Tag Archive | हास्य-व्यंग्य

इधर से उधर-हास्य कविता

अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट लिखते-लिखते
दोनों के दिल मिल गए अपने आप
दोनों युवा थे और कविता लिखने के शौकीन भी
होना था मिलन कभी न कभी
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता
अपना लिखना भूल गया
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता
और खुश होता अपने ही आप

एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘ कुछ और रचनाएं भी लिखा करो
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे
‘केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर’कहलाओगे
इससे होगा मुझे भारी संताप

प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर
वह लिखने में जुट गया
हो गया मशहूर सब जगह
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का
उसके दिल में था घाव
बदला लेने को था बेताब
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर
लगाना शुरू किया कमेन्ट
एक अपने और आठ छद्म नाम से
उसके ब्लोग को हिट कराता
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा
उसको हर बार भेंट
प्रेमिका का दिल भी गया पलट
दूसरे में गया दिल गया भटक
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप

उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर
उसे सब समझ में आया
मन में हुआ भारी संताप
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश
‘यह क्या कर रही हो
मुझे लिखने में उलझाकर
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम
अंतर नही समाज रही
धोखा खाओगी अपने आप’

प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी
तुम्हारी रचना दर्द बाँटती हैं
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया
तुम अपना दिल कहीं और लगाना
मत देना अपने को विरह का संताप
सब ठीक हो जायेगा अपने आप

नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

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शायद ऐसे ही सजता है अखबार-हास्य कविता

हादसों की ख़बरों से भरा हुआ अख़बार
ढूंढ रहे हैं शब्द लोग
अपने दिल को लुभाने वाले
विज्ञापनों से सजा रंगीन पृष्ठ
ढेर सारे शब्दों की पंक्तियों से
गुजर जाती हैं दृष्टि
पर बैचेनी बढाते जाते हैं शब्द
कहीं सूखे हैं अकाल से
तो कहीं उफनते हैं वर्षा से नदी और नाले
कही चटके हैं किसी घर के ताले
कही पकड़े हैं नकली माल बनाने वाले
चमकता लगता है
बहुत सारे हादसों से अख़बार

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सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये दहशत का खिलौना-हिंदी शायरी

दहशत की भी सब जगह
चलती फिरती दुकान हो गयी
विज्ञापन का कोई झंझट नहीं
उनकी करतूतों की खबर सरेआम हो गयी

कहीं विचारधारा का बोर्ड लगा है
कहीं भाषा का नाम टंगा है
कहीं धर्म के नाम से रंगा है
जज्बातों का तो बस नाम है
सारी दुनियां मशहूरी उनके नाम हो गयी

बिना पैसे खिलौना नहीं आता
उनके हाथ में बम कैसे चला आता
फुलझड़ी में हाथ कांपता है गरीब बच्चे का
उनके हाथ बंदूक कैसे आती
गोलियां क्या सड़क पड़ उग आती
सवाल कोई नहीं पूछता
चर्चाएं सब जगह हो जाती
गंवाता है आम इंसान अपनी जान
कमाता कौन है, आता नहीं उसका नाम
दहशत कोई चीज नहीं जो बिके
पर फिर भी खरीदने वाले बहुत हैं
सपने भी भला जमीन पर होते कहां
पर वह भी तो हमेशा खूब बिके
हाथ में किसी के नहीं खरीददार उनके भी बहुत हैं
शायद मुश्किल हो गया है
सपनों में अब लोगों को बहलाना
इसलिये दहशत से चाहते हैं दहलाना
आदमी के दिल और दिमाग से खेलने के लिये
सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये खिलौना
इसलिये एक मंडी दहशत के नाम हो गयी
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