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देश की बढ़ती अमीरी बन रही है बोरियत का कारण-हिन्दी लेख

       जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। निश्चित रूप से यह खबर लोगों के लिये डरावनी है। इधर भारत में यह लग रहा है कि जापान की सुनामी पर समाचार और बहस प्रसारण में भारतीय चैनलों के लिये विज्ञापनों की सुनामी आ गयी। ऐसे खास अवसरों ं टीवी चैनल के दर्शक कुछ विस्तार से सुनना और जानना चाहते हैं और यह बात देश के प्रचार प्रबंधकों को पता है और वह पर्दे के सामने चिपके रहेंगे इसलिये उनके सामने विज्ञापन दिखाकर अपने प्रायोजकों को खुश करते हैं। मुश्किल यह है कि उनके पास प्रबंध कौशल केवल अपने विज्ञापनदाताओं करे खुश करने तक ही सीमित है कार्यक्रम के निर्माण और प्रस्तुति में नज़र नहीं आती। उनको समाचार और बहसों के बीच केवल अपने विज्ञापनों की फिक्र रहती है।
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विज्ञापनों की वजह से इतने सारे समाचार चैनल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य विज्ञापन प्रसारित करना है और समाचार और बहस तो उनके लिये फालतु का विषय है। जो नये चैनल आ रहे हैं वह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते हैं इसलिये वह पुराने चैनलों को परास्त नहीं कर पा रहे। सच बात तो यह है कि इन प्रबंधकों के पास पैसा कमाने के ढेर सारे तरीके होंगे पर प्रबंध कौशल नाम का नहीं है। प्रबंध कौशल से आशय है कि अपने व्यवसाय से संबंधित हर व्यक्ति को खुश करना और कम से कम भारतीय समाचार टीवी चैनलों के दर्शक उनसे खुश नहीं है। समाचारों और बहसों के बीच जिस तरह विज्ञापन जिस तरह दिखाये जा रहे हैं उससे तो यह बात साफ लगती है कि दर्शकों की परवाह उनको नहीं है। एक मिनट का समाचार पांच मिनट का विज्ञापन। यह भी चल जाये पर बहस बीच में भी यही हाल। चार विद्वान जुटा लिये और आधे घंटे की उनकी बहस में पांच मिनट का भी वार्तालाप नहीं होता।
        कई बार तो यह हालत हो जाती है किसी विषय पर विद्वान अपनी एक मिनट की बात पांच मिनट के विज्ञापन के साथ दो बार पूरी करा करता है। ऐसा लगता है कि उधर जब सुनामी आ गयी तो भारत के टीवी चैनलों के प्रबंधक विज्ञापनों का प्रबंधन कर रहे होंगे क्योंकि उनको मालुम था कि उनके कर्मचारी विदेशी टीवी चैनलों की कतरनों से समाचार प्रसारित करने के साथ ही चार चार पांच लाईने बोलने वाले विद्वान भी जुटाकर कार्यक्रम ठीकठाक बना लेंगे। कौन हिन्दी दर्शक अंग्रेजी टीवी चैनल देखता है जो इस घटिया स्तर को समझ पायेगा।
     ऐसा लगता है कि विश्व पटल पर भारत जो कर्थित आर्थिक विकास कर रहा है वह यहां के आम लोगों के लिये महत्वहीन होता जा रहा है। भारत के आर्थिक ताकत होने पर यहां कौन यकीन कर सकता है जब यहां के आम आदमी की किसी को परवाह न हो। विकास कंपनियों के नाम पर शक्तिशाली लोगों के समूहों को रहा है। कलाकार, विद्वान, पूंजीपति, समाजसेवी और बाहुबली सभी जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और यही प्रसिद्ध चेहरे कहीं न कहीं  कंपनियों के पीछे रहनुमा क तरह खड़े हैं। इतनी सारी कपंनियां और उनके विज्ञापन बार बार देखकर मन उकता जाता है। वही क्रिकेट, फिल्म और टीवी धारावाहिकों में सक्रिय चेहरे सतत सामने आते हैं तो लगता है कि टीवी बंद रखना ही श्रेयस्कर है। देश की कथित अमीरी अब बोरियत का कारण बन रही है।
       जापान की सुनामी की चर्चा में कहीं  कुछ ऐसा सुनने को मिला जिसे याद रखने योग्य माना जाये। वहां भारी तबाही है। प्रकृति के प्रकोप से आई सुनामी के निशान मिट जायेंगे पर वहां जो परमाणु संयत्र पर विस्फोट हुआ है वह काफी चिंताजनक हैं। मर्यादा लांघकर आया समंदर लौट जायेगा पर मानवजनित उस परमाणु ऊर्जा से उपजा प्रकोप से निपटना आसान काम नहीं होगा। लोग बता रहे हैं कि जापान में आई सुनामी का भारत पर प्रभाव नहीं होगा पर अगर परमाणु संयंत्र से गैस का रिसाव हुआ तो वह समंदर के साथ ही विश्व की पूरी धरती पर विष घोल सकता है। समंदर में रेडिएशन घुल गया तो वह बरसात के माध्यम से कहां बरसेगा पता नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रिसाव से कोई खतरा नहीं पर हमारे हिसाब से उनको अभी अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। हमारा मानना तो यह है कि इस तरह के प्रकोप इसलिये हो रहे हैं कि अमेरिका और चीन सहित अनेक देशों ने ज़मीन और समंदर में ढेर सारे विस्फोट किये हैं।
                    ऐसे में एशिया के सबसे संपन्न जापान पर आया संकट यही संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक मानव स्वयं के लिये अधिक खतरनाक है। समंदर तो आज नहीं तो कल वापस अपनी जगह जायेगा पर परमाणु संयत्र से आया संकट आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। जापान के लोगों ने 1942 में अपने दो शहरों हिरोशिमा और नागासकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरते देखें हैं और वह इसे जानते हैं। बहरहाल उनके यहां आयी सुनामी भारत के टीवी चैनलों के लिये भी सुनामी लायी है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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कर्जे और किश्तों में जिंदगी-आलेख और कविता (loan and lifr-hindi article and poem)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।

 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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क्रिकेट खेल के साथ दूसरी बातें भी जुड़ी हैं-हिन्दी आलेख

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने! सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग अभी भी यह प्रयास कर रहे हैं कि उसके कुछ खिलाड़ियों को यहां बुलाकर पाकिस्तान के लोगों को खुश किया जाये। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
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जब फैशन तनाव बने-हिन्दी आलेख (fashan is tension-hindi article)

अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।

एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये।  उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये।  कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी।  उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।

बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’

हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी।  उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’

वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’

बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी।  अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था।  अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’

हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।

हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं।  अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’

एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है।  हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की  चप्पल नहीं पहन सकती।’

उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।

वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी  अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।

दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं।  आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।

हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने  दहेज में कार मांगी है।’

वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!

बेटे ने बाप को  समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता।  नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।

बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा।  जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे।  औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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योग केवल सांस लेने की क्रिया नहीं है-आलेख (yog aur asan-hindi lekh)

वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया  है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार  का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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शब्दों पर नियंत्रण-हिन्दी व्यंग्य (control of word-hindi satire

एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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