Tag Archive | manoranjan

अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का प्रायोगिक प्रयास

यह विडियो प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा रहा. अगर पाठकों और दर्शकों पसंद आया तो आगे भी ऐसे प्रयास होते रहेंगे। यह एक महानुभाव के अनुरोध पर प्रस्तुत किया जा रहा है. http://youtu.be/VvdgZmhxN8A

इंसान की फितरत-हिन्दी कविताएँ

कभी उनके पाँव
तन्हाई की ओर तरफ चले जाते हैं,
मगर फिर भी भीड़ के लोगों के साथ गुजरे पल
उनको वहाँ भी सताते हैं,
कुछ लोग बैचेनी में जीने के
इतने आदी होते कि
अकेले में कमल और गुलाब के फूल भी
मुस्कराहट नहीं दे पाते हैं।
———-
जहां जाती भीड़
कभी लोग वहीं जाते हैं,
दरअसल अपनी सोची राह पर
चलने से सभी घबड़ाते हैं।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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अपने अपने बयान-हिन्दी शायरी

ज़िंदगी का फलसफा अभी तक कोई समझा नहीं
मगर कामयाबी के तरीके हर कोई बता रहा है।
खामोशी हर मर्ज की दवा है,मगर मुश्किल है
अपने बेकार बयानों से हर कोई हमें सता रहा है।
दुनिया की दौलत की पीछे दौड़ रहा आदमी
खुद को जमाने का पहरेदार जाता रहा है।
कहें दीपक बापू कब्जे की ज़मीन और चुराये पौधे
इंसान अपने लिए मालिक का खिताब लगा रहा है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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देश की बढ़ती अमीरी बन रही है बोरियत का कारण-हिन्दी लेख

       जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। निश्चित रूप से यह खबर लोगों के लिये डरावनी है। इधर भारत में यह लग रहा है कि जापान की सुनामी पर समाचार और बहस प्रसारण में भारतीय चैनलों के लिये विज्ञापनों की सुनामी आ गयी। ऐसे खास अवसरों ं टीवी चैनल के दर्शक कुछ विस्तार से सुनना और जानना चाहते हैं और यह बात देश के प्रचार प्रबंधकों को पता है और वह पर्दे के सामने चिपके रहेंगे इसलिये उनके सामने विज्ञापन दिखाकर अपने प्रायोजकों को खुश करते हैं। मुश्किल यह है कि उनके पास प्रबंध कौशल केवल अपने विज्ञापनदाताओं करे खुश करने तक ही सीमित है कार्यक्रम के निर्माण और प्रस्तुति में नज़र नहीं आती। उनको समाचार और बहसों के बीच केवल अपने विज्ञापनों की फिक्र रहती है।
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विज्ञापनों की वजह से इतने सारे समाचार चैनल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य विज्ञापन प्रसारित करना है और समाचार और बहस तो उनके लिये फालतु का विषय है। जो नये चैनल आ रहे हैं वह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते हैं इसलिये वह पुराने चैनलों को परास्त नहीं कर पा रहे। सच बात तो यह है कि इन प्रबंधकों के पास पैसा कमाने के ढेर सारे तरीके होंगे पर प्रबंध कौशल नाम का नहीं है। प्रबंध कौशल से आशय है कि अपने व्यवसाय से संबंधित हर व्यक्ति को खुश करना और कम से कम भारतीय समाचार टीवी चैनलों के दर्शक उनसे खुश नहीं है। समाचारों और बहसों के बीच जिस तरह विज्ञापन जिस तरह दिखाये जा रहे हैं उससे तो यह बात साफ लगती है कि दर्शकों की परवाह उनको नहीं है। एक मिनट का समाचार पांच मिनट का विज्ञापन। यह भी चल जाये पर बहस बीच में भी यही हाल। चार विद्वान जुटा लिये और आधे घंटे की उनकी बहस में पांच मिनट का भी वार्तालाप नहीं होता।
        कई बार तो यह हालत हो जाती है किसी विषय पर विद्वान अपनी एक मिनट की बात पांच मिनट के विज्ञापन के साथ दो बार पूरी करा करता है। ऐसा लगता है कि उधर जब सुनामी आ गयी तो भारत के टीवी चैनलों के प्रबंधक विज्ञापनों का प्रबंधन कर रहे होंगे क्योंकि उनको मालुम था कि उनके कर्मचारी विदेशी टीवी चैनलों की कतरनों से समाचार प्रसारित करने के साथ ही चार चार पांच लाईने बोलने वाले विद्वान भी जुटाकर कार्यक्रम ठीकठाक बना लेंगे। कौन हिन्दी दर्शक अंग्रेजी टीवी चैनल देखता है जो इस घटिया स्तर को समझ पायेगा।
     ऐसा लगता है कि विश्व पटल पर भारत जो कर्थित आर्थिक विकास कर रहा है वह यहां के आम लोगों के लिये महत्वहीन होता जा रहा है। भारत के आर्थिक ताकत होने पर यहां कौन यकीन कर सकता है जब यहां के आम आदमी की किसी को परवाह न हो। विकास कंपनियों के नाम पर शक्तिशाली लोगों के समूहों को रहा है। कलाकार, विद्वान, पूंजीपति, समाजसेवी और बाहुबली सभी जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और यही प्रसिद्ध चेहरे कहीं न कहीं  कंपनियों के पीछे रहनुमा क तरह खड़े हैं। इतनी सारी कपंनियां और उनके विज्ञापन बार बार देखकर मन उकता जाता है। वही क्रिकेट, फिल्म और टीवी धारावाहिकों में सक्रिय चेहरे सतत सामने आते हैं तो लगता है कि टीवी बंद रखना ही श्रेयस्कर है। देश की कथित अमीरी अब बोरियत का कारण बन रही है।
       जापान की सुनामी की चर्चा में कहीं  कुछ ऐसा सुनने को मिला जिसे याद रखने योग्य माना जाये। वहां भारी तबाही है। प्रकृति के प्रकोप से आई सुनामी के निशान मिट जायेंगे पर वहां जो परमाणु संयत्र पर विस्फोट हुआ है वह काफी चिंताजनक हैं। मर्यादा लांघकर आया समंदर लौट जायेगा पर मानवजनित उस परमाणु ऊर्जा से उपजा प्रकोप से निपटना आसान काम नहीं होगा। लोग बता रहे हैं कि जापान में आई सुनामी का भारत पर प्रभाव नहीं होगा पर अगर परमाणु संयंत्र से गैस का रिसाव हुआ तो वह समंदर के साथ ही विश्व की पूरी धरती पर विष घोल सकता है। समंदर में रेडिएशन घुल गया तो वह बरसात के माध्यम से कहां बरसेगा पता नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रिसाव से कोई खतरा नहीं पर हमारे हिसाब से उनको अभी अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। हमारा मानना तो यह है कि इस तरह के प्रकोप इसलिये हो रहे हैं कि अमेरिका और चीन सहित अनेक देशों ने ज़मीन और समंदर में ढेर सारे विस्फोट किये हैं।
                    ऐसे में एशिया के सबसे संपन्न जापान पर आया संकट यही संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक मानव स्वयं के लिये अधिक खतरनाक है। समंदर तो आज नहीं तो कल वापस अपनी जगह जायेगा पर परमाणु संयत्र से आया संकट आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। जापान के लोगों ने 1942 में अपने दो शहरों हिरोशिमा और नागासकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरते देखें हैं और वह इसे जानते हैं। बहरहाल उनके यहां आयी सुनामी भारत के टीवी चैनलों के लिये भी सुनामी लायी है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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कार और बैलगाड़ी-हिन्दी शायरियां (kar and bailgadi-hindi shayriyan)

वह कभी विकास विकास
तो कभी शांति शांति का नारा लगाते हैं।
कौन समझाये उनको
बैलगाड़ी युग में लौटकर ही
शांति के साथ हम जी पायेंगे,
वरना कार के धूऐं से
अपनी सांसों के साथ इंसान भी उड जायेंगे,
दिखाते हैं क्रिकेट और फिल्मों के
नायकों के सपने,
जैसे भूल जाये ज़माना दर्द अपने,
नैतिकता का देते उपदेश
लोगों को
पैसे की अंधी दौड़ में भागने के लिये
भौंपू बजाकर उकसाते हैं।
—————–
हर इंसान में
इंसानियात होना जरूरी नहीं होती है,
चमड़ी भले एक जैसी हो
मगर सोच एक होना जरूरी नहीं होती है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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कुदरत का खेल-हिन्दी शायरी (kudrat ka khel-hindi shayari)

माना कि उनके घर के दरवाजे तंग हैं,
तो भी हम उसमें से हम निकल जाते,
मुश्किल यह है कि उनकी सोच भी
तंग दायरों में कैद है इसलिये वह हमको
कभी प्यार से नहीं बुलाते।
————-
कई बार बहुत लोगों पर यकीन किया हमने
पर हर बार धोखा खाते हैं,
फिर भी नहीं रुकता यह सिलसिला
कुदरत का खेल कौन समझा
धोखा देना एक आदत है इंसान की
बस, समय और चेहरा बदल जाते हैं।
————

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छोटे और बड़े साहब-हिन्दी क्षणिकाएँ (boss culture-hindi comic poem)

 दिन भर अपने लिए साहब शब्द सुनकर

वह रोज फूल जाते हैं।

मगर उनके ऊपर भी साहब हैं

जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
——————–

नयी दुनियां में पुजने का रोग

सभी के सिर पर चढ़ा है।

कामयाबी का खिताब

नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ

नाकामी की लानत का आरोप

ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,

भले ही सभी जगह साहब हैं

बच जाये दंड से, वही बड़ा है

——–

साहबी संस्कृति में डूबे लोग

आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।

जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी

जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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