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मुश्किल का हल-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (mushkil ka hal-hindi hasya vyangya kavita)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
”यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें..”

सुनकर दूसरा बोला 
“सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें..”
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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कर्जे और किश्तों में जिंदगी-आलेख और कविता (loan and lifr-hindi article and poem)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।

 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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छोटे और बड़े साहब-हिन्दी क्षणिकाएँ (boss culture-hindi comic poem)

 दिन भर अपने लिए साहब शब्द सुनकर

वह रोज फूल जाते हैं।

मगर उनके ऊपर भी साहब हैं

जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
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नयी दुनियां में पुजने का रोग

सभी के सिर पर चढ़ा है।

कामयाबी का खिताब

नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ

नाकामी की लानत का आरोप

ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,

भले ही सभी जगह साहब हैं

बच जाये दंड से, वही बड़ा है

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साहबी संस्कृति में डूबे लोग

आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।

जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी

जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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जब फैशन तनाव बने-हिन्दी आलेख (fashan is tension-hindi article)

अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।

एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये।  उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये।  कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी।  उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।

बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’

हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी।  उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’

वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’

बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी।  अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था।  अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’

हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।

हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं।  अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’

एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है।  हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की  चप्पल नहीं पहन सकती।’

उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।

वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी  अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।

दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं।  आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।

हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने  दहेज में कार मांगी है।’

वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!

बेटे ने बाप को  समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता।  नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।

बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा।  जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे।  औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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योग केवल सांस लेने की क्रिया नहीं है-आलेख (yog aur asan-hindi lekh)

वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया  है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार  का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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शब्दों पर नियंत्रण-हिन्दी व्यंग्य (control of word-hindi satire

एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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घर का रोना-हास्य व्यंग्य कविता (ghar ka rona-vyangya kavita

छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
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नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita

फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

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समस्याओं का प्रचार-हास्य व्यंग्य कविताऐं

जब हो जायेगा देश का उद्धार-व्यंग्य क्षणिकाएँ
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मिस्त्री ने कहा ठेकेदार से
‘बाबूजी यह पाईप तो सभी चटके हुए हैं
कैसे लगायें इनको
जनता की समस्या इससे नहीं दूर पायेगी
पानी की लाईन तो जल्दी जायेगी टूट’
ठेकेदार ने कहा
‘कितनी मुश्किल से चटके हुए पाईप लाया हूं
इसके मरम्मत का ठेका भी
लेने की तैयारी मैंने कर ली है पहले ही
तुम तो लगे रहो अपने काम में
नहीं तो तुम्हारी नौकरी जायेगी छूट’
…………………..
समस्याओं को पैदा कर
किया जाता है पहले प्रचार
फिर हल के वादे के साथ
प्रस्तुत होता है विचार

अगर सभी समस्यायें हल हो जायेंगी
तो मुर्दा कौम में जान फूंकने के लिये
बहसें कैसे की जायेंगी
बुद्धिजीवियों के हिट होने का फार्मूला है
जन कल्याण और देश का विकास
कौन कहेगा और कौन सुनेगा
जब हो जायेगा देश का उद्धार

…………………………..
तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य
——————–
वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
…………………….

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आचरण निजी मामला है-हास्य व्यंग्य

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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ऑस्कर से कोई फिल्म दीवार और अभिनेता अमिताभ बच्चन तो नहीं बन सकता-आलेख (amitabh bachchar and oscar award-hindi lekh)

भारत में अधिकतर लोगों को फिल्म देखने का शौक है और सभी की अपनी वय और समय के अनुसार पंसदीदा फिल्में और अभिनेता हैं। वैसे फिल्म शोले की अक्सर चर्चा होती है पर अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म दीवार वाकई एतिहासिक फिल्म है। शोले में हाथ काटने की घटना दिखाने के कारण अनेक लोग उसे पसंद नहीं करते हैं क्योंकि उसके बाद देश में क्रूरता की घटनायें बढ़ीं हैं। कुल मिलाकर लोगों के लिये फिल्में मनोरंजन का एक सशक्त और प्रिय माध्यम हैं।
फिल्मों के लेकर अनेक पुरस्कार बंटते हैं जिनमें राष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल हैं। अनेक व्यवसायिक फिल्मकार उनकी यह कहकर आलोचना करते हैं कि उन पुरस्कारों के वितरण में आम दर्शक की पसंद का ध्यान नहीं रखा जाता है। यही कारण है कि वह कभी राष्ट्रीय पुरस्कारोंं के समानांतर वह अपने लिये अलग से पुरस्कार कार्यक्रम आयोजित कर उनका खूब प्रचार भी करते हैं। अब तो टीवी चैनलों पर भी उनका प्रचार होता है। हिंदी फिल्मकार इसलिये विदेशी पुरस्कार आस्कर लेने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं और वहां अपनी फिल्मों का नामांकन होते ही यहां प्रचार भी शुरू कर देते हैं। वह इतना होता है कि जब पुरस्कार न मिलने पर भी उनको कोई अंतर नहीं पड़ता। वैसे आस्कर अवार्ड कुछ भारतीय फिल्मकारों को भी मिल चुका है पर उनकी फिल्में भी कोई इस देश में अधिक लोकप्रिय नहीं थीं। इसके बावजूद भारतीय फिल्मकार उसके पीछे लगे रहते हैं और कभी उसमें आम भारतीय दर्शक की उपेक्षा की चर्चा नहीं करते। हर साल आस्कर अवार्ड का समय पास आते ही यहां शोर मच जाता हैं। टीवी चैनल और अखबार उसमें नामांकित भारतीय फिल्मों की चर्चा करते हैं।

बहरहाल स्लमडाग मिलेनियर की चर्चा खूब हैं और उसके आस्कर मेंे ंनामांकित होने की चर्चा भी बहुत हैं। इस लेखक ने यह फिल्म नहीं देखी पर इसकी कहानी कुछ प्रचार माध्यमों में पढ़ी है उससे तो लगता है कि उसमें ं अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार और टीवी धारावाहिक ‘कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम की छाया है। इसके अलावा अन्य फिल्मों के नामांकित होने की चर्चा है। शोर इतना है कि जहां देखो आस्कर का नाम आता है। इस बारे में हम तो इतना ही कहते हैं कि ‘आस्कर मिलने से कोई फिल्म दीवार और अभिनेता अमिताभ बच्चन तो नहीं बन सकता।’ याद रहे दीवार फिल्में में एक गरीब घर का लड़का अमीर बन गया और उसने अपने पिता के कातिलों से बदला लिया। यह फिल्म बहुत सफल रही और उससे एक्शन फिल्मों को दौर शुरु हुआ और तो शोले तो उसके बाद में आयी

जैसे बाजार और प्रचार के माध्यमों का निजीकरण हुआ है आस्कर अवार्ड के कार्यक्रम यहां भी दिखाये जाते हैं जबकि उनसे भारतीय दर्शक को कोई लेनादेना नहीं है। हां, अब पढ़ा लिख तबका कुछ अधिक हो गया है जिसका विदेशों से मोह है वही इसमें दिलचस्पी लेता है बाकी फिल्म देखने वाले तो हर वर्ग के दर्शक हैं और उनकी ऐसे पुरस्कारों में अधिक दिलचस्पी नहीं होती। इस देश में अमिताभ बच्चन एक ऐसा सजीव पात्र हैं जिस पर कोई लेखक कहानी भी नहीं लिख सकता। विदेशी तो बिल्कुल नहीं। उनको अगर कोई पुरस्कार फिल्मोंं में योगदान पर मिल भी जाये तो उसकी छबि बढ़ेगी न कि अमिताभ बच्चन की। उनकी युवावस्था का दौर भारतीय फिल्मों का स्वर्णिम काल है। बहरहाल आशा है कुछ दिनों में आस्कर का शोर थम जायेगा पर हिंदी फिल्मों का रथ तो हमेशा की तरह आगे बढ़ता ही रहेगा।
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अपनों की परवाह नहीं, परायों के लिए दीवानापन -व्यंग्य आलेख

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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निरर्थक बहसों में उलझे देश के बुद्धिजीवी-चिंतन आलेख

देश में आतंक के नाम पर निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्रों से ना जोड़ने का आग्रह करने वाले ही इसे जोड़ते भी दिख रहे हैं. यह कैसे संभव है कि आप एक तरफ यह कहें के आतंकियों का कोई धर्म, भाषा और जाति नहीं है दूसरी तरफ उसी उनके समूहों की तरफ से सफाई भी देते फिरें. आश्चर्य की बात है कि अनेक बुद्धजीवी तो भ्रमित हैं. उनके भ्रम का निवारण करना तो बहुत कठिन है.

वैसे तो किसी भी प्रकार कि हिंसा को किसी धर्म,भाषा या जाति से जोड़ना ठीक नहीं पर कुछ लोग ऐसा कहते हुए बड़ी चालाकी से इनका आधार पर बने समूहों का वह प्रशस्ति गान करते हैं. तब फिर एक आम आदमी को यह कैसे समझाया जा सकता है कि इन अपराधिक घटनाओं को सहजता से ले. हालत तो और अधिक खराब होते जा रहे हैं पर कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक खुराक के लिए सतही विचारों को जिस तरह व्यक्त कर रहे हैं वह चिंताजनक है. उनके विचारों का उन लोगों पर और भे अधिक बुरा प्रभाव पडेगा जो पहले से ही भ्रमित है.

कुछ बुद्धिजीवी तो हद से आगे बाद रहे हैं. वह कथित रूप से सम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए एस समुदाय विशेष को अधिक सक्षम मानते हैं. अपने आप में इतना हायास्पद तर्क है जिसका कोई जवाब नहीं है. वैसे तो हम देख रहे है कि देश में बुद्धिजीवि वर्ग विचारधाराओं में बँटा हुआ है और उनकी सोच सीमित दायरों में ही है. इधर अंतरजाल पर कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जो स्वयं अपना मौलिक तो लिखते नहीं पर पुराने बुद्धिजीवियों के ऐसे विचार यहाँ लिख रहे हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वैसे देखा जाए तो पहले प्रचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे तब कहीं भाषण सुनकर या किताब पढ़कर लोग अपनी राय कायम थे. अनेक लोग तब यही समझते थे कि अगर किसी विद्वान ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा. अब समय बदल गया है. प्रचार माध्यम की ताकत ने कई ऐसे रहस्यों से परदा उठा दिया है जिनकी जानकारी पहले नहीं होती थी. अब लोग सब कुछ सामने देखकर अपनी राय कायम करते हैं। ऐसे में पुरानी विचारधाराओं के आधार पर उनको प्रभावित नहीं करती।

अमरीकी सम्राज्यवाद भी अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है और अब इस देश के लोग तो वैसे ही ऐसी बातों में नहीं आते। अमेरिका कोई एक व्यक्ति, परिवार या समूह का शासन नहीं है। वहां भी गरीबी और बेरोजगारी है-यह बात यहां का आदमी जानता है। अमेरिका अगर आज जिन पर हमला कर रहा है तो वही देश या लोग हैं जो कभी उसके चरणों में समर्पित थे। अमेरिका के रणनीतिकारों ने पता नहीं जानबूझकर अपने दुश्मन बनाये हैं जो उनकी गलतियों से बने हैं यह अलग रूप से विचारा का विषय है पर उसके जिस सम्राज्य का जिक्र लोग यहां कर रहे हैं उन्हें यह बात समझना चाहिये कि वह हमारे देश पर नियंत्रण न कर सका है न करने की ताकत है। अभी तक उसने उन्हीं देशों पर हमले किये हैं जो परमाणु बम से संपन्न नहीं है। उससे भारत की सीधी कोई दुश्मनी नहीं है। वह आज जिन लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहा है पहले ही उसके साथ रहकर मलाई बटोर रहे थे। अब अगर वह उनके खिलाफ आक्रामक हुआ है तो उसमें हम लोगों का क्या सरोकार है?

अमेरिकी सम्राज्य का भ्रम कई वर्षों तक इस देश में चला। अब अमेरिका ऐसे झंझटों में फंसा है जिससे वर्षों तक छुटकारा नहीं मिलने वाला। इराक और अफगानिस्तान से वह निकल नहीं पाया और ईरान में भी फंसने जा रहा है, मगर इससे इसे देश के लोगों का कोई सरोकार नहींं है। ऐसे में उससे लड़ रहे लोगों के समूहों का नाम लेकर व्यर्थ ही यह प्रयास करना है कि वह अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ सक्षम हैं। देश में विस्फोट हों और उससे अपराध से अलग केवल आतंक से अलग विषय में देखना भी एक विचार का विषय है पर उनकी आड़ में ऐसी बहसे तो निरर्थक ही लगती हैं। इन पंक्तियों का लेखक पहले भी अपने ब्लागों परी लिख चुका है कि इन घटनाओं पर अपराध शास्त्र के अनुसार इस विषय पर भी विचार करना चाहिये कि इनसे लाभ किनको हो रहा है। लोग जबरदस्ती धर्म,जातियों और भाषाओं के समूहों का नाम लेकर इस अपराध को जो विशिष्ट स्वरूप दे रहा है उससे पैदा हुआ आकर्षण अन्य लोगों को भी ऐसा ही करने लिये प्रेरित कर सकता है। दरअसल कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आतंक के नाम फैलायी जा रही हिंसा कहीं व्यवसायिक रूप तो नहीं ले चुकी है। यह खौफ का व्यापार किनके लिये फायदेमंद है इसकी जांच होना भी जरूरी है पर इसकी आड़ में धर्म,भाषा और जातियों को लेकर बहस आम आदमी के लिये कोई अच्छा संदेश नहीं देती।
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