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शायद ऐसे ही सजता है अखबार-हास्य कविता

हादसों की ख़बरों से भरा हुआ अख़बार
ढूंढ रहे हैं शब्द लोग
अपने दिल को लुभाने वाले
विज्ञापनों से सजा रंगीन पृष्ठ
ढेर सारे शब्दों की पंक्तियों से
गुजर जाती हैं दृष्टि
पर बैचेनी बढाते जाते हैं शब्द
कहीं सूखे हैं अकाल से
तो कहीं उफनते हैं वर्षा से नदी और नाले
कही चटके हैं किसी घर के ताले
कही पकड़े हैं नकली माल बनाने वाले
चमकता लगता है
बहुत सारे हादसों से अख़बार

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