पुरालेख

योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)

अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-
योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath

नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
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वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

दुष्प्रचार का प्रतिकार-संपादकीय

अगर कोई समस्या हो तो उसके उद्गम स्थल पर ही उसका निराकरण किया जाना चाहिए तभी उसका निराकरण किया जा सकता है पर अपने देश के संकटमोचक इसकी बजाय समस्या की बहती हुई धारा का निपटाने के लिये जूझते दिखते हैं। एक लहर कटती है दूसरी आ जाती है। हम बात कर रहे हैं उन तमाम मुद्दों पर जो अक्सर चर्चा में रहते हैं और वह खासतौर से धर्म और विचारधाराओं के निर्वहन-परिवर्तन से जुड़े हैं।
भारतीय जनमानस का यह स्वभाव रहा है कि वह कोई भी बात मनोरंजन के द्वारा ही ग्रहण करता है चाहे वह अध्यात्मिक ज्ञान ही क्यों न हो? यही कारण है कि अनेक धार्मिक संत तक अपने प्रवचनों और कथाओं में भी अपनी मनोरंजन ही प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में यह देखना चाहिए कि हमारे देश में जहां से मनोरंजन प्रस्तुत किया जा रहा है वहां से क्या और किस तरह का संदेश दिया जा रहा है और लोगों के मानस पर उसका किस तरह प्रभाव हो रहा है? इसको समझे बिना कोई भी धार्मिक, सामाजिक या भावनात्मक अभियान सफल नहीं हो सकता।
मुख्य बात यह है कि इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि
1.फिल्म, टीवी चैनलों और मनोरंजक साधनों से प्रसारित कहानियां किस तरह के धार्मिक, भाषाई,जातीय और क्षेत्रीय संदेश अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से देती हैं।
2.दो उसमें काम करने वाले अभिनेता, अभिनेत्रियों और अन्य सहायकों का चयन किस तरह का है और उनसे कैसे संदेश लोगों के बीच जा रहा है।
3.उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रायोजक किस तरह का है।
मुख्य बात यह है कि जो शक्तिशाली लोग अपने समूहों के लिये वैचारिक,सांस्कारिक, तथा धार्मिक भय अनुभव करते हैं उनको उसी तरह के प्रतिकार के लिये तैयार होना चाहिये। केवल नारे लगाना या विरोध करने से काम नहीं चलने वाला-उल्टे इससे उनके स्वयं के समूह में नकारात्मक संदेश जाता है। सकारात्मक प्रतिकार तो यही है कि आप भी अपने लिये फिल्मों टीवी चैनलों तथा अन्य मनोरंजक साधनों पर वैसे ही मनोरंजक सामग्री प्रस्तुत करें जिसमें आपके विचारों, संस्कारों के साथ धार्मिक विचाराधारा का प्रतिबिंब दिखे।
यह लेखक तो एक दृष्टा की तरह देखता है-ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर।’ ऐसे में जो धार्मिक, जातीय और भाषाई समूह आपस में द्वंद्वरत हैं उनमें कौन क्यों पिछड़ रहा है, इसका अवलोकन यह लेखक करता रहता है। उसी के आधार पर पिछड़ रहे धार्मिक, जातीय और भाषाई समूहों को यही समझाइश देता है कि भई तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी इस तरह अपनी बढ़ता बनाये हुए हैं। इस पर प्रकाशित दो फ्लाप आलेख यहां प्रस्तुत हैं। जैसे कि आम आदमी का स्वभाव है कि वह द्वंद्वों में आनंद लेता है वैसे ही यह लेखक उनमेें आदर्श भाव तलाशता है क्योंकि विश्व में जितने भी समूह धर्म के आधार पर खड़े हैं उनकी पृष्ठभूमि में भी इस तरह के सामूहिक द्वंद्वों के आधार पर खड़े हैं। किसी का नाम न लेने के पीछे दो ही उद्देश्य हैं-एक तो इस लेखक के पीछे या सामने कोई संगठन नहीं है जिससे अपनी प्रशंसा या आलोचना से अनुग्रहीत किया जाये। दूसरा सारा काम लेखक ही करेगा तो पाठक क्या खाक चिंतन करेंगे? इसी कारण पाठकों में चिंतन क्षमता का विकास हो इसलिये इस तरह की बात व्यंजना विधा में कहना सुरक्षा की दृष्टि से कहना भी ठीक रहता है।
प्रस्तुत हैं दो बेहतर आलेख
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मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख
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वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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प्रचार का मुकाबला प्रचार से ही संभव-आलेख
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समाज को सुधारने की प्रयास हो या संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का सवाल हमेशा ही विवादास्पद रहा है। इस संबंध में अनेक संगठन सक्रिय हैं और उनके आंदोलन आये दिन चर्चा में आते हैं। इन संगठनों के आंदोलन और अभियान उसके पदाधिकारियेां की नीयत के अनुसार ही होते हैं। कुछ का उद्देश्य केवल यह होता है कि समाज सुधारने के प्रयास के साथ संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का प्रयास इसलिये ही किया जाये ताकि उसके प्रचार से संगठन का प्रचार बना रहे और बदले में धन और सम्मान दोनों ही मिलता रहे। कुछ संगठनों के पदाधिकारी वाकई ईमानदार होते हैं उनके अभियान और आंदोलन को सीमित शक्ति के कारण भले ही प्रचार अधिक न मिले पर वह बुद्धिमान और जागरुक लोगों को प्रभावित करते हैं।
ईमानदारी से चल रहे संगठनों के अभियानों और आंदोलनों के प्रति लोगों की सहानुभूति हृदय में होने के बावजूद मुखरित नहीं होती जबकि सतही नारों के साथ चलने वाले आंदोलनों और अभियानों को प्रचार खूब मिलता है क्योंकि प्रचार माध्यम उनको अपने लिये भावनात्मक रूप से ग्राहकों को जोड़े रखने का एक बहुत सस्ता साधन मानते हैं। ऐसे कथित अभियान और आंदोलन उन बृहद उद्देश्यों को पूर्ति के लिये चलते हैं जिनका दीर्घावधि में भी पूरा होने की संभावना भी नहीं रहती पर उसके प्रचार संगठन और पदाधिकारियों के प्रचारात्मक लाभ मिलता है जिससे उनको कालांतर में आर्थिक और सामाजिक उपलब्धि प्राप्त हो जाती है।

मुख्य बात यह है कि ऐसे संगठन दीवारों पर लिखने और सड़क पर नारे लगाने के अलावा कोई काम नहीं करते। उनके प्रायोजक भी इसकी आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि उनके लिये यह संगठन केवल अपनी सुरक्षा और सहायता के लिये होते हैं और उनको समझाईश देना उनके लिये संभव नहीं है। अगर इस देश में समाज सुधार के साथ संस्कार और संस्कृति के लिये किसी के मन में ईमानदारी होती तो वह उन स्त्रोतों पर जरूर अपनी पकड़ कायम करते जहां से आदमी का मन प्रभावित होता है।
भाररीय समाज में इस समय फिल्म, समाचार पत्र और टीवी चैनलों का बहुत बड़ा प्रभाव है। भारतीय समाज की नब्ज पर पकड़ रखने वाले इस बात को जानते हैं। लार्ड मैकाले ने जिस तरह वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण कर हमेशा के लिये यहां की मानसिकता का गुलाम बना दिया वही काम इन माध्यमों से जाने अनजाने हो रहा है इस बात को कितने लोगों ने समझा है?
पहले हिंदी फिल्मों की बात करें। कहते हैं कि उनमें काला पैसा लगता है जिनमें अपराध जगत से भी आता है। इन फिल्मों में एक नायक होता है जो अकेले ही खलनायक के गिरोह का सफाया करता है पर इससे पहले खलनायक अपने साथ लड़ने वाले अनेक भले लोगों के परिवार का नाश कर चुका है। यह संदेश होता है एक सामान्य आदमी के लिये वह किसी अपराधी से टकराने का साहस न करे और किसी नायक का इंतजार करे जो समाज का उद्धार करने आये। कहीं भीड़ किसी खलनायक का सफाया करे यह दिखाने का साहस कोई निर्माता या निर्देशक नहीं करता। वैसे तो फिल्म वाले यही कहते हैं कि हम तो जो समाज में जो होता है वही दिखाते हैं पर आपने देखा होगा कि अनेक ऐसे किस्से हाल ही में हुए हैं जिसमें भीड़ ने चोर या बलात्कारी को मार डाला पर किसी फिल्मकार ने उसे कलमबद्ध करने का साहस नहीं दिखाया। संस्कारों और संस्कृति के नाम पर फिल्म और टीवी चैनलों पर अंधविश्वास और रूढ़वादितायें दिखायी जाती हैं ताकि लोगों की भारतीय धर्मों के प्रति नकारात्मक सोच स्थापित हो। यह कोई प्रयास आज का नहीं बल्कि बरसों से चल रहा है। इसके पीछे जो आर्थिक और वैचारिक शक्तियां कभी उनका मुकाबला करने का प्रयास नहीं किया गया। हां, कुछ फिल्मों और टीवी चैनलों के कार्यक्रमों का विरोध हुआ पर यह कोई तरीका नहीं है। सच बात तो यह है कि किसी का विरोध करने की बजाय अपनी बात सकारात्मक ढंग से सामने वाले के दुष्प्रचार पर पानी फेरना चाहिये।

एक ढर्रे के तहत टीवी चैनलों और फिल्मों में कहानियां लिखी जाती हैं। यह कहानी हिंदी भाषा में होती है पर उसको लिखने वाला भी हिंदी और उसके संस्कारों को कितना जानता है यह भी देखने वाली बात है। मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रमों के पीछे जो आर्थिक शक्ति होती है उसके अदृश्य निर्देशों को ध्यान में रखा जाता है और न भी निर्देश मिलें तो भी उसका ध्यान तो रखा ही जाता है कि वह किस समुदाय, भाषा, जाति या क्षेत्र से संबंधित है। विरोध कर प्रचार पाने वाले संगठन और उनके प्रायोजक-जो कि कोई कम आर्थिक शक्ति नहीं होते-स्वयं क्यों नहीं फिल्मों और टीवी चैनलों के द्वारा उनकी कोशिशों पर फेरते? इसके लिये उनको अपने संगठन में बौद्धिक लोगों को शामिल करना पड़ेगा फिर उनकी सहायता लेने के लिये उनको धन और सम्मान भी देना पड़ेगा। मुश्किल यही आती है कि हिंदी के लेखक को एक लिपिक समझ लिया है और उसे सम्मान या धन देने में सभी शक्तिशाली लोग अपनी हेठी समझते हैं। यकीन करें इस लेखक के दिमाग में कई ऐसी कहानियां हैं जिन पर फिल्में अगर एक घंटे की भी बने तो हाहाकार मचा दे।

इस समाज में कई ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं जो प्रचार माध्यमों में सामाजिक एकता, समरसता और सभी धर्मों के प्रति आदर दिखाने के कथित प्रयास की धज्जियां उड़ा सकती है। प्यार और विवाह के दायरों तक सिमटे हिंदी मनोरंजन संसार को घर गृहस्थी में सामाजिक, धार्मिक और अन्य बंधन तोड़ने से जो दुष्परिणाम होते हैं उसका आभास तक नहीं हैं। आर्थिक, सामाजिक और दैहिक शोषण के घृणित रूपों को जानते हुए भी फिल्म और टीवी चैनल उससे मूंह फेरे लेते हैं। कटु यथार्थों पर मनोरंजक ढंग से लिखा जा सकता है पर सवाल यह है कि लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला कौन है? जो कथित रूप से समाज, संस्कार और संस्कृति के लिये अभियान चलाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य अपना प्रचार पाना है और उसमें वह किसी की भागीदारी स्वीकार नहीं करते।
टीवी चैनलों पर अध्यात्मिक चैनल भी धर्म के नाम पर मनोरंजन बेच रहे हैं। सच बात तो यह है कि धार्मिक कथायें और और सत्संग अध्यात्मिक शांति से अधिक मन की शांति और मनोरंजन के लिये किये जा रहे हैं। बहुत लोगों को यह जानकर निराशा होगी कि इनसे इस समाज, संस्कृति और संस्कारों के बचने के आसार नहीं है क्योंकि जिन स्त्रोतों से प्रसारित संदेश वाकई प्रभावी हैं वहां इस देश की संस्कृति, संस्कार और सामाजिक मूल्यों के विपरीत सामग्री प्रस्तुत की जा रही है। उनका विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला। इसके दो कारण है-एक तो नकारात्मक प्रतिकार कोई प्रभाव नहीं डालता और उससे अगर हिंसा होती है तो बदनामी का कारण बनती है, दूसरा यह कि स्त्रोतों की संख्या इतनी है कि एक एक को पकड़ना संभव ही नहीं है। दाल ही पूरी काली है इसलिये दूसरी दाल ही लेना बेहतर होगा।

अगर इन संगठनों और उनके प्रायोजकों के मन में सामाजिक मूल्यों के साथ संस्कृति और संस्कारों को बचाना है तो उन्हें फिल्मों, टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में अपनी पैठ बनाना चाहिये या फिर अपने स्त्रोत निर्माण कर उनसे अपने संदेशात्मक कार्यक्रम और कहानियां प्रसारित करना चाहिए। दीवारों पर नारे लिखकर या सड़कों पर नारे लगाने या कहीं धार्मिक कार्यक्रमों की सहायता से कुछ लोगों को प्रभावित किया जा सकता है पर अगर समूह को अपना लक्ष्य करना हो तो फिर इन बड़े और प्रभावी स्त्रोतों का निर्माण करें या वहां अपनी पैठ बनायें। जहां तक कुछ निष्कामी लोगों के प्रयासों का सवाल है तो वह करते ही रहते हैं और सच बात तो यह है कि जो सामाजिक मूल्य, संस्कृति और संस्कार बचे हैं वह उन्हीं की बदौलत बचे हैं बड़े संगठनों के आंदोलनों और अभियानों का प्रयास कोई अधिक प्रभावी नहीं दिखा चाहे भले ही प्रचार माध्यम ऐसा दिखाते या बताते हों। इस विषय पर शेष फिर कभी।
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चाणक्य नीति: अधिकारी कभी इच्छा और लोभ से मुक्त नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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निरर्थक बहसों में उलझे देश के बुद्धिजीवी-चिंतन आलेख

देश में आतंक के नाम पर निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्रों से ना जोड़ने का आग्रह करने वाले ही इसे जोड़ते भी दिख रहे हैं. यह कैसे संभव है कि आप एक तरफ यह कहें के आतंकियों का कोई धर्म, भाषा और जाति नहीं है दूसरी तरफ उसी उनके समूहों की तरफ से सफाई भी देते फिरें. आश्चर्य की बात है कि अनेक बुद्धजीवी तो भ्रमित हैं. उनके भ्रम का निवारण करना तो बहुत कठिन है.

वैसे तो किसी भी प्रकार कि हिंसा को किसी धर्म,भाषा या जाति से जोड़ना ठीक नहीं पर कुछ लोग ऐसा कहते हुए बड़ी चालाकी से इनका आधार पर बने समूहों का वह प्रशस्ति गान करते हैं. तब फिर एक आम आदमी को यह कैसे समझाया जा सकता है कि इन अपराधिक घटनाओं को सहजता से ले. हालत तो और अधिक खराब होते जा रहे हैं पर कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक खुराक के लिए सतही विचारों को जिस तरह व्यक्त कर रहे हैं वह चिंताजनक है. उनके विचारों का उन लोगों पर और भे अधिक बुरा प्रभाव पडेगा जो पहले से ही भ्रमित है.

कुछ बुद्धिजीवी तो हद से आगे बाद रहे हैं. वह कथित रूप से सम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए एस समुदाय विशेष को अधिक सक्षम मानते हैं. अपने आप में इतना हायास्पद तर्क है जिसका कोई जवाब नहीं है. वैसे तो हम देख रहे है कि देश में बुद्धिजीवि वर्ग विचारधाराओं में बँटा हुआ है और उनकी सोच सीमित दायरों में ही है. इधर अंतरजाल पर कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जो स्वयं अपना मौलिक तो लिखते नहीं पर पुराने बुद्धिजीवियों के ऐसे विचार यहाँ लिख रहे हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वैसे देखा जाए तो पहले प्रचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे तब कहीं भाषण सुनकर या किताब पढ़कर लोग अपनी राय कायम थे. अनेक लोग तब यही समझते थे कि अगर किसी विद्वान ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा. अब समय बदल गया है. प्रचार माध्यम की ताकत ने कई ऐसे रहस्यों से परदा उठा दिया है जिनकी जानकारी पहले नहीं होती थी. अब लोग सब कुछ सामने देखकर अपनी राय कायम करते हैं। ऐसे में पुरानी विचारधाराओं के आधार पर उनको प्रभावित नहीं करती।

अमरीकी सम्राज्यवाद भी अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है और अब इस देश के लोग तो वैसे ही ऐसी बातों में नहीं आते। अमेरिका कोई एक व्यक्ति, परिवार या समूह का शासन नहीं है। वहां भी गरीबी और बेरोजगारी है-यह बात यहां का आदमी जानता है। अमेरिका अगर आज जिन पर हमला कर रहा है तो वही देश या लोग हैं जो कभी उसके चरणों में समर्पित थे। अमेरिका के रणनीतिकारों ने पता नहीं जानबूझकर अपने दुश्मन बनाये हैं जो उनकी गलतियों से बने हैं यह अलग रूप से विचारा का विषय है पर उसके जिस सम्राज्य का जिक्र लोग यहां कर रहे हैं उन्हें यह बात समझना चाहिये कि वह हमारे देश पर नियंत्रण न कर सका है न करने की ताकत है। अभी तक उसने उन्हीं देशों पर हमले किये हैं जो परमाणु बम से संपन्न नहीं है। उससे भारत की सीधी कोई दुश्मनी नहीं है। वह आज जिन लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहा है पहले ही उसके साथ रहकर मलाई बटोर रहे थे। अब अगर वह उनके खिलाफ आक्रामक हुआ है तो उसमें हम लोगों का क्या सरोकार है?

अमेरिकी सम्राज्य का भ्रम कई वर्षों तक इस देश में चला। अब अमेरिका ऐसे झंझटों में फंसा है जिससे वर्षों तक छुटकारा नहीं मिलने वाला। इराक और अफगानिस्तान से वह निकल नहीं पाया और ईरान में भी फंसने जा रहा है, मगर इससे इसे देश के लोगों का कोई सरोकार नहींं है। ऐसे में उससे लड़ रहे लोगों के समूहों का नाम लेकर व्यर्थ ही यह प्रयास करना है कि वह अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ सक्षम हैं। देश में विस्फोट हों और उससे अपराध से अलग केवल आतंक से अलग विषय में देखना भी एक विचार का विषय है पर उनकी आड़ में ऐसी बहसे तो निरर्थक ही लगती हैं। इन पंक्तियों का लेखक पहले भी अपने ब्लागों परी लिख चुका है कि इन घटनाओं पर अपराध शास्त्र के अनुसार इस विषय पर भी विचार करना चाहिये कि इनसे लाभ किनको हो रहा है। लोग जबरदस्ती धर्म,जातियों और भाषाओं के समूहों का नाम लेकर इस अपराध को जो विशिष्ट स्वरूप दे रहा है उससे पैदा हुआ आकर्षण अन्य लोगों को भी ऐसा ही करने लिये प्रेरित कर सकता है। दरअसल कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आतंक के नाम फैलायी जा रही हिंसा कहीं व्यवसायिक रूप तो नहीं ले चुकी है। यह खौफ का व्यापार किनके लिये फायदेमंद है इसकी जांच होना भी जरूरी है पर इसकी आड़ में धर्म,भाषा और जातियों को लेकर बहस आम आदमी के लिये कोई अच्छा संदेश नहीं देती।
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चाणक्य नीतिःजिनके पास दिमाग है ताकत भी होती उनके पास

१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती है.
२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पता. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली सिंह को कुएँ में गिराकर मार डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.
३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अध्यात्मिक गुरु जब मायावी ढांचे के बचाव में आगे आते हैं-आलेख

कल गुरुपूर्णिमा के दिन था और लोगों ने अपने हृदय में स्थित गुरुओं की पूर्जा अर्चना की। भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है। हिंदू अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और शायद यही कारण है कि इसे धर्म मानने वाले लोग रूढ़ता के बंधनों में नहीं बंधते क्योंकि अध्यात्म के पुराने और गूढ़ रहस्यों को समय समय पर प्रसिद्धि पाने वाले यह गुरू आधुनिक संदर्भों में व्याख्या कर समाज में व्यवस्था बनाये रखते हैं। देखा जाये तो हिंदू होना ही अपने आप में प्रगतिशील होना है पर समय के साथ भौतिकवाद ने यहां ऐसे अनेक भ्रम प्रचलित कर दिये हैं जिससे वास्तविक अध्यात्म ज्ञान की न तो गुरुओं में समझ है और न ही ऐसे गुरु को लोग समझने के इच्छुक है। कथित संतों और गुरुओं ने गेहुंए और सफेद वस्त्र तो पहने लिये हैं पर उनके मन में माया का मैला खाने की इच्छा प्रबल है।

अनेक संतों ने अपना अध्यात्मिकता के नाम पर अपना विशाल आर्थिक सम्राज्य खड़ा कर लिया है और वह संत कम एक पूंजीपति अधिक लगते हैं। उन्होंने अपने तमाम आश्रम बना लिये है जिनको एक तरह से फाईव स्टार होटल कहा जा सकता है। अनेक प्रकार के सामान बनाने के काम अपने हाथ में ले लिया है जिसमें दवाईयां, पेन, कैलेंडर, चाबी के छल्ले तथा पुस्तकें प्रकाशित करने का काम वह कर रहे हैं। उनक द्वारा उत्पादित वस्तुओं की धार्मिक भाव के कारण अधिक बिक्री होती है इसलिये सामान्य उत्पादक और व्यवसायियों का रोजगार इससे प्रभावित होता है। इससे उनके प्रति बहुत असंतोष है पर उनके भक्तों की विशाल संख्या को देखते हुए कोई सार्वजनिक रूप से कह नहीं पाता। ऐसे एक नहीं अनेक संत है। कभी कभी ऐसे संतों की आश्रमों पर कोई प्रतिकूल चर्चा होती है तो वह स्वयं प्रवक्ता बनकर सामने आते हैं जबकि उनके संस्थानों के बृहद स्वरूप को देखते हुए यह संभव नहीं है कि वह उनकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रख सकें। फिर भी वह सार्वजनिक रूप से आकर न अपने आश्रम और उसकी देखभाल करने वाले अपने अनुयायियों का बचाव करते हैं। वह इन प्रतिकूल चर्चाओं को धर्म पर हमला बताते हुए अपने भक्तों को इस तरह प्रेरित करते हैं जिससे वह उनके सम्मान की रक्षा के लिये हिंसक होने को भी तैयार हो जाता है।

कुछ दिनों पहले एक योगाचार्य की दवाईयां बनाने वाले कारखाने को लेकर सवाल उठे थे। वह योगाचार्य उन दिनों केवल उसके बारे में सफाई दे रहे थे। प्रतिदिन अध्यात्म और निंरकार की बातें करने वाले वह योगाचार्य अपने मायावी ढांचे (योग सिखाने के लिये विश्व का सबसे बड़ा केंद्र) की रक्षा के लिये उतर आये। उसी तरह एक संत द्वारा संचालित विद्यालय में दो छात्रों की संदिग्ध मौत से विवाद उठा। लोगों ने तमाम तरह के आक्षेप उनके विद्यालय प्रबंधन पर किये पर उन संत ने उनका बचाव किया। अपने आप में यह बात अजीब लगती है कि आखिर ऐसे संतों को इस मायावी दुनियां में ऐसे विवादों से क्या मतलब है। बच्चों की मौत अंततः कानून के दायरे में होनी है तो उसकी जांच उसी के अनुसार होना चाहिए। अपने आश्रम, विद्यालय और उसके प्रबंधन को उसका सामना करने के लिये छोड़ देना चाहिए। यह क्या भला कि आप स्वयं ही मैदान में आ रहे है। क्या भय लगता है कि उनका आर्थिक सम्राज्य ऐसे हमलों से कहीं न ढह जाये? ऐसे संतों को अपनी अध्यात्म शक्ति पर स्वयं ही यकीन नहीं है। उन्हें अपने भौतिक सम्राज्य की रक्षा के लिये स्वयं ही उतरते देख तो ऐसा ही लग रहा है। किसी ने उन पर आरोप नहीं लगाया पर वह ऐसे प्रदर्शित कर रहे थे कि जैसे उनको निशाना बनाया गया है। अपनी 14 साल की पुत्री की हत्या के आरोप से बरी एक डाक्टर से स्वयं की तुलना करना किसी संत को शोभा नहीं देता कि हम भी उसकी तरह ही निर्दोष होंगे। अपने ही व्यक्तित्व के आभामंडल की उनको अनुभूति नहीं है।

कल मैंने गुरू पूर्णिमा पर ही अपने लेख लिखे। एक में कबीर जी के दोहे पर व्याख्या की तो दूसरे में अच्छे गुरू न मिलने पर अर्जुन की बजाय एकलव्य जैसा शिष्य बनने का सुझाव दिया। तीसरे में में मैंने योग साधना सिखाने वालों को अध्यात्मिक गुरु न मानने का सुझाव दिया। नीले अक्षरों पर क्लिक कर आप उनको पढ़ सकते हैं। गुरु पूर्णिमा पर एक दिन देर से ही सही मेरी बधाई स्वीकार करें।
दीपक भारतदीप
लेखक एवं संपादक