पुरालेख

रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

…………………………
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गलतियाँ, अपराध और लिंगभेद-आलेख

भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता। अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।
दोनों किस्से टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला। उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया। पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी। वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी। वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर। वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे। तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला। ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है। वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है? लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।
पुलिस अधिकारी यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’

इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा। क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं। दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है। ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये। कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये। इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।
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अंतर्जाल लेखक अपना दायित्व समझें-आलेख

हिन्दी ब्लॉग जगत के पुराने ब्लागर अपना दायित्व समझें -आलेख
देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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रात के पिटे पैदल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

गुजु उस्ताद सुबह ही दिख गया। पहले हम उसके मोहल्ले में रहते थे अब कालोनी में मकान बना लिया सो उससे दूर हो गये, मगर हमारे काम पर जाने का रास्ता उसी मोहल्ले से जाता है। गुजु उस्ताद को भी हमारी तरह क्रिकेट देखने का शौक था पर इधर क्रिकेट मैचों पर फिक्सिंग वगैरह के आरोप लगे तो हम इससे विरक्त हो गये पर गुजु उस्ताद का शौक लगातार बना रहा।
हम रास्ते पर खड़ा देखकर कई बार उसे नमस्कार कर निकलते तो कई बार वही कर लेता। कई बार दोनों ही एक दूसरे को देखकर मूंह फेर लेते हैं। हां, क्रिकेट मैच के दिन हम अगर जरूरी समझते हैं तो रुक कर उससे बात कर लेते हैं। आज भी रुके।
वह देखते हुए बोला-‘हां, मुझे पता है कल भारत हार गया है और तुम जरूर जले पर नमक छिड़कने का काम करोगे। देशभक्ति नाम की चीज तो अब तुम में बची कहां है?’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो? हम तुम्हें पहले भी बता चुके हैं क्रिकेट खेल में हमारी देशभक्ति को बिल्कुल नहीं आजमाना। हां, यह बताओ कल हुआ क्या?’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘तुमने मैच तो जरूर देखा होगा। चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये। आंखें कितनी बूढ़ी हो जायें सुंदरी देख कर वही नजरें टिकाने से बाज नहीं आती।’
हमने कहा-‘नहीं मैच तो हम देख रहे थे। पहले लगा कि भारतीय टीम है पर जब तीसरा विकेट गिरा तो ध्यान आया कि यह तो बीसीसीआई की टीम है। अब काहे की देशभक्ति दिखा रहे हो? इस तरह मूंह लटका घूम रहे हो जैसे कि तुम्हारा माल असाबब लुट गया है। क्या यह पहला मौका है कि बीसीसीआई की टीम हारी है?’
गुजु उस्ताद-‘यार, पिछली बार बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपनी टीम विश्व विजेता बनी थी और अब उसकी यह गत! देखते हुए दुःख होता है।’
हमने चैंकते हुए कहा-‘अपनी टीम! इससे तुम्हारा क्या आशय है? अरे, भई अपना राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। यह तो बीसीसीआई यानि इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम है। हार गयी तो हार गयी।’
गुजु उस्ताद-‘काहे को दिल को तसल्ली दे रहे हो कि हाकी राष्ट्रीय खेल है। हमें पता है तुम कभी हाकी खेलते थे पर साथ ही यह भी कि तुम ही लंबे समय तक क्रिकेट खेल देखते रहे। 1983 में विश्व कप जीतने पर तुमने ही अखबार में इसी भारतीय टीम की तारीफ में लेख लिखे थे। बोलो तो कटिंग लाकर दिखा दूं। हां, कुछ झूठे लोगों ने इस खेल को बदनाम किया तो तुम बरसाती मेंढक की तरह भाग गये। मगर यह क्रिकेट खेल इस देश का धर्म है। हां, इसमें तुम जैसे हाकी धर्म वाले अल्पसंख्यक जरूर हैं जो मजा लेने के लिये घुस आये और फिर बदनाम होता देखकर भाग खड़े हुए।’
हमने कहा-‘यह किसने कहा क्रिकेट इस देश का धर्म है?’
गुजु उस्ताद ने हमसे कहा-‘क्या टीवी देखते हो या नहीं। एफ. एम. रेडियो सुनते हो कि नहीं? सभी यही कह रहे हैं।
हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि कल हमने बीसीसीआई टीम का तीसरा विकेट गिरते ही मैच बंद कर दिया। सोचा सुबह अखबार में परिणाम का समाचार देख लेंगे। मगर आजकल थोड़ी पूजा वगैरह कर रहे हैं इसलिये सोचा कि क्यों सुबह खराब करें। अगर बीसीसीआई की टीम हार गयी तो दुःख तो होगा क्योंकि यह देश से भाग लेने वाली अकेली टीम थी। पिछली प्रतियोगिता में तो अपने देश से चार पांच टीमें थी जिसमें भारत के खिलाड़ी भी शामिल थे तब देखने का मन नहीं कर रहा था। इस बार पता नहीं क्यों एक ही टीम उतारी।’
गुजु उस्ताद-‘महाराज, यह विश्व कप है इसमें एक ही टीम जाती है। यह कोई क्लब वाले मैच नहीं है। लगता है कि क्रिकेट को लेकर तुम्हारे अंदर स्मृति दोष हो गया है। फिर काहे दोबारा क्रिकेट मैच देखना काहे शुरु किया। लगता है तुम विधर्मी लोगों की नजर टीम को लग गयी।’
हमने कहा-‘वह कल टीवी में एक एंकर चिल्ला रही थी ‘युवराज ने लगाये थे पिछली बार छह छक्के और आज उस बालर को नींद नहीं आयी होगी‘। हमने यह देखना चाहा कि वह बालर कहीं उनींदी आंखों से बाल तो नहीं कर रहा है पर वह तो जमकर सोया हुआ लग रहा था। गजब की बालिंग कर रहा था। फिर युवराज नहीं आया तो हमने सोचा कि शायद टीम में नहीं होगा। इसलिये फिर सो गये। चलो ठीक है!’
गुजु उस्ताद ने घूर कर पूछा-‘क्या ठीक है। टीम का हारना?’
हमने कहा-‘नहीं यार, सुना ही बीसीसीआई की टीम अब प्रतियोगिता से बाहर हो गये इसलिये अब नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। कल भी बारह बजे सोया था। आज देर से जागा हूं। वैसे तुम ज्यादा नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र भी बहुत हो चली है। यह क्रिकेट तो ऐसा ही खेल है। कुछ नाम वाला तो कुछ बदनाम है।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘देखो! अब आगे मत बोलना। मुझसे सहानुभूति जताने के लिये रुके हो?मुझे पता है कि बाहर से क्रिकेट का धर्म निभाते नजर आते हो पर अंदर तो तुम अपनी हाकी की गाते है। अगर कोई शुद्ध क्रिकेट खेलने वाला होता तो उसे बताता मगर तो तुम हाकी वाले और कुछ कह दिया तो हाल ही कहोगे कि ‘हम हाकी खेलने वाले अल्पसंख्यक हैं इसलिये क्रिकेट वाले हम पर रुतबा जमाते हैं।’
हमने कहा-‘यार, सभी खेल धर्म तो एक ही जैसे है। सभी खेल स्वास्थ्य और मन के लिये बहुत अच्छे हैं। हम तो खेल निरपेक्ष हैं। आजकल तो शतरंज भी खेल लेते हैं।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात नहीं मानता। मुझे याद है जब क्रिकेट की बात मेरा तुम्हारा झगड़ा हुआ था तब मैं तुम्हें मारने के लिये बैट लाया तो तुम हाकी ले आये। इसलिये यह तो कहना ही नहीं कि क्रिकेट से तुम्हारा लगाव है।’
हमने सोचा गुजु उस्ताद बहुत अधिक अप्रसन्न होकर बोल रहे थे। तब हमने विषयांतर करते हुए कहा-‘पर अपनी टीम तो बहुत अच्छी है। हारी कैसे?’
गुजु उस्ताद बोले-‘तुम जाओ महाराज, हमने रात खराब की है और तुम दिन मत खराब करो। अभी तो नींद से उठे हैं और फिर हाकी धर्म वाले की शक्ल देख ली।’
हमने चुपचाप निकलने में वहां से खैर समझी। हमने सोचा रात के यह पिटे हुए पैदल कहीं चलते चलते वजीर जैसे आक्रामक बन गये तो फिर झगड़ा हो जायेगा। सच बात तो यह है कि गुजु उस्ताद ही वह शख्स हैं जिन पर हम क्रिकेट से जुड़ी कटोक्तियां कह जाते हैं बाकी के सामने तो मुश्किल ही होता है। लोग गुस्सा होने पर देशभक्ति का मामला बीच में ले आते हैं। हालांकि यह सब बाजार का ही कमाल है जो क्ल्ब के मैचों के वक्त देशभक्ति की बात को भुलवा कर बड़े शहरों के नाम पर भावनायें भड़काते हुए अपना माल बेचता है तो विश्व कप हो तो देश के नाम पर भी यही करता है। मगर भावनायें तो भावनायें हैं। हम ठहरे हाकी वाले-जहां तक देश का सवाल है तो उसमें भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है फिर काहे झगड़ा लेते फिरें।
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ईमानदारी पर सम्मेलन -हास्य व्यंग्य

दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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पिंजर से बाहर झांकता ज्ञान-आलेख चिंत्तन

उनके चेहरे पर बटन की तरह टंगी आंखें कपड़े और किताबों के पिंजर से बाहर झांकती दिखती है। ऐसा लगता है कि चिड़ियाघर के पिंजड़े में कोई इंसानी बुत ऐसे ही सजाये गये हैं जिनके आगे कपड़े के एक ही रंग और किसी किताब की लिखी लाईने लोहे के दरवाजे की तरह ऐसे ही लगी हों जैसे पिंजड़े के बाहर लगी होती हैं जहां से वह कभी निकल ही नहीं सकते। बस उससे बाहर झांकते हैं कि कोई पर्यटक आये तो वह उनकी तरफ देखे और वह अपनी अदाओं से उसे प्रभावित करें।
दुनियां में हर मनुष्य एक ही तरह से पैदा होता है पर जीवन यापन का सबका अपना अलग तरीका होता है। देखा जाये तो जीवन एक शब्द है जिसमें विविध रंगों, स्वादों और विचारों की धारा बहती है। यह धारा उसके मन रूपी हिमालय से बहती है जो इंसान को बहाती हुई ले जाती है। अधिकतर इंसान इस धारा में बहते हुए जाते हैं और उनकी कोई अपनी कामना नहीं होती। मगर कुछ लोग ऐसे हैं जो इस मानव रूपी मन की धारा के उद्गम स्थल पर बैठकर उसका बहाव अपनी ओर करना चाहते हैं ताकि उसका स्वामी मनुष्य बहकर उनकी तरफ आये ताकि वह उस पर शासन कर सकें। तय बात है कि एक इंसान वह है जो अपनी एकलधारा में आजादी से बहता हुआ चलता है और एक दूसरा है जो चाहता है कि अनेक इंसान उसकी तरफ बहकर आयें ताकि वह शासक या विद्वान कहला सके।
सर्वशक्तिमान के अनेक रूप और रंग हैं पर उसके किसी एक रूप और रंग को पकड़ कर ऐसे लोग वह पिंजड़ा बना लेते हैं जिसमें वह दूसरों को फंसाने के लिये घूमते हैं। उनको लगता है कि वह आदमी को अपने रंग और किताब के पिंजड़े में कैद कर लेंगे पर सच यह है कि वह स्वयं भी उसकी कैद में रहते हैं।
सर्वशक्तिमान के कितने रंग और रूप हैं कोई नहीं जानता पर फिर भी ऐसे लोगों ने अभी तक दस बीस की कल्पना को प्रसिद्ध तो कर ही दिया है। लाल, पीला, नीला, सफेद, काला, हरा, पीला और पता नहीं कितने रंग हैं। हरे रंग मेें भी बहुत सारे रंग हैं पर अक्ल और ताकत की ख्वाहिश रखने वाले कोई एक रंग सर्वशक्तिमान की पहचान बताते हैं। सभी की किताबेें हैं जिसमें हर शब्द और लकीर सर्वशक्तिमान के मूंह से निकली प्रचारित की जाती है। अपने तयशुदा रंग के कपड़े रोज पहनते हैं और वह किताब अपने हाथ में पकड़ कर उसे पढ़ते हुए दुसरों को सुनाते हैं। राजा हो या प्रजा उनके दरवाजे पर आकर सलाम ठोकते है। राजा इसलिये आता है क्योंकि प्रजा वहां आती है और उसे निंयत्रित करने के लिये ऐसे सिद्ध, पीर, फकीर, साधु, संत-इसके अलावा कोई दूसरा शब्द जो सर्वशक्तिमान से किसी की करीबी दिखाता हो-बहुत काम आते हैं। प्रजा इसलिये इनके पिंजर में आती है क्योंकि राजा आता है और पता नहीं कब उससे काम पड़ जाये और यह पिंजर में बंद अजूबा उसमें सहायक बने।
यह अजूबे कभी अपने पिंजर ने बाहर नहीं आते। जिस रंग के कपड़े पहन लिये तो फिर दूसरा नहीं पहन सकते। जिस किताब को पकड़ लिया उसकी लकीर में ही हर नजीर ढूंढते और फिर बताते हैं। वह किताब अपने लिये नहीं दूसरे को मार्ग बताने के लिये पढ़ते हैं। खुद पिंजडे में बंद हैं पर दूसरे को मार्ग बताते हैं। दाढ़ी बढ़ा ली। कुछ मनोविशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ी दाढ़ी वैसे भी दूसरे पर प्रभाव छोड़ती है-अर्थात आप ज्ञानी या दानी न भी हों तो उसके होने का अहसास सभी को होता है। वह दाढ़ी नहीं बनाते क्योंकि उनकी छबि इससे खराब होती है। इस दुनियां में एक भय उन पर शासन करता है कि राजा और प्रजा कहीं उनसे विरक्त न हो जायें।

कभी दृष्टा बनकर सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप के दरबार में पहुंच जाओ और महसूस करो कि चिड़ियाघर में आ गये हो। देखो वहां पर एक ही रंग के कपड़े और किताब के पिंजर में बंद उस अजूबे को जो तुम्हें सर्वशक्तिमान का मार्ग बताता है। दुनियां बनाने वाले ने अनेक रंग बनाये हैं और उसके बंदों ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं पर एक ही रंग और किताब की लकीरों के पिंजर में बंद वह अजूबे वहां से भी राजा और प्रजा के बीच दलाली करते नजर आते हैं। अगर तुम आजाद होकर सोचोगे तभी उनका पिंजर दिखाई देगा नहीं तो उनके हाथ में बंद उससे भी छोटे पिंजर में तुम अपने को फंसा देखोगे वैसे ही जैसे पिंजड़े में बंद शेर के पास जाकर कोई आदमी अपना हाथ उसके मूंह में दे बैठता है और फिर……….जो होता है वह तो सर्वशक्तिमान की मर्जी होती है।
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