पुरालेख

कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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शब्द लिखना और पढ़ना एक नशा होता है-आलेख

लिखना और पढ़ना एक आदत है और यह अधिक शिक्षित में भी हो सकती है और कम शिक्षित में भी। चाहे किसी भी भाषा मं लिखने या पढ़ने का प्रश्न हो उसका इस बात से कोई संबंध नहीं है कि कोई पढ़ा लिखा अधिक पढ़ता है या कम पढ़ा लिखा। कई ऐसे लोग है जिन्होंने केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त किया पर वह कथित सामाजिक और जासूसी उपन्यास जमकर पढ़ते हैं पर कई ऐसे हैं जो बहुत पढ़ लिखकर ऊंचे पद पर पहुंच गये और अब इस बात की शिकायत करते हैं कि -उनको पढ़ने का समय नहीं मिलता।’

कई बार ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि ठेले पर सब्जी वाला लड़का भी फुरसत में कुछ न कुछ पढ़ता दिख जाये और उसके पास पढ़ा लिखा आदमी सब्जी खरीदने जाये। वहां उसे पढ़ता देख वह सोचता है कि ‘अच्छी फुरसत मिलती है इस सब्जी को पढ़ने की।
जिसे शब्द पढ़ने में आनंद आता है उसको चित्र देखकर भी मजा नहीं आता। पढ़ने वालों को किसी चित्र से कम उसके साथ लिखे शब्दों को पढ़ने में आनंद आता है। फिर आखिर पत्र-पत्रिकाओं में फोटो क्यों लगाये जाते हैं?’

अपनी मेहनत और पैसा बचाने के लिये। पता नहीं इस विषय पर लोग क्या सोचते हैं? पत्र पत्रिकाऐं अपने यहा प्रकाशनों में फोटो लंबे चैड़े लगाती हैं पर शब्द होते हैं कम। बहुत बड़ा हीरो और हीरोइन का साथ में चिपके हुए फोटो और अक्षर कुल दस ‘प्रेम के चर्चे गर्म; चार अक्षर शीर्षक के और छह अक्षर की खबर। किसी खाने की चीज के बनाने की विधि बतायी जाती है पचास शब्दों में और फोटो होता है डेढ़ पेज में। तय बात है कि संपादक अपनी मेहनत बचाता है और प्रकाशक अपना पैसा!’

पत्र पत्रिकाओं के संपादक और प्रकाशक हमेशा ही इस देश में पूज्यनीय रहे हैं पर वह पाठकों को अपना भक्त नहीं मानते। उनके लिये भगवान है विज्ञापन। जहां तक लेखकों का सवाल है तो उनकी हालत तो मजदूर से भी बदतर है। पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों के गठजोड़ का मानना है कि ‘लिख तो कोई भी सकता है।’
इसी सोच के परिणाम यह है कि वह किसी ऐसे लेखक में रुचि नहीं रखते जो केवल लिखता हो बल्कि उनकी नजर में वही लेखक श्रेष्ठ है जो थोड़ा प्रेक्टिकल (व्यवहारिक) हो यानि चाटुकारिता में भी दक्ष हो।’
इसी कारण हिंदी में प्रभाव छोड़ने वाला न लिखा गया और लिखवाया गया। फिल्म और पत्रिकारिता में मौलिक लेखकों को अभाव है। नकल कर सभी जगह काम चलाया जा रहा है और कहते क्या हैं-हिंदी में अच्छा लिखने वाले कम है।’

बहुत समय यानि अट्ठाईस वर्ष पहले एक नाठककार ने अपने भाषण में कहा था कि-िहंदी में नाटक लिखने वाले कम हैं।’

उस समय अनेक कथित हिंदी साहित्यकार यह सुन रहे थे पर किसी ने कुछ नहीं बोला पर उस इस आलेख का लेखक का कहना चाहता था कि-‘‘हिंदी मेें कहानी लिखी जाती है एक नाटक की तरह जिसमें वातावरण और पात्र इस तरह बुने जाते हैं कि नाटक भी बन जाये। फिर रामायण और महाभारत के बारे में कोई क्या कह सकता है। वह ऐसी रचनायें रही है जिन पर अनेक नाटक और फिल्म बन चुकी हैं। उस समय प्रेमचंद की एक कहानी पर एक नाटक इस पंक्तियों का लेखक स्वयं देखकर आया था। वहां कहा इसलिये नहीं क्योंकि उस समय दिग्गजों के सामने एक नवयुवक की क्या हिम्मत होती?’

अपनी पूज्यता का भाव हिंदी के लेखकों के लिये हमेशा दुःखदायी रहा है। वह जब थोड़ा पुजने लगते हैं तो अपनी असलियत भूल जाते हैं और उनको लगता है कि वह हो गये संपूर्ण लेखक। तमाम तरह के साहित्येत्तर सहयोग के कारण वह अपने इहकाल में पुज जाते हैं पर बाद में उनको कोई याद नहीं करता। हां, कुछ ऐसे लोग जो स्वयं लिखना नहीं जानते उनकी रचनाओं को दूसरे लेखकों के मुकाबले प्रकाशन जगत में लाते हैं ताकि वह प्रसिद्ध नहीं हो सके। कुकरमुत्तों जैसी हालत है। जो लेखक नहीं है वह चालू है और लेखक होने का ढोंग कर पुराने लेखकों की रचनायें क्लर्क बनकर लाते हैं और जो लेखक हैं वह सीधे सादे होते हैं और फिर हिंदी भाषी समाज उनके प्रति गंभीर नहीं है।

परिणाम सामने हैं कि हिंदी में एसा कुछ नहीं लिखा और जो पढ़ने को मिल रहा जिसे विश्वस्तरीय मानना कठिन है। हिंदी में जो लेखक मौलिक लेखन कर रहे हैं वह एक तरह के नशेड़ी है और जो पढ़े रहे है वह भी कोई कम नहीं हैं। मुश्किल यह है कि पश्चिम से प्रभावित यहां के पूंजीपतियों और बुद्धिजीवियों का गठजोड़ इस बात से कोई मतलब नहीं रखता। इस देश में नीतियां ऐसी हैं कि नये आदमी को कहीं स्थापित होने का अवसर नहीं है यही कारण फिल्म,साहित्य,पत्रकारिता और व्यवसाय के क्षेत्र और परिवार को पनपने का अवसर नहीं मिल पाता। पत्र पत्रकायें छापी जाती हैं पर पाठक के लिये नहीं बल्कि विज्ञापनदाताओंं के लिये। संपादक यह नहीं सोचता कि पाठक को चित्र पसंद आयेंगे कि नहंी बल्कि वह शायर सोचता यह है कि मालिक और उसके परिवार को पत्रिका पंसद आना चाहियै। तय बात है कि कोई भी पत्र पत्रिका केवल फोटो से ही चमक सकती है। अब यह कौन किसको बताये कि शब्द पढ़ने वाले चित्र नहीं पढ़ा करते? उनको नशा होता है शब्द पढ़ना और लिखना। ऐसे नशेडि़यों को अच्छा पढ़ने और लिखने के लिये जो संघर्ष करना पड रहा है उस पर फिर कभी।
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वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा-व्यंग कविता

वस्त्र का नाप शून्य हो तो चलेगा
हवस की मोहब्बत का पैमाना उससे बढ़ेगा
टूटे बिखरे लोगों का मन
मोहब्बत के नाम से ही फड़केगा
खरीददार बहुत हैं जज्बातों के
असल में नहीं मिलते जो
इसलिये तस्वीरों से उनका दिल मचलेगा
बाजार में सजाते हैं सौदागर
मोहब्बत के पैगाम
उसी से ही चलता है उनका काम
ख्वाब दिखाकर ही मिल जाता उनको दाम
अपनी हकीकत से भागते हैं लोग
झूठे दिखावे से उनक चेहरा महकेगा
अगर सच से रखते हो वास्ता
तो नहीं है तुम्हारा रास्ता
मन में चैन रहेगा और दिल में सुकून
पर कोई आदमी तुम्हारे पास नहीं फटकेगा

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जिसका नहीं कोई सगा, उससे कभी होता नहीं दगा- व्यंग्य कविता

उन आंखों से क्या, दया की चाहत करना
जिनमें शर्म-ओ-हया का पानी सूख गया हो
उन होठों से क्या, मीठे बोल की उम्मीद करना
जिनकी जुबान से प्यार का शब्द रूठ गया हो
उस जमाने से क्या, मदद मांगना
नाम के दोस्त तो बहुत हैं
पर निभाने का मतलब कौन जानता है
मतलब के लिये सब हो जाते साथ
उससे अधिक कौन किसे मानता है
वफा की उम्मीद उनसे क्या करना
जिन्होंने अपना यकीन खुद लूट लिया हो
दगा किसी का सगा नहीं
पर जिसका नहीं कोई सगा
उससे कभी होता नहीं दगा
अपने बनते है कुछ पल के लिये लोग
काम निकल गया तो भूल जाते हैं
वह क्या याद करेंगे फिर
जिन्होंने हमेशा भूलने का घूंट पिया हो

जिनका कोई नहीं बनता अपना
विश्वासघात का खतरा उनको नहीं होता
जुटाते हैं जो भीड़ अपने साथ
रखते हैं उसका स्वार्थ अपने हाथ
पूरा करें या नहीं, ललचाते जरूर हैं
अपने हाथ उठाकर,क्या उनसे मांगना
जिन्होंने ओढ़ ली है बनावटी हरियाली
पर अपना पूरा जीवन ठूंठ की तरह जिया हो

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ब्रहमाण्ड का रहस्य जानने का प्रयास नाकाम तो होना ही था-व्यंग्य

महामशीन के रूप में चर्चित महादानवीय मशीन का प्रयोग अब रुक गया है। अगर आज के सभ्य समाज में महिमा मंडित विज्ञान के भ्रम का चरम रूप देखना है तो इस मशीन को देखा जा सकता है। बात अगर ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानने की है तो वह केवल पंचतत्वों की कार्य परिधि में नहीं देखा जा सकता है। छठा तत्व है वह सत्य जो इनमें प्रविष्ट होकर फिर निकल गया पर यह पांच तत्व-आकाश, प्रथ्वी,जल,वायु, अग्नि-उसके बचे अंशों से विस्तार पा गये। इस संबंध में पहले ही अपने लेख में कह चुका हूं कि वह सत्य तत्व विज्ञान के किसी भी प्रयास से यहां नहीं लाया जा सकता। उसे कभी देखा तो नहीं पर अनुभव किया जा सकता है और उसके लिये एक ही उपाय है ध्यान। ध्यान में ही वह शक्ति है जो उस सत्य की अनुभूति की जा सकती है।

दरअसल ज्ञान के बाद जो विज्ञान की कार्य शुरु होता है उसमें उपयोग किये जाने वाले साधन शक्तिशाली होते हैं पर वह यही प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तुओं से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। ब्रह्माण्ड के जन्म का रहस्य भारतीय अध्यात्म ग्रंथों में वर्णित है साथ ही यह भी कि उस सत्य की महिमा और वर्णन अत्यंत व्यापक है जिसे कोई ज्ञानी ही अनुभव कर सकता है। ब्रह्माण्ड का रहस्य ने जिन पांच तत्वों से अपनी मशीन बनाई उसमें वह छठा तत्व कभी भी शामिल नहीं कर सकते अतः उन्हें अपने ज्ञान से ही उसका रहस्य समझना होगा। बेकार में इतना धन और परिश्रम कर रहे हैं।

मैंने अपने लेख में लिखा था कि अब वर्तमान में वैज्ञानिकों के पास बस एक ही बड़ा लक्ष्य रह गया है कि वह सूर्य की ऊर्जा का संग्रह करने वाला कोई ऐसा संयत्र बनायें जिससे पैट्रोल और परमाणु सामग्री के बिना ही वर्तमान विश्व का संचालन हो। वैसे उन्होंने अभी तक जो साधन बनाये हैं वह अधिक उपयोग नहीं है इसलिये विश्व अभी पैट्रोल पर अधिक निर्भर है। इस संबंध में मेरा लिखा गया लेख पुनः प्रस्तुत है।

ब्रह्माण्ड को जानने के लिये महादानव का प्रयास-व्यंग्य आलेख hasya vyangya
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महामशीन का महाप्रयोग हो गया। कुछ समय तक उसे महादानव कहकर भी प्रचारित कर प्रचार माध्यमों ने आम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। संभवतः लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था इसलिये उसका नकारात्मक प्रचार कर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने उस महामशीन का नाम प्रतिष्ठित किया। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि नाम करने के लिये बदनाम होने को भी कुछ लोग तैयार हो जाते हैं। कहते हैं कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है‘। शायद इसी तर्ज पर तमाम तरह की बातें की गयीं।

भारतीय संचार माध्यमों को भी अपने लिये चार दिन तक खूब सक्रियता दिखाकर अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का सुंदर अवसर मिला। विज्ञान की फतह-हां, यही शब्द प्रयोग किया है प्रचार माध्यमों ने उस सफल प्रयोग के लिये। पहले महादानव अब महादूत बन गया लगता है। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि पहले किसी को दानव बनाओ फिर देवदूत। इससे किसी विषय को लंबा खींचने का अवसर तो मिलता ही है उससे वह व्यक्ति भी संतुष्ट हो जाता है जिससे बदनाम किया गया पर ऐक बेजान मशीन को जिस तरह प्रचारित किया गया उसे प्रचार के बाजार में सक्रिय लोगों की तारीफ करने का मन करता है।

अब बात करें उस महादानव या महामशीन की जिसे आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गयी है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पति के रहस्य को जानना चाहते हैं। आश्चर्य है कि जो विषय विज्ञान की परिधि से कोसों दूर है वह उस पर काम कर रहे हैं। दुनियां की कोई शय उस रहस्य को नहीं देख सकती। जीवन से पहले और मृत्यु के बाद के रहस्य विज्ञान की शक्ति से बाहर हैं। उन्हें वही ज्ञानी जान सकता है जिसने अपनी इस देह से तपस्या की हो। यह काम हमारे ऋषि और मुनि कर चुके हैं। उन्होंेने इस ब्रह्माण्ड की उत्पति का रहस्य पहले ही बता दिया है।

उसकी संक्षिप्त कहानी इस तरह है कि सत्य बरसों तक ऐसे ही पड़ा हुआ था। उसे इतना समय व्यतीत हो गया कि वह स्वयं को असत्य समझने लगा तब वह प्रयोग करने निकला। पांच तत्व (प्रथ्वी,आकाश.जल.आकाश.और वायु) कणों के रूप में-जिन्हें आधुनिक भाषा में अणु भी कह सकते हैं-उसके समक्ष पड़े हुए थे। वह उनमें दाखिल हो गया तो उस देखने, सुनने सूंघने, और स्पर्श करने का अवसर मिला। वह इन तत्वों से निकल आया पर उसके अंश इसमें छूट गये और वह पांचों तत्व बृहद रूप लेते गये। उनके आपसी संपर्क से ब्रहमाण्ड का सृजन हुआ। यह कथा व्यापक है और इस पर चर्चा आगे भी की जा सकती है।

हमारे देश के ज्ञानी महापुरुषों ने पहले ही इसे जान लिया है। अब विज्ञान की बात करे लें। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों तक ही कार्य कर सकता है। उन्होंने इस महाप्रयोग में जिन भी चीजों का उपयोग किया वह कहीं न कहीं इसी धरती पर मौजूद हैं। यानि पांच तत्वों में एक तत्व। फिर जल, वायु और अग्नि का भी उन्होंने उपयोग किया होगा। चलो यह भी मान लिया। उन्होंनें आकाशीय तत्व के रूप में गैसों का भी प्रयोग किया होगा। हां, इसके बिना सब संभव नहीं है। मगर वह सत्य का तत्व जो निर्गुण, निराकार, और अदृश्य है उसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। उसे कोई छू नहीं सकता, उसे कोई देख नहीं सकता और जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है उस सत्य तत्व का प्रयोग केवल कोई तपस्वी ही कर सकता है। उस सत्य तत्व की केवल अनुभूति की जा सकती है और उसके लिये ध्यान और योग की प्रक्रिया है। जो इन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं वही उसकी अनुभूति कर पाते हैं।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति इस सत्य का जानता है फिर यह कौनसे ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने का प्रयास कर रहे है। यह अलग बात है कि अंग्रेजी की शिक्षा पद्धति ने लोगों को अपना अध्यात्मक भुला दिया है पर फिर भी कुछ लोग हैं जो इस सत्य का धारण किये रहते हैं। आधुनिक विज्ञान मंगल और बृहस्पति तक पहुंच गया है। हो सकता है वह सूर्य तक भी पहुंच जाये। वह ब्रह्माण्ड के अंतिम सिरे तक पहुंच जाये पर वह सत्य उसे नहीं दिखाई देगा। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के साथ ही विज्ञान का भी पोषक है। श्रीमद्भागवत गीता में विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। क्योंकि धर्म की रक्षा के लिये अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग अवश्यंभावी होता है इसलिये विज्ञान का विरोध करना तो मूर्खता है पर उसकी सीमाऐं हैं यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
हमारे देश ने एक समय योग साधना और ध्यान को नकार दिया था। पश्चिम से आयातित इलाज को ही प्राथमिकता दी जाने लगी। अब यह रहस्य तो सभी जगह उजागर है कि आधुनिक चिकित्सा के पास रोग को रोकने की क्षमता है पर मिटाने की नहीं। इसलिये अब डाक्टर ही अपने मरीजों को योगसाधना करने का मशविरा देते हैं। यानि भारतीय ज्ञान की अपनी महिमा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिम विज्ञान ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया है जबकि उसका तो कोई वजन है ही नहीं। आदमी मर जाता है तो उसका इतना वजन इसलिये कम हो जाता है क्योंकि कुछ हवा पानी म्ृत्यु के समय निकल जाता है। भारतीय और पश्चिम के विज्ञान बारंबार कहते हैं कि उनको ं ब्रह्माण्ड का रहस्य जानना है मगर पांच तत्वों के मेल से बने इस ब्रह्माण्ड को जानने के लिये क्या वैज्ञानिकों से किसी छठे तत्व को भी अपने प्रयोग को शामिल किया था। अरे, भई वह छठा तत्व किसी की पकड़ में नहीं आ सकता।

दुनियां का सबसे बड़ा प्रयोग-यही नाम उसे दे रहे हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों के पास कोई काम नहीं बचा है। हमारे हिसाब से वैज्ञानिकों के पास एक काम है जिस पर वह नाकाम हो रहे हैं। वह यह कि बिना तेल के कार,स्कूटर,वायुयान और घर की बिजली जल सके इस पर उनको काम करना चाहिये। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसकी तरफ अनेक वैज्ञानिक इशारा करते हैं। अगर वैज्ञानिको को करना ही है तो ऐसे यंत्र बनाये जो कि सूर्य से इस धरती पर आने वाली ऊर्जा का संयच तीव्र गति से कर सकें और बिना तेल और लकड़ी के लोगों का खाना बन सके। अभी तक तो धरती पर मौजूद तेल,गैस और अन्य रसायनों के भंडारों से ही सारा संसार चल रहा है। मतलब यह कि अभी धरती पर ही विजय नहीं पायी और आकाश में ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने चले हैं। अनेक लोग बिचारे रोज अखबार और टीवी इसलिये ही खोलकर देखते हैं कि कहीं कोई ऐसी चीज बनी गयी क्या जिससे बिना तेल और बिजली के उनका काम चल सके। स्कूटर चलाने के लिये अभी भी पैट्रोल पंप पर जाना पड़ता है और गैस के लिये फोन करना पड़ता हैं। कंप्यूटर चलाने के लिये लाईट खोलना पड़ती है। यह सब सौर ऊर्जा से हो जाये तो फिर माने कि विश्व के वैज्ञानिकों ने तरक्की की है।

जहां तक इन पश्चिमी वैज्ञानिकों की बात है वह अनेक तरह के अविष्कारों से नये नये साधन बना चुके हैं पर ऊर्जा के मामले में फैल हैं। परमाणु ऊर्जा का नाम बहुत है पर उसे केवल बम की वजह से जाना जाता है जो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये थे। अगर उससे कुछ बिजली बनी भी है तो वह कोई समस्या का हल नहीं हैं। बात तो तब मानी जाये जैसे स्कूटर हर कोई आदमी चला लेता है वैसे ही उसके पास ऐसे साधन भी हों कि वह घर बैठे ही सूर्य से ऊर्जा एकत्रित कर उसे चला सके। कहीं ऐसा तो नहीं पश्चिम के वैज्ञानिक केवल उसी स्तर तक काम करते हों जहां तक आम आदमी सुविधाओं का दास बने और स्वतंत्र रूप से विचरण न कर सकें। इस महाप्रयोग का प्रचार कितना भी हो पर वह छठा तत्व-जिसे वैज्ञानिक जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे-विज्ञान के कार्य करने की परिधि से बाहर है, यह बात तय है।
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आतंकी हिंसा पर बुद्धिजीवियों की निरर्थक बहस-संपादकीय

एक शवयात्रा में दो आदमी पीछे जा रहे थे
एक ने कहा-‘बेकार आदमी था। किसी के काम का नहीं था’
दूसरे ने कहा-‘नहीं कैसी बात करते हो। वह दरियादिल आदमी थी। मेरे तो दस काम किये। कभी काम के लिये मना नहीं किया।
दूसरे ने कहा-‘मेरे भी उसने दस काम किये पर एक काम के लिये मना लिया। इसलिये ही तो कहता हूं कि वह ठीक आदमी नहीं था। अगर होता तो एक काम के लिये मना क्यों करता?’

उनके पीछे एक आदमी चल रहा था। उसने पूछा‘-आप यहा तो बताओ। उसका देहावसान कैसे हुआ। क्या बीमार थे? क्या बीमारी थी?’
दोनों ने कहा‘-हमें इससे क्या मतलब हमें तो शवयात्रा में दिखावे के लिये शामिल हुए हैं।’
वह तीसरा आदमी चुपचाप उनके पीछे चलता रहा।’
उसने देखा कि दोनों के साथ उनके समर्थक भी जुड़ते जा रहे थे। कोई मृतक की बुराई करता कोई प्रशंसा। तीसरा आदमी सबसे मृत्यु की वजह पूछता पर कोई नहीं बताता। एक ने तो कह दिया कि अगर हमारी चर्चा में शामिल नहीं होना तो आगे जाकर मुर्दे को कंधा दे। देख नहीं रहा हमारे उस्ताद लोग बहस में उलझे हैं।’
यह कहानी एक तरह देश में चल रही अनेक बहसों के परिणामों का प्रतीक है। देश में बढ़ती कथित आंतकी हिंसा घटनाओं के बाद प्रचार माध्यमों में अनेक तरह की सामग्री देखने को मिलती है। बस वही रुटीन है। ऐसी घटनाओं के बाद सभी प्रचार माध्यम रटी रटाई बातों पर चल पड़ते हैं। अखबारों में तमाम तरह के लेख प्रकाशित होते हैं। इन घटनाओं के पीछे ऐसी कौनसी बात है जो किसी की समझ में नहीं आ रही और इनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।
अभी दिल्ली में हुए हादसे के बाद अगर प्रचार माध्यमों-जिनमें अंतर्जाल पर ब्लाग भी शामिल हैं-में आये आलेखों को देखा जाये तो एक बात साफ हो जाती है कि लोगों की सोच वहीं तक ही सीमित है जहां तक वह देख पाते हैं या जो उनको बताया जाता है। न तो उनमें मौलिक चिंतन करने की क्षमता है और न ही कल्पना शक्ति।

वैसे तो तमाम तरह की खोजबीन का दावा अनेक लोग करते हैं पर इन आतंकी हिंसक घटनाओं के पीछे का राजफाश कोई नहीं कर पाता। नारों और वाद पर चलते बुद्धिजीवी भी गोल गोल घूमते हुए रटी रटाई बातें लिखते हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया कि जिसमें भारतीय पढ़ खूब लेते हैं पर फिर भूल जाते हैं।
आतंकी हिंसा अपराध है और अपराध शास्त्र के अनुसार तीन कारणों से लोग गलत काम करते हैं-जड़ (धन), जोरु (स्त्री) और जमीन। वैसे तो अपराध शास्त्र के विद्वान बहुत होंगे पर हर आम आदमी को उसका मूल सिद्धांत पता है कि इन तीन कारणों से ही अपराध होते हैं।’

अब सवाल यह है कि आतंकी हिंसा क्या अपराध शास्त्र से बाहर हैं और लोग मानकर चले रहे हैं कि यह अपराध से अलग कोई घटना है। देखा जाये तो आतंकी हिंसा के विरुद्ध सब हैं पर बहसें हो रही हैं धर्म,भाषा और जाति के लेकर। इतिहास सुनाया जा रहा है और वाद और नारे लग रहे हैं। देश के बुद्धिजीवियों पर तरस आता है। आतंकी हिंसा में सबसे अधिक कष्ट उन लोगों का होता है जिनका नजदीकी मारा जाता है। उनसे हमदर्दी दिखाने की बजाय लोग ऐसी बहसें करते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं है। और तो छोडि़ये लोगों ने इस आतंकी हिंसा को भी सभ्य शब्द दे दिया‘आतंकवाद’। फिर वह किसी दूसरे वाद को लेकर फिकरे कस रहे हैं?

ऐसी चर्चायें दो चार दिन चलतीं हैं फिर बंद हो जातीं हैं। जिनके परिवार का सदस्य मारा गया उनकी पीड़ा की तो बाद में कोई खबर नहीं लेता। इसी बीच कोई अन्य घटना हो जाती है और फिर शुरू हो जाती है बहस। कोई इस बात में दिलचस्पी नहीं लेता कि आख्रि इस हिंसा में किसका फायदा है? यकीनन यह फायदा आर्थिक ही है। सच तो यह है कि यह एक तरह का व्यवसाय बन गया लगता है। अगर नहीं तो इस सवाल का जवाब क्या है कि कोई इन घटनाओं के लिये कैसे पैसे उपलब्ध कराता है। जो लोग इन कामों में लिप्त हैं वह कोई अमीर नहीं होते बल्कि चंद रुपयों के लिये वह यह सब करते हैं। तय बात है कि यह धन ऐसे लोग देते हैं जिनको इस हिंसा से प्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है। यह फायदा उनको ऐसे व्यवसायों से होता है जो समाज के लिये बुरे माने जाते हैं और उसे निरंतर बनाये रखने के लिये समाज और प्रशासन का ध्यान बंटाये रखना उनके लिये जरूरी है और यह आतंकी हिंसा उनके लिये मददगार हो।
कुछ जानकार लोगों ने दबी जबान से ही सही यह बात लिखी थी कि जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब वहां से भारत और पाकिस्तान के बीच दो नंबर का व्यापार दोगुना बढ़ गया। कभी इस पर अधिक बहस नहीं हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों और सरकारों का ध्यान बंटाने के लिये इस तरह की घटनायें करवायीं जाती हों।
जहां तक किसी समूह विशेष से जोड़ने का सवाल है तो ऐसी हिंसा कई जगह हो रही है और उसमें जाति, धर्म, भाषा ओर वर्ण के आधार पर बने समूह लिप्त हैं। यह सच है कि जब कहीं ऐसी घटना होती है तो उसकी जांच स्थानीय स्तर पर होती है पर राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय अपराध विशेषज्ञों को अब इस बात पर दृष्टिपात करना चाहिये कि इसके लिये धन कौन दे रहा है और उसका फायदा क्या है?’

धर्म, जाति, और भाषा के नाम पर समूह बने भ्रम की राह पर चले रहे हैं और तय बात है कि इसी का लाभ उठाकर आर्थिक लाभ उठाने का प्रयास कई तरह से हो रहा है-यह अलग से चर्चा का विषय है पर ऐसे मामलों में हम उनका नाम लेकर अपराधियों का ही महिमा मंडल करते हैं। अगर इनके आर्थिक स्त्रोतो पर नजर रखते हुए काम किया जाये तभी इन पर नियंत्रण किया जा सकता है।
धर्म,जाति,भाषा और वर्ण के आधार पर कौन कितना अपने समूह का है सब जानते हैं। अमरीका ने पहले इस बात के प्रयास किये कि इनके इस प्रकार के हिंसातंत्र को प्रायोजित करने वाले आर्थिक स्त्रोतों पर ही वह हमला करेगा पर लगता है कि वह इराक युद्ध में उलझकर स्वयं भी भूल गया। यह धन अपने हाथ से कौन दे रहा है उसका पता लग जाये तो फिर यह पता लगाना भी जरूरी है कि उसके पास पैसा कहां से आया? इनके पास पैसा उन्हीं व्यवसायों से जुड़ लोगों से आता होगा जिनमें धर्म के दूने जैसा लाभ है। यह हो सकता है कि ऐसा व्यवसाय करने वाले सीधे आतंकी हिंसा करने वालों को पैसा न दें पर उनसे पैसा लेने वाले कुछ लोग इसलिये भी ऐसी हिंसा करा सकते हैं कि इससे एक तो उनको धन देन वाले चुपचाप धन देते रहें और दूसरा दो नंबर का काम करने वालों का धंधा भी चलता रहे।

जड़,जोरू और जमीन से अलग कोई अपराध नहीं होता। चाहे देशभर के बुद्धिजीवी शीर्षासन कर कहें तब भी वह बात जंचती नहीं। विचारधाराओं और कार्यशैली पर विभिन्न समूहों में मतभेद हो सकते हैं पर किसी में ऐसी ताकत नहीं है जो बिना पैसे कोई लड़ने निकल पड़े और पैसा वही देगा जिसका कोई आर्थिक फायदा होगा। कहीं कहीं आदमी डर के कारण चंदा या हफ्ता देता है पर वह इसलिये क्योंकि तब वह अपने अंदर शारीरिक सुरक्षा का भाव उत्पन्न होने के साथ उसका व्यापार भी चलता है। इधर यह भी हो रहा है कि अपराधियों का महिमा मंडन भी कम नहीं हो रहा। यही कारण है कि लोग प्रचार के लिये भी ऐसा करते हैं जो अंततः उनके आर्थिक लाभ के रूप में ही परिवर्तित होता है। जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनके प्रचारकों को प्रचार माध्यम उनकी तरफ से सफाई देते हुए दिखाते हैं। सच तो यह है कि आतंकी हिंसा की आड़ में अनेक लोगों ने नाम और नामा कमाया है और यह सब पैसा कहीं न कहीं देश के लोगों की जेब से ही गया है। हालांकि इनके आर्थिक स्त्रोतों का पता स्थानीय स्तर पर नहीं लग सकता। इसके लिये आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय लोग इसके लिये सक्रिय हों। इसके लिये जरूरी है कि देश में चल रहे दो नंबर के व्यवसायियों में कौन किस किस को धन देते हैं और उसका उनको क्या लाभ है यह देखा जाना जरूरी है। अनेक अपराधी पकड़ जाते हैं पर असली तत्व दृष्टिगोचर नहीं होते। हो सकता है कि हिंसा करने वाले कंपनियों के रूप में सक्रिय हों पर उनके कर्ताधर्ता का पता लगाना जरूरी है।

बुद्धिजीवी लोग इन हिंसक घटनाओं से उत्पन्न बिना मतलब के विषयों पर चर्चा के इस पर बहस क्यों नहीं करते कि आखिर इसका लाभ किसको कैसे हो सकता है। अगर यही बहसों का हाल रहा तो एक दिन देश को आतंकवाद के मसले पर विश्व में मिल रही सहानुभूति समाप्त हो जायेगी ओर यह यहां का आंतरिक मामला मान लिया जायेगा और विदेशों में देश के अपराधियों को शरण मिलती रहेगी। अगर कोई अपराध विशेषज्ञ इसे अलग प्रकार का अपराध मानता है तो फिर कुछ कहना बेकार है पर ऐसा कहने वाले बहुत कम मिलेंगे अगर मिल जाये तो लार्ड मैकाले की प्रशंसा अवश्य करें जिसने इस देश के लोगों की बुद्धि कोई हमेशा के लिये कुंठित कर दिया। ऐसे विषयों पर अपराध विज्ञानियों को चर्चा करना चाहिये पर यहां केवल विचारधाराओं के आधार चलने वाले बुद्धिजीवी बहस करते हैं तब यही लगता है कि वह केवल तयशुदा वाद और नारों पर ही चलते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
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दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।

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दीपक भारतदीप

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