पुरालेख

जमाने की चाहत-हास्य हिंदी कविता

सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
…………………….
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।

………………………………
पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
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चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath

नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
—————————–

वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita

फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

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रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

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गलतियाँ, अपराध और लिंगभेद-आलेख

भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता। अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।
दोनों किस्से टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला। उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया। पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी। वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी। वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर। वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे। तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला। ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है। वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है? लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।
पुलिस अधिकारी यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’

इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा। क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं। दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है। ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये। कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये। इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।
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अंतर्जाल लेखक अपना दायित्व समझें-आलेख

हिन्दी ब्लॉग जगत के पुराने ब्लागर अपना दायित्व समझें -आलेख
देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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