पुरालेख

भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति को धंधे की तरह न करें (bhakti ko dhandha n samjhen-hindu sandesh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लिए  कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त  करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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चाणक्य नीति-कुविचारी नारी से तो कोई साथ न हो अच्छा (chankya niti-kuvichari nari ka sath

नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
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वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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चाणक्य नीति: अधिकारी कभी इच्छा और लोभ से मुक्त नहीं होता

निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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अध्यात्मिक गुरु जब मायावी ढांचे के बचाव में आगे आते हैं-आलेख

कल गुरुपूर्णिमा के दिन था और लोगों ने अपने हृदय में स्थित गुरुओं की पूर्जा अर्चना की। भारत में यह पर्व बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है। हिंदू अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और शायद यही कारण है कि इसे धर्म मानने वाले लोग रूढ़ता के बंधनों में नहीं बंधते क्योंकि अध्यात्म के पुराने और गूढ़ रहस्यों को समय समय पर प्रसिद्धि पाने वाले यह गुरू आधुनिक संदर्भों में व्याख्या कर समाज में व्यवस्था बनाये रखते हैं। देखा जाये तो हिंदू होना ही अपने आप में प्रगतिशील होना है पर समय के साथ भौतिकवाद ने यहां ऐसे अनेक भ्रम प्रचलित कर दिये हैं जिससे वास्तविक अध्यात्म ज्ञान की न तो गुरुओं में समझ है और न ही ऐसे गुरु को लोग समझने के इच्छुक है। कथित संतों और गुरुओं ने गेहुंए और सफेद वस्त्र तो पहने लिये हैं पर उनके मन में माया का मैला खाने की इच्छा प्रबल है।

अनेक संतों ने अपना अध्यात्मिकता के नाम पर अपना विशाल आर्थिक सम्राज्य खड़ा कर लिया है और वह संत कम एक पूंजीपति अधिक लगते हैं। उन्होंने अपने तमाम आश्रम बना लिये है जिनको एक तरह से फाईव स्टार होटल कहा जा सकता है। अनेक प्रकार के सामान बनाने के काम अपने हाथ में ले लिया है जिसमें दवाईयां, पेन, कैलेंडर, चाबी के छल्ले तथा पुस्तकें प्रकाशित करने का काम वह कर रहे हैं। उनक द्वारा उत्पादित वस्तुओं की धार्मिक भाव के कारण अधिक बिक्री होती है इसलिये सामान्य उत्पादक और व्यवसायियों का रोजगार इससे प्रभावित होता है। इससे उनके प्रति बहुत असंतोष है पर उनके भक्तों की विशाल संख्या को देखते हुए कोई सार्वजनिक रूप से कह नहीं पाता। ऐसे एक नहीं अनेक संत है। कभी कभी ऐसे संतों की आश्रमों पर कोई प्रतिकूल चर्चा होती है तो वह स्वयं प्रवक्ता बनकर सामने आते हैं जबकि उनके संस्थानों के बृहद स्वरूप को देखते हुए यह संभव नहीं है कि वह उनकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रख सकें। फिर भी वह सार्वजनिक रूप से आकर न अपने आश्रम और उसकी देखभाल करने वाले अपने अनुयायियों का बचाव करते हैं। वह इन प्रतिकूल चर्चाओं को धर्म पर हमला बताते हुए अपने भक्तों को इस तरह प्रेरित करते हैं जिससे वह उनके सम्मान की रक्षा के लिये हिंसक होने को भी तैयार हो जाता है।

कुछ दिनों पहले एक योगाचार्य की दवाईयां बनाने वाले कारखाने को लेकर सवाल उठे थे। वह योगाचार्य उन दिनों केवल उसके बारे में सफाई दे रहे थे। प्रतिदिन अध्यात्म और निंरकार की बातें करने वाले वह योगाचार्य अपने मायावी ढांचे (योग सिखाने के लिये विश्व का सबसे बड़ा केंद्र) की रक्षा के लिये उतर आये। उसी तरह एक संत द्वारा संचालित विद्यालय में दो छात्रों की संदिग्ध मौत से विवाद उठा। लोगों ने तमाम तरह के आक्षेप उनके विद्यालय प्रबंधन पर किये पर उन संत ने उनका बचाव किया। अपने आप में यह बात अजीब लगती है कि आखिर ऐसे संतों को इस मायावी दुनियां में ऐसे विवादों से क्या मतलब है। बच्चों की मौत अंततः कानून के दायरे में होनी है तो उसकी जांच उसी के अनुसार होना चाहिए। अपने आश्रम, विद्यालय और उसके प्रबंधन को उसका सामना करने के लिये छोड़ देना चाहिए। यह क्या भला कि आप स्वयं ही मैदान में आ रहे है। क्या भय लगता है कि उनका आर्थिक सम्राज्य ऐसे हमलों से कहीं न ढह जाये? ऐसे संतों को अपनी अध्यात्म शक्ति पर स्वयं ही यकीन नहीं है। उन्हें अपने भौतिक सम्राज्य की रक्षा के लिये स्वयं ही उतरते देख तो ऐसा ही लग रहा है। किसी ने उन पर आरोप नहीं लगाया पर वह ऐसे प्रदर्शित कर रहे थे कि जैसे उनको निशाना बनाया गया है। अपनी 14 साल की पुत्री की हत्या के आरोप से बरी एक डाक्टर से स्वयं की तुलना करना किसी संत को शोभा नहीं देता कि हम भी उसकी तरह ही निर्दोष होंगे। अपने ही व्यक्तित्व के आभामंडल की उनको अनुभूति नहीं है।

कल मैंने गुरू पूर्णिमा पर ही अपने लेख लिखे। एक में कबीर जी के दोहे पर व्याख्या की तो दूसरे में अच्छे गुरू न मिलने पर अर्जुन की बजाय एकलव्य जैसा शिष्य बनने का सुझाव दिया। तीसरे में में मैंने योग साधना सिखाने वालों को अध्यात्मिक गुरु न मानने का सुझाव दिया। नीले अक्षरों पर क्लिक कर आप उनको पढ़ सकते हैं। गुरु पूर्णिमा पर एक दिन देर से ही सही मेरी बधाई स्वीकार करें।
दीपक भारतदीप
लेखक एवं संपादक

मनु स्मृति: दंड का उचित उपयोग न करने वाला अपयश का भागी

१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं देता उसे जगत में बहुत अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक भोगता है.
२.सबसे पहले अपराध करने को समझाना चाहिऐ, जब उसका प्रभाव न पड़े तब उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दंड लगाना चाहिए, जब इसका भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दंड देना चाहिऐ. उसके बाद भी प्रभाव न पड़े तो चारों डंडों का प्रयोग करना चाहिए.