पुरालेख

भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लिए  कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त  करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath

नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
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वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

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पिंजर से बाहर झांकता ज्ञान-आलेख चिंत्तन

उनके चेहरे पर बटन की तरह टंगी आंखें कपड़े और किताबों के पिंजर से बाहर झांकती दिखती है। ऐसा लगता है कि चिड़ियाघर के पिंजड़े में कोई इंसानी बुत ऐसे ही सजाये गये हैं जिनके आगे कपड़े के एक ही रंग और किसी किताब की लिखी लाईने लोहे के दरवाजे की तरह ऐसे ही लगी हों जैसे पिंजड़े के बाहर लगी होती हैं जहां से वह कभी निकल ही नहीं सकते। बस उससे बाहर झांकते हैं कि कोई पर्यटक आये तो वह उनकी तरफ देखे और वह अपनी अदाओं से उसे प्रभावित करें।
दुनियां में हर मनुष्य एक ही तरह से पैदा होता है पर जीवन यापन का सबका अपना अलग तरीका होता है। देखा जाये तो जीवन एक शब्द है जिसमें विविध रंगों, स्वादों और विचारों की धारा बहती है। यह धारा उसके मन रूपी हिमालय से बहती है जो इंसान को बहाती हुई ले जाती है। अधिकतर इंसान इस धारा में बहते हुए जाते हैं और उनकी कोई अपनी कामना नहीं होती। मगर कुछ लोग ऐसे हैं जो इस मानव रूपी मन की धारा के उद्गम स्थल पर बैठकर उसका बहाव अपनी ओर करना चाहते हैं ताकि उसका स्वामी मनुष्य बहकर उनकी तरफ आये ताकि वह उस पर शासन कर सकें। तय बात है कि एक इंसान वह है जो अपनी एकलधारा में आजादी से बहता हुआ चलता है और एक दूसरा है जो चाहता है कि अनेक इंसान उसकी तरफ बहकर आयें ताकि वह शासक या विद्वान कहला सके।
सर्वशक्तिमान के अनेक रूप और रंग हैं पर उसके किसी एक रूप और रंग को पकड़ कर ऐसे लोग वह पिंजड़ा बना लेते हैं जिसमें वह दूसरों को फंसाने के लिये घूमते हैं। उनको लगता है कि वह आदमी को अपने रंग और किताब के पिंजड़े में कैद कर लेंगे पर सच यह है कि वह स्वयं भी उसकी कैद में रहते हैं।
सर्वशक्तिमान के कितने रंग और रूप हैं कोई नहीं जानता पर फिर भी ऐसे लोगों ने अभी तक दस बीस की कल्पना को प्रसिद्ध तो कर ही दिया है। लाल, पीला, नीला, सफेद, काला, हरा, पीला और पता नहीं कितने रंग हैं। हरे रंग मेें भी बहुत सारे रंग हैं पर अक्ल और ताकत की ख्वाहिश रखने वाले कोई एक रंग सर्वशक्तिमान की पहचान बताते हैं। सभी की किताबेें हैं जिसमें हर शब्द और लकीर सर्वशक्तिमान के मूंह से निकली प्रचारित की जाती है। अपने तयशुदा रंग के कपड़े रोज पहनते हैं और वह किताब अपने हाथ में पकड़ कर उसे पढ़ते हुए दुसरों को सुनाते हैं। राजा हो या प्रजा उनके दरवाजे पर आकर सलाम ठोकते है। राजा इसलिये आता है क्योंकि प्रजा वहां आती है और उसे निंयत्रित करने के लिये ऐसे सिद्ध, पीर, फकीर, साधु, संत-इसके अलावा कोई दूसरा शब्द जो सर्वशक्तिमान से किसी की करीबी दिखाता हो-बहुत काम आते हैं। प्रजा इसलिये इनके पिंजर में आती है क्योंकि राजा आता है और पता नहीं कब उससे काम पड़ जाये और यह पिंजर में बंद अजूबा उसमें सहायक बने।
यह अजूबे कभी अपने पिंजर ने बाहर नहीं आते। जिस रंग के कपड़े पहन लिये तो फिर दूसरा नहीं पहन सकते। जिस किताब को पकड़ लिया उसकी लकीर में ही हर नजीर ढूंढते और फिर बताते हैं। वह किताब अपने लिये नहीं दूसरे को मार्ग बताने के लिये पढ़ते हैं। खुद पिंजडे में बंद हैं पर दूसरे को मार्ग बताते हैं। दाढ़ी बढ़ा ली। कुछ मनोविशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ी दाढ़ी वैसे भी दूसरे पर प्रभाव छोड़ती है-अर्थात आप ज्ञानी या दानी न भी हों तो उसके होने का अहसास सभी को होता है। वह दाढ़ी नहीं बनाते क्योंकि उनकी छबि इससे खराब होती है। इस दुनियां में एक भय उन पर शासन करता है कि राजा और प्रजा कहीं उनसे विरक्त न हो जायें।

कभी दृष्टा बनकर सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप के दरबार में पहुंच जाओ और महसूस करो कि चिड़ियाघर में आ गये हो। देखो वहां पर एक ही रंग के कपड़े और किताब के पिंजर में बंद उस अजूबे को जो तुम्हें सर्वशक्तिमान का मार्ग बताता है। दुनियां बनाने वाले ने अनेक रंग बनाये हैं और उसके बंदों ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं पर एक ही रंग और किताब की लकीरों के पिंजर में बंद वह अजूबे वहां से भी राजा और प्रजा के बीच दलाली करते नजर आते हैं। अगर तुम आजाद होकर सोचोगे तभी उनका पिंजर दिखाई देगा नहीं तो उनके हाथ में बंद उससे भी छोटे पिंजर में तुम अपने को फंसा देखोगे वैसे ही जैसे पिंजड़े में बंद शेर के पास जाकर कोई आदमी अपना हाथ उसके मूंह में दे बैठता है और फिर……….जो होता है वह तो सर्वशक्तिमान की मर्जी होती है।
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चाणक्य नीति: अधिकारी कभी इच्छा और लोभ से मुक्त नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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झूठ भी सच की तरह सजाते-व्यंग्य कविता

हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच की तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए हैं
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी है
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप ग्वालियर

दक्षिण एशिया के साहित्यकार आतंक पर सच लिख भी कहां पाये-आलेख

अभी हाल ही में दक्षिण एशिया के देशों का एक साहित्यकार सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान,श्रीलंका,बंग्लादेश तथा अन्य सदस्य देशों के नामचीन साहित्यकार शामिल हुए। जैसा कि संभावना थी कि इस इलाके में व्याप्त आतंकवाद भी इसमें चर्चा का विषय बना। जब इलाके में आतंकवाद का बोलबाला है तो यह स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार इसी दर्पण की आंख की तरह देखने वाला होता है। इन साहित्यकारों ने आतंकवाद की निंदा की है और अपने देश के हिसाब से ही अपने विचार व्यक्त किये। पाकिस्तान के एक साहित्यकार ने बंग्लादेश में हाल ही में हुए विद्रोह में अपने देश का हाथ होने के आरोप का खंडन किया। बात यहीं पर ही अटक जाती है कि साहित्यकारों को क्या उसी नजरिये पर चलना चाहिये जिस पर उनका समाज या देश चल रहा है।

पहले तो यहां साहित्यकार और पत्रकार का भेद स्पष्ट करना जरूरी है। पत्रकार जो देखता है वही दिखाता और लिखता है पर साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिये। पत्रकार कल्पना नहीं करता और न उसे करना चाहिये पर साहित्यकार को किसी घटना में तर्क के आधार पर कल्पना और अनुमान करने की शक्ति होना चाहिये। अपने समाज और देश के प्रति साहित्यकार की प्रतिबद्धता होना जरूरी है पर उसे अंधभक्ति से दूर रहना चाहिये। दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अपने देश में जो इनाम मिलते हैं वही उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनते हैं पर सच तो यह है कि पूरे क्षे.त्र की हालत एक जैसी है और सभी जगह यह पुरस्कार लेखकों के संबंधों पर अधिक दिये जाते हैं और कई तो ऐसे साहित्यकार भी पुरस्कार पा जाते हैं जिनको समाज में ही अहमियत नहीं दी जाती है। बहरहाल दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अब इस बात का भी मंथन करना चाहिये कि क्या वह वास्तव में ही समाज और देश के लिये महत्ती भूमिका निभा रहे है? दक्षिण एशिया की सभी भाषाओं में बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर उससे सामाजिक सरोकार कितने जुड़े हैं यह भी देखने की बात है।
हम दक्षिण एशिया के साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद पर लिखी गयी सामग्रियों पर ही विचार करें तो लगेगा कि वह यथार्थ से परे हैं। लेखक को कल्पना तो करना चाहिये पर उससे यथार्थ का बोध होता हो न कि वह झूठ लगने लगे। हमने केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही पढ़ा है। सभी को पढ़ना संभव नहीं है पर पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर इस संबंध में पढ़ते है तो लगता है सभी साहित्यकार एक जैसे ही है। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों पर उनकी रचनायें अनुवादों को माध्यम से अधिक नहीं पढ़ने को मिल पाती।
अब साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद की निंदा की गयी पर कितने ऐसे साहित्यकार हैं जो इस बात को समझते हैं कि आतंकवाद भले ही जाति,भाषा,क्षेत्र और धर्म के नाम झंडो तले अपना काम करता है पर वास्तव में वह एक व्यापार है। ऐसा व्यापार जिस पर भावना,श्रृंगार और अलंकार से शब्द सजाकर प्रस्तुत करना कभी कभी एकदम निरर्थक प्रक्रिया लगती है। आतंकवाद एक हाथी है जिसे साहित्यकार आंखें बंदकर पकड़ लेते हैं। कोई उसके सूंड़ को पकल लेता है तो कोई पूंछ-फिर उस पर अपनी व्याख्या करने लगता है। जिस तरह पहले किसी सुंदरी का मुखड़ा गढ़कर उसकी आंखें,नाक,कान,कमर,और बालों पर कवितायें और कहानी लिखी जाती थीं वैसे ही आतंकवाद का विषय उनके हाथ आ गया है। जिस तरह किसी सुंदरी के शारीरिक अंगों पर खूब लिख गया पर उसके व्यवहार,आचरण और ज्ञान पर कवि लिखने से बचते रहे वही हाल आतंकवाद का है। साहित्यकारों और लेखकों ने आतंकवादी घटनाओंे से हुई त्रासदी पर वीभत्स रस से सराबोर रचनायें खूब लिखीं। पाठक का दर्द खूब उबारा पर कभी इन घटनाओं के पीछे जो सौदागर हैं उसकी कल्पना किसी ने नहंी की। प्रसंगवश यहां हम मुंबई के खूंखार आतंकवादी कसाब की चर्चा करते हैं। 58 से अधिक बेकसूर लोगों का हत्यारा कसाब इंसान से कैसे राक्षस बना? क्या किसी पाकिस्तानी लेखक ने उसकी कल्पना करते हुए कोई लघुकथा या कविता लिखी। एक गरीब घर का लड़का जिसे उसका बाप आतंकवादी कैंप में यह कहकर भेजता है कि उसकी दो बहिनों की शादी के लिये पैसे मिलने के लिये यही एक रास्ता है। वह एक मामूली चोर डेढ़ से दो लाख रुपये की लालच में अपने देश के लिये योद्धा बनने को तैयार कैसे हो गया? उसमें इतनी क्रूरता कैसे आयी कि बंदूक हाथ में आते ही उसने 58 जाने बेहिचक ले ली? यही इंसान से राक्षस बना कसाब पकड़े जाने पर चूहे की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगा। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि अब वह अपने किये पर पछता रहा है तब तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर इस राक्षसीय कृत्य के लिये प्रेरित करने वाले कौनसे कारण थे?
कसाब के पीछे जो तत्व हैं उनके सच पर कितने पाकिस्तानी या भारतीय साहित्यकार लिख पाते हैं। कसाब और उसके साथी तो साँस लेते हुए ऐसे इंसान थे जो किन्ही राक्षसों के हथियार बने गये। मुख्य अपराधी कौन हैं? मुख्य अपराधी हैं वह जो इसके लिये धन मुहैया करवा रहे हैं। यह धन देने वाले तमाम तरह के अवैध धंधों में लिप्त हैं और प्रशासन और जनता का ध्यान उन पर न जाये इस तरह के आतंकवाद का प्रायोजन कर रहे हैं। यह सच कितने साहित्यकार लिख पाये? कसाब तो इंसानी रूप में एक बुत है या कहें कि रोबोट है।
पाकिस्तान साहित्यकारों में क्या इतनी हिम्मत है कि वह कसाब को केंद्रीय पात्र बनाकर कोई कहानी लिख सकें? नहीं! दरअसल दक्षिण एशियों के साहित्यकार नायकों पर लिखकर समाज की वाहवाही लूटना चाहते हैं पर खलनायकों के कृत्यों में पीछे समाज की जो स्वयं की कमियां हैं उसे उबारकर लोगों के गुस्से से बचना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि नायकों की विजय के पीछे अगर समाज है तो खलनायक की क्रूरता के पीछे भी इसी समाज के ही तत्व हैं। समाज की की खामियों को छिपाकर उससे अच्छा बताने से तात्कालिक रूप से प्रशंसा मिलती है शायद यही कारण है कि लोग उससे बचने लगे हैं। भारत में हालांकि अनेक लोग समाज की कमियों की व्याख्या करते हैं पर वह भी उसके मूल में नहीं जाते बल्कि सतही तौर पर देखकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। नारी स्वातंत्रय पर लिखने वाले अनेक लेखक तो हास्यास्पद रचनायें लिखते हैं और उससे यह भी पता लगता है कि उनके गहन चिंतन की कमी है।

दक्षिण एशियाई देश भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी,अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के कारण विश्व में पिछडे हुए हैं और इसलिये यहां लोगों में कहीं न कहीं गुस्से की भावना है। दक्षिण एशिया की छबि विश्व में कितनी खराब है यह इस बात से भी पता चलता है कि ईरान के सबसे बड़े दुश्मन इजरायल ने भी उसे अपने लिये कम पाकिस्तान को अधिक संकट माना है जो कि दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। जब हम दक्षिण एशिया की बात करते हैं तो फिर भौगोलिक सीमाओं से उठकर विचार करना चाहिये पर जैसे कि सम्मेलन की समाचार पढ़ने को मिले उससे तो नहीं लगता कि शामिल लोग ऐसा कर पाये। सच बात तो यह है कि समाज और देश को दिशा देने का काम साहित्यकार ही कर पाते हैं क्योंकि वह पुरानी सीमाओं से बाहर निकलकर रचनायें करते हैं। सभी साहित्यकार ऐसा नहीं कर पाते जो पर जो करते हैं वही कालजयी रचनायें दे पाते हैं। अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिति को देखें तो अब ऐसी कालजयी कृतियां कहां लिखी जा रही हैं जिससे समाज या देश में परिवर्तन अपेक्षित हो।
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