Tag Archive | मस्तराम

इंसान की फितरत-हिन्दी कविताएँ

कभी उनके पाँव
तन्हाई की ओर तरफ चले जाते हैं,
मगर फिर भी भीड़ के लोगों के साथ गुजरे पल
उनको वहाँ भी सताते हैं,
कुछ लोग बैचेनी में जीने के
इतने आदी होते कि
अकेले में कमल और गुलाब के फूल भी
मुस्कराहट नहीं दे पाते हैं।
———-
जहां जाती भीड़
कभी लोग वहीं जाते हैं,
दरअसल अपनी सोची राह पर
चलने से सभी घबड़ाते हैं।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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कार और बैलगाड़ी-हिन्दी शायरियां (kar and bailgadi-hindi shayriyan)

वह कभी विकास विकास
तो कभी शांति शांति का नारा लगाते हैं।
कौन समझाये उनको
बैलगाड़ी युग में लौटकर ही
शांति के साथ हम जी पायेंगे,
वरना कार के धूऐं से
अपनी सांसों के साथ इंसान भी उड जायेंगे,
दिखाते हैं क्रिकेट और फिल्मों के
नायकों के सपने,
जैसे भूल जाये ज़माना दर्द अपने,
नैतिकता का देते उपदेश
लोगों को
पैसे की अंधी दौड़ में भागने के लिये
भौंपू बजाकर उकसाते हैं।
—————–
हर इंसान में
इंसानियात होना जरूरी नहीं होती है,
चमड़ी भले एक जैसी हो
मगर सोच एक होना जरूरी नहीं होती है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

वह इंसानी बुत
आंख से देखते हुए भी
सभी को दिखते,
अपनी कलम से पद पाने की हसरत में
हाथ से अपील भी लिखते,
कान आगे बढ़ाकर आदमी की
शिकायत भरी आवाज भी सुनते,
चेहरे पर अपनी अदाओं से
गंभीरता की लकीरें भी बुनते
फिर चढ़ जाते हैं सीढ़ियां
बैठ जाते शिखर पर।

अगली बार नीचे आने तक
वह लाचार हो जाते,
हर हादसे के लिये
अपने मातहत को जिम्मेदार
और खुद को बेबस बताते
अपनी बेबसी यूं ही दिखाते हैं,
लोकतंत्र के यज्ञ में
सेवा का पाखंड
किस कदर है कि
ज़माने की हर परेशानी के हल का
दावा करने वाले
महलों में घुसते ही बनकर राजा
अनुचरों के हाथ, पांव, कान तथा नाक के घेरे में ही
अपना सिंहासन सजाते हैं,
कौम के सपने रह जाते हैं बिखर कर।
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

हिन्दी शायरी-सीख और काम (hindi shayari-seekh aur kaam)

उस्तादों ने
वफादारी का रास्ता दिखाया
पर कैसे की जाती है
यह नहीं सिखाया।
इसलिये ज़माने भर के शगिर्द
करते हैं यकीन निभाने की बात
मगर वफादारों में 
कभी किसी ने नाम नहीं लिखाया।
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

शैतान मरता नहीं है-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (sahitan marta nahin hai-hindi satire poem)

हर बार लगा कि शैतान के ताबूत में
आखिरी कील ठोक दी गयी है,
फिर भी वह दुनियां में
अपनी हाजिरी रोज दर्ज कराता है,
मुश्किल यह है कि
इंसानों के दिल में ही उसका घर है
भले ही किसी को नज़र नहीं आता है।
———-
बार बार खबर आती है कि
शैतान मर गया है
मगर वह फिर नाम और वेश
बदलकर सामने आता है,
कमबख्त,
कई इंसान उसे पत्थर मारते मारते
मर गये
यह सोचकर कि
उन्होंने अपना फर्ज अदा किया
मगर जिंदा रहा वह उन्हीं के शरीर में
छोड़ गये वह उसे
शैतान दूसरे में चला जाता है।
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दौलत और हादसों का रिश्ता-हिन्दी शायरी (daulat aur hadson ka rishta-hind shayri)

लोग हादसों की खबर पढ़ते और सुनते हैं
लगातार देखते हुए उकता न जायें
इसलिये विज्ञापनों का बीच में होना जरूरी है।
सौदागारों का सामान बिके बाज़ार में
इसलिये उनका भी विज्ञापन होना जरूरी है।
आतंक और अपराधों की खबरों में
एकरसता न आये इसलिये
उनके अलग अलग रंग दिखाना जरूरी है।
आतंक और हादसों का
विज्ञापन से रिश्ता क्यों दिखता है,
कोई कलमकार
एक रंग का आतंक बेकसूर
दूसरे को बेकसूर क्यों लिखता है,
सच है बाज़ार के सौदागर
अब छा गये हैं पूरे संसार में,
उनके खरीद कुछ बुत बैठे हैं
लिखने के लिये पटकथाऐं बार में
कहीं उनके हफ्ते से चल रही बंदूकें
तो कहीं चंदे से अक्लमंद भर रहे संदूके,
इसलिये लगता है कि
दौलत और हादसों में कोई न कोई रिश्ता होना जरूरी है।

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देशप्रेम और सयाने-हिन्दी व्यंग्य कविता (deshprem aur sayane-hindi vyangya poem)

नहीं जगा पाते अब देशप्रेम
फिल्मों के पुराने घिसे पिटे गाने,
हालत देश की देखकर
मन उदास हो जाता है,
स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस
उठते है मन ही मन ताने।
अपने आज़ाद होने के बारे में सुना
पर कभी नहीं हुआ अहसास,
जीवन संघर्ष में नहीं पाया किसी को पास,
आज़ादह और एकता के नारे
हमेशा सुनने को मिलते रहे,
पर अपनों से ही जंग में पिलते रहे,
अपने को हर पग पर गुलाम जैसा पाया,
अपने हाथ अपने मन से नहीं चलाया,
हमेशा रहे आज़ादी और स्वयं के तंत्र से अनजाने
सब उलझे हैं उलझनों में
जो सुलझे हैं,
वह भी लगे दौलत और शौहरत जुटाने की उधेड़बनों में,
देशप्रेम की बात करते हैं,
पर दिखाते नहीं वही कहलाते सयाने।
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