पुरालेख

मुश्किल का हल-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (mushkil ka hal-hindi hasya vyangya kavita)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
”यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें..”

सुनकर दूसरा बोला 
“सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें..”
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दौलत और हादसों का रिश्ता-हिन्दी शायरी (daulat aur hadson ka rishta-hind shayri)

लोग हादसों की खबर पढ़ते और सुनते हैं
लगातार देखते हुए उकता न जायें
इसलिये विज्ञापनों का बीच में होना जरूरी है।
सौदागारों का सामान बिके बाज़ार में
इसलिये उनका भी विज्ञापन होना जरूरी है।
आतंक और अपराधों की खबरों में
एकरसता न आये इसलिये
उनके अलग अलग रंग दिखाना जरूरी है।
आतंक और हादसों का
विज्ञापन से रिश्ता क्यों दिखता है,
कोई कलमकार
एक रंग का आतंक बेकसूर
दूसरे को बेकसूर क्यों लिखता है,
सच है बाज़ार के सौदागर
अब छा गये हैं पूरे संसार में,
उनके खरीद कुछ बुत बैठे हैं
लिखने के लिये पटकथाऐं बार में
कहीं उनके हफ्ते से चल रही बंदूकें
तो कहीं चंदे से अक्लमंद भर रहे संदूके,
इसलिये लगता है कि
दौलत और हादसों में कोई न कोई रिश्ता होना जरूरी है।

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योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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तरक्की और कामयाबी-हिन्दी शायरी

अपनी मदद खुद कर सको, उतना ही आगे जाना।
तरक्की और कामयाबी के ख्वाब में यूं न खो जाना।।
बिकते हैं सपने बाज़ार में, मु्फ्त का खेल दिखाकर,
तरक्की के रास्ते चल, उधार के जाल में न फंस जाना ।।
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मोहब्बत शादी के अंजाम
तक आशिक और माशुका
शायद इसलिये पहुंचाते हैं
क्योंकि जिस्म की हवस मिटते ही
साथी के बेवफा होने से डर जाते हैं।
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यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
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मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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अंतर्जाल पर दूसरे की लोकप्रियता का लाभ उठाने के प्रयास-हिन्दी लेख

तीन वर्ष से जारी हमारी निजी ‘चिट्ठाचर्चा’ में पहली बार दो ऐसे शब्दों से सामना हुआ जिनके अर्थ और भाव से हम आज तक परिचित नहीं थे। वह हैं ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’। मुश्किल तो यही है कि भाई लोग अंग्रेजी हिज्जे नहीं लिखते जिससे उनका शुद्ध उच्चारण और हिन्दी अर्थ कहीं से पता करें। बहरहाल ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ को दूसरे के नाम की लोकप्रियता का उपयोग अपने हित में भुनाने के प्रयास को कह सकते हैं। ‘साइबर स्कवैटिंग’ का मतलब यह है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के आधार पर अपनी वेबसाईट या ब्लाग का पता और नाम तय करना। ‘टाईपो स्क्वैटिंग’ का मतलब है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के नाम से मिलता जुलता नाम रखना ताकि लोग भ्रमित होकर वहां आयें।
अंतर्जाल पर जब हमने लिखना शुरु किया तब ऐसा प्रयास किया था कि जिससे दूसरे मशहूर नामों का लाभ हमें मिले। तब इस बात का आभास नहीं था कि जिनको सामान्य जीवन को हम गलत समझते आये हैं वही हम करने जा रहे हैं। वैसे इस विषय पर हिन्दी ब्लाग जगत में विवाद भी चल रहा है पर इस पाठ का उससे कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह विषय अत्यंत व्यापक है और इस बारे में नये लेखकों के साथ आम लोगों तक भी यह संदेश पहुंचाना जरूरी है कि इस तरह लोकप्रियता का उपयोग विवाद पैदा कर सकता है।
आपने देखा होगा कि अनेक बार बाजारों में ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं जहां एक ही वस्तु की दुकाने होती हैं। जिनमें एक नाम ‘अमुक’ होता है तो दूसरा ‘न्यू अमुक’ कर लिखता है। अनेक शहरों में चाट, गजक, नमकीन तथा मिठाई की प्रसिद्ध दुकानें होती हैं और उसका उपयोग अन्य लोग ‘न्यू’ या अन्य शब्द जोड़कर करते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि किसी शहर की कोई दुकान अपनी चीज के कारण प्रसिद्ध है तो ठीक उसी नाम से दूसरे शहर में खुल जाती है। अनेक बार उपभोक्ता वहां जाते भी हैं और पूछने पर मालिक लोग उसी की शाखा होने का दावा करते हैं। अब यह अलग बात है कि दूसरे शहर जाने पर जब उस मशहूर दुकान वाले से पूछा जाता है तो इसका खंडन हो जाता है। कोटा की प्याज कचौड़ी मशहूर है और उसे बनाने वाले की दूसरे शहर में कोई दुकान नहीं है पर दूसरे शहरों के कुछ दुकानदार ऐसा दावा करते हैं।
दूसरे की लोकप्रियता भुनाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है पर सचाई यह है कि यह कानूनी या नैतिक रूप से गलत न भी हो पर इससे स्वयं की छबि प्रभावित जरूर होती है-कई लोग तो नकलची तक कह देते हैं। ऐसा करते समय अगर हम यह न सोचें कि दूसरा क्या कहेगा पर यह तो देखें कि हम ऐसा करते हुए दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे में हमारी मेहनत ईमानदार होती है पर फिर भी उसमें नेकनीयती की कमी से हमारी छबि प्रभावित होती है।
जब हम अंतर्जाल पर लोकप्रिय नामों से जुड़ने का प्रयास कर रहे थे तब अपनी गलती का पता नहीं था, और एक वर्ष पहले तक ही यह आभासा हो पाया कि यहां ब्लाग के पते और नाम से अधिक ताकतवर तो उसमें लिखी गयी सामग्री है। पहले कुछ ब्लागों में नाम उपयोग किये तो कहीं पते भी लोकप्रिय नामों से लिये गये। बाद में उनमें से अनेक हटा लिये। इस लेखक के ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर बीस ब्लाग हैं जिनमें अब एक ब्लाग ऐसा बचा है भले ही वह एक लोकप्रिय नाम से मिलता है पर उसकी लोकप्रियता अब भी कम है। प्रसंगवश इसी लेखक ने अपने दो छद्म ब्लाग भी बनाये थे पर यह संयोग ही था कि वह उत्तरप्रदेश के एक प्रसिद्ध लेखक से उसके नाम और पते मेल खा गये। दरअसल वह नाम भी ऐसा ही था जिसे लेकर इस लेखक की नानी उसे बचपन में बुलाती थी। उन पर दो वर्ष से कुछ नहीं लिखा पर आठ दस पाठक उन पर आ ही जाते हैं-उन ब्लाग को लेकर मन में कोई गलती अनुभव भी नहीं होती। अलबत्ता अब तो यह सोच रहे हैं कि उस अपने एक ब्लाग स्पाट के ब्लाग का पता भी बदल दें क्योंकि आगे चलकर लोग यही कहेंगे कि देखो यह दूसरे की लोकप्रियता भुना रहा है।
मुख्य बात यह है कि अंतर्जाल पर अगर तात्कालिक उद्देश्य पूरे करना हों तो यह ठीक हो सकता है पर कालांतर में इसका कोई लाभ नहीं होता। जिनको लंबे समय तक टिकना है उन्हें तो इससे दूर ही रहना चाहिए। अगर आपने वेबसाईट या ब्लाग का नाम किसी दूसरे की लोकप्रियता को बनाया तो वह आपकी छबि को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरी बात यह है कि हम जहां अपने शब्द लिखते हैं उनकी शक्ति का समझना जरूरी है। उस क्षेत्र को एच.टी.एम.एल कहा जाता है। हम जो शीर्षक, सामग्री या लेबल टैग लगाते हैं वह हमारे ब्लाग को सच इंजिनों में ले जाते हैं-एक तरह से शब्द ही चालक हैं अगर आपको किसी की लोकप्रियता का लाभ उठाना है तो बस अपने शीर्षक में ही उसका उपयोग करें कि दूसरे को यह न लगे कि आपने उसके नाम का उपयोग किया है। अगर वह आपका मित्र या जानपहचान वाला हो तो उसकी प्रशंसा में एक दो पाठ लिख दें-उसका नाम शीर्षक के साथ दें। याद रहे यहां किसी की निंदा या आलोचना करते हुए नाम लेने से बचें। ब्लाग का पता या नाम अगर किसी लोकप्रिय नाम पर लिखेंगे तो उससे अपना छबि को स्वतंत्र रूप से नहीं स्थापित कर पायेंगे। फिर उससे आप स्वयं ही संकीर्ण दायरे में यह सोचकर सिमट जायेंगे कि आप तो वैसे ही हिट हैं और नवीन प्रयोग और रचना नहीं कर पायेंगे।
आगरा का पेठा मशहूर है तो भारत की हिन्दी-अभिप्राय है कि सार्वज्निक महत्व के नामों को लेकर झगड़ा नहीं होता। इतना तो चल जाता है पर निजी लोकप्रिय नामों के उपयोग को लेकर अनेक जगह झगड़ा भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि व्यक्ति की निजी लोकप्रियता को तभी भुनाने का प्रयास करें जब आपके पास हूबहू उस नाम के प्रयोग का पुख्ता आधार हो। अगर राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म या अन्य किसी क्षेत्र में कोई प्रसिद्ध नाम है और उसका आप इस्तेमाल करते हैं तो वह कानून का मामला बन सकता है। अभी अंतर्जाल पर ऐसा कोई कानून है कि पता नहीं पर इसका आशय यह नहीं है कि चाहे किसी का नाम भी उपयेाग किया जा सकता है। ब्लाग या वेबसाईट का पता भले ही आसानी से मिल जाये पर किसी मामले पर अदालतें संज्ञान ले सकती हैं। एक बात याद रखिये संस्थान पंजीकृत होते हैं पर निजी लोकप्रियता नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति का नाम कोई उपयोग करने लगे-लोगों की निजी लोकप्रियता की रक्षा न्याय के दायरे में है भले ही उसके लिये कोई कानून न बना हो। संभवतः अदालतों में आत्मुग्धता का तर्क नहीं चले कि ‘यह तो हमें मिल गया, हमने हड़पा नहीं है’। एक प्रसिद्ध नेता के नाम पर बनी वेबसाईट को गलत ठहराया जा चुका है-ऐसा उसी लेख में पढ़ने को मिला जिसमें ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ मिले।
कहने का अभिप्राय यह है कि जितना हो सके अपनी लोकप्रियता अपने पाठों से जुटाने का प्रयास करें। अपने ब्लाग और वेबसाईटों के पतों में लोकप्रिय नामों का उपयोग करने से क्या लाभ? यह काम तो एक पाठ से किया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि अधिक से अधिक सकारात्मक लेखन करें तो स्वतः ही अंतर्जाल पर आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। दुकानों का बोर्ड तो लोग इसलिये बनाते हैं ताकि ग्राहक उसे देखकर आयें। इस प्रयास में होता यह है कि अच्छी चीज बनायें या बेचें पर फिर भी उनकी छबि नकलची की ही होती है। लोग कमाने के लिये झेलते हैं क्योंकि वह रोज बोर्ड बदल नहीं सकते जबकि ब्लाग या वेबसाईट पर तो एक नहीं हजारों बोर्ड शीर्षक बनाकर लगाये जा सकते हैं। इसलिये यहां दूसरे की लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास कर अपनी छबि न बिगाड़े तो ही अच्छा! कानून यह नैतिकता के प्रश्न से बड़ी बात यह है कि हम अपनी छबि वैसे ही बनायें जैसी कि दूसरों से अपेक्षा करते हैं।

संदर्भ के लिये यह दिलचस्प पाठ अवश्य पढ़ें।
http://nilofer73.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

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यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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जब फैशन तनाव बने-हिन्दी आलेख (fashan is tension-hindi article)

अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।

एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये।  उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये।  कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी।  उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।

बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’

हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी।  उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’

वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’

बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी।  अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था।  अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’

हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।

हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं।  अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’

एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है।  हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की  चप्पल नहीं पहन सकती।’

उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।

वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी  अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।

दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं।  आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।

हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने  दहेज में कार मांगी है।’

वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!

बेटे ने बाप को  समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता।  नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।

बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा।  जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे।  औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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