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अपने दर्द से छिपना हर इन्सान की होती आदत -व्यंग्य कविता

उसने कहा कवि से
‘तू क्यों कविता लिखता है
सारे जमाने का दर्द समेट कर
अपने शब्दों में
अपनी ही पीड़ाओं से स्वयं छिपता है
बजती होंगी तेरी कविताओं पर
सम्मेलनों में तालियां
पर पीठ पीछे पड़ती है गालियां
कई लोगों के साथ तेरे शब्दों का भंडार भी
कूड़े के ढेर में दिखता है
भला शब्दों के सहारे भी
कभी दुनियां का सच टिकता है
जो तू कविता लिखता है’

कहा कवि ने
‘हर इंसान की तरह मेरी भी आदत है
अपने दर्द से छिपना
पर मैं हंसता नहीं किसी का दर्द देखकर
बात तो अपनी ही कहता हंू
शब्दों में वही होता है जो मैं सहता हूं
भले ही लगे दूसरे के दर्द पर लिखना
कवियों पर लोग फब्बितयां कसते हैं
पर खुद अपनी पीड़ाओं के आंसू
अंदर पीते हुए
दूसरे के दर्द पर सभी हंसते हैं
फिर अपने ही बुने जाल में फंसते हैं
लोग छिप रहे हैं अपने पापों से
अपनी ही हंसने की इच्छाओं के पूरे होने की
उम्मीद कर रहे हैं दूसरे के स्यापों से
अगर हल्का हो जाता है उनका दर्द
तो देते रहें कवियों का गालियां
फिर सम्मेलनों में वही बजाते हैं तालियां
पर कवि अपनी बात से किसी को नहीं रुलाते
अपने आंसु छिपाकर दूसरे को हंसाते
भाग रहा है जमाना अपने आप से
खौफ खाता है एकालाप से
लोगों को नहीं आती दिल की बात कहने की कला
इसलिये कवियों की कवितायें लगती हैंं बला
अपना दर्द दूसरे का बताकर
कवि अपना बोझ हल्का कर जाते हैं
बोझिल लोग इसलिये उनसे चिढ़ खाते हैं
दर्द बहुत है
इसलिये कवि भी बहुत लिखते हैं
शिकायत बेकार है लोगों की
दर्द का व्यापार करने की
उनकी बदौलत ही तो
बाजार में दर्द बिकता है
इसलिये कवि लिखता है

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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