पुरालेख

अध्यात्मिक गुरु जब मायावी ढांचे के बचाव में आगे आते हैं-आलेख

कल गुरुपूर्णिमा के दिन था और लोगों ने अपने हृदय में स्थित गुरुओं की पूर्जा अर्चना की। भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है। हिंदू अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और शायद यही कारण है कि इसे धर्म मानने वाले लोग रूढ़ता के बंधनों में नहीं बंधते क्योंकि अध्यात्म के पुराने और गूढ़ रहस्यों को समय समय पर प्रसिद्धि पाने वाले यह गुरू आधुनिक संदर्भों में व्याख्या कर समाज में व्यवस्था बनाये रखते हैं। देखा जाये तो हिंदू होना ही अपने आप में प्रगतिशील होना है पर समय के साथ भौतिकवाद ने यहां ऐसे अनेक भ्रम प्रचलित कर दिये हैं जिससे वास्तविक अध्यात्म ज्ञान की न तो गुरुओं में समझ है और न ही ऐसे गुरु को लोग समझने के इच्छुक है। कथित संतों और गुरुओं ने गेहुंए और सफेद वस्त्र तो पहने लिये हैं पर उनके मन में माया का मैला खाने की इच्छा प्रबल है।

अनेक संतों ने अपना अध्यात्मिकता के नाम पर अपना विशाल आर्थिक सम्राज्य खड़ा कर लिया है और वह संत कम एक पूंजीपति अधिक लगते हैं। उन्होंने अपने तमाम आश्रम बना लिये है जिनको एक तरह से फाईव स्टार होटल कहा जा सकता है। अनेक प्रकार के सामान बनाने के काम अपने हाथ में ले लिया है जिसमें दवाईयां, पेन, कैलेंडर, चाबी के छल्ले तथा पुस्तकें प्रकाशित करने का काम वह कर रहे हैं। उनक द्वारा उत्पादित वस्तुओं की धार्मिक भाव के कारण अधिक बिक्री होती है इसलिये सामान्य उत्पादक और व्यवसायियों का रोजगार इससे प्रभावित होता है। इससे उनके प्रति बहुत असंतोष है पर उनके भक्तों की विशाल संख्या को देखते हुए कोई सार्वजनिक रूप से कह नहीं पाता। ऐसे एक नहीं अनेक संत है। कभी कभी ऐसे संतों की आश्रमों पर कोई प्रतिकूल चर्चा होती है तो वह स्वयं प्रवक्ता बनकर सामने आते हैं जबकि उनके संस्थानों के बृहद स्वरूप को देखते हुए यह संभव नहीं है कि वह उनकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रख सकें। फिर भी वह सार्वजनिक रूप से आकर न अपने आश्रम और उसकी देखभाल करने वाले अपने अनुयायियों का बचाव करते हैं। वह इन प्रतिकूल चर्चाओं को धर्म पर हमला बताते हुए अपने भक्तों को इस तरह प्रेरित करते हैं जिससे वह उनके सम्मान की रक्षा के लिये हिंसक होने को भी तैयार हो जाता है।

कुछ दिनों पहले एक योगाचार्य की दवाईयां बनाने वाले कारखाने को लेकर सवाल उठे थे। वह योगाचार्य उन दिनों केवल उसके बारे में सफाई दे रहे थे। प्रतिदिन अध्यात्म और निंरकार की बातें करने वाले वह योगाचार्य अपने मायावी ढांचे (योग सिखाने के लिये विश्व का सबसे बड़ा केंद्र) की रक्षा के लिये उतर आये। उसी तरह एक संत द्वारा संचालित विद्यालय में दो छात्रों की संदिग्ध मौत से विवाद उठा। लोगों ने तमाम तरह के आक्षेप उनके विद्यालय प्रबंधन पर किये पर उन संत ने उनका बचाव किया। अपने आप में यह बात अजीब लगती है कि आखिर ऐसे संतों को इस मायावी दुनियां में ऐसे विवादों से क्या मतलब है। बच्चों की मौत अंततः कानून के दायरे में होनी है तो उसकी जांच उसी के अनुसार होना चाहिए। अपने आश्रम, विद्यालय और उसके प्रबंधन को उसका सामना करने के लिये छोड़ देना चाहिए। यह क्या भला कि आप स्वयं ही मैदान में आ रहे है। क्या भय लगता है कि उनका आर्थिक सम्राज्य ऐसे हमलों से कहीं न ढह जाये? ऐसे संतों को अपनी अध्यात्म शक्ति पर स्वयं ही यकीन नहीं है। उन्हें अपने भौतिक सम्राज्य की रक्षा के लिये स्वयं ही उतरते देख तो ऐसा ही लग रहा है। किसी ने उन पर आरोप नहीं लगाया पर वह ऐसे प्रदर्शित कर रहे थे कि जैसे उनको निशाना बनाया गया है। अपनी 14 साल की पुत्री की हत्या के आरोप से बरी एक डाक्टर से स्वयं की तुलना करना किसी संत को शोभा नहीं देता कि हम भी उसकी तरह ही निर्दोष होंगे। अपने ही व्यक्तित्व के आभामंडल की उनको अनुभूति नहीं है।

कल मैंने गुरू पूर्णिमा पर ही अपने लेख लिखे। एक में कबीर जी के दोहे पर व्याख्या की तो दूसरे में अच्छे गुरू न मिलने पर अर्जुन की बजाय एकलव्य जैसा शिष्य बनने का सुझाव दिया। तीसरे में में मैंने योग साधना सिखाने वालों को अध्यात्मिक गुरु न मानने का सुझाव दिया। नीले अक्षरों पर क्लिक कर आप उनको पढ़ सकते हैं। गुरु पूर्णिमा पर एक दिन देर से ही सही मेरी बधाई स्वीकार करें।
दीपक भारतदीप
लेखक एवं संपादक

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मनु स्मृति: दंड का उचित उपयोग न करने वाला अपयश का भागी

१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं देता उसे जगत में बहुत अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक भोगता है.
२.सबसे पहले अपराध करने को समझाना चाहिऐ, जब उसका प्रभाव न पड़े तब उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दंड लगाना चाहिए, जब इसका भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दंड देना चाहिऐ. उसके बाद भी प्रभाव न पड़े तो चारों डंडों का प्रयोग करना चाहिए.