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शब्द लिखना और पढ़ना एक नशा होता है-आलेख

लिखना और पढ़ना एक आदत है और यह अधिक शिक्षित में भी हो सकती है और कम शिक्षित में भी। चाहे किसी भी भाषा मं लिखने या पढ़ने का प्रश्न हो उसका इस बात से कोई संबंध नहीं है कि कोई पढ़ा लिखा अधिक पढ़ता है या कम पढ़ा लिखा। कई ऐसे लोग है जिन्होंने केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त किया पर वह कथित सामाजिक और जासूसी उपन्यास जमकर पढ़ते हैं पर कई ऐसे हैं जो बहुत पढ़ लिखकर ऊंचे पद पर पहुंच गये और अब इस बात की शिकायत करते हैं कि -उनको पढ़ने का समय नहीं मिलता।’

कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि ठेले पर सब्जी वाला लड़का भी फुरसत में कुछ न कुछ पढ़ता दिख जाये और उसके पास पढ़ा लिखा आदमी सब्जी खरीदने जाये। वहां उसे पढ़ता देख वह सोचता है कि ‘अच्छी फुरसत मिलती है इस सब्जी को पढ़ने की।
जिसे शब्द पढ़ने में आनंद आता है उसको चित्र देखकर भी मजा नहीं आता। पढ़ने वालों को किसी चित्र से कम उसके साथ लिखे शब्दों को पढ़ने में आनंद आता है। फिर आखिर पत्र-पत्रिकाओं में फोटो क्यों लगाये जाते हैं?’

अपनी मेहनत और पैसा बचाने के लिये। पता नहीं इस विषय पर लोग क्या सोचते हैं? पत्र पत्रिकाऐं अपने यहा प्रकाशनों में फोटो लंबे चैड़े लगाती हैं पर शब्द होते हैं कम। बहुत बड़ा हीरो और हीरोइन का साथ में चिपके हुए फोटो और अक्षर कुल दस ‘प्रेम के चर्चे गर्म; चार अक्षर शीर्षक के और छह अक्षर की खबर। किसी खाने की चीज के बनाने की विधि बतायी जाती है पचास शब्दों में और फोटो होता है डेढ़ पेज में। तय बात है कि संपादक अपनी मेहनत बचाता है और प्रकाशक अपना पैसा!’

पत्र पत्रिकाओं के संपादक और प्रकाशक हमेशा ही इस देश में पूज्यनीय रहे हैं पर वह पाठकों को अपना भक्त नहीं मानते। उनके लिये भगवान है विज्ञापन। जहां तक लेखकों का सवाल है तो उनकी हालत तो मजदूर से भी बदतर है। पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों के गठजोड़ का मानना है कि ‘लिख तो कोई भी सकता है।’
इसी सोच के परिणाम यह है कि वह किसी ऐसे लेखक में रुचि नहीं रखते जो केवल लिखता हो बल्कि उनकी नजर में वही लेखक श्रेष्ठ है जो थोड़ा प्रेक्टिकल (व्यवहारिक) हो यानि चाटुकारिता में भी दक्ष हो।’
इसी कारण हिंदी में प्रभाव छोड़ने वाला न लिखा गया और लिखवाया गया। फिल्म और पत्रिकारिता में मौलिक लेखकों को अभाव है। नकल कर सभी जगह काम चलाया जा रहा है और कहते क्या हैं-हिंदी में अच्छा लिखने वाले कम है।’

बहुत समय यानि अट्ठाईस वर्ष पहले एक नाठककार ने अपने भाषण में कहा था कि-िहंदी में नाटक लिखने वाले कम हैं।’

उस समय अनेक कथित हिंदी साहित्यकार यह सुन रहे थे पर किसी ने कुछ नहीं बोला पर उस इस आलेख का लेखक का कहना चाहता था कि-‘‘हिंदी मेें कहानी लिखी जाती है एक नाटक की तरह जिसमें वातावरण और पात्र इस तरह बुने जाते हैं कि नाटक भी बन जाये। फिर रामायण और महाभारत के बारे में कोई क्या कह सकता है। वह ऐसी रचनायें रही है जिन पर अनेक नाटक और फिल्म बन चुकी हैं। उस समय प्रेमचंद की एक कहानी पर एक नाटक इस पंक्तियों का लेखक स्वयं देखकर आया था। वहां कहा इसलिये नहीं क्योंकि उस समय दिग्गजों के सामने एक नवयुवक की क्या हिम्मत होती?’

अपनी पूज्यता का भाव हिंदी के लेखकों के लिये हमेशा दुःखदायी रहा है। वह जब थोड़ा पुजने लगते हैं तो अपनी असलियत भूल जाते हैं और उनको लगता है कि वह हो गये संपूर्ण लेखक। तमाम तरह के साहित्येत्तर सहयोग के कारण वह अपने इहकाल में पुज जाते हैं पर बाद में उनको कोई याद नहीं करता। हां, कुछ ऐसे लोग जो स्वयं लिखना नहीं जानते उनकी रचनाओं को दूसरे लेखकों के मुकाबले प्रकाशन जगत में लाते हैं ताकि वह प्रसिद्ध नहीं हो सके। कुकरमुत्तों जैसी हालत है। जो लेखक नहीं है वह चालू है और लेखक होने का ढोंग कर पुराने लेखकों की रचनायें क्लर्क बनकर लाते हैं और जो लेखक हैं वह सीधे सादे होते हैं और फिर हिंदी भाषी समाज उनके प्रति गंभीर नहीं है।

परिणाम सामने हैं कि हिंदी में एसा कुछ नहीं लिखा और जो पढ़ने को मिल रहा जिसे विश्वस्तरीय मानना कठिन है। हिंदी में जो लेखक मौलिक लेखन कर रहे हैं वह एक तरह के नशेड़ी है और जो पढ़े रहे है वह भी कोई कम नहीं हैं। मुश्किल यह है कि पश्चिम से प्रभावित यहां के पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों का गठजोड़ इस बात से कोई मतलब नहीं रखता। इस देश में नीतियां ऐसी हैं कि नये आदमी को कहीं स्थापित होने का अवसर नहीं है यही कारण फिल्म,साहित्य,पत्रकारिता और व्यवसाय के क्षेत्र और परिवार को पनपने का अवसर नहीं मिल पाता। पत्र पत्रकायें छापी जाती हैं पर पाठक के लिये नहीं बल्कि विज्ञापनदाताओंं के लिये। संपादक यह नहीं सोचता कि पाठक को चित्र पसंद आयेंगे कि नहंी बल्कि वह शायर सोचता यह है कि मालिक और उसके परिवार को पत्रिका पंसद आना चाहियै। तय बात है कि कोई भी पत्र पत्रिका केवल फोटो से ही चमक सकती है। अब यह कौन किसको बताये कि शब्द पढ़ने वाले चित्र नहीं पढ़ा करते? उनको नशा होता है शब्द पढ़ना और लिखना। ऐसे नशेडि़यों को अच्छा पढ़ने और लिखने के लिये जो संघर्ष करना पड रहा है उस पर फिर कभी।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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