पुरालेख

बुतों की तरह चलने की काबलियत-हिन्दी व्यंग्य कविता

सिंहासन पर अब लायक इंसान
नहीं पहुंच पाते हैं,
जिनमें काबलियत है बुतों की तरह चलने की
हुक्मरान बन कर सज जाते हैं।
उनकी उंगलियां इशारे करती आती हैं नज़र
कभी कभी जुबां पर बोल भी आते हैं।
पर सच यह है कि
इरादे कोई दूसरा करता
सोचता कोई और है
जमाना तो गुलाम है उनका
दौलत और ताकत है जिनके पास
वही बाकी इंसानों की अदाओं के खरीददार बन जाते हैं।
——————————-

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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नकली खोये की मिठाई, हो गयी प्यार से जुदाई-हास्य व्यंग्य

वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रेम का इजहार करता था और कहता”-आई लव यू।
”कभी कहता-”मेरे प्रपोजल का उत्तर क्यों नहीं देती।’
वह चली जाती और वह देखता रह जाता था। आखिर एक दिन उसने कहा कहा-”मुझे ना कर दो, कम से कम अपना वक्त खराब तो नहीं करूं।”
वह लडकी आगे बढ़ गयी और फिर पीछे लौटी-”तुम्हारे पास प्यार लायक पैसा है।”
वह बोला-”हाँ, गिफ्ट में मोबाइल, कान की बाली और दो ड्रेस तो आज ही दिलवा सकता हूँ।”
लड़की ने पूछा-”तुम्हारे पास गाडी है।”
लड़के न कहा-”हाँ मेरे पास अपनी मोटर साइकिल है, वैसे मेरी मम्मी और पापा के पास अलग-अलग कार हैं। मम्मी की कार मैं ला सकता हूँ।”
लड़की ने पूछा-“तुम्हारे पास अक्ल है?”
लड़के ने कहा-”हाँ बहुत है, तभी तो इतने दिन से तुम्हारे साथ प्रेम प्रसंग चलाने का प्रयास कर रहा हूँ। और चाहो तुम आजमा लो।”
लड़की ने कहा-”ठीक है। धन तेरस को बाजार में घूमेंगे, तब पता लगेगा की तुम्हें खरीददारी की अक्ल है कि नहीं। हालांकि तुम्हें थोडा धन का त्रास झेलना पडेगा, और बात नहीं भी बन सकती है।”
लड़का खुश हो गया और बोला-”ठीक, आजमा लेना।धन तेरस को दोनों खूब बाजार में घूमें। लड़के ने गिफ्ट में उसे मोबाइल,कान की बाली और ड्रेस दिलवाई। जब वह घर जाने लगी तो उसने पूछा-”क्या ख्याल है मेरे बारे में?”
लड़की ने कहा-”अभी पूरी तरह तय नहीं कर पायी। अब तुम दिवाली को घर आना और मेरी माँ से मिलना तब सोचेंगे। वहाँ कुछ और लोग भी आने वाले हैं।”
लड़का खुश होता हुआ चला गया। दीपावली के दिन वह बाजार से महंगी खोवे की मिठाई का डिब्बा लेकर उसके घर पहुंचा। वहाँ और भी दो लड़के बैठे थे। लड़की ने उसका स्वागत किया और बोली-”आओ मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रही थी, आओ बैठो।”
लड़का दूसरे प्रतिद्वंदियों को देखकर घबडा गया था और बोला -”नहीं मैं जल्दी में हूँ। मेरी यह मिठाई लो और खाओ तो मेरे दिल को तसल्ली हो जाये।”
लड़की ने कहा-”पहले मैं चेक करूंगी की मिठाई असली खोये की की या नकली की। यह दो और भी लड़के बैठे हैं इनकी भी मिठाई चेक कर करनी है। यही तुम्हारे अक्ल की परीक्षा होगी। ”
लड़के ने कहा-”असली खोवे की है, उसमे बादाम और काजू भी हैं। ”
लडकी ने आँखें नाचते और उसकी मिठाई की पेटी खोलते हुए पूछा-”खोवा तुम्हारे घर पर बनता है।”
लड़का सीना तान कर बोला-”नहीं, पर मुझे पहचान है।”
लडकी ने मिठाई का टुकडा मुहँ पर रखा और फिर उसे थूक दिया और चिल्लाने लगी-”यह नकली खोवे की है।”
लड़का घबडा गया और बोला-”पर मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।”
लडकी ने कहा-‘तभी यह नकली खोवे की मिठाई लाये हो। तुम फेल हो गए। अब तुम जाओ इन दो परीक्षार्थियों की भी परीक्षा लेनी है।”
लड़का अपना मुहँ लेकर लौट आया और बाहर खडा रहा। बाद में एक-एक कर दोनों प्रतिद्वंद्वी भी ऐसे ही मुहँ लटका कर लौट आये। तीनों एक स्वर में चिल्लाए-”इससे तो मिठाई की जगह कुछ और लाते, कम से कम जुदाई का गम तो नहीं पाते।”
हालांकि तीनों को मन ही मन में इस बात की तसल्ली थी की उनमें से कोई भी पास नहीं हुआ था।
नोट- यह एक काल्पनिक व्यंग्य है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।

अपने आंसू धीरे-धीरे बहाओ

शिष्य के हाथ से हुई पिटाई

गुरुजी को मलाल हो गया

जिसको पढ़ाया था दिल से

वह यमराज का दलाल हो गया

गुरुजी को मरते देख

हैरान क्यों हैं लोग

गुरू दक्षिणा के रुप में

लात-घूसों की बरसात होते देख

परेशान क्यों है लोग

यह होना था

आगे भी होगा

चाहत थी फल की बोया बबूल

अब वह पेड युवा हो गया

राम को पूजा दिल से

मंदिर बहुत बनाए

पर कभी दिल में बसाया नहीं

कृष्ण भक्ती की

पर उसे फिर ढूँढा नहीं

गांधी की मूर्ती पर चढाते रहे माला

पर चरित्र अंग्रेजों का

हमारा आदर्श हो गया

कदम-कदम पर रावण है

सीता के हर पग पर है

मृग मारीचिका के रूपमें

स्वर्ण मयी लंका उसे लुभाती है

अब कोई स्त्री हरी नहीं जाती

ख़ुशी से वहां जाती है

सोने का मृग उसका उसका हीरो हो गया

जहाँ देखे कंस बैठा है

अब कोइ नहीं चाहता कान्हा का जन्म

कंस अब उनका इष्ट हो गया

रिश्तों को तोलते रूपये के मोल

ईमान और इंसानियत की

सब तारीफ करते हैं
पर उस राह पर चलने से डरते हैं

बैईमानी और हैवानियत दिखाने का

कोई अवसर नहीं छोड़ते लोग

आदमी ही अब आदमखोर हो गया

घर के चिराग से नहीं लगती आग

हर आदमी शार्ट सर्किट हो गया

किसी अवतार के इन्तजार में हैं सब

जब होगा उसकी फ़ौज के

ईमानदार सिपाही बन जायेंगे

पर तब तक पाप से नाता निभाएंगे

धीरे धीरे ख़ून के आंसू बहाओ

जल्दी में सब न गंवाओ

अभी और भी मौक़े आएंगे

धरती के कण-कण में

घोर कलियुग जो हो गया

कसमें, वादे क्या, इन पर भरोसा क्या?

दोस्ती निभाने के वादे
किये नही जाते
निभाए जाते हैं।
जुबान से कहने के
मौक़े आते हैं हर दिन
निभाने के कभी कभी आते हैं।
देखा रोज यह कहने वालों की
भीड़ लगी रहती है कि कोइ
मुसीबत में हमें याद कर लेना
घिरता हूँ जब चारों और से
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं
जो हर पल निभाने की कसमें
सबसे ज्यादा खाते हैं
——————
कोई भी जब मेरे पास
वादों का पुलिंदा लेकर आता है
मैं समझ जाता हूँ
आज मी लुटने का दिन है
पहले सलाम करते हैं
फिर पूछते हैं हालचाल
फिर याद दिलाते हैं
पुरानी दोस्ती का इतिहास
मैं इन्तजार करता हूँ
उनकी फरमाइश सुनने का
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर
दावा यह कि केवल तुम अपने हो
इसीलिये कह रहा हूँ
मैं समझ जाता हूँ
आज एक दोस्त अपने से
सबंध ख़त्म होने का दिन है
________________

आकाश में धरती:फिर स्वर्ग और नरक कहॉ है?

वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर अगर गम्भीरता से विचार करें तो अविश्वास का कोई कारण मुझे तो नज़र नहीं आता । अमेरिकी वैज्ञानिकों की खोज पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी और शायद वही हैं जो आज भी अपने देश का सिर पूरे विश्व में उठाएँ हुए हैं। जब मैं आकाश की तरफ देखता था तो मुझे यह विश्वास होता था कि कहीं न कहीं आकाश में जीवन जरूर होगा, इसके पीछ तर्क थोडा हल्की तरह का अवश्य देता था पर किसी आदमी को समझाने के लिए वह ठीक ही है। वह यह कि हमारे पास एक से ज्यादा स्थानों पर जमीन होती है तो क्या हम उसको निरुप्योगी छोड़ देते हैं , एक जगह मकान में रहते हैं और दूसरी जगह पलट मिल जाये तो या तो उसे बेचे देते हैं या उस पर मकान बनवाकर उसे किराए पर उठा देते हैं, तो जिस परमात्मा ने यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड रचा है क्या वह इस धरती पर जीवन को स्थापित कर बाकी जगह खाली छोड़ सकता है। हमारे लिए जो सौरमंडल है उसमे किसी पर जीवन होगा इसमें मुझे संदेह रहता है, कारण ? मैं धरती को एक बड़ी इमारत की तरह मानता जिसमे खिड़की, रौश्नादन और पानी की टंकी तथा अन्य सुरक्षा कवच की तरह अनेक ग्रह और उपग्रह स्थापित हैं । हाँ, इसकी छतें दिन और रात में बदलती हैं-दिन में सूर्य अपने तेज से और रात को चंद्रमा अपनी शीतलता से जीवन का संचालन करते हैं । जब मैंने आकाश पर धरती के अस्तित्व की खबर देखी, सुनीं और पढी तो एक रोमांच का अनुभव किया क्योंकि बचपन से आकाश की तरफ देखते हुए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह विचार जरूर आता है कि वहां भी ऐसा ही जीवन होगा। दुनियां में कोई भी ऐसा वृतांत सुनाने को नहीं मिलता कि आकाश में कोई जीवन है। हाँ, देवताओं के आकाश में विचारने की पुष्टि होती है और फिर इन्सान के लिए स्वर्ग-नरक या कहें जन्नत-जहन्नुम जैसे कल्पित स्थान आकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर ही गडे गए हैं ताकी आदमी आकाश के बारे में ज्यादा सोचे नहीं- क्योंकि वह अगर आकाश के बारे में सोचेगा तो उसे तथाकथित बुध्दिजीवियों के भ्रमजाल में फंसने का समय ही कहाँ मिलेगा। हमारे धर्म ग्रंथों में आकाश वानियाँ होने तथा देवताओं के धरती पर आने की घटनाओं का वर्णन तो मिलता है पर हमारे जैसा खिन और भी जीवन है ऎसी कोई जानकारी मेरे नजरों के सामने नही आयी है । विश्व के अनेक किताबों में आकाश से प्रथ्वी का जिक्र मिलता है और वहां से धरती पर विमान आने और लोगों के उतरने की अनेक घटनाएँ हैं पर जैसा जीवन यहां है ऐसा कहीं और भी है ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बहरहाल मेरे हिसाब से यह सबसे नवीनतम खोज है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जहाँ तक जीवन के मूल तत्वों का प्रशन है भारतीय दर्शन और पशिचम के विज्ञान में कोई अंतर नहीं है। जीवन के लिए जलवायु का होना जरूरी है और जिस धरती की खोज की गयी है उस पर वैसी ही जलवायु है जैसी यहां पायी जाती है।यह संभावना कम ही है कि उस धरती के लोगों से कोई हमारा जल्दी संपर्क होने वाला है। अगर हो सकता है तो तभी जब वहां हमसे ज्यादा प्र्गातिवान लोग हौं , क्योंकि हमारी वैज्ञानिक क्षमता अभी उन तक अपना संदेश पहुंचाने की नहीं है। पर एक बात जो कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है यह कि अगर उस धरती के लोगों से संपर्क हो गया तो यहां ऐसे कईं भ्रम और विचारधाराएँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी जो बरसों से पीढी -दर-पीढी हमारे मस्तिष्क पर स्थापित रही हैं और उनकी आड़ में तमाम लोग अपने परिवार के लिए राज्यीय, आर्थिक, और धार्मिक सत्ता जुटाते रहे हैं। एक अनजाने भय जो कहीं आकाश में स्थित नहीं है उसका भय दिखाकर सामान्य आदमी को दिखाकर उसका सामाजिक, आर्थिक, बौध्दिक और राजनीतिक शौषण किया जाता रहा है और ऐसा करने वाले आकाश से ही अपनी शक्ति प्राप्त करने का दावा करते हैं। जब आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि आकाश में भी हमारे जैसे गरीब और बीमार लोग रहेते हैं वह स्वर्ग और नरक के अतार्किक सपनों और दुसप्नों से मुक्त हो जाएगा। अभी तक उसे यह बताया जाता है कि आकाश में स्वर्ग है जहां तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं फ्री में मिल जाती हैं अगर वह अपने तथाकथित पथप्रदर्शक की बात मान ले तो! अगर नहीं मानेगा तो उसे नरक का भय दिखाया जाता है। अगर यह संपर्क हो गया तो सभी धर्मों के कर्म कांडों -जो स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी देते हैं-पर पलीता लग जाएगा। क्योंकि आदमी अपने पथ प्रदर्शकों से पूछेगा के आकाश में भी धरती है तो यह स्वर्ग और नरक कहॉ है?यकीनन वह इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और उनके द्वारा बरसों से बुना गया भ्रमजाल टूट जाएगा ।

अपनों से डरने लगे हैं लोग

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शाश्वत सत्य नये संदर्भ में: “यहाँ गरीब का आना मना है”

खबर यह थी कि उसका पुत्र एक राजनीतिक दल के दफ्तर में


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