पुरालेख

घर का रोना-हास्य व्यंग्य कविता (ghar ka rona-vyangya kavita

छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

आचरण निजी मामला है-हास्य व्यंग्य

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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नए टीवी लाने की गलती नहीं करना-हास्य कविता

एक सज्जन ने दूसरे से कहा
‘‘यार, क्या तुम्हारे घर में ळाह सास बहु का
रोज होता है झगड़ा
हमारे यहां तो रोज का है लफड़ा
पहले जब सास बहु पर आते थे
सामाजिक धारावाहिक
तब भी जमकर होता गाली गलौच के साथ घमासान
अब आने लगा है कामेडी धारावाहिक
तो भी मजाक ही मजाक में तानेबाजी से
मच जाती है जोरदार जंग
मेरा और पिताजी का मन होता है इससे तंग
इतने सारे टीवी चैनल
बने गये हैं हमारे घर के लिये लफड़ा’’

दूसरे सज्जन ने कहा-
‘‘नहीं मेरे यहां ऐसी समस्या नहीं आती
दोनों के कमरे में अलग अलग टीवी है
पर वह अपनी पसंद के कार्यक्रम भी
भी भला दोनों कब देख पाती
मेरी बेटी अपनी मां से लड़कर
सारा दिन कार्टून फिल्म देखती
बेटा उधम मचाकर मेरी मां से
रिमोट छीनकर देखता है फिल्म
सास बहु दिन भर बच्चों से
जूझते हुए थक जाती
बच्चों की झाड़ फूंक न करूं
इसलिये मुझे भी नहीं बताती
पर कभी कभी दो नये टीवी
घर में लाने की मांग जरूर उठाती
मेरे पिताजी कहते हैं मुझसे
कभी ऐसी गलती नहीं करना
नये टीवी आये घर में तो
अपने गले का फंदा बन जायेगा
इन दोनों सास बहू का लफड़ा’’
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कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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इधर से उधर-हास्य कविता

अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट लिखते-लिखते
दोनों के दिल मिल गए अपने आप
दोनों युवा थे और कविता लिखने के शौकीन भी
होना था मिलन कभी न कभी
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता
अपना लिखना भूल गया
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता
और खुश होता अपने ही आप

एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘ कुछ और रचनाएं भी लिखा करो
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे
‘केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर’कहलाओगे
इससे होगा मुझे भारी संताप

प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर
वह लिखने में जुट गया
हो गया मशहूर सब जगह
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का
उसके दिल में था घाव
बदला लेने को था बेताब
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर
लगाना शुरू किया कमेन्ट
एक अपने और आठ छद्म नाम से
उसके ब्लोग को हिट कराता
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा
उसको हर बार भेंट
प्रेमिका का दिल भी गया पलट
दूसरे में गया दिल गया भटक
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप

उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर
उसे सब समझ में आया
मन में हुआ भारी संताप
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश
‘यह क्या कर रही हो
मुझे लिखने में उलझाकर
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम
अंतर नही समाज रही
धोखा खाओगी अपने आप’

प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी
तुम्हारी रचना दर्द बाँटती हैं
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया
तुम अपना दिल कहीं और लगाना
मत देना अपने को विरह का संताप
सब ठीक हो जायेगा अपने आप

नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

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अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
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दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।

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दीपक भारतदीप

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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(hasya vyangya)

यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता

चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना
भला कौनसी अक्लमंदी है
सब कुछ करते हैं हम
अपने नाम के लिए
लेते हैं इसका और उसका नाम
हम करतार नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी हर पर अपना काम
लिखा हो यही मानते हैं
आजाद लगती हैं अक्ल
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को
निभाने के लिए समाज की बंदी है

हम छोड़ आये अंतर्जाल की वह गलियाँ-हास्य आलेख

जब मैंने शुरू में अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तब पता नहीं था की ब्लोग क्या होता है पर इस पर हमारे लिखे को दूसरे भी पढ़ सकते हैं यह सोचकर मैंने इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि हम जिन अंतर्जाल पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेज रहे थे वह अपने अंकों में हमेशा ही स्थान नहीं दे सकतीं थी, और फिर हम कुछ ऐसे सम-सामायिक विषयों पर लिखते हैं जिन्हें साहित्य तो माना ही नहीं जा सकता. इसलिए अपने इसी ब्लोग पर भी नियमित रूप से लिखना शुरू किया. इन सब ब्लोग को एक जगह दिखाने के लिए फोरम बना हुआ था नारद.

हम नारद को अंतर्जाल की पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ पर लिंक देखते थे. इसमें कई लोगों के ब्लोग थे पर हम यह समझे थे कि इनको कोई स्तंभ दिया गया है. तब हमने इसके लिए अपना एक व्यंग्य भेजा. इधर हम ब्लोग स्पॉट और वर्डप्रेस पर भी पता नहीं कैसे जुट गए. पता नहीं हमारी नजर ब्लोग स्पॉट काम के ब्लोग पर पड़ गयी. उसका लेखक कोई मुस्लिम ही था. इस्लाम मजहब के प्रवर्तक हजरत पैगंबर के कार्टून को लेकर जब प्रदर्शन हो रहे थे तब उस संबंध में उस मुस्लिम लेखक ने व्यंग्य लिखा था कि किस तरह इसके लिए भीड़ जुटाई जा रही थी. उसके लेखन में शब्दों की बहुत त्रुटियाँ थीं पर कथ्य इतना दमदार लगा कि हमने सोचा कि यह अपनी अभिव्यक्ति का एक बहुत बढिया साधन है. हमने ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये. उसमें लगभग एक माह लग गया. ब्लोग बना तो समझ में आया कि नारद पर उसे फोरम पर दिखाना जरूरी है-तभी पाठक मिल पायेंगे. हमें इसके लिए प्रयास शुरू किये. हमारा ब्लोग सादा हिन्दी फॉण्ट में था और दूसरे लोग इसे यूनीकोड में लिख रहे थे. दूसरी समस्या यह थी कि हमें तो ब्लोग का पता लिखना ही नहीं आता था. इसी अफरातफरी में हम पता नहीं क्या करते थे कि दूसरों को परेशानी होने लगी. नारद ने हमारा ईमेल बैन करने की धमकी दी. हम चुप कर अपना ब्लोग लिखने लगे. इसी बीच कोई एक महिला की नजर में हमारा ब्लोग आया. उसने बताया कि हमारा लिखा उसकी पढाई में नहीं आ रहा है. तब हमने सोचा कि मजाक कर रही होगी. इसी बीच हमारा ब्लागस्पाट के हिन्दी टूल पर पर नजर पड़ गयी पर उससे हम अपने लेख का पहला पैर लिखते थे ताकि वर्डप्रेस के डैशबोर्ड पर लोगों को पढाई आये. लोगों की नजर पड़ती तो वह उसे खोलते और फिर कहते थे कि बाकी तो कूडा ही दिखाई दे रहा है.तब हमने ब्लागस्पाट कॉम के ही हिन्दी टूल से कवितायेँ लिखकर वर्डप्रेस पर रखने लगे. पहली ही कविता पर ही हमें कमेन्ट मिला. तब तो फिर धीरे-धीर हम यूनीकोड में ही लिखने लगे. इतना लिख गए कि लोग आये कि आप इसे नारद पर पंजीकृत क्यों नहीं करा रहे. तब हमें ईमेल किया और नारद पर एक नहीं तीन ब्लोग पंजीकृत कराये.

इस तरह हम लेखक से ब्लोगर बन गए. शुरूआत में हमें लगा कि शायद यह अभिव्यक्ति का ही भाग है पर बाद में यह साफ समझ में आ गया कि कुछ उत्साही लोगों का समूह है जो इस तरह की चौपाल बनाकर हिन्दी के ब्लोगरों को एकत्रित कर रहा है. हमनें लिखना शुरू किया तो मजा आने लगा. पंजीकरण के १० माह तक निर्बाध रूप से लिखते रहे. वहाँ दरअसल बहुत सारी चीजें हमारे स्वभाव के विपरीत थी पर हम सोचते थे हमें क्या? लोगों का प्यार मिलता रहा तो लिखते चले जा रहे थे. कई बार सोचा कि छोड़ जाएं पर फिर सोचा कि यार इतना सारा प्यार करने वाले लोगों को किस कारण से छोडें. क्या बताएं?फिर सोच रहे थे कि धीरे-धीरे लिखना कम करते चले जाएं पर वह भी नहीं हो रहा था. इससे हमारा रचनात्मक लेखन प्रभावित हो रहा था.

आखिर वह अवसर आया और हमने पतली गली से निकलने का विचार बनाया. इस तरह कि कोई मित्र फिर हमें यह कहने नहीं आये कि तुमने लिखना बंद कर दिया है. वह जगह छोड़ने का कारण यह था कि हमें वहाँ से आगे के लिए कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. ऐसा लगा रहा है कि हम रुक गए हैं. के तरह भीड़ में बैठकर लिख रहे हैं जो कि संभव नहीं है. अब होना यह है कि हमारे लिखे को पाठक एकदम नहीं मिलेंगे पर मिलेंगे जरूर. हालांकि आम पाठक इस पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते पर हम भी क्या करते? वहाँ हमें कोई गंभीरता से पढ़ने वाला नहीं था और इस चक्कर में हमारा ध्यान अपने पाठको से हट रहा था. (क्रमश:)

नकली खोये की मिठाई, हो गयी प्यार से जुदाई-हास्य व्यंग्य

वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रेम का इजहार करता था और कहता”-आई लव यू।
”कभी कहता-”मेरे प्रपोजल का उत्तर क्यों नहीं देती।’
वह चली जाती और वह देखता रह जाता था। आखिर एक दिन उसने कहा कहा-”मुझे ना कर दो, कम से कम अपना वक्त खराब तो नहीं करूं।”
वह लडकी आगे बढ़ गयी और फिर पीछे लौटी-”तुम्हारे पास प्यार लायक पैसा है।”
वह बोला-”हाँ, गिफ्ट में मोबाइल, कान की बाली और दो ड्रेस तो आज ही दिलवा सकता हूँ।”
लड़की ने पूछा-”तुम्हारे पास गाडी है।”
लड़के न कहा-”हाँ मेरे पास अपनी मोटर साइकिल है, वैसे मेरी मम्मी और पापा के पास अलग-अलग कार हैं। मम्मी की कार मैं ला सकता हूँ।”
लड़की ने पूछा-“तुम्हारे पास अक्ल है?”
लड़के ने कहा-”हाँ बहुत है, तभी तो इतने दिन से तुम्हारे साथ प्रेम प्रसंग चलाने का प्रयास कर रहा हूँ। और चाहो तुम आजमा लो।”
लड़की ने कहा-”ठीक है। धन तेरस को बाजार में घूमेंगे, तब पता लगेगा की तुम्हें खरीददारी की अक्ल है कि नहीं। हालांकि तुम्हें थोडा धन का त्रास झेलना पडेगा, और बात नहीं भी बन सकती है।”
लड़का खुश हो गया और बोला-”ठीक, आजमा लेना।धन तेरस को दोनों खूब बाजार में घूमें। लड़के ने गिफ्ट में उसे मोबाइल,कान की बाली और ड्रेस दिलवाई। जब वह घर जाने लगी तो उसने पूछा-”क्या ख्याल है मेरे बारे में?”
लड़की ने कहा-”अभी पूरी तरह तय नहीं कर पायी। अब तुम दिवाली को घर आना और मेरी माँ से मिलना तब सोचेंगे। वहाँ कुछ और लोग भी आने वाले हैं।”
लड़का खुश होता हुआ चला गया। दीपावली के दिन वह बाजार से महंगी खोवे की मिठाई का डिब्बा लेकर उसके घर पहुंचा। वहाँ और भी दो लड़के बैठे थे। लड़की ने उसका स्वागत किया और बोली-”आओ मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रही थी, आओ बैठो।”
लड़का दूसरे प्रतिद्वंदियों को देखकर घबडा गया था और बोला -”नहीं मैं जल्दी में हूँ। मेरी यह मिठाई लो और खाओ तो मेरे दिल को तसल्ली हो जाये।”
लड़की ने कहा-”पहले मैं चेक करूंगी की मिठाई असली खोये की की या नकली की। यह दो और भी लड़के बैठे हैं इनकी भी मिठाई चेक कर करनी है। यही तुम्हारे अक्ल की परीक्षा होगी। ”
लड़के ने कहा-”असली खोवे की है, उसमे बादाम और काजू भी हैं। ”
लडकी ने आँखें नाचते और उसकी मिठाई की पेटी खोलते हुए पूछा-”खोवा तुम्हारे घर पर बनता है।”
लड़का सीना तान कर बोला-”नहीं, पर मुझे पहचान है।”
लडकी ने मिठाई का टुकडा मुहँ पर रखा और फिर उसे थूक दिया और चिल्लाने लगी-”यह नकली खोवे की है।”
लड़का घबडा गया और बोला-”पर मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।”
लडकी ने कहा-‘तभी यह नकली खोवे की मिठाई लाये हो। तुम फेल हो गए। अब तुम जाओ इन दो परीक्षार्थियों की भी परीक्षा लेनी है।”
लड़का अपना मुहँ लेकर लौट आया और बाहर खडा रहा। बाद में एक-एक कर दोनों प्रतिद्वंद्वी भी ऐसे ही मुहँ लटका कर लौट आये। तीनों एक स्वर में चिल्लाए-”इससे तो मिठाई की जगह कुछ और लाते, कम से कम जुदाई का गम तो नहीं पाते।”
हालांकि तीनों को मन ही मन में इस बात की तसल्ली थी की उनमें से कोई भी पास नहीं हुआ था।
नोट- यह एक काल्पनिक व्यंग्य है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा।

आकाश में धरती:फिर स्वर्ग और नरक कहॉ है?

वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर अगर गम्भीरता से विचार करें तो अविश्वास का कोई कारण मुझे तो नज़र नहीं आता । अमेरिकी वैज्ञानिकों की खोज पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी और शायद वही हैं जो आज भी अपने देश का सिर पूरे विश्व में उठाएँ हुए हैं। जब मैं आकाश की तरफ देखता था तो मुझे यह विश्वास होता था कि कहीं न कहीं आकाश में जीवन जरूर होगा, इसके पीछ तर्क थोडा हल्की तरह का अवश्य देता था पर किसी आदमी को समझाने के लिए वह ठीक ही है। वह यह कि हमारे पास एक से ज्यादा स्थानों पर जमीन होती है तो क्या हम उसको निरुप्योगी छोड़ देते हैं , एक जगह मकान में रहते हैं और दूसरी जगह पलट मिल जाये तो या तो उसे बेचे देते हैं या उस पर मकान बनवाकर उसे किराए पर उठा देते हैं, तो जिस परमात्मा ने यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड रचा है क्या वह इस धरती पर जीवन को स्थापित कर बाकी जगह खाली छोड़ सकता है। हमारे लिए जो सौरमंडल है उसमे किसी पर जीवन होगा इसमें मुझे संदेह रहता है, कारण ? मैं धरती को एक बड़ी इमारत की तरह मानता जिसमे खिड़की, रौश्नादन और पानी की टंकी तथा अन्य सुरक्षा कवच की तरह अनेक ग्रह और उपग्रह स्थापित हैं । हाँ, इसकी छतें दिन और रात में बदलती हैं-दिन में सूर्य अपने तेज से और रात को चंद्रमा अपनी शीतलता से जीवन का संचालन करते हैं । जब मैंने आकाश पर धरती के अस्तित्व की खबर देखी, सुनीं और पढी तो एक रोमांच का अनुभव किया क्योंकि बचपन से आकाश की तरफ देखते हुए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह विचार जरूर आता है कि वहां भी ऐसा ही जीवन होगा। दुनियां में कोई भी ऐसा वृतांत सुनाने को नहीं मिलता कि आकाश में कोई जीवन है। हाँ, देवताओं के आकाश में विचारने की पुष्टि होती है और फिर इन्सान के लिए स्वर्ग-नरक या कहें जन्नत-जहन्नुम जैसे कल्पित स्थान आकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर ही गडे गए हैं ताकी आदमी आकाश के बारे में ज्यादा सोचे नहीं- क्योंकि वह अगर आकाश के बारे में सोचेगा तो उसे तथाकथित बुध्दिजीवियों के भ्रमजाल में फंसने का समय ही कहाँ मिलेगा। हमारे धर्म ग्रंथों में आकाश वानियाँ होने तथा देवताओं के धरती पर आने की घटनाओं का वर्णन तो मिलता है पर हमारे जैसा खिन और भी जीवन है ऎसी कोई जानकारी मेरे नजरों के सामने नही आयी है । विश्व के अनेक किताबों में आकाश से प्रथ्वी का जिक्र मिलता है और वहां से धरती पर विमान आने और लोगों के उतरने की अनेक घटनाएँ हैं पर जैसा जीवन यहां है ऐसा कहीं और भी है ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बहरहाल मेरे हिसाब से यह सबसे नवीनतम खोज है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जहाँ तक जीवन के मूल तत्वों का प्रशन है भारतीय दर्शन और पशिचम के विज्ञान में कोई अंतर नहीं है। जीवन के लिए जलवायु का होना जरूरी है और जिस धरती की खोज की गयी है उस पर वैसी ही जलवायु है जैसी यहां पायी जाती है।यह संभावना कम ही है कि उस धरती के लोगों से कोई हमारा जल्दी संपर्क होने वाला है। अगर हो सकता है तो तभी जब वहां हमसे ज्यादा प्र्गातिवान लोग हौं , क्योंकि हमारी वैज्ञानिक क्षमता अभी उन तक अपना संदेश पहुंचाने की नहीं है। पर एक बात जो कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है यह कि अगर उस धरती के लोगों से संपर्क हो गया तो यहां ऐसे कईं भ्रम और विचारधाराएँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी जो बरसों से पीढी -दर-पीढी हमारे मस्तिष्क पर स्थापित रही हैं और उनकी आड़ में तमाम लोग अपने परिवार के लिए राज्यीय, आर्थिक, और धार्मिक सत्ता जुटाते रहे हैं। एक अनजाने भय जो कहीं आकाश में स्थित नहीं है उसका भय दिखाकर सामान्य आदमी को दिखाकर उसका सामाजिक, आर्थिक, बौध्दिक और राजनीतिक शौषण किया जाता रहा है और ऐसा करने वाले आकाश से ही अपनी शक्ति प्राप्त करने का दावा करते हैं। जब आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि आकाश में भी हमारे जैसे गरीब और बीमार लोग रहेते हैं वह स्वर्ग और नरक के अतार्किक सपनों और दुसप्नों से मुक्त हो जाएगा। अभी तक उसे यह बताया जाता है कि आकाश में स्वर्ग है जहां तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं फ्री में मिल जाती हैं अगर वह अपने तथाकथित पथप्रदर्शक की बात मान ले तो! अगर नहीं मानेगा तो उसे नरक का भय दिखाया जाता है। अगर यह संपर्क हो गया तो सभी धर्मों के कर्म कांडों -जो स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी देते हैं-पर पलीता लग जाएगा। क्योंकि आदमी अपने पथ प्रदर्शकों से पूछेगा के आकाश में भी धरती है तो यह स्वर्ग और नरक कहॉ है?यकीनन वह इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और उनके द्वारा बरसों से बुना गया भ्रमजाल टूट जाएगा ।