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झूठ भी सच की तरह सजाते-व्यंग्य कविता

हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की कोशिश
हर बार समाज में
सम्मान पाने की कोशिश
आदमी को बांधे रहती है
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते

ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते
कई किताबों के झुंड में से
छांटकर लोगों को सुनाये जाते
झूठ भी सच की तरह बताते

सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए हैं
आदमी को पालतू बनाने के लिए
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह
फिर भी कोई नहीं चाहता
अपने बनाए रास्ते पर
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते
समाज कोई इमारत नहीं है
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते

आदमी अकेला आया है
और अकेला ही जाता भी है
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए
इस दुनिया से विदा हो जाते

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप ग्वालियर

होली के रंग में मेकअप बिगड़ जायेगा-हास्य व्यंग्य कविताएँ (holi ke rang hasya kavita ke sang-hindi haasya kavitaeen)

एक लड़की ने दूसरी से पूछा
‘क्या होली पर तुम्हारा
प्रेमी भी रंग खेलने आयेगा
मैं भी उसका मूंह काला करूंगी
जब वह तुमसे मिलने आयेगा’

दूसरी ने कहा
‘आने को तो वह कह रहा था
पर मैंने बाहर जाने का
बहाना कर मना कर दिया
क्योंकि वह मुझे देखता है मेकअप में
अगर रंग डालेगा तो सब बिगड़ जायेगा।
बदल सकती है उसकी नजरें
जब मेरी असली सूरत देख जायेगा।
वैसे भी तुमने देखा होगा
टीवी और अखबारों में प्रेमियों की
चर्चा नहीं नहीं होती
मेकअप से मिला प्यार नहीं टिक सकता
पानी की धार इतनी तेज होती
होली का एक दिन उससे दूर रहने पर
मेरा यह प्यार बच जायेगा।
……………………..
इंटरनेट पर होली के रंग
दोस्तों के अंदाज-ए-बयां में नजर आते है।
कोई एक जैसी टिप्पणी सभी दरवाजों पर फैंकते
कोई साथ में पाठ भी चिपका जाते हैं।
चलता कोई नहीं दिखता
पर भागमभाग सभी करते नजर आते
लाल,गुलाबी,पीले और हरे रंग
दिल नहीं बहला पाते जितना
उससे अधिक दोस्तों की अदाओं के रंग
अधरों पर मुस्कान बिखेर जाते हैं।

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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