Tag Archive | sahitya

देश की बढ़ती अमीरी बन रही है बोरियत का कारण-हिन्दी लेख

       जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। निश्चित रूप से यह खबर लोगों के लिये डरावनी है। इधर भारत में यह लग रहा है कि जापान की सुनामी पर समाचार और बहस प्रसारण में भारतीय चैनलों के लिये विज्ञापनों की सुनामी आ गयी। ऐसे खास अवसरों ं टीवी चैनल के दर्शक कुछ विस्तार से सुनना और जानना चाहते हैं और यह बात देश के प्रचार प्रबंधकों को पता है और वह पर्दे के सामने चिपके रहेंगे इसलिये उनके सामने विज्ञापन दिखाकर अपने प्रायोजकों को खुश करते हैं। मुश्किल यह है कि उनके पास प्रबंध कौशल केवल अपने विज्ञापनदाताओं करे खुश करने तक ही सीमित है कार्यक्रम के निर्माण और प्रस्तुति में नज़र नहीं आती। उनको समाचार और बहसों के बीच केवल अपने विज्ञापनों की फिक्र रहती है।
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विज्ञापनों की वजह से इतने सारे समाचार चैनल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य विज्ञापन प्रसारित करना है और समाचार और बहस तो उनके लिये फालतु का विषय है। जो नये चैनल आ रहे हैं वह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते हैं इसलिये वह पुराने चैनलों को परास्त नहीं कर पा रहे। सच बात तो यह है कि इन प्रबंधकों के पास पैसा कमाने के ढेर सारे तरीके होंगे पर प्रबंध कौशल नाम का नहीं है। प्रबंध कौशल से आशय है कि अपने व्यवसाय से संबंधित हर व्यक्ति को खुश करना और कम से कम भारतीय समाचार टीवी चैनलों के दर्शक उनसे खुश नहीं है। समाचारों और बहसों के बीच जिस तरह विज्ञापन जिस तरह दिखाये जा रहे हैं उससे तो यह बात साफ लगती है कि दर्शकों की परवाह उनको नहीं है। एक मिनट का समाचार पांच मिनट का विज्ञापन। यह भी चल जाये पर बहस बीच में भी यही हाल। चार विद्वान जुटा लिये और आधे घंटे की उनकी बहस में पांच मिनट का भी वार्तालाप नहीं होता।
        कई बार तो यह हालत हो जाती है किसी विषय पर विद्वान अपनी एक मिनट की बात पांच मिनट के विज्ञापन के साथ दो बार पूरी करा करता है। ऐसा लगता है कि उधर जब सुनामी आ गयी तो भारत के टीवी चैनलों के प्रबंधक विज्ञापनों का प्रबंधन कर रहे होंगे क्योंकि उनको मालुम था कि उनके कर्मचारी विदेशी टीवी चैनलों की कतरनों से समाचार प्रसारित करने के साथ ही चार चार पांच लाईने बोलने वाले विद्वान भी जुटाकर कार्यक्रम ठीकठाक बना लेंगे। कौन हिन्दी दर्शक अंग्रेजी टीवी चैनल देखता है जो इस घटिया स्तर को समझ पायेगा।
     ऐसा लगता है कि विश्व पटल पर भारत जो कर्थित आर्थिक विकास कर रहा है वह यहां के आम लोगों के लिये महत्वहीन होता जा रहा है। भारत के आर्थिक ताकत होने पर यहां कौन यकीन कर सकता है जब यहां के आम आदमी की किसी को परवाह न हो। विकास कंपनियों के नाम पर शक्तिशाली लोगों के समूहों को रहा है। कलाकार, विद्वान, पूंजीपति, समाजसेवी और बाहुबली सभी जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और यही प्रसिद्ध चेहरे कहीं न कहीं  कंपनियों के पीछे रहनुमा क तरह खड़े हैं। इतनी सारी कपंनियां और उनके विज्ञापन बार बार देखकर मन उकता जाता है। वही क्रिकेट, फिल्म और टीवी धारावाहिकों में सक्रिय चेहरे सतत सामने आते हैं तो लगता है कि टीवी बंद रखना ही श्रेयस्कर है। देश की कथित अमीरी अब बोरियत का कारण बन रही है।
       जापान की सुनामी की चर्चा में कहीं  कुछ ऐसा सुनने को मिला जिसे याद रखने योग्य माना जाये। वहां भारी तबाही है। प्रकृति के प्रकोप से आई सुनामी के निशान मिट जायेंगे पर वहां जो परमाणु संयत्र पर विस्फोट हुआ है वह काफी चिंताजनक हैं। मर्यादा लांघकर आया समंदर लौट जायेगा पर मानवजनित उस परमाणु ऊर्जा से उपजा प्रकोप से निपटना आसान काम नहीं होगा। लोग बता रहे हैं कि जापान में आई सुनामी का भारत पर प्रभाव नहीं होगा पर अगर परमाणु संयंत्र से गैस का रिसाव हुआ तो वह समंदर के साथ ही विश्व की पूरी धरती पर विष घोल सकता है। समंदर में रेडिएशन घुल गया तो वह बरसात के माध्यम से कहां बरसेगा पता नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रिसाव से कोई खतरा नहीं पर हमारे हिसाब से उनको अभी अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। हमारा मानना तो यह है कि इस तरह के प्रकोप इसलिये हो रहे हैं कि अमेरिका और चीन सहित अनेक देशों ने ज़मीन और समंदर में ढेर सारे विस्फोट किये हैं।
                    ऐसे में एशिया के सबसे संपन्न जापान पर आया संकट यही संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक मानव स्वयं के लिये अधिक खतरनाक है। समंदर तो आज नहीं तो कल वापस अपनी जगह जायेगा पर परमाणु संयत्र से आया संकट आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। जापान के लोगों ने 1942 में अपने दो शहरों हिरोशिमा और नागासकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरते देखें हैं और वह इसे जानते हैं। बहरहाल उनके यहां आयी सुनामी भारत के टीवी चैनलों के लिये भी सुनामी लायी है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
http://dpkraj.wordpress.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Advertisements

मुश्किल का हल-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (mushkil ka hal-hindi hasya vyangya kavita)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
”यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें..”

सुनकर दूसरा बोला 
“सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें..”
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

ग़रीब की थाली सजाने में-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (garib ki thali-hindi vyangya kavitaen)

हिन्दी साहित्य,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,समाज,hindi literature,sahityaखड़े हैं गरीब
खाली पेट लिये हुक्मत की रसोई के बाहर
जब भी मांगते हैं रोटी
तो जवाब देते हैं रसोईघर के रसोईये
‘अभी इंतजार करो
अभी तुम्हारी थाली में रोटी सजा रहे हैं,
उसमें समय लगेगा
क्योंकि रोटी के साथ
आज़ादी की खीर भी होगी,
खेल तमाशों का अचार भी होगा,
उससे भी पहले
विज्ञापन करना है ज़माने में,
समय लगेगा उसको पापड़ की तरह सज़ाने में,
तुम्हारी भूख मिटाने से पहले
हम अपने मालिकों की छबि
फरिश्तों की तरह बनाने के लिये
अपनी रसोई सजा रहे हैं।
———–
देश की भूख मिटाना
बन कर रह गया है सपना
मुश्किल यह है कि
रोटी बनाने के नये फैशन आ रहे हैं,
खर्च हो जाता है
नये बर्तन खरीदने में पैसा
पुरानों में रोटी परोसने से लगेगा
नये बज़ट हाल पुराने जैसा,
इधर ज़माने में
गरीब की थाली सजने से पहले ही
नये व्यंजन फैशन में आ रहे हैं,
काम में नयापन जरूरी है

फिर देश की तरक्की देश में अकेले नहीं दिखाना,
ताकतवर देशों में भी नाम है लिखाना,
समय नहीं मिलता
इधर गरीबों और भूखों की पहचान भी बदली है
उनके नये चेहरे फैशन में आ रहे हैं।
——-

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

शासक, शासित, जनता और सरकार, व्यंग्य कविता,देश की व्यवस्था,गरीब,देश,पहचान,भारत में लोकतंत्र भारत में प्रजातंत्र,janta aur sarkar,garib ki thali,garibi par kavitaen,pahachan,bharat mein loktantra,bharat mein azadi,bharat mein prajatantra,garib ko roti,garib ki roti

दुष्प्रचार का प्रतिकार-संपादकीय

अगर कोई समस्या हो तो उसके उद्गम स्थल पर ही उसका निराकरण किया जाना चाहिए तभी उसका निराकरण किया जा सकता है पर अपने देश के संकटमोचक इसकी बजाय समस्या की बहती हुई धारा का निपटाने के लिये जूझते दिखते हैं। एक लहर कटती है दूसरी आ जाती है। हम बात कर रहे हैं उन तमाम मुद्दों पर जो अक्सर चर्चा में रहते हैं और वह खासतौर से धर्म और विचारधाराओं के निर्वहन-परिवर्तन से जुड़े हैं।
भारतीय जनमानस का यह स्वभाव रहा है कि वह कोई भी बात मनोरंजन के द्वारा ही ग्रहण करता है चाहे वह अध्यात्मिक ज्ञान ही क्यों न हो? यही कारण है कि अनेक धार्मिक संत तक अपने प्रवचनों और कथाओं में भी अपनी मनोरंजन ही प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में यह देखना चाहिए कि हमारे देश में जहां से मनोरंजन प्रस्तुत किया जा रहा है वहां से क्या और किस तरह का संदेश दिया जा रहा है और लोगों के मानस पर उसका किस तरह प्रभाव हो रहा है? इसको समझे बिना कोई भी धार्मिक, सामाजिक या भावनात्मक अभियान सफल नहीं हो सकता।
मुख्य बात यह है कि इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि
1.फिल्म, टीवी चैनलों और मनोरंजक साधनों से प्रसारित कहानियां किस तरह के धार्मिक, भाषाई,जातीय और क्षेत्रीय संदेश अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से देती हैं।
2.दो उसमें काम करने वाले अभिनेता, अभिनेत्रियों और अन्य सहायकों का चयन किस तरह का है और उनसे कैसे संदेश लोगों के बीच जा रहा है।
3.उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रायोजक किस तरह का है।
मुख्य बात यह है कि जो शक्तिशाली लोग अपने समूहों के लिये वैचारिक,सांस्कारिक, तथा धार्मिक भय अनुभव करते हैं उनको उसी तरह के प्रतिकार के लिये तैयार होना चाहिये। केवल नारे लगाना या विरोध करने से काम नहीं चलने वाला-उल्टे इससे उनके स्वयं के समूह में नकारात्मक संदेश जाता है। सकारात्मक प्रतिकार तो यही है कि आप भी अपने लिये फिल्मों टीवी चैनलों तथा अन्य मनोरंजक साधनों पर वैसे ही मनोरंजक सामग्री प्रस्तुत करें जिसमें आपके विचारों, संस्कारों के साथ धार्मिक विचाराधारा का प्रतिबिंब दिखे।
यह लेखक तो एक दृष्टा की तरह देखता है-ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर।’ ऐसे में जो धार्मिक, जातीय और भाषाई समूह आपस में द्वंद्वरत हैं उनमें कौन क्यों पिछड़ रहा है, इसका अवलोकन यह लेखक करता रहता है। उसी के आधार पर पिछड़ रहे धार्मिक, जातीय और भाषाई समूहों को यही समझाइश देता है कि भई तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी इस तरह अपनी बढ़ता बनाये हुए हैं। इस पर प्रकाशित दो फ्लाप आलेख यहां प्रस्तुत हैं। जैसे कि आम आदमी का स्वभाव है कि वह द्वंद्वों में आनंद लेता है वैसे ही यह लेखक उनमेें आदर्श भाव तलाशता है क्योंकि विश्व में जितने भी समूह धर्म के आधार पर खड़े हैं उनकी पृष्ठभूमि में भी इस तरह के सामूहिक द्वंद्वों के आधार पर खड़े हैं। किसी का नाम न लेने के पीछे दो ही उद्देश्य हैं-एक तो इस लेखक के पीछे या सामने कोई संगठन नहीं है जिससे अपनी प्रशंसा या आलोचना से अनुग्रहीत किया जाये। दूसरा सारा काम लेखक ही करेगा तो पाठक क्या खाक चिंतन करेंगे? इसी कारण पाठकों में चिंतन क्षमता का विकास हो इसलिये इस तरह की बात व्यंजना विधा में कहना सुरक्षा की दृष्टि से कहना भी ठीक रहता है।
प्रस्तुत हैं दो बेहतर आलेख
………………………………………

मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख
—————————-

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
………………………..

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

प्रचार का मुकाबला प्रचार से ही संभव-आलेख
——————————

समाज को सुधारने की प्रयास हो या संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का सवाल हमेशा ही विवादास्पद रहा है। इस संबंध में अनेक संगठन सक्रिय हैं और उनके आंदोलन आये दिन चर्चा में आते हैं। इन संगठनों के आंदोलन और अभियान उसके पदाधिकारियेां की नीयत के अनुसार ही होते हैं। कुछ का उद्देश्य केवल यह होता है कि समाज सुधारने के प्रयास के साथ संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का प्रयास इसलिये ही किया जाये ताकि उसके प्रचार से संगठन का प्रचार बना रहे और बदले में धन और सम्मान दोनों ही मिलता रहे। कुछ संगठनों के पदाधिकारी वाकई ईमानदार होते हैं उनके अभियान और आंदोलन को सीमित शक्ति के कारण भले ही प्रचार अधिक न मिले पर वह बुद्धिमान और जागरुक लोगों को प्रभावित करते हैं।
ईमानदारी से चल रहे संगठनों के अभियानों और आंदोलनों के प्रति लोगों की सहानुभूति हृदय में होने के बावजूद मुखरित नहीं होती जबकि सतही नारों के साथ चलने वाले आंदोलनों और अभियानों को प्रचार खूब मिलता है क्योंकि प्रचार माध्यम उनको अपने लिये भावनात्मक रूप से ग्राहकों को जोड़े रखने का एक बहुत सस्ता साधन मानते हैं। ऐसे कथित अभियान और आंदोलन उन बृहद उद्देश्यों को पूर्ति के लिये चलते हैं जिनका दीर्घावधि में भी पूरा होने की संभावना भी नहीं रहती पर उसके प्रचार संगठन और पदाधिकारियों के प्रचारात्मक लाभ मिलता है जिससे उनको कालांतर में आर्थिक और सामाजिक उपलब्धि प्राप्त हो जाती है।

मुख्य बात यह है कि ऐसे संगठन दीवारों पर लिखने और सड़क पर नारे लगाने के अलावा कोई काम नहीं करते। उनके प्रायोजक भी इसकी आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि उनके लिये यह संगठन केवल अपनी सुरक्षा और सहायता के लिये होते हैं और उनको समझाईश देना उनके लिये संभव नहीं है। अगर इस देश में समाज सुधार के साथ संस्कार और संस्कृति के लिये किसी के मन में ईमानदारी होती तो वह उन स्त्रोतों पर जरूर अपनी पकड़ कायम करते जहां से आदमी का मन प्रभावित होता है।
भाररीय समाज में इस समय फिल्म, समाचार पत्र और टीवी चैनलों का बहुत बड़ा प्रभाव है। भारतीय समाज की नब्ज पर पकड़ रखने वाले इस बात को जानते हैं। लार्ड मैकाले ने जिस तरह वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण कर हमेशा के लिये यहां की मानसिकता का गुलाम बना दिया वही काम इन माध्यमों से जाने अनजाने हो रहा है इस बात को कितने लोगों ने समझा है?
पहले हिंदी फिल्मों की बात करें। कहते हैं कि उनमें काला पैसा लगता है जिनमें अपराध जगत से भी आता है। इन फिल्मों में एक नायक होता है जो अकेले ही खलनायक के गिरोह का सफाया करता है पर इससे पहले खलनायक अपने साथ लड़ने वाले अनेक भले लोगों के परिवार का नाश कर चुका है। यह संदेश होता है एक सामान्य आदमी के लिये वह किसी अपराधी से टकराने का साहस न करे और किसी नायक का इंतजार करे जो समाज का उद्धार करने आये। कहीं भीड़ किसी खलनायक का सफाया करे यह दिखाने का साहस कोई निर्माता या निर्देशक नहीं करता। वैसे तो फिल्म वाले यही कहते हैं कि हम तो जो समाज में जो होता है वही दिखाते हैं पर आपने देखा होगा कि अनेक ऐसे किस्से हाल ही में हुए हैं जिसमें भीड़ ने चोर या बलात्कारी को मार डाला पर किसी फिल्मकार ने उसे कलमबद्ध करने का साहस नहीं दिखाया। संस्कारों और संस्कृति के नाम पर फिल्म और टीवी चैनलों पर अंधविश्वास और रूढ़वादितायें दिखायी जाती हैं ताकि लोगों की भारतीय धर्मों के प्रति नकारात्मक सोच स्थापित हो। यह कोई प्रयास आज का नहीं बल्कि बरसों से चल रहा है। इसके पीछे जो आर्थिक और वैचारिक शक्तियां कभी उनका मुकाबला करने का प्रयास नहीं किया गया। हां, कुछ फिल्मों और टीवी चैनलों के कार्यक्रमों का विरोध हुआ पर यह कोई तरीका नहीं है। सच बात तो यह है कि किसी का विरोध करने की बजाय अपनी बात सकारात्मक ढंग से सामने वाले के दुष्प्रचार पर पानी फेरना चाहिये।

एक ढर्रे के तहत टीवी चैनलों और फिल्मों में कहानियां लिखी जाती हैं। यह कहानी हिंदी भाषा में होती है पर उसको लिखने वाला भी हिंदी और उसके संस्कारों को कितना जानता है यह भी देखने वाली बात है। मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रमों के पीछे जो आर्थिक शक्ति होती है उसके अदृश्य निर्देशों को ध्यान में रखा जाता है और न भी निर्देश मिलें तो भी उसका ध्यान तो रखा ही जाता है कि वह किस समुदाय, भाषा, जाति या क्षेत्र से संबंधित है। विरोध कर प्रचार पाने वाले संगठन और उनके प्रायोजक-जो कि कोई कम आर्थिक शक्ति नहीं होते-स्वयं क्यों नहीं फिल्मों और टीवी चैनलों के द्वारा उनकी कोशिशों पर फेरते? इसके लिये उनको अपने संगठन में बौद्धिक लोगों को शामिल करना पड़ेगा फिर उनकी सहायता लेने के लिये उनको धन और सम्मान भी देना पड़ेगा। मुश्किल यही आती है कि हिंदी के लेखक को एक लिपिक समझ लिया है और उसे सम्मान या धन देने में सभी शक्तिशाली लोग अपनी हेठी समझते हैं। यकीन करें इस लेखक के दिमाग में कई ऐसी कहानियां हैं जिन पर फिल्में अगर एक घंटे की भी बने तो हाहाकार मचा दे।

इस समाज में कई ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं जो प्रचार माध्यमों में सामाजिक एकता, समरसता और सभी धर्मों के प्रति आदर दिखाने के कथित प्रयास की धज्जियां उड़ा सकती है। प्यार और विवाह के दायरों तक सिमटे हिंदी मनोरंजन संसार को घर गृहस्थी में सामाजिक, धार्मिक और अन्य बंधन तोड़ने से जो दुष्परिणाम होते हैं उसका आभास तक नहीं हैं। आर्थिक, सामाजिक और दैहिक शोषण के घृणित रूपों को जानते हुए भी फिल्म और टीवी चैनल उससे मूंह फेरे लेते हैं। कटु यथार्थों पर मनोरंजक ढंग से लिखा जा सकता है पर सवाल यह है कि लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला कौन है? जो कथित रूप से समाज, संस्कार और संस्कृति के लिये अभियान चलाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य अपना प्रचार पाना है और उसमें वह किसी की भागीदारी स्वीकार नहीं करते।
टीवी चैनलों पर अध्यात्मिक चैनल भी धर्म के नाम पर मनोरंजन बेच रहे हैं। सच बात तो यह है कि धार्मिक कथायें और और सत्संग अध्यात्मिक शांति से अधिक मन की शांति और मनोरंजन के लिये किये जा रहे हैं। बहुत लोगों को यह जानकर निराशा होगी कि इनसे इस समाज, संस्कृति और संस्कारों के बचने के आसार नहीं है क्योंकि जिन स्त्रोतों से प्रसारित संदेश वाकई प्रभावी हैं वहां इस देश की संस्कृति, संस्कार और सामाजिक मूल्यों के विपरीत सामग्री प्रस्तुत की जा रही है। उनका विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला। इसके दो कारण है-एक तो नकारात्मक प्रतिकार कोई प्रभाव नहीं डालता और उससे अगर हिंसा होती है तो बदनामी का कारण बनती है, दूसरा यह कि स्त्रोतों की संख्या इतनी है कि एक एक को पकड़ना संभव ही नहीं है। दाल ही पूरी काली है इसलिये दूसरी दाल ही लेना बेहतर होगा।

अगर इन संगठनों और उनके प्रायोजकों के मन में सामाजिक मूल्यों के साथ संस्कृति और संस्कारों को बचाना है तो उन्हें फिल्मों, टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में अपनी पैठ बनाना चाहिये या फिर अपने स्त्रोत निर्माण कर उनसे अपने संदेशात्मक कार्यक्रम और कहानियां प्रसारित करना चाहिए। दीवारों पर नारे लिखकर या सड़कों पर नारे लगाने या कहीं धार्मिक कार्यक्रमों की सहायता से कुछ लोगों को प्रभावित किया जा सकता है पर अगर समूह को अपना लक्ष्य करना हो तो फिर इन बड़े और प्रभावी स्त्रोतों का निर्माण करें या वहां अपनी पैठ बनायें। जहां तक कुछ निष्कामी लोगों के प्रयासों का सवाल है तो वह करते ही रहते हैं और सच बात तो यह है कि जो सामाजिक मूल्य, संस्कृति और संस्कार बचे हैं वह उन्हीं की बदौलत बचे हैं बड़े संगठनों के आंदोलनों और अभियानों का प्रयास कोई अधिक प्रभावी नहीं दिखा चाहे भले ही प्रचार माध्यम ऐसा दिखाते या बताते हों। इस विषय पर शेष फिर कभी।
……………………………………..

यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

झूठ भी सच की तरह सजाते-व्यंग्य कविता

हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच की तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए हैं
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी है
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

———————————————–
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप ग्वालियर

कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

……………………………………………..
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

शब्द लिखना और पढ़ना एक नशा होता है-आलेख

लिखना और पढ़ना एक आदत है और यह अधिक शिक्षित में भी हो सकती है और कम शिक्षित में भी। चाहे किसी भी भाषा मं लिखने या पढ़ने का प्रश्न हो उसका इस बात से कोई संबंध नहीं है कि कोई पढ़ा लिखा अधिक पढ़ता है या कम पढ़ा लिखा। कई ऐसे लोग है जिन्होंने केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त किया पर वह कथित सामाजिक और जासूसी उपन्यास जमकर पढ़ते हैं पर कई ऐसे हैं जो बहुत पढ़ लिखकर ऊंचे पद पर पहुंच गये और अब इस बात की शिकायत करते हैं कि -उनको पढ़ने का समय नहीं मिलता।’

कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि ठेले पर सब्जी वाला लड़का भी फुरसत में कुछ न कुछ पढ़ता दिख जाये और उसके पास पढ़ा लिखा आदमी सब्जी खरीदने जाये। वहां उसे पढ़ता देख वह सोचता है कि ‘अच्छी फुरसत मिलती है इस सब्जी को पढ़ने की।
जिसे शब्द पढ़ने में आनंद आता है उसको चित्र देखकर भी मजा नहीं आता। पढ़ने वालों को किसी चित्र से कम उसके साथ लिखे शब्दों को पढ़ने में आनंद आता है। फिर आखिर पत्र-पत्रिकाओं में फोटो क्यों लगाये जाते हैं?’

अपनी मेहनत और पैसा बचाने के लिये। पता नहीं इस विषय पर लोग क्या सोचते हैं? पत्र पत्रिकाऐं अपने यहा प्रकाशनों में फोटो लंबे चैड़े लगाती हैं पर शब्द होते हैं कम। बहुत बड़ा हीरो और हीरोइन का साथ में चिपके हुए फोटो और अक्षर कुल दस ‘प्रेम के चर्चे गर्म; चार अक्षर शीर्षक के और छह अक्षर की खबर। किसी खाने की चीज के बनाने की विधि बतायी जाती है पचास शब्दों में और फोटो होता है डेढ़ पेज में। तय बात है कि संपादक अपनी मेहनत बचाता है और प्रकाशक अपना पैसा!’

पत्र पत्रिकाओं के संपादक और प्रकाशक हमेशा ही इस देश में पूज्यनीय रहे हैं पर वह पाठकों को अपना भक्त नहीं मानते। उनके लिये भगवान है विज्ञापन। जहां तक लेखकों का सवाल है तो उनकी हालत तो मजदूर से भी बदतर है। पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों के गठजोड़ का मानना है कि ‘लिख तो कोई भी सकता है।’
इसी सोच के परिणाम यह है कि वह किसी ऐसे लेखक में रुचि नहीं रखते जो केवल लिखता हो बल्कि उनकी नजर में वही लेखक श्रेष्ठ है जो थोड़ा प्रेक्टिकल (व्यवहारिक) हो यानि चाटुकारिता में भी दक्ष हो।’
इसी कारण हिंदी में प्रभाव छोड़ने वाला न लिखा गया और लिखवाया गया। फिल्म और पत्रिकारिता में मौलिक लेखकों को अभाव है। नकल कर सभी जगह काम चलाया जा रहा है और कहते क्या हैं-हिंदी में अच्छा लिखने वाले कम है।’

बहुत समय यानि अट्ठाईस वर्ष पहले एक नाठककार ने अपने भाषण में कहा था कि-िहंदी में नाटक लिखने वाले कम हैं।’

उस समय अनेक कथित हिंदी साहित्यकार यह सुन रहे थे पर किसी ने कुछ नहीं बोला पर उस इस आलेख का लेखक का कहना चाहता था कि-‘‘हिंदी मेें कहानी लिखी जाती है एक नाटक की तरह जिसमें वातावरण और पात्र इस तरह बुने जाते हैं कि नाटक भी बन जाये। फिर रामायण और महाभारत के बारे में कोई क्या कह सकता है। वह ऐसी रचनायें रही है जिन पर अनेक नाटक और फिल्म बन चुकी हैं। उस समय प्रेमचंद की एक कहानी पर एक नाटक इस पंक्तियों का लेखक स्वयं देखकर आया था। वहां कहा इसलिये नहीं क्योंकि उस समय दिग्गजों के सामने एक नवयुवक की क्या हिम्मत होती?’

अपनी पूज्यता का भाव हिंदी के लेखकों के लिये हमेशा दुःखदायी रहा है। वह जब थोड़ा पुजने लगते हैं तो अपनी असलियत भूल जाते हैं और उनको लगता है कि वह हो गये संपूर्ण लेखक। तमाम तरह के साहित्येत्तर सहयोग के कारण वह अपने इहकाल में पुज जाते हैं पर बाद में उनको कोई याद नहीं करता। हां, कुछ ऐसे लोग जो स्वयं लिखना नहीं जानते उनकी रचनाओं को दूसरे लेखकों के मुकाबले प्रकाशन जगत में लाते हैं ताकि वह प्रसिद्ध नहीं हो सके। कुकरमुत्तों जैसी हालत है। जो लेखक नहीं है वह चालू है और लेखक होने का ढोंग कर पुराने लेखकों की रचनायें क्लर्क बनकर लाते हैं और जो लेखक हैं वह सीधे सादे होते हैं और फिर हिंदी भाषी समाज उनके प्रति गंभीर नहीं है।

परिणाम सामने हैं कि हिंदी में एसा कुछ नहीं लिखा और जो पढ़ने को मिल रहा जिसे विश्वस्तरीय मानना कठिन है। हिंदी में जो लेखक मौलिक लेखन कर रहे हैं वह एक तरह के नशेड़ी है और जो पढ़े रहे है वह भी कोई कम नहीं हैं। मुश्किल यह है कि पश्चिम से प्रभावित यहां के पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों का गठजोड़ इस बात से कोई मतलब नहीं रखता। इस देश में नीतियां ऐसी हैं कि नये आदमी को कहीं स्थापित होने का अवसर नहीं है यही कारण फिल्म,साहित्य,पत्रकारिता और व्यवसाय के क्षेत्र और परिवार को पनपने का अवसर नहीं मिल पाता। पत्र पत्रकायें छापी जाती हैं पर पाठक के लिये नहीं बल्कि विज्ञापनदाताओंं के लिये। संपादक यह नहीं सोचता कि पाठक को चित्र पसंद आयेंगे कि नहंी बल्कि वह शायर सोचता यह है कि मालिक और उसके परिवार को पत्रिका पंसद आना चाहियै। तय बात है कि कोई भी पत्र पत्रिका केवल फोटो से ही चमक सकती है। अब यह कौन किसको बताये कि शब्द पढ़ने वाले चित्र नहीं पढ़ा करते? उनको नशा होता है शब्द पढ़ना और लिखना। ऐसे नशेडि़यों को अच्छा पढ़ने और लिखने के लिये जो संघर्ष करना पड रहा है उस पर फिर कभी।
………………………………………….
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप