पुरालेख

उनको चैन नहीं आता -हिंदी शायरी

जब तक लगे न कहीं आग
उनको चैन नहीं आता
बुझाने के ठेकेदारों को
ज्यादा देर इंतजार नहीं करना होता
आदमी अपने घर को आग लगाकर
उनकी शरण में आता
भीड़ लग गयी है
लोगों के जज्बतों से खेलने वाले सौदागरों की
खुद ही खिलौना बनकर
आदमी उनके पास पहुंच जाता
लुटकर इस कदर बेहाल होता कि
पछता किस बात पर रहे हैं
यह भी उसे याद नहीं आता
फिर वह किसे सिखाये
जब अपना रास्ता ही भूल जाये

इसलिये अनवरत चलता जाता
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आदमी के सामने ही हो जाता अंधेरे का व्यापार-व्यंग्य एवं कविता( hasya vyangya)

एक नया कवि मंच पर कविता सुनाने के लिये बुलाया गया तो उसने आते ही कहा‘,आज मैं अपनी एक कविता सुनाने जा रहा हूं। यह जोरदार कविता है। सुनिये-
अरे, पुराने घाघ कवियों
रोज रोज मंचों पर क्यों चले आते हो
अपनी पुरानी रचनायें सुनाते हो
सब हो गये बोर तुमसे
अब यहां से रिटायर हो जाओ
ताकि नये लोग आ सकें
पुराने और कबाड़ के माल जैसे लगते हो
तुम यहां से रुखसत हो जाओ’’

लोगों ने बहुत जोर से तालियां बजाईं। वाह वाह की आवाज से पूरा मैदान गूंज उठा। मंच पर बाकी कवि सन्नाटे में बैठे रहे। वह कवि भी माइक से हट गया तो दर्शक चिल्लाये-‘अरे, भई अपनी कविता तो सुनाओ। तब तो इन पुराने कवियों को रुखसत करें।’

नये कवि ने कहा-‘यह कविता नहीं तो और क्या थी? कितनी देर तक तो वाह वाह करते रहे।
एक दर्शक चिल्लाया-‘वाह वाह तो सभी के लिये करते हैं पर तुम्हारे लिये इसलिये की कि तुम अधिक देर तक नयी कवितायें सुनाओगे। यह तो चुटकी बजाकर चले गये। इससे तो यह पुराने भले थे।

नये कवि ने कहा-‘पहले यह सब हट जायें तभी तो सुनाऊंगा। वैसे अभी मैं यह एक ही कविता लिखी है जो सुना दी। फिर आगे लिखकर सुनाऊंगा।’

दर्शकों ने हाय हाय शुरू की दी। कुछ तो उसे मंच पर ही लड़ने दौड़े वह वहां से भाग निकला। तक हालत को संभालने के लिये एक पुराने कवि ने अपनी नयी रचनायें सुनाना शुरू कर दी।

‘नया नया कर सब चले आते
पुराने पर सभी मूंह फेर जाते
जब नया हो जाता फ्लाप
पुराने का ही होता है जाप
पुराने चावल और शराब का
मजा खाने और पीने में कुुछ और न होता
तो शायद हर जगह पुराना
शायर पिट रहा होता
नया चार लाईनों के हिट लूट रहा होता
अपने नयेपन इतराते हैं बहुत लोग
नहीं जानते क्या है मजा और क्या है रोग
अहसास ही है बस नये और पुराने का
नाम ही खाली जमाने का
शोर मचाकर कविता लिखी जा सकती
तो यहां हर कोई कवि होता
दर्द सभी को है पर
हर कोई शब्दों में उसे नहीं पिरोता
आधुनिक जमाने में तीस पर ही
कई बुढ़ापे के रोगों का होते शिकार
जवान दिखते हैं वह जो हैं साठ के पार
नये और पुराने आदमी में भेद करना
अब कठिन हो गया है
पुरानी गाड़ी खरीदते हैं कबाड़ में
और छह महीने चल चुकी कार को
कहते हैं सैकेंड हैंड
बजाते हैं खुशी का बैंड
आदमी के चक्षुओं के सामने ही
हो जाता है अंधेरे का व्यापार

उसकी कविता सुनकर नये कवि के पीछ भागने वाले श्रोता और दर्शक रुक गये और पूरा मैदान वाह वाह से गूंज उठा।
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hindi sher, शेर, हिन्दी शायरी, हिन्दी साहित्य

सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये दहशत का खिलौना-हिंदी शायरी

दहशत की भी सब जगह
चलती फिरती दुकान हो गयी
विज्ञापन का कोई झंझट नहीं
उनकी करतूतों की खबर सरेआम हो गयी

कहीं विचारधारा का बोर्ड लगा है
कहीं भाषा का नाम टंगा है
कहीं धर्म के नाम से रंगा है
जज्बातों का तो बस नाम है
सारी दुनियां मशहूरी उनके नाम हो गयी

बिना पैसे खिलौना नहीं आता
उनके हाथ में बम कैसे चला आता
फुलझड़ी में हाथ कांपता है गरीब बच्चे का
उनके हाथ बंदूक कैसे आती
गोलियां क्या सड़क पड़ उग आती
सवाल कोई नहीं पूछता
चर्चाएं सब जगह हो जाती
गंवाता है आम इंसान अपनी जान
कमाता कौन है, आता नहीं उसका नाम
दहशत कोई चीज नहीं जो बिके
पर फिर भी खरीदने वाले बहुत हैं
सपने भी भला जमीन पर होते कहां
पर वह भी तो हमेशा खूब बिके
हाथ में किसी के नहीं खरीददार उनके भी बहुत हैं
शायद मुश्किल हो गया है
सपनों में अब लोगों को बहलाना
इसलिये दहशत से चाहते हैं दहलाना
आदमी के दिल और दिमाग से खेलने के लिये
सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये खिलौना
इसलिये एक मंडी दहशत के नाम हो गयी
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इस सप्ताह के चुनींदा फ्लाप पाठ इस पत्रिका पर प्रस्तुत हैं

सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य

जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीं रख लेती।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’

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मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’

मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’

बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे।

एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’

उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।
मैंने हंसते हुए कहा-‘तो रख लो।’
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफादारी से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’

मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफादारी से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम

मिट्टी और मांस की मूर्ति-लघुकथा

मूर्तिकार फुटपाथ पर अपने हाथ से बनी मिट्टी की भगवान के विभिन्न रूपों वाली छोटी बड़ी मूर्तियां बेच रहा था तो एक प्रेमी युगल उसके पास अपना समय पास करने के लिये पहुंच गया।
लड़के ने तमाम तरह की मूर्तियां देखने के बाद कहा-‘अच्छा यह बताओ। मैं तुम्हारी महंगी से महंगी मूर्ति खरीद लेता हूं तो क्या उसका फल मुझे उतना ही महंगा मिल जायेगा। क्या मुझे भगवान उतनी ही आसानी से मिल जायेंगे।’

ऐसा कहकर वह अपनी प्रेमिका की तरफ देखकर हंसने लगा तो मूर्तिकार ने कहा-‘मैं मूर्तियां बेचता हूं फल की गारंटी नहीं। वैसे खरीदना क्या बाबूजी! तस्वीरें देखने से आंखों में बस नहीं जाती और बस जायें तो दिल तक नहीं पहुंच पाती। अगर आपके मन में सच्चाई है तो खरीदने की जरूरत नहीं कुछ देर देखकर ही दिल में ही बसा लो। बिना पैसे खर्च किये ही फल मिल जायेगा, पर इसके लिये आपके दिल में कोई कूड़ा कड़कट बसा हो उसे बाहर निकालना पड़ेगा। किसी बाहर रखी मांस की मूर्ति को अगर आपने दिल में रखा है तो फिर इसे अपने दिल में नहीं बसा सकेंगे क्योंकि मांस तो कचड़ा हो जाता है पर मिट्टी नहीं।’
लड़के का मूंह उतर गया और वह अपनी प्रेमिका को लेकर वहां से हट गया

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प्यार में भी भला कभी वादे किये जाते हैं-हिंदी शायरी

जन्नत में बिताने के लिये सुहानी रात
आसमान से चांद सितारे तोड़कर लाने की बात
प्यार के संदेश देने वाले ऐसे ही
किये जाते हैं
बातों पर कर ले भरोसा
शिकार यूं ही फंसाये जाते हैं
प्यार किस चिडिया का नाम
कोई नहीं जान पाया
रोया वह भी जिसने प्यार का फल चखा
तरसा वह भी जिसने नहीं खाया
प्यार का जो गीत गाते
कोई ऊपर वाले का तो
कोई जमीन पर बसी सूरतों के नाम
अपनी जुबान पर लाते
कोई नाम को योगी
तो कोई दिल का रोगी
धोखे को प्यार की तरह तोहफे में देते सभी
जो भला दिल में बसता है
किसी को कैसे दिया जा सकता है
सर्वशक्तिमान से ही किया जा सकता है
उस प्यार के में भी भला
कभी वादे किये जाते हैं
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चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी

शाम होते ही
सूरज के डूबने के बाद
काली घटा घिर आयी
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी
मन उदास था बहुत
घर पहुंचते हुए
छोटे चिराग ने दिया
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी
…………………………………..

अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से निकल जातीं-हिन्दी शायरी
यूं

तो वक्त गुजरता चला जाता
पर आदमी साथ चलते पलों को ही
अपना जीवन समझ पाता
गुजरे पल हो जाते विस्मृत
नहीं हिसाब वह रख पाता

कभी दुःख तो कभी होता सुख
कभी कमाना तो कभी लुट जाना
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से
निकल जातीं
जिसमें जी रहा है
वही केवल सत्य नजर आती
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही
अपने को लड़ता पाता

हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश सोने की लंका
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता
तो कभी कुछ पाकर बहकता
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता

तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही
मुक्त नजर आता
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया
चलाती है वह चारों तरफ
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता
……………………………….

अध्यात्मिक गुरु जब मायावी ढांचे के बचाव में आगे आते हैं-आलेख

कल गुरुपूर्णिमा के दिन था और लोगों ने अपने हृदय में स्थित गुरुओं की पूर्जा अर्चना की। भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है। हिंदू अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और शायद यही कारण है कि इसे धर्म मानने वाले लोग रूढ़ता के बंधनों में नहीं बंधते क्योंकि अध्यात्म के पुराने और गूढ़ रहस्यों को समय समय पर प्रसिद्धि पाने वाले यह गुरू आधुनिक संदर्भों में व्याख्या कर समाज में व्यवस्था बनाये रखते हैं। देखा जाये तो हिंदू होना ही अपने आप में प्रगतिशील होना है पर समय के साथ भौतिकवाद ने यहां ऐसे अनेक भ्रम प्रचलित कर दिये हैं जिससे वास्तविक अध्यात्म ज्ञान की न तो गुरुओं में समझ है और न ही ऐसे गुरु को लोग समझने के इच्छुक है। कथित संतों और गुरुओं ने गेहुंए और सफेद वस्त्र तो पहने लिये हैं पर उनके मन में माया का मैला खाने की इच्छा प्रबल है।

अनेक संतों ने अपना अध्यात्मिकता के नाम पर अपना विशाल आर्थिक सम्राज्य खड़ा कर लिया है और वह संत कम एक पूंजीपति अधिक लगते हैं। उन्होंने अपने तमाम आश्रम बना लिये है जिनको एक तरह से फाईव स्टार होटल कहा जा सकता है। अनेक प्रकार के सामान बनाने के काम अपने हाथ में ले लिया है जिसमें दवाईयां, पेन, कैलेंडर, चाबी के छल्ले तथा पुस्तकें प्रकाशित करने का काम वह कर रहे हैं। उनक द्वारा उत्पादित वस्तुओं की धार्मिक भाव के कारण अधिक बिक्री होती है इसलिये सामान्य उत्पादक और व्यवसायियों का रोजगार इससे प्रभावित होता है। इससे उनके प्रति बहुत असंतोष है पर उनके भक्तों की विशाल संख्या को देखते हुए कोई सार्वजनिक रूप से कह नहीं पाता। ऐसे एक नहीं अनेक संत है। कभी कभी ऐसे संतों की आश्रमों पर कोई प्रतिकूल चर्चा होती है तो वह स्वयं प्रवक्ता बनकर सामने आते हैं जबकि उनके संस्थानों के बृहद स्वरूप को देखते हुए यह संभव नहीं है कि वह उनकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रख सकें। फिर भी वह सार्वजनिक रूप से आकर न अपने आश्रम और उसकी देखभाल करने वाले अपने अनुयायियों का बचाव करते हैं। वह इन प्रतिकूल चर्चाओं को धर्म पर हमला बताते हुए अपने भक्तों को इस तरह प्रेरित करते हैं जिससे वह उनके सम्मान की रक्षा के लिये हिंसक होने को भी तैयार हो जाता है।

कुछ दिनों पहले एक योगाचार्य की दवाईयां बनाने वाले कारखाने को लेकर सवाल उठे थे। वह योगाचार्य उन दिनों केवल उसके बारे में सफाई दे रहे थे। प्रतिदिन अध्यात्म और निंरकार की बातें करने वाले वह योगाचार्य अपने मायावी ढांचे (योग सिखाने के लिये विश्व का सबसे बड़ा केंद्र) की रक्षा के लिये उतर आये। उसी तरह एक संत द्वारा संचालित विद्यालय में दो छात्रों की संदिग्ध मौत से विवाद उठा। लोगों ने तमाम तरह के आक्षेप उनके विद्यालय प्रबंधन पर किये पर उन संत ने उनका बचाव किया। अपने आप में यह बात अजीब लगती है कि आखिर ऐसे संतों को इस मायावी दुनियां में ऐसे विवादों से क्या मतलब है। बच्चों की मौत अंततः कानून के दायरे में होनी है तो उसकी जांच उसी के अनुसार होना चाहिए। अपने आश्रम, विद्यालय और उसके प्रबंधन को उसका सामना करने के लिये छोड़ देना चाहिए। यह क्या भला कि आप स्वयं ही मैदान में आ रहे है। क्या भय लगता है कि उनका आर्थिक सम्राज्य ऐसे हमलों से कहीं न ढह जाये? ऐसे संतों को अपनी अध्यात्म शक्ति पर स्वयं ही यकीन नहीं है। उन्हें अपने भौतिक सम्राज्य की रक्षा के लिये स्वयं ही उतरते देख तो ऐसा ही लग रहा है। किसी ने उन पर आरोप नहीं लगाया पर वह ऐसे प्रदर्शित कर रहे थे कि जैसे उनको निशाना बनाया गया है। अपनी 14 साल की पुत्री की हत्या के आरोप से बरी एक डाक्टर से स्वयं की तुलना करना किसी संत को शोभा नहीं देता कि हम भी उसकी तरह ही निर्दोष होंगे। अपने ही व्यक्तित्व के आभामंडल की उनको अनुभूति नहीं है।

कल मैंने गुरू पूर्णिमा पर ही अपने लेख लिखे। एक में कबीर जी के दोहे पर व्याख्या की तो दूसरे में अच्छे गुरू न मिलने पर अर्जुन की बजाय एकलव्य जैसा शिष्य बनने का सुझाव दिया। तीसरे में में मैंने योग साधना सिखाने वालों को अध्यात्मिक गुरु न मानने का सुझाव दिया। नीले अक्षरों पर क्लिक कर आप उनको पढ़ सकते हैं। गुरु पूर्णिमा पर एक दिन देर से ही सही मेरी बधाई स्वीकार करें।
दीपक भारतदीप
लेखक एवं संपादक

आम पाठक की प्रतिक्रिया की बन सकती है अंतर्जाल लेखकों की प्रेरणा-संपादकीय

इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नहीं लिखी जिसकी चर्चा की जा सके। वजह यह रही कि बरसात के मौसम में विद्युत प्रवाह की समस्या और फिर शादी विवाह में जाने के कारण व्यस्तता रही। ऐसे में कुछ कवितायें लिखी जिनको कोई अधिक हिट नहीं मिल सके। संभवतः पाठक भी ऐसी ही समस्याओं से जूझ रहे होंगे। ब्लाग जगत में मेरे लिये कोई खास सप्ताह नहीं रहा। वैसे धीरे-धीरे मन अब ऊब रहा है क्योंकि पाठक संख्या में वृद्धि अब भी नहीं हो पा रही। पांच सौ से छह सौ के बीच कुल पाठक मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं को देख रहे हैं और यह क्रम करीब छह माह से बना हुआ है। पिछले सप्ताह एक दिन यह आंकड़ा सात सौ के पार पहुंचता लग रहा था पर नहीं हो पाया। शायद 695 तक ही पहुंचा था।

बहरहाल अब उन ब्लाग पर जिन पर पहले अध्यात्म से संबंधित पाठ रखता था- अब वहां बंद कर दिये है-वहां अभी तक अध्यात्म के पाठ अधिक पाठक संख्या लेते नजर आ रहे थे अब हास्य कविताएं और व्यंग्य भी अपने लिये अधिक पाठक जुटाने में लगे हैंं। मेरे दिमाग में कई प्रकार का गंभीर चिंतन है और कुछ अलग से कागज पर भी लिखा हुआ है पर, पर वह बड़े हैं और यहां बड़ा लिखने पर लोग उसकी उपेक्षा कर देते हैं। इसलिये अपनी कहानियां, व्यंग्य और चिंतन अभी भी यहां टाईप नहीं कर रहा। एक बात तय है कि जब तक हाथ से लिखकर यहां टाईप नहीं करूंगा तक अच्छी रचनायें नहीं आयेंगी। इसलिये आम पाठकों की तरफ से भी अब प्रयास होने चाहिये कि लेखक प्रोत्साहित हो सके। इसलिये हर पढ़ने वाले को कमेंट भी देना चाहिये और लेखक द्वारा जब उसके वास्तविक होने की पुष्टि के लिये संदेश किसी भी रूप में भेजा जाये तो उसका जवाब मिले। वरना यह मानकर चलना पड़ता है कि किसी दोस्त ने ही छद्म नाम से यह दिया है।
इस सप्ताह की कुछ रचनायें यहां दे रहा हूं।
दीपक भारतदीप

कुछ गूगल के हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद टूल से भी पूछ लो-व्यंग्य
जो कोई नहीं कर सका वह गूगल का हिंदी अंग्रेजी टूल करा लेगा। वह काम हैं हिंदी के लेखकों से शुद्ध हिंंदी लिखवाने का। दरअसल आजकल मैं अपने वर्डप्रेस के शीर्षक हिंदी में कराने के लिये उसके पास जाता हूं। कई बार अनेक कवितायें भी ले जाता हूं। उसकी वजह यह है कि हिंदी में तो लगातार फ्लाप रहने के बाद सोचता हूं कि शायद मेरे पाठ अंग्रेजों को पसंद आयें। इसके लिये यह जरूरी है कि उनका अंग्रेजी अनुवाद साफ सुथरा होना चाहिये। अब हिट होने के लिये कुछ तो करना ही है। अब देश के अखबार नोटिस नहीं ले रहे तो हो सकता है कि विदेशी अखबारों में चर्चा हो जाये तो फिर यहां हिट होने से कौन रोक सकता है? फिर तो अपने आप लोग आयेंगे। तमाम तरह के साक्षात्कार के लिये प्रयास करेंगे।

इसलिये उस टूल से अनुवाद के बाद उनको मैं पढ़ता हूं पर वह अनेक ऐसे शब्दों को नकार देता है जो दूसरी भाषाओं से लिये गये होते हैं या जबरन दो हिंदी शब्द मिलाकर एक कर लिखे जाते हैं। इसका अनुवाद सही नहीं है पर जितना है वह अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हो ही जाता है। उसकी सबसे मांग शुद्ध हिंदी है। उस दिन चिट्ठा चर्चा में एक शब्द आया था जालोपलब्ध। मैंने इसका विरोध करते हुए सुझा दिया जाललब्ध। इस टूल पर प्रमाणीकरण के लिये गया पर उसने दोनों शब्दों को उठाकर फैंक दिया और मैं मासूमों की तरह उनको टूटे कांच की तरह देखता रहा। तब मैंने जाल पर उपलब्ध शब्द प्रयोग किया तब उसने सही शब्द दिया-जैसे शाबाशी दे रहा हो। मतलब वह इसके लिये तैयार नहीं है कि तीन शब्दों को मिलाकर उसक पास अनुवाद के लिये लाया जाये।

इधर बहुत सारे विवाद चल रहे हैं। कोई कहता है कि हिंदी में सरल शब्द ढूंढो और कोई कहता है कि हिंदी में उर्दू शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो। कोई कहता हैं कि उर्दू शब्दों में नुक्ता हो। कोई कहता है कि जरूरत नहीं। इन बहसों में हमारे अंतर्जाल लेखक-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं-इस बात पर विचार नहीं करते कि कुछ गूगल के हिंदी अग्रेजी टूल से भी तो पूछें कि उसे यह सब स्वीकार है कि नहीं।
आप कहेंगे कि इससे हमें क्या लेना देना? भई, हिंदी में भी अंतर्जाल पर लिखकर हिट होने की बात तो अब भूल जाओ। भाई लोग, अब बाहर के लेखकों के लिये क्लर्क का काम भी करने लगे हैं। उनकी रचनायें यहां लिख कर ला रहे हैं और बताते हैं कि उन जैसा लिखो। अब इनमें कई लेखक ऐसे हैं जिनका नाम कोई नहीं जानता पर उनको ऐसे चेले चपाटे मिल गये हैं जो उनकी रचनाओं को अपने मौलिक लेखन क्षमता के अभाव में अपना नाम चलाने के लिये इस अंतर्जाल पर ला रहे हैं। सो ऐसे में एक ही चारा बचता है कि अंतर्जाल पर अंग्रेजी वाले भी हिंदी वालों को पढ़ने लगें और अगर वह प्रसिद्धि मिल जाये तो ही संभव है कि यहां भी हिट मिलने लगें।

मैं यह मजाक में नहीं कह रहा हूं। यह सच है कि भाषा की दीवारें ढह रहीं हैं और ऐसे में अपने लिखे के दम पर ही आगे जाने का मार्ग यही है कि हम इस तरह लिखें कि उसका अनुवाद बहुत अच्छी तरह हो सके। हालांकि मैंने प्रारंभ में कुछ पाठ वहां जाकर देखे पर फिर छोड़ दिया क्योंकि उस समय कुछ अधिक हिट आने लगे थे। अब फिर वेैसी कि वैसी ही हालत हो गयी है और अब सोच रहा हूं कि पुनः गूगल के हिंदी अंग्रजी टूल पर ही जाकर अपने पाठ देखेंे जायें वरना यहां तो पहले से ही अनजान लेखकों को यहां पढ़कर अपना माथा पीटना पड़ेगा। अखबार फिर उन लेखकों और उनको लिखने वाले ब्लाग लेखकों के नाम छापेंगे। अगर अपना नाम कहीं विदेश में चमक जायेगा तो यहां अपने आप हिट मिल जायेंगे। वैसे भी यहां हिंदी वाले अंग्रेजी की वेबसाईटें देखना चाहते है और उनके लिये हिंदी में पढ़ना एक तरह से समय खराब करना है ऐसे में हो सकता है कि जब यहां प्रचार हो जाये कि अंग्रेजी वाले भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे है तब हो सकता है कि उनमें रुचि जागे। यहां के लोग विदेशियों की प्रेरणा पर चलते हैं स्वयं का विवेक तो बहुत बाद में उपयोग करते हैं।

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चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी
शाम होते ही
सूरज के डूबने के बाद
काली घटा घिर आयी
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी
मन उदास था बहुत
घर पहुंचते हुए
छोटे चिराग ने दिया
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी
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रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल

दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम

अपने अंदर ढूंढे, मिलता तभी चैन है-हिंदी शायरी
घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंढे तभी मिलता चैन है
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रह जाते बस जख्मों के निशान-हिन्दी शायरी

मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आसान
नहीं होता पांव में पड़े
छालों के दर्द का भान
पर समय भी होता है बलवान
दिल के मचे तूफानों का
कौन पता लगा सकता है
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी
उड़ा ले जाते हैं
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते
जो सवालों को दिये जायें
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान
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जब तक प्यार नहीं था
उनसे हम अनजान थे
जो किया तो जाना
वह कई दर्द साथ लेकर आये
जो अब हमारी बने पहचान थे
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यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता

चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना
भला कौनसी अक्लमंदी है
सब कुछ करते हैं हम
अपने नाम के लिए
लेते हैं इसका और उसका नाम
हम करतार नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी हर पर अपना काम
लिखा हो यही मानते हैं
आजाद लगती हैं अक्ल
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को
निभाने के लिए समाज की बंदी है