! जंग के पैगाम बांटने वालों
तुम भी कहां अमन से रह पाओगे
जब दूसरों का खून जमीन पर गिराओगे
क्रिया की प्रतिक्रिया हमेशा होती है
आज न हो तो कल हो
पर सामने कभी न कभी अपनी करनी होती है
मौत का दिन एक है
पर जिंदगी के रंग तो अनेक हैं
जंग में अपने लिये चैन ढूंढने की
ख्वाहिश बेकार है
अमन को ही कुदरत का तोहफा समझना
जंग तो बदरंग कर देती है जिंदगी
कर सको भला काम तो
हमेशा दूसरे के घाव पर मल्हम मलना

…………………………………
आकाश में चांद को देखकर
उसे पाने की चाह भला किसमें नहीं होती
पर कभी पूरी भी नहीं होती

शायरों ने लिखे उस पर ढेर सारे शेर
हर भाषा में उस पर लिखे गये शब्द ढेर
हसीनों की शक्ल को उससे तोला गया
उसकी तारीफ में एक से बढ़कर एक शब्द बोला गया
सच यह है चांद में
अपनी रोशनी नहीं होती
सूरज से उधार पर आयी चांदनी
रोशनी का कतरा कतरा उस पर बोती
मगर इस जहां में बिकता है ख्वाब
जो कभी पूरे न हों सपने
उनकी कीमत सबसे अधिक होती
सब भागते हैं हकीकत से
क्योंकि वह कभी कड़वी तो
कभी बहुत डरावनी होती
सूरज से आंख मिला सके
भला इतनी ताकत किस इंसान में होती

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जिसका नहीं कोई सगा, उससे कभी होता नहीं दगा- व्यंग्य कविता

उन आंखों से क्या, दया की चाहत करना
जिनमें शर्म-ओ-हया का पानी सूख गया हो
उन होठों से क्या, मीठे बोल की उम्मीद करना
जिनकी जुबान से प्यार का शब्द रूठ गया हो
उस जमाने से क्या, मदद मांगना
नाम के दोस्त तो बहुत हैं
पर निभाने का मतलब कौन जानता है
मतलब के लिये सब हो जाते साथ
उससे अधिक कौन किसे मानता है
वफा की उम्मीद उनसे क्या करना
जिन्होंने अपना यकीन खुद लूट लिया हो
दगा किसी का सगा नहीं
पर जिसका नहीं कोई सगा
उससे कभी होता नहीं दगा
अपने बनते है कुछ पल के लिये लोग
काम निकल गया तो भूल जाते हैं
वह क्या याद करेंगे फिर
जिन्होंने हमेशा भूलने का घूंट पिया हो

जिनका कोई नहीं बनता अपना
विश्वासघात का खतरा उनको नहीं होता
जुटाते हैं जो भीड़ अपने साथ
रखते हैं उसका स्वार्थ अपने हाथ
पूरा करें या नहीं, ललचाते जरूर हैं
अपने हाथ उठाकर,क्या उनसे मांगना
जिन्होंने ओढ़ ली है बनावटी हरियाली
पर अपना पूरा जीवन ठूंठ की तरह जिया हो

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शायद ऐसे ही सजता है अखबार-हास्य कविता

हादसों की ख़बरों से भरा हुआ अख़बार
ढूंढ रहे हैं शब्द लोग
अपने दिल को लुभाने वाले
विज्ञापनों से सजा रंगीन पृष्ठ
ढेर सारे शब्दों की पंक्तियों से
गुजर जाती हैं दृष्टि
पर बैचेनी बढाते जाते हैं शब्द
कहीं सूखे हैं अकाल से
तो कहीं उफनते हैं वर्षा से नदी और नाले
कही चटके हैं किसी घर के ताले
कही पकड़े हैं नकली माल बनाने वाले
चमकता लगता है
बहुत सारे हादसों से अख़बार

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