पुरालेख

मुश्किल का हल-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (mushkil ka hal-hindi hasya vyangya kavita)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
”यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें..”

सुनकर दूसरा बोला 
“सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें..”
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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तरक्की और कामयाबी-हिन्दी शायरी

अपनी मदद खुद कर सको, उतना ही आगे जाना।
तरक्की और कामयाबी के ख्वाब में यूं न खो जाना।।
बिकते हैं सपने बाज़ार में, मु्फ्त का खेल दिखाकर,
तरक्की के रास्ते चल, उधार के जाल में न फंस जाना ।।
———–
मोहब्बत शादी के अंजाम
तक आशिक और माशुका
शायद इसलिये पहुंचाते हैं
क्योंकि जिस्म की हवस मिटते ही
साथी के बेवफा होने से डर जाते हैं।
———

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यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
———-
मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
———-

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जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता

सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
…………………….
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।

………………………………
पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
………………..

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नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita

फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

………………………………

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क्यों जंग का बिगुल बजा रहे हो-हिन्दी शायरी

कमरों में बंद दौलत लूटकर
लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर।
उसकी चकाचैंध में
रौशनी खो बैठे उनके नूर।
अल्मारी में बंद किताबों को
जलाकर कर रख कर दिया
तलवारों से बहाकर खून की नदियां
राहगीरों को दर-ब-दर कर दिया
तुम उनकी यादों को संजोकर
क्यों जंग का बिगुल बजा रहे हो
किसलिये अपने लहू को रंग की
तरह सजा रहे हो
जबकि तुम उनको किताबें पढ़कर ही
जानते हो
जिंदगी की बिसात पर
प्यादों की तरह पिटे बादशाहों को
सिकंदर मानते हो
अपने ही अंधेरे इतिहास में
बेकार है कुछ ढूंढने की कोशिश कराना
अपनी सोच का चिराग क्यों नहीं जलाते
जिसकी रौशनी पहुंचे बहुत दूर।।

………………………….

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धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएँगे-व्यंग्य कविता

उनकी अदाओं को देखकर
वफाओं का आसरा हमने किया.
उतरे नहीं उम्मीद पर वह खरे
फिर भी कसूर खुद अपने को हमने दिया.
दिल ही दिल में उस्ताद माना उनको
अपनी बेवफाई से उन्होंने
वफ़ा और यकीन को मोल हमें बता दिया.
————————
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए
कदम कदम पर जंग लड़ते लोग
किसी को भरोसा कैसे निभाएँगे.
मयस्सर नहीं जिनको चैन का एक भी पल
किसी दूसरे की बेचैनी क्या मिटायेंगे.
वादे कर मुकरने की आदत
हो गयी पूरे ज़माने की
नीयत हो गयी दूसरे के दर्द पर कमाने की
ऐसे में कौन लोग किसके खिलाफ
धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएंगे.
———————

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होली के रंग में मेकअप बिगड़ जायेगा-हास्य व्यंग्य कविताएँ (holi ke rang hasya kavita ke sang-hindi haasya kavitaeen)

एक लड़की ने दूसरी से पूछा
‘क्या होली पर तुम्हारा
प्रेमी भी रंग खेलने आयेगा
मैं भी उसका मूंह काला करूंगी
जब वह तुमसे मिलने आयेगा’

दूसरी ने कहा
‘आने को तो वह कह रहा था
पर मैंने बाहर जाने का
बहाना कर मना कर दिया
क्योंकि वह मुझे देखता है मेकअप में
अगर रंग डालेगा तो सब बिगड़ जायेगा।
बदल सकती है उसकी नजरें
जब मेरी असली सूरत देख जायेगा।
वैसे भी तुमने देखा होगा
टीवी और अखबारों में प्रेमियों की
चर्चा नहीं नहीं होती
मेकअप से मिला प्यार नहीं टिक सकता
पानी की धार इतनी तेज होती
होली का एक दिन उससे दूर रहने पर
मेरा यह प्यार बच जायेगा।
……………………..
इंटरनेट पर होली के रंग
दोस्तों के अंदाज-ए-बयां में नजर आते है।
कोई एक जैसी टिप्पणी सभी दरवाजों पर फैंकते
कोई साथ में पाठ भी चिपका जाते हैं।
चलता कोई नहीं दिखता
पर भागमभाग सभी करते नजर आते
लाल,गुलाबी,पीले और हरे रंग
दिल नहीं बहला पाते जितना
उससे अधिक दोस्तों की अदाओं के रंग
अधरों पर मुस्कान बिखेर जाते हैं।

………………………………

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कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा-व्यंग कविता

वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा
हवस की मोहब्बत का पैमाना उससे बढ़ेगा
टूटे बिखरे लोगों का मन
मोहब्बत के नाम से ही फड़केगा
खरीददार बहुत हैं जज्बातों के
असल में नहीं मिलते जो
इसलिये तस्वीरों से उनका दिल मचलेगा
बाजार में सजाते हैं सौदागर
मोहब्बत के पैगाम
उसी से ही चलता है उनका काम
ख्वाब दिखाकर ही मिल जाता उनको दाम
अपनी हकीकत से भागते हैं लोग
झूठे दिखावे से उनक चेहरा महकेगा
अगर सच से रखते हो वास्ता
तो नहीं है तुम्हारा रास्ता
मन में चैन रहेगा और दिल में सुकून
पर कोई आदमी तुम्हारे पास नहीं फटकेगा

……………………………..

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जिसका नहीं कोई सगा, उससे कभी होता नहीं दगा- व्यंग्य कविता

उन आंखों से क्या, दया की चाहत करना
जिनमें शर्म-ओ-हया का पानी सूख गया हो
उन होठों से क्या, मीठे बोल की उम्मीद करना
जिनकी जुबान से प्यार का शब्द रूठ गया हो
उस जमाने से क्या, मदद मांगना
नाम के दोस्त तो बहुत हैं
पर निभाने का मतलब कौन जानता है
मतलब के लिये सब हो जाते साथ
उससे अधिक कौन किसे मानता है
वफा की उम्मीद उनसे क्या करना
जिन्होंने अपना यकीन खुद लूट लिया हो
दगा किसी का सगा नहीं
पर जिसका नहीं कोई सगा
उससे कभी होता नहीं दगा
अपने बनते है कुछ पल के लिये लोग
काम निकल गया तो भूल जाते हैं
वह क्या याद करेंगे फिर
जिन्होंने हमेशा भूलने का घूंट पिया हो

जिनका कोई नहीं बनता अपना
विश्वासघात का खतरा उनको नहीं होता
जुटाते हैं जो भीड़ अपने साथ
रखते हैं उसका स्वार्थ अपने हाथ
पूरा करें या नहीं, ललचाते जरूर हैं
अपने हाथ उठाकर,क्या उनसे मांगना
जिन्होंने ओढ़ ली है बनावटी हरियाली
पर अपना पूरा जीवन ठूंठ की तरह जिया हो

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प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं-हिंदी शायरी

उगते सूरज को करें सभी नमन
डूबते से कभी नजर न मिलाएं
कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी
अपने चारों और फैले
पद, पैसा और प्रतिष्ठा की रोशनी को
अपनी ही ऊर्जा से
चमकने वाली समझ बैठता
जब गिरता है तो उसे सब तरफ
अंधेरा नजर आता है
जिस पर करता था भरोसा
वही दुश्मन नजर आता है
फिर भी उस समय देता है
जमाने को दोष
सच से मूँह छिपाता है
जिन्हें सच का ज्ञान है वह ढूंढते हैं
दिल का ही चैन और अमन
शिखर के ऊपर हों या
जमीन पर हों उनके पाँव
किसी भी क्षण में न पछताएँ
—————————–
प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं
घृणा और विवाद फैलाता
खुद आदमी सब जगह
प्रेम की भाषा कभी समझता नहीं
दोष देता है जमाने को
अपने अहंकार को छोड़ता नहीं
———————–

prem ki bhasha,aadmi,knowledge of true,poem on love,vivad,dosh,sach ka gyan,anhkar,samay,zamin aur asman,zameen aur aasman,

आदमी के सामने ही हो जाता अंधेरे का व्यापार-व्यंग्य एवं कविता( hasya vyangya)

एक नया कवि मंच पर कविता सुनाने के लिये बुलाया गया तो उसने आते ही कहा‘,आज मैं अपनी एक कविता सुनाने जा रहा हूं। यह जोरदार कविता है। सुनिये-
अरे, पुराने घाघ कवियों
रोज रोज मंचों पर क्यों चले आते हो
अपनी पुरानी रचनायें सुनाते हो
सब हो गये बोर तुमसे
अब यहां से रिटायर हो जाओ
ताकि नये लोग आ सकें
पुराने और कबाड़ के माल जैसे लगते हो
तुम यहां से रुखसत हो जाओ’’

लोगों ने बहुत जोर से तालियां बजाईं। वाह वाह की आवाज से पूरा मैदान गूंज उठा। मंच पर बाकी कवि सन्नाटे में बैठे रहे। वह कवि भी माइक से हट गया तो दर्शक चिल्लाये-‘अरे, भई अपनी कविता तो सुनाओ। तब तो इन पुराने कवियों को रुखसत करें।’

नये कवि ने कहा-‘यह कविता नहीं तो और क्या थी? कितनी देर तक तो वाह वाह करते रहे।
एक दर्शक चिल्लाया-‘वाह वाह तो सभी के लिये करते हैं पर तुम्हारे लिये इसलिये की कि तुम अधिक देर तक नयी कवितायें सुनाओगे। यह तो चुटकी बजाकर चले गये। इससे तो यह पुराने भले थे।

नये कवि ने कहा-‘पहले यह सब हट जायें तभी तो सुनाऊंगा। वैसे अभी मैं यह एक ही कविता लिखी है जो सुना दी। फिर आगे लिखकर सुनाऊंगा।’

दर्शकों ने हाय हाय शुरू की दी। कुछ तो उसे मंच पर ही लड़ने दौड़े वह वहां से भाग निकला। तक हालत को संभालने के लिये एक पुराने कवि ने अपनी नयी रचनायें सुनाना शुरू कर दी।

‘नया नया कर सब चले आते
पुराने पर सभी मूंह फेर जाते
जब नया हो जाता फ्लाप
पुराने का ही होता है जाप
पुराने चावल और शराब का
मजा खाने और पीने में कुुछ और न होता
तो शायद हर जगह पुराना
शायर पिट रहा होता
नया चार लाईनों के हिट लूट रहा होता
अपने नयेपन इतराते हैं बहुत लोग
नहीं जानते क्या है मजा और क्या है रोग
अहसास ही है बस नये और पुराने का
नाम ही खाली जमाने का
शोर मचाकर कविता लिखी जा सकती
तो यहां हर कोई कवि होता
दर्द सभी को है पर
हर कोई शब्दों में उसे नहीं पिरोता
आधुनिक जमाने में तीस पर ही
कई बुढ़ापे के रोगों का होते शिकार
जवान दिखते हैं वह जो हैं साठ के पार
नये और पुराने आदमी में भेद करना
अब कठिन हो गया है
पुरानी गाड़ी खरीदते हैं कबाड़ में
और छह महीने चल चुकी कार को
कहते हैं सैकेंड हैंड
बजाते हैं खुशी का बैंड
आदमी के चक्षुओं के सामने ही
हो जाता है अंधेरे का व्यापार

उसकी कविता सुनकर नये कवि के पीछ भागने वाले श्रोता और दर्शक रुक गये और पूरा मैदान वाह वाह से गूंज उठा।
—————————————————-

यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’ पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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hindi sher, शेर, हिन्दी शायरी, हिन्दी साहित्य

अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
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दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।

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दीपक भारतदीप

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(hasya vyangya)

सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये दहशत का खिलौना-हिंदी शायरी

दहशत की भी सब जगह
चलती फिरती दुकान हो गयी
विज्ञापन का कोई झंझट नहीं
उनकी करतूतों की खबर सरेआम हो गयी

कहीं विचारधारा का बोर्ड लगा है
कहीं भाषा का नाम टंगा है
कहीं धर्म के नाम से रंगा है
जज्बातों का तो बस नाम है
सारी दुनियां मशहूरी उनके नाम हो गयी

बिना पैसे खिलौना नहीं आता
उनके हाथ में बम कैसे चला आता
फुलझड़ी में हाथ कांपता है गरीब बच्चे का
उनके हाथ बंदूक कैसे आती
गोलियां क्या सड़क पड़ उग आती
सवाल कोई नहीं पूछता
चर्चाएं सब जगह हो जाती
गंवाता है आम इंसान अपनी जान
कमाता कौन है, आता नहीं उसका नाम
दहशत कोई चीज नहीं जो बिके
पर फिर भी खरीदने वाले बहुत हैं
सपने भी भला जमीन पर होते कहां
पर वह भी तो हमेशा खूब बिके
हाथ में किसी के नहीं खरीददार उनके भी बहुत हैं
शायद मुश्किल हो गया है
सपनों में अब लोगों को बहलाना
इसलिये दहशत से चाहते हैं दहलाना
आदमी के दिल और दिमाग से खेलने के लिये
सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये खिलौना
इसलिये एक मंडी दहशत के नाम हो गयी
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