मुश्किल का हल-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (mushkil ka hal-hindi hasya vyangya kavita)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
”यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें..”

सुनकर दूसरा बोला 
“सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें..”
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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ग़रीब की थाली सजाने में-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (garib ki thali-hindi vyangya kavitaen)

हिन्दी साहित्य,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,समाज,hindi literature,sahityaखड़े हैं गरीब
खाली पेट लिये हुक्मत की रसोई के बाहर
जब भी मांगते हैं रोटी
तो जवाब देते हैं रसोईघर के रसोईये
‘अभी इंतजार करो
अभी तुम्हारी थाली में रोटी सजा रहे हैं,
उसमें समय लगेगा
क्योंकि रोटी के साथ
आज़ादी की खीर भी होगी,
खेल तमाशों का अचार भी होगा,
उससे भी पहले
विज्ञापन करना है ज़माने में,
समय लगेगा उसको पापड़ की तरह सज़ाने में,
तुम्हारी भूख मिटाने से पहले
हम अपने मालिकों की छबि
फरिश्तों की तरह बनाने के लिये
अपनी रसोई सजा रहे हैं।
———–
देश की भूख मिटाना
बन कर रह गया है सपना
मुश्किल यह है कि
रोटी बनाने के नये फैशन आ रहे हैं,
खर्च हो जाता है
नये बर्तन खरीदने में पैसा
पुरानों में रोटी परोसने से लगेगा
नये बज़ट हाल पुराने जैसा,
इधर ज़माने में
गरीब की थाली सजने से पहले ही
नये व्यंजन फैशन में आ रहे हैं,
काम में नयापन जरूरी है

फिर देश की तरक्की देश में अकेले नहीं दिखाना,
ताकतवर देशों में भी नाम है लिखाना,
समय नहीं मिलता
इधर गरीबों और भूखों की पहचान भी बदली है
उनके नये चेहरे फैशन में आ रहे हैं।
——-

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शासक, शासित, जनता और सरकार, व्यंग्य कविता,देश की व्यवस्था,गरीब,देश,पहचान,भारत में लोकतंत्र भारत में प्रजातंत्र,janta aur sarkar,garib ki thali,garibi par kavitaen,pahachan,bharat mein loktantra,bharat mein azadi,bharat mein prajatantra,garib ko roti,garib ki roti

दौलत और हादसों का रिश्ता-हिन्दी शायरी (daulat aur hadson ka rishta-hind shayri)

लोग हादसों की खबर पढ़ते और सुनते हैं
लगातार देखते हुए उकता न जायें
इसलिये विज्ञापनों का बीच में होना जरूरी है।
सौदागारों का सामान बिके बाज़ार में
इसलिये उनका भी विज्ञापन होना जरूरी है।
आतंक और अपराधों की खबरों में
एकरसता न आये इसलिये
उनके अलग अलग रंग दिखाना जरूरी है।
आतंक और हादसों का
विज्ञापन से रिश्ता क्यों दिखता है,
कोई कलमकार
एक रंग का आतंक बेकसूर
दूसरे को बेकसूर क्यों लिखता है,
सच है बाज़ार के सौदागर
अब छा गये हैं पूरे संसार में,
उनके खरीद कुछ बुत बैठे हैं
लिखने के लिये पटकथाऐं बार में
कहीं उनके हफ्ते से चल रही बंदूकें
तो कहीं चंदे से अक्लमंद भर रहे संदूके,
इसलिये लगता है कि
दौलत और हादसों में कोई न कोई रिश्ता होना जरूरी है।

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देशप्रेम और सयाने-हिन्दी व्यंग्य कविता (deshprem aur sayane-hindi vyangya poem)

नहीं जगा पाते अब देशप्रेम
फिल्मों के पुराने घिसे पिटे गाने,
हालत देश की देखकर
मन उदास हो जाता है,
स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस
उठते है मन ही मन ताने।
अपने आज़ाद होने के बारे में सुना
पर कभी नहीं हुआ अहसास,
जीवन संघर्ष में नहीं पाया किसी को पास,
आज़ादह और एकता के नारे
हमेशा सुनने को मिलते रहे,
पर अपनों से ही जंग में पिलते रहे,
अपने को हर पग पर गुलाम जैसा पाया,
अपने हाथ अपने मन से नहीं चलाया,
हमेशा रहे आज़ादी और स्वयं के तंत्र से अनजाने
सब उलझे हैं उलझनों में
जो सुलझे हैं,
वह भी लगे दौलत और शौहरत जुटाने की उधेड़बनों में,
देशप्रेम की बात करते हैं,
पर दिखाते नहीं वही कहलाते सयाने।
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योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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बुतों की तरह चलने की काबलियत-हिन्दी व्यंग्य कविता

सिंहासन पर अब लायक इंसान
नहीं पहुंच पाते हैं,
जिनमें काबलियत है बुतों की तरह चलने की
हुक्मरान बन कर सज जाते हैं।
उनकी उंगलियां इशारे करती आती हैं नज़र
कभी कभी जुबां पर बोल भी आते हैं।
पर सच यह है कि
इरादे कोई दूसरा करता
सोचता कोई और है
जमाना तो गुलाम है उनका
दौलत और ताकत है जिनके पास
वही बाकी इंसानों की अदाओं के खरीददार बन जाते हैं।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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गरीब की खुशी पर रोते-हिन्दी व्यंग्य कविता (garib ki khushi par rote-hindi vyangya kavita)

अपनी खुशी पर हंसने की बजाय
दूसरे के सुख रोते
इसलिये इंसान कभी फरिश्ते नहीं होते।
मुखौटे लगा लेते हैं खूबसूरत लफ़्जों का
दरअसल काली नीयत लोग छिपा रहे होते।
दौलत के महल में बसने वाले
खुश दिखते हैं,

 मगर  गरीब की पल भर की खुशी पर वह भी रोते।
सोने के सिंहासन पर विराजमान
उसके छिन जाने के खौफ के साये में
जीते लोग
कभी किसी के वफादार नहीं होते।
———–

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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पसीने की धारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें

कभी मेरे बहते हुए पसीने पर
तुम तरस न खाना,
यह मेरे इरादे पूरे करने के लिये
बह रहा है मीठे जल की तरह,
इसकी बदबू तुम्हें तब सुगंध लगेगी
जब मकसद समझ जाओगे।
सिमट रहा है ज़माना वातानुकुलित कमरे में
सूरज की तपती गर्मी से लड़ने पर
जिंदगी थक कर आराम से सो जाती,
खिले हैं जो फूल चमन में
पसीने से ही सींचे गये
वरना दुनियां दुर्गंध में खो जाती,
जब तक हाथ और पांव से
पसीने की धारा नहीं प्रवाहित कर करोगे
तब अपनी जिंदगी को हाशिए पर ही पाओगे।

——————-
अकल से भैंस कभी बड़ी नहीं होती,
अगर होती तो, खूंटे से नहीं बंधी होती।
यह अलग बात है कि इंसान नहीं समझते
इसलिये उनकी अक्ल भी अमीरों की खूंटी पर टंगी होती।
भैंस चारा खाकर, संतोष कर लेती है,
मगर इंसान की अकल, पत्थरों की प्रियतमा होती।
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आदर्श की बातें-हिन्दी शायरी

गनीमत है इंसान के पांव
सिर्फ जमीन पर चलते हैं,
उस पर भी जिस टुकड़े पर जमें हैं
उसे अपना अपना कहकर
सभी के सीने तनते हैं,
हक के नाम पर हर कोई लड़ने को उतारू है।
अगर कुदरत ने पंख दिये होता तो
आकाश में खड़े होकर हाथों से
एक दूसरे पर आग बरसाते,
जली लाशों पर रोटी पकाते,
आदर्श की बातें जुबान से करते
मगर कोड़ियों में बिकने के लिये तैयार सभी बाजारू हैं।
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सच के नाम पर सजा झूठ-हिन्दी शायरी

हिन्दी साहित्य,समाज,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,hindi shaitya,sher,shतमाम रस्में निभाकर भी
हम क्या पाते हैं,
पुराने बयान पर आंखें बंद कर यकीन के साथ
यूं ही जिंदगी में चले जाते हैं।
इंसानों की सोच पर बंधन डाले हैं
सर्वशक्तिमान के संदेश की किताबें लिखने वालों ने
हम हंसते हुए बंधे क्यों चले जाते हैं,
कभी बहाओ अपनी अक्ल की धारा
देखना फिर उसमें
सच के नाम पर सजे कितने झूठ बहते नज़र आते हैं।
————-
ताउम्र गुज़ार दी निभाते हुए रस्में
खाते रहे आकाश की कसमें,
पर बैचेन रहे हमेशा यहां।
अपनी अक्ल से
अगर हाथ हिलें नहीं,
पांव कभी चले नहीं,
आंखों से कभी नहीं निहारा,
कान अपनी इच्छा से सुने न बिचारा,
तब मिलता भला चैन कहां।
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इंसान सस्ता हो रहा है-क्षणिकायें

महंगाई आसमान पर चढ़ गयी है,
इसलिये नैतिकता तस्वीर में जड़ गयी है।
चीजों की तरह इंसान भी बिकने लगा है,
मांग आपूर्ति के नियम से अनुसार
जरूरत से ज्यादा है बाज़ार में
इसलिये मेहनत की कीमत पड़ रही है।
———
आधुनिकता के नाम पर
इंसान सस्ता हो रहा है,
मस्ती के नाम पर अनैतिकता की
गुलामी को ढो रहा है।
यौवन की आज़ादी के नाम पर
पेट में पाप के बीज़ बो रहा है।
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तरक्की और कामयाबी-हिन्दी शायरी

अपनी मदद खुद कर सको, उतना ही आगे जाना।
तरक्की और कामयाबी के ख्वाब में यूं न खो जाना।।
बिकते हैं सपने बाज़ार में, मु्फ्त का खेल दिखाकर,
तरक्की के रास्ते चल, उधार के जाल में न फंस जाना ।।
———–
मोहब्बत शादी के अंजाम
तक आशिक और माशुका
शायद इसलिये पहुंचाते हैं
क्योंकि जिस्म की हवस मिटते ही
साथी के बेवफा होने से डर जाते हैं।
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चमन में अमन है-हिन्दी व्यंग्य कविता

दहशतगर्द घूम रहे आजाद
उनकी गोलियों से सभी तो नहीं मर गये
फिर भी जिंदा हैं ढेर सारे लोग
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

खेल के नाम पर चल रहा जुआ
जिनकी मर्जी है वही तो खेल रहे हैं
बाकी लोग तो बैठे हैं चैन से
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

कुछ नारियों की आबरु होती तार तार
बाकी तो संभाले हैं घरबार
इसलिये मान लो चमन में अमन हैं।

लुटेरों ने दौलत भेज दी परदेस
पर फिर भी भूखे लोग जिंदा हैं
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

खरीद रखा है शैतानों ने उस हर शख्स को
जो भीड़ पर काबू रख सकता है
अगर उनको रोकने की कोशिश हुई
तो आ जायेगा भूचाल,
छोड़कर भाग जायेंगे तुम्हारे पहरेदार
छोड़कर तलवार और ढाल,
जलने लगेगा हर शहर,
गु्फा से निकले शैतानों का टूटेगा कहर
चलने तो उनका कारवां,
वही हैं यहां के बागवां,
बंद कर लो अपनी आखें,
शैतानो को रोकें ऐसी नहीं रही सलाखें,
उनका व्यापार चल रहा है
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
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असली और नकली जांबाज-हिन्दी शायरी

मैदान पर लड़ते कम
किनारे पर खड़े दिखाते दम
कागजी जांबाजो के करतब
कभी अंजाम पर नहीं पहुंचे
पर हर पल उनको अपनी आस्तीने
ऊपर करते हमने देखा है।
कीर्तिमान बहुत सुनते हैं उनके
पर कामयाबी के नाम पर खाली लेखा है।
———-
पत्र प्रारूप पर
हाशिए पर नाम लिखवाकर
वह इतराते हैं,
सच तो यह है कि
कारनामे देते अंजाम देते असली जांबाज
हाशिए पर छपे नाम प्रसिद्धि नहीं पाते हैं।
———-
उनको गलत फहमी है कि
किनारे पर चीखते हुए
तैराकों से अधिक नाम कमा लेंगे।
हाशिऐ पर खिताबों से जड़कर नाम
जमाने पर सिक्का जमा लेंगे।
शायद नहीं जानते कि
किनारे पल भर का सहारा है
असली जंग तो दरिया से लड़ते हैं जांबाज
लोगों की नज़रे लग रहती हैं उन पर
कागज के बीच में लिखा मजमून ही
पढ़ते हैं सभी
हाशिए के नाम बेजान बुत की तरह ही जड़े रहेंगे।
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यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
———-
मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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