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जिसका नहीं कोई सगा, उससे कभी होता नहीं दगा- व्यंग्य कविता

उन आंखों से क्या, दया की चाहत करना
जिनमें शर्म-ओ-हया का पानी सूख गया हो
उन होठों से क्या, मीठे बोल की उम्मीद करना
जिनकी जुबान से प्यार का शब्द रूठ गया हो
उस जमाने से क्या, मदद मांगना
नाम के दोस्त तो बहुत हैं
पर निभाने का मतलब कौन जानता है
मतलब के लिये सब हो जाते साथ
उससे अधिक कौन किसे मानता है
वफा की उम्मीद उनसे क्या करना
जिन्होंने अपना यकीन खुद लूट लिया हो
दगा किसी का सगा नहीं
पर जिसका नहीं कोई सगा
उससे कभी होता नहीं दगा
अपने बनते है कुछ पल के लिये लोग
काम निकल गया तो भूल जाते हैं
वह क्या याद करेंगे फिर
जिन्होंने हमेशा भूलने का घूंट पिया हो

जिनका कोई नहीं बनता अपना
विश्वासघात का खतरा उनको नहीं होता
जुटाते हैं जो भीड़ अपने साथ
रखते हैं उसका स्वार्थ अपने हाथ
पूरा करें या नहीं, ललचाते जरूर हैं
अपने हाथ उठाकर,क्या उनसे मांगना
जिन्होंने ओढ़ ली है बनावटी हरियाली
पर अपना पूरा जीवन ठूंठ की तरह जिया हो

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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