पुरालेख

चमन में अमन है-हिन्दी व्यंग्य कविता

दहशतगर्द घूम रहे आजाद
उनकी गोलियों से सभी तो नहीं मर गये
फिर भी जिंदा हैं ढेर सारे लोग
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

खेल के नाम पर चल रहा जुआ
जिनकी मर्जी है वही तो खेल रहे हैं
बाकी लोग तो बैठे हैं चैन से
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

कुछ नारियों की आबरु होती तार तार
बाकी तो संभाले हैं घरबार
इसलिये मान लो चमन में अमन हैं।

लुटेरों ने दौलत भेज दी परदेस
पर फिर भी भूखे लोग जिंदा हैं
इसलिये मान लो चमन में अमन है।

खरीद रखा है शैतानों ने उस हर शख्स को
जो भीड़ पर काबू रख सकता है
अगर उनको रोकने की कोशिश हुई
तो आ जायेगा भूचाल,
छोड़कर भाग जायेंगे तुम्हारे पहरेदार
छोड़कर तलवार और ढाल,
जलने लगेगा हर शहर,
गु्फा से निकले शैतानों का टूटेगा कहर
चलने तो उनका कारवां,
वही हैं यहां के बागवां,
बंद कर लो अपनी आखें,
शैतानो को रोकें ऐसी नहीं रही सलाखें,
उनका व्यापार चल रहा है
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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क्रिकेट खेल के साथ दूसरी बातें भी जुड़ी हैं-हिन्दी आलेख

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने! सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग अभी भी यह प्रयास कर रहे हैं कि उसके कुछ खिलाड़ियों को यहां बुलाकर पाकिस्तान के लोगों को खुश किया जाये। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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भारत के शिक्षित लोगों का बौद्धिक अंतर्द्वंद्व -आलेख

भारत का शिक्षित वर्ग हमेशा ही मानसिक द्वंद्व में फंसा दिखता है जो पश्चात्य सभ्यता के समर्थन और विरोध में उस समय अभिव्यक्त होता है जब कोई खास दिन हैं-जैसे वैलंटाईन डे, फ्रैंड्स डे और मदर फादर डे। दरअसल यह अंतद्वंद्व इसलिये दृष्टिगोचर होता है क्योंकि दो तरह के सस्कारों के साथ ही शिक्षित वर्ग बचपन से आगे बढ़ता है। एक तरफ उसको घर में अपने प्राचीनतम संस्कारों के साथ जीवन व्यतीत करना होता है पर अपने शैक्षणिक स्थानों में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान उसे पश्चात््य संस्कृति का सामना भी करना होता है। स्थिति यह है कि घर में शायद कोई नववर्ष न कहता हो पर वह बाहर जाकर अनेक लोगों के साथ उसकी औपचारिकता निभाता है। एक तरफ विदेशी तरफ संस्कृति का विरोध करने वाले दूसरी तरफ अपने बच्चों को किश्चियन कान्वेंट स्कूलों में भेजने को लालायित रहते हैं। क्या यह मूर्खतापूर्ण बात नहीं है कि एक तरफ आपने बच्चे को अंग्रेजी में दक्ष देखना चाहते हैं दूसरी तरफ आप उसकी संस्कृति से उसे परे देखना चाहते हैं। सच बात तो यह है भाषा का भाव से गहरा संबंध होता है और अगर आप यह चाहते हैं कि अंग्रेजी में बच्चा दक्ष हो और हिंदी में पैदल रह जाये तो फिर भारतीय सस्कृति में उसके रचे बचे होने की आशा नहीं करना चाहिये।
इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक गतिविधियों का आर्थिक आधारों से गहरा संबंध है। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था दो स्वरूपों में बंट चुकी है-एक परंपरागत और दूसरी आधुनिक। चाहे लाख विकास का दावा कर लिया जाये पर अभी भी हमारे देश के लोगों के रोजगार का आधार परंपरागत आधारों-कृषि,पशुपालन,लघु उद्योग तथा छोटे व्यवसाय-पर टिका है। हम जिस बेरोजगारी की बात करते हैं वह शिक्षित वर्ग में ही अधिक है। परंपरागत आधारों वाली अर्थव्यवस्था के अधिकांशतः स्त्रोत शहरों में बहुत छोटे हैं या उससे दूर हैं। इसके विपरीत आधुनिक आधारों वाले आर्थिक स्त्रोत- माल, कारखाने, बैंक, कंपनियां तथा अन्य कार्यालय-शहरों में स्थित हैंं और उनकी चमक दमक लोगों को आकर्षित करती हैं। इस आधुनिक अर्थव्यवसथा में नौकरी पेशा लोग अपनी हैसियत के अनुसार आधुनिक संस्कृति से जुड़कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं और उसे देखकर परंपरागवादी लोग अपनी चिंतायें कहीं शांति तो कहीं उग्रता से व्यक्त करते हैं। तमाम तरह के अखबार और टीवी चैनल-अब अंतर्जाल पर वेबसाईट और ब्लाग लेखक भी-इस पर क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहन देते हैं। इसमें कोई आपत्ति नजर नहीं आती पर ऐसे में रचनात्मकता का दायरा सिमट जाने से उन लोगों को कष्ट होता है जो व्यापक दृष्टिकोण रखने के साथ ही वास्तविकताओं को समझने वाले हैं। कहने के कहा जाता है कि यह नयी पीढ़ी का ढंग है पर वास्तविकता यह है कि उसका संबंध केवल आधुनिक व्यवस्था से जुड़े लोगों तक ही सीमित है जबकि परपंरागत अर्थव्यवस्था से जुड़ी पीढ़ी इस पाश्चात्य संस्कृति से अभी भी कोसों दूर है भले ही उसकी शिक्षा आधुनिक स्कूलों में हुई है।

एक मजेदार बात यह है कि हम कहते हैं कि बाजार अपने लाभ के लिये केवल पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार कर रहा है पर यह भी एक तरह का भ्रम है। असल बात यह है कि हमारे अंदर अपनी संस्कृति और संस्कार इस तरह बचपन में भर गये होते हैं कि हमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार तो दिखाई देता है पर अपनी सभ्यता का बाजारीकरण कभी नहीं दिखता। जैसे ही वैलंटाईन बीता वैसे ही अनेक प्रचार माध्यम बंसत के गुणगान पर उतर आये। अनेक बार राखी दिवाली और होली के अवसर पर क्या हमारे देश के प्रचार माध्यम कोई कसर नहीं उठाये रखते। फिर जब कोई खास अवसर नहीं है तब अनेक चमत्कारी स्थानों का वर्णन पढ़ने और देखने को मिलता है। ज्योतिष का कार्यक्रम तो सभी चैनल चलाते हैं और अखबारों में इस संबंध में स्तंभ हम लोग बरसों से ही देखते आ रहे है। हम अपने धर्म, संस्कार और संस्कृति के बाजारीकरण की अनुभूति इसलिये नहीं कर पाते क्योंकि हम उसकों नित्य देखने के आदी हो गये हैं। इसके विपरीत पश्चात्य संस्कृति के पर्व कभी कभार आते हैं। अब जैसे मदर डे और फदर डे की बात ही लें। हमारे यहां माता पिता का सम्मान प्रतिदिन किया जाने वाला व्यवहार है। इसके लिये किसी दिन की अनिवार्यता नहीं है। व्यक्ति निर्माण में गुरु, माता पिता और दादा दादी का बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। इतना ही नहीं व्यक्ति का निर्माण करने वाले सभी लोग सतत इसके लिये प्रयासरत रहते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति और संस्कारों के नष्ट होने की कल्पना करना व्यर्थ है। खासतौर से तब जब हमारा आर्थिक आधार अभी भी परंपरागत स्त्रोतों के इर्दगिर्द ही सिमटा हो। आप देखें कि चारों तरफ औद्योगिक मंदी का समय है पर हमारे परंपरागत स्त्रोत उससे परे दिखाई देते हैं। हालांकि औद्योगिक मंदी आने वाले समय में देश के लिये खतरनाक साबित होगी पर परंपरागत स्त्रोत अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम हैं और उनको कहीं से सहायता भी नहीं मिलने वाली है।

पिछले पंद्रह दिनों से पाश्चात्य सभ्यता को लेकर हुई बहस अब वैलंटाईन डे के बाद थम गयी है। यही कारण है कि अब बसंत, महाशिवरात्रि और होली पर चर्चायें शुरु हो गयी हैं। तय बात है कि इसके पीछे भी बाजार का उद्देश्य है। सच कहा जाये जिस बाजार पर हम अपनी सस्कृति को तहस नहस होने का आरोप लगाते हैं वही उसे बचाने के लिये भी आगे आता है। यह अर्थव्यवस्था और संस्कृति का खेल है जिसे समझने की जरूरत है।
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मधुशाला पसंद है पर मद्यपान नहीं -व्यंग्य

हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने उसे थोड़ा पढ़ा। कुछ लोगों ने जमकर पढ़ा। हमने उसके कुछ अंश एक साहित्यक पत्रिका में पढ़े थे। एक बार किताब हाथ लगी पर उसे पूरा नहीं पढ़ सके और लायब्रेरी में ं वापस जमा कर दी। मधुशाला के कुछ काव्यांश प्रसिद्ध हैं और देश की एकता के लिये उनका उपयेाग जमकर किया जाता है। उनका आशय यह है कि सर्वशक्तिमान के नाम पर बने सभी प्रकार के दरबार आपस में झगड़ा कराते हैं पर मधुशाला सभी को एक जैसा बना देती है। मधुशाला को लेकर उनका भाव संदेशात्मक ही था। एक तरह से कहा जाये तो उन्होने मधुशाला की आड़ में समाज को एकता का संदेश दिया था। हमने अभी तक उसके जितने भी काव्यांश देखे है उनमें मधुशाला पर लिखा गया है पर मद्यपान पर कुछ नहीं बताया गया। सीधी भाषा में कहा जाये तो मधुशाला तक ही उनका संदेश सीमित था पर मद्यपान में उसमें गुण दोषों का उल्लेख नहीं किया गया।
अब यह बताईये कि मधुशाला में मद्यपान नहीं होगा तो क्या अमृतपान होगा?बहुत समय तक लोग एकता के संदेशों में मधुशाला के काव्यांशों का उल्लेख करते हैं पर मद्यपान को लेकर आखें मींच लेते हैं। उनमें वह भी लोग हैं जो मद्यपान नहीं करते। नारों और वाद पर चलने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। मधुशाला पवित्र और एकता का संदेश देने वाली पर मद्यपान…………..यानि देश में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण। इससे आंखें बंद कर लो। चिंतन के दरवाजे मधुशाला से आगे नहीं जाते क्योंकि वहां से मद्यपान का मार्ग प्रारंभ होता है ं।

चलिये मधुशाला को जरा आज के संदर्भ में देख लें। बीयर बार और पब भी आजकल की नयी मधुशाला हैं। जब से यह शब्द प्रचलन में आये हैं तब से मधुशाला की कविताओं का प्रंचार भी कम हो गया है। पिछले दिनों हमने पब का अर्थ जानने का प्रयास किया पर अंग्रेजी डिक्शनरी में नहीं मिला। तब एक ऐसे सभ्य,संस्कृत और आधुनिक शैली जीवन के अभ्यस्त आदमी से इसका अर्थ पूछा तब उन्होंने बताया कि ‘आजकल की नयी प्रकार की कलारी भी कह सकते हो।’ कलारी से अधिक संस्कृत शब्द तो मधुशाला ही है। दरअसल आजकल कलारी शब्द देशी शराब के संबंध में ही प्रयोग किया जाता है। बहरहाल मधुशाला का अर्थ अगर मद्यपान का केंद्र हैं तो पब का भी आशय यही है।

स्व. हरिबंशराय बच्चन की मधुशाला में कई बातें लिखी गयी हैं जिनमें यह भी है कि मधुशाला एक ऐसी जगह है जहां पर जाकर हर जाति,वर्ण,वर्ग,भाषा,धर्म और क्षेत्र का आदमी हम प्याला बन जाता है। उन्होंने यह शायद कहीं नहीं लिखा कि वहां स्त्रियों और पुरुष भी ं एक समान हो जाते है। अगर वह अपने समय में भी ऐसी बातें लिखते तो उनका जमकर विरोध हो जाता क्योंकि उस समय स्त्रियों के वहां जाने का कोई प्रचलन नहीं होता। मधुशाला प्रगतिवादियों की मनपसंदीदा पुस्तक है मगर मुश्किल है कि मद्यपान से आदमी का मनमस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उस समय सारी नैतिकता और नारे एक जगह धरे रह जाते हैंं।

आजकल पब का जमाना है और उसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही जाने लगे हैं। मगर पब मेें ड्रिंक करने पर भी वहीं असर होता है जो कलारी में दारु और मधुशाला में मद्यपान करने से होता है। पहले लोग कलारियों के पास अपना घर बनाने ये किराये पर लेने से इंकार कर देते थे पर आजकल पबों और बारों के पास लेने में उनको कोई संकोच नहीं होता। मगर दारु तो दारु है झगड़े होंगे। पीने वाले करें न न पीने वाले उनसे करें। जिस तरह पबों का प्रचलन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे ‘आधुनिक रूप से’ फसाद होंगें। ऐसा ही कहीं झगड़ा हुआ वहां सर्वशक्तिमान के नाम पर बनी किसी सेना ने महिलाओं से बदतमीजी की। यह बुरी बात है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होना चाहिये पर जिस तरह देश के बुद्धिजीवी और लेखक इस घटना पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं वह गंभीरता की बजाय हास्य का भाव पैदा कर रहा है। हमने देखा कि इनमें कुछ बुद्धिजीवी और लेखक मधुशाला के प्रशंसक रहे हैं पर उनको मद्यपान के दोषों का ज्ञान नहीं है। पहले भी कलारियों पर झगड़े होते थे पर उनमें लोग वर्ण,जाति,भाषा और धर्म का भेद नहीं देखते थे-क्योंकि मधुशाला के संदेश का प्रभाव था और सभी झगड़ा करने वाले ‘हमप्याला’ थे। मगर अभी एक जगह झगड़ा हुआ उसमें पब में गयी महिलाओं से बदतमीजी की गयी। यह एक शर्मनाक घटना है और उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी की जा रही पर अब इस पर चल रही निरर्थक बहस में दो तरह के तर्क प्रस्तुत किया जा रहे हैं।

1.कथित प्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोग इसमें अपनी रीति नीति के अनुसार महिलाओं पर अनाचार का विरोध कर रहे हैं क्योंकि मधुशाला में स्त्रियों और पुरुषों के हमप्याला होने की बात नहीं लिखी।
2.गैरप्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी महिलाओं के शराब पीने पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ दोनों का हमप्याला होने पर आपत्ति उठा रहे हैं।
हम दोनों से सहमत नहीं हैं।

जहां तक घटना का सवाल है तो हमें यह जानकारी भी मिली है कि वहां कुछ पुरुषों के साथ बदतमीजी की गयी थी। इसलिये केवल महिलाओं के अधिकारों की बात करना केवल सतही विचार है। महिलाओं को शराब नहीं पीना चाहिये तो शायद इस देश के कई जातीय समुदायों के लोग सहमत नहीं होंगे क्योकि उनमें महिलायें भी मद्य का अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार सेवन करती हैं। किसी घटना पर इस तरह की सोच इस बात को दर्शाती हैं कि लोगों की सीमित दायरे में कुछ घटनाओं पर लिखने तक ही सीमित हो रहे हैं। मजे की बात यह है कि मधुशाला पढ़ने वाले हमप्यालों के एक होने पर तो सहमत हैं पर झगड़े होने पर तमाम तरह के पुराने भेद ढूंढ कर बहस करने लगते हैं। बहरहाल इस पर हमारी एक कुछ काव्य के रूप में पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

किसी भी घर का बालक हो या बाला
पियक्कड़ हो जाते जो पहुंचे मधुशाला
मत ढूंढों जाति,धर्म,भाषा,और लिंग का भेद
सभी को अमृतपान कराती मधुशाला
नशे में टूट गया, एक जो था गुलदस्ता
हर फूल को अपने से उसने अलग कर डाला
जो खुश होते थे देखकर रोज वह मंजर देखकर
करने लगे आर्तनाद,भूल गये वह थी मधुशाला
मद्यपान की जगह होगी जहां, वहां होंगे फसाद
नाम पब और बार हो या कहें अपनी मधुशाला
……………………………………………

आदमी हो या औरत पीने का मन
किसका नहीं करता
यारों, चंद शराब के कतरों की धारा में
संस्कृति नहीं बहा करती
आस्था और संस्कारों की इमारत
इतनी कमजोर नहीं होती
टूट सकती है शराब की बोतल से
जो संस्कृति वह बहुत दिन
जिंदा रहने की हक भी नहीं रखती
अपने इरादों पर कमजोर रहने वाला इंसान ही
यकीन को जिंदा रखने के लिये जंग की बात करता

……………………………………

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अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
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दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।

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दीपक भारतदीप

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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(hasya vyangya)

संत कबीरवाणीः शराब का बर्तन स्वर्ण का हो तो भी प्रशंसा नहीं पाता

ऊंचे कुल की जनमिया करनी ऊँच न होय
कनक कलश मद सों, भरा साधू निंदा सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में जन्म लेने से किसी के आचरण ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का घडा यदि मदिरा से भरा है तो साधू पुरुषों द्वारा उसकी निंदा की जाती है।
कोयला भी हो ऊजला जरि बरि ह्नै जोय
सेव कनक कलश मन सों, भरा साधू निंदा होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भली भांति आग में जलाकर कोयला भी सफ़ेद हो जाता है पर निबुद्धि मनुष्य कभी नहीं सुधर सकता जैसे ऊसर के खेत में बीज नहीं होते।

क्या प्रसिद्धि पाने का विचार बुरा है-इस पत्रिका का द्वितीय अंक

जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका संबंध लेखकों से होता है तो उसकी प्रतिक्रिया जन सामान्य में कम होने के बावजूद अधिक प्रतिध्वनित होती है। ऐसे विषयों पर चूंकि लेखक ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद उनमें वजन अधिक  होता और जन सामान्य तो स्वयं प्रभावित होने के बावजूद मुखर होकर  अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता इसलिये उसकी प्रतिध्वनि का सुनाई देती है।

कल मेरे द्वारा लिखे गये एक लेख-जो हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग को लेकर था-पर प्रतिक्रियायें आयीं वह ऐसे ब्लाग लेखकों की आयी जो वाकई गंभीर लेखक हैं और इसलिये मैंने अपने अंदर उनकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस की। ऐसी बहसें तो कई बरसों से चल रहीं हैं पर निष्कर्ष निकलना कठिन होता है पर इससे लिखने वाले अपनी भाषा पर नियंत्रण रखने का मन बनाते हैं इसलिये भाषा के मूल स्वभाव बने रहने की आशा पैदा होती है।
साहित्य में ऐसी बहसें भले ही निर्णायक न हों पर वह भाषा का स्तर बनाये रखने में सहायक होती हैं पर अन्य क्षेत्रों में ऐसी बहसें केवल मुद्दे बनाये रखने के लिये होती हैं और उनका कोई निष्कर्ष इसलिये नहीं निकाला जाता क्योकि बहस करने वालों की रुचि लोगों को उसमें उलझाकर अपने हित साधने होते हें। मेरा इसी सप्ताह लिखा गया एक लेख-जिसमें मैंने राजनीतिक विषयों पर लिखने के कारण बताये थे-फ्लाप हो गया। उसी तरह एक अन्य लेख-जो मैंने ऐसे ही भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों पर लिखा था -उसे भी अधिक समर्थन नहीं मिला। मुझे भी लग रहा है कि वह हिट होने लायक नहीं था।
मेरे एक मित्र श्री ललितमोहन त्रिवेदी ने ब्लाग लिखना शूरू किया। उस पर मैंने एक समीक्षा लिखी जिसे वाकई मैंने दिल से लिखा है।
वैसे इस सप्ताह कोई बहुत जोरदार हिट पाठ नहीं आया। पुराने हिट पर ही नाम चल रहा है और अमेरिका-भारत संबंधों पर लिखा गया एक लेख अभी तक लोगों को पढ़ता हुआ देख अच्छा लग रहा है वह आज भी प्रासंगिक है यही कारण है कि मैंने अभी तक इस पर कुछ नहंी लिखा।
इस बार दो व्यंग्य अच्छे लिखे पर वह भी फ्लाप रहे पर आगे पाठक उसे आम पाठक हिट बनायेंगे। एक तो था कीचड़ उछालने पर मिठाई मिलने पर, दूसरा था व्यंग्य को विज्ञापन की तरह सजाने का। इन दोनों को आगे पाठक हिट बनायेंगे इसमें कोई संशय नहीं है।
कुछ कवितायें लिखीं। इनमें कुछ संजीदा थीं तो कुछ हास्य से सराबोर। थोड़े बहुत हिट लेकर मैं संतुष्ट था। आखिर मुझ जैसे लेखक को इससे अधिक हिट मिल भी कहां सकते है।
कुल मिलाकर यह सप्ताह ठीक ठाक ही रहा। अब इस पत्रिका को बहुत गंभीरता से लिखने का विचार बना रहा हूं क्योंकि यहां अंतर्जाल पर मुझे कोई घास भी नहीं डाल रहा। लोग सम्मान तो देंगे नहीं, इसलिये मैंने महाकवि की उपाधि स्वयं ही धारण कर ली। इस पर लिखी कविता पर मेरे एक मित्र की टिप्पणी थी कि‘ अरे, नहीं आप अकेले नहीं। यह पदवी धारण करने वाले’। वह स्वयं भी इसमें शामिल हैं यह बात मुझे मालुम हैं पर स्वयं डरेंगे क्योंकि वह इस अंतर्जाल पर हिंदी के प्रसिद्ध ब्लाग लेखक बन चुके हैं पर हमें तो फोरमों पर अधिक लोग पढ़ते नहीं और आम पाठक कौन हमसे कहने वाला है कि आपने हमसे पूछ बगैर यह उपाधि क्यों धारण कर ली। बहुत समय तक लेखक के रूप में लिखते रहने के बाद मुझे प्रसिद्धि नहीं मिली तो हो सकता है कि संपादक  के रूप में मिल जाये। क्या प्रसिद्धि पाने का विचार कोई बुरा है? मेरे ख्याल से तो नहीं!
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अपनी कुछ कवितायें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं
दीपक भारतदीप

बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में
अपने दिल की तसल्ली के लिये
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते
सभी जानते हैं यह सच कि
अकेले ही चलना है सभी जगह
पर रिश्तों के साथ होने का
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते
कहें महाकवि दीपक बापू
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे
शख्स से दोस्ती
जिससे हमेशा दूर होते
वह तुम ही होते

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इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई
बड़ी नौकरी वाला साहब
छोटे काम वाले देखते रहते हैं
बस माशुका पाने का ख्वाब

वह दिन गये जब
बगीचों में आशिक और हसीना
चले जाते थे
अपने घर की छत पर ही
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट
पर ही चलता है इश्क का काम
कौन कहता है
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब
जाकर कौन देख सकता है
जब करने वाले ही नहीं देख पाते
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को
फंसा लेता है अपने जाल में
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर
मोहब्बत तो बस नाम है
नाम दिल का है
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और
होटल में खाने के बिल का है
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता
होते थे बदनाम
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब
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यूं तुम अपने लिये
कुछ भी मांग लिया करो
सिवाय प्यार के
क्योंकि यह मांगने की नहीं
अहसास कराने की शय है
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही
आंखों से जाहिर हो जाता है
जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें
झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले
सुरों की धारा से पता चल जाता
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो
जब तक दिल में है
प्यार को सलामत समझ लो
जो जुबां से निकला तो कभी कभी
वहां से भी बाहर हो जाता है
फिर लौटकर नहीं आता
अहसास भी बदन से निकल कर
बाहर बदहाल हो जाता है
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है
………………………………….
गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब तो उसकी परख के लिये
प्रतियोगितायें को अब वह
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन
उससे हमले कराये जाते
मद्धिम संगीत और गीत से
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते

कहें महाकवि दीपक बापू
‘अब गीत और संगीत
में लयताल कहां ढूंढे
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते
महफिलें तो बस नाम है
श्रोता तो वहां भाड़े के स