पुरालेख

शब्दों पर नियंत्रण-हिन्दी व्यंग्य (control of word-hindi satire

एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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नए अवतार का जाल-हास्य व्यंग्य कविता (naye avtar ka jaal-hindi hasya kavita

फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’

सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।

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रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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जिंदादिल-हिंदी शायरी (jindadil-hindi shayri)

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

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रात के पिटे पैदल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

गुजु उस्ताद सुबह ही दिख गया। पहले हम उसके मोहल्ले में रहते थे अब कालोनी में मकान बना लिया सो उससे दूर हो गये, मगर हमारे काम पर जाने का रास्ता उसी मोहल्ले से जाता है। गुजु उस्ताद को भी हमारी तरह क्रिकेट देखने का शौक था पर इधर क्रिकेट मैचों पर फिक्सिंग वगैरह के आरोप लगे तो हम इससे विरक्त हो गये पर गुजु उस्ताद का शौक लगातार बना रहा।
हम रास्ते पर खड़ा देखकर कई बार उसे नमस्कार कर निकलते तो कई बार वही कर लेता। कई बार दोनों ही एक दूसरे को देखकर मूंह फेर लेते हैं। हां, क्रिकेट मैच के दिन हम अगर जरूरी समझते हैं तो रुक कर उससे बात कर लेते हैं। आज भी रुके।
वह देखते हुए बोला-‘हां, मुझे पता है कल भारत हार गया है और तुम जरूर जले पर नमक छिड़कने का काम करोगे। देशभक्ति नाम की चीज तो अब तुम में बची कहां है?’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो? हम तुम्हें पहले भी बता चुके हैं क्रिकेट खेल में हमारी देशभक्ति को बिल्कुल नहीं आजमाना। हां, यह बताओ कल हुआ क्या?’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘तुमने मैच तो जरूर देखा होगा। चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये। आंखें कितनी बूढ़ी हो जायें सुंदरी देख कर वही नजरें टिकाने से बाज नहीं आती।’
हमने कहा-‘नहीं मैच तो हम देख रहे थे। पहले लगा कि भारतीय टीम है पर जब तीसरा विकेट गिरा तो ध्यान आया कि यह तो बीसीसीआई की टीम है। अब काहे की देशभक्ति दिखा रहे हो? इस तरह मूंह लटका घूम रहे हो जैसे कि तुम्हारा माल असाबब लुट गया है। क्या यह पहला मौका है कि बीसीसीआई की टीम हारी है?’
गुजु उस्ताद-‘यार, पिछली बार बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपनी टीम विश्व विजेता बनी थी और अब उसकी यह गत! देखते हुए दुःख होता है।’
हमने चैंकते हुए कहा-‘अपनी टीम! इससे तुम्हारा क्या आशय है? अरे, भई अपना राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। यह तो बीसीसीआई यानि इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम है। हार गयी तो हार गयी।’
गुजु उस्ताद-‘काहे को दिल को तसल्ली दे रहे हो कि हाकी राष्ट्रीय खेल है। हमें पता है तुम कभी हाकी खेलते थे पर साथ ही यह भी कि तुम ही लंबे समय तक क्रिकेट खेल देखते रहे। 1983 में विश्व कप जीतने पर तुमने ही अखबार में इसी भारतीय टीम की तारीफ में लेख लिखे थे। बोलो तो कटिंग लाकर दिखा दूं। हां, कुछ झूठे लोगों ने इस खेल को बदनाम किया तो तुम बरसाती मेंढक की तरह भाग गये। मगर यह क्रिकेट खेल इस देश का धर्म है। हां, इसमें तुम जैसे हाकी धर्म वाले अल्पसंख्यक जरूर हैं जो मजा लेने के लिये घुस आये और फिर बदनाम होता देखकर भाग खड़े हुए।’
हमने कहा-‘यह किसने कहा क्रिकेट इस देश का धर्म है?’
गुजु उस्ताद ने हमसे कहा-‘क्या टीवी देखते हो या नहीं। एफ. एम. रेडियो सुनते हो कि नहीं? सभी यही कह रहे हैं।
हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि कल हमने बीसीसीआई टीम का तीसरा विकेट गिरते ही मैच बंद कर दिया। सोचा सुबह अखबार में परिणाम का समाचार देख लेंगे। मगर आजकल थोड़ी पूजा वगैरह कर रहे हैं इसलिये सोचा कि क्यों सुबह खराब करें। अगर बीसीसीआई की टीम हार गयी तो दुःख तो होगा क्योंकि यह देश से भाग लेने वाली अकेली टीम थी। पिछली प्रतियोगिता में तो अपने देश से चार पांच टीमें थी जिसमें भारत के खिलाड़ी भी शामिल थे तब देखने का मन नहीं कर रहा था। इस बार पता नहीं क्यों एक ही टीम उतारी।’
गुजु उस्ताद-‘महाराज, यह विश्व कप है इसमें एक ही टीम जाती है। यह कोई क्लब वाले मैच नहीं है। लगता है कि क्रिकेट को लेकर तुम्हारे अंदर स्मृति दोष हो गया है। फिर काहे दोबारा क्रिकेट मैच देखना काहे शुरु किया। लगता है तुम विधर्मी लोगों की नजर टीम को लग गयी।’
हमने कहा-‘वह कल टीवी में एक एंकर चिल्ला रही थी ‘युवराज ने लगाये थे पिछली बार छह छक्के और आज उस बालर को नींद नहीं आयी होगी‘। हमने यह देखना चाहा कि वह बालर कहीं उनींदी आंखों से बाल तो नहीं कर रहा है पर वह तो जमकर सोया हुआ लग रहा था। गजब की बालिंग कर रहा था। फिर युवराज नहीं आया तो हमने सोचा कि शायद टीम में नहीं होगा। इसलिये फिर सो गये। चलो ठीक है!’
गुजु उस्ताद ने घूर कर पूछा-‘क्या ठीक है। टीम का हारना?’
हमने कहा-‘नहीं यार, सुना ही बीसीसीआई की टीम अब प्रतियोगिता से बाहर हो गये इसलिये अब नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। कल भी बारह बजे सोया था। आज देर से जागा हूं। वैसे तुम ज्यादा नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र भी बहुत हो चली है। यह क्रिकेट तो ऐसा ही खेल है। कुछ नाम वाला तो कुछ बदनाम है।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘देखो! अब आगे मत बोलना। मुझसे सहानुभूति जताने के लिये रुके हो?मुझे पता है कि बाहर से क्रिकेट का धर्म निभाते नजर आते हो पर अंदर तो तुम अपनी हाकी की गाते है। अगर कोई शुद्ध क्रिकेट खेलने वाला होता तो उसे बताता मगर तो तुम हाकी वाले और कुछ कह दिया तो हाल ही कहोगे कि ‘हम हाकी खेलने वाले अल्पसंख्यक हैं इसलिये क्रिकेट वाले हम पर रुतबा जमाते हैं।’
हमने कहा-‘यार, सभी खेल धर्म तो एक ही जैसे है। सभी खेल स्वास्थ्य और मन के लिये बहुत अच्छे हैं। हम तो खेल निरपेक्ष हैं। आजकल तो शतरंज भी खेल लेते हैं।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात नहीं मानता। मुझे याद है जब क्रिकेट की बात मेरा तुम्हारा झगड़ा हुआ था तब मैं तुम्हें मारने के लिये बैट लाया तो तुम हाकी ले आये। इसलिये यह तो कहना ही नहीं कि क्रिकेट से तुम्हारा लगाव है।’
हमने सोचा गुजु उस्ताद बहुत अधिक अप्रसन्न होकर बोल रहे थे। तब हमने विषयांतर करते हुए कहा-‘पर अपनी टीम तो बहुत अच्छी है। हारी कैसे?’
गुजु उस्ताद बोले-‘तुम जाओ महाराज, हमने रात खराब की है और तुम दिन मत खराब करो। अभी तो नींद से उठे हैं और फिर हाकी धर्म वाले की शक्ल देख ली।’
हमने चुपचाप निकलने में वहां से खैर समझी। हमने सोचा रात के यह पिटे हुए पैदल कहीं चलते चलते वजीर जैसे आक्रामक बन गये तो फिर झगड़ा हो जायेगा। सच बात तो यह है कि गुजु उस्ताद ही वह शख्स हैं जिन पर हम क्रिकेट से जुड़ी कटोक्तियां कह जाते हैं बाकी के सामने तो मुश्किल ही होता है। लोग गुस्सा होने पर देशभक्ति का मामला बीच में ले आते हैं। हालांकि यह सब बाजार का ही कमाल है जो क्ल्ब के मैचों के वक्त देशभक्ति की बात को भुलवा कर बड़े शहरों के नाम पर भावनायें भड़काते हुए अपना माल बेचता है तो विश्व कप हो तो देश के नाम पर भी यही करता है। मगर भावनायें तो भावनायें हैं। हम ठहरे हाकी वाले-जहां तक देश का सवाल है तो उसमें भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है फिर काहे झगड़ा लेते फिरें।
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ईमानदारी पर सम्मेलन -हास्य व्यंग्य

दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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पिंजर से बाहर झांकता ज्ञान-आलेख चिंत्तन

उनके चेहरे पर बटन की तरह टंगी आंखें कपड़े और किताबों के पिंजर से बाहर झांकती दिखती है। ऐसा लगता है कि चिड़ियाघर के पिंजड़े में कोई इंसानी बुत ऐसे ही सजाये गये हैं जिनके आगे कपड़े के एक ही रंग और किसी किताब की लिखी लाईने लोहे के दरवाजे की तरह ऐसे ही लगी हों जैसे पिंजड़े के बाहर लगी होती हैं जहां से वह कभी निकल ही नहीं सकते। बस उससे बाहर झांकते हैं कि कोई पर्यटक आये तो वह उनकी तरफ देखे और वह अपनी अदाओं से उसे प्रभावित करें।
दुनियां में हर मनुष्य एक ही तरह से पैदा होता है पर जीवन यापन का सबका अपना अलग तरीका होता है। देखा जाये तो जीवन एक शब्द है जिसमें विविध रंगों, स्वादों और विचारों की धारा बहती है। यह धारा उसके मन रूपी हिमालय से बहती है जो इंसान को बहाती हुई ले जाती है। अधिकतर इंसान इस धारा में बहते हुए जाते हैं और उनकी कोई अपनी कामना नहीं होती। मगर कुछ लोग ऐसे हैं जो इस मानव रूपी मन की धारा के उद्गम स्थल पर बैठकर उसका बहाव अपनी ओर करना चाहते हैं ताकि उसका स्वामी मनुष्य बहकर उनकी तरफ आये ताकि वह उस पर शासन कर सकें। तय बात है कि एक इंसान वह है जो अपनी एकलधारा में आजादी से बहता हुआ चलता है और एक दूसरा है जो चाहता है कि अनेक इंसान उसकी तरफ बहकर आयें ताकि वह शासक या विद्वान कहला सके।
सर्वशक्तिमान के अनेक रूप और रंग हैं पर उसके किसी एक रूप और रंग को पकड़ कर ऐसे लोग वह पिंजड़ा बना लेते हैं जिसमें वह दूसरों को फंसाने के लिये घूमते हैं। उनको लगता है कि वह आदमी को अपने रंग और किताब के पिंजड़े में कैद कर लेंगे पर सच यह है कि वह स्वयं भी उसकी कैद में रहते हैं।
सर्वशक्तिमान के कितने रंग और रूप हैं कोई नहीं जानता पर फिर भी ऐसे लोगों ने अभी तक दस बीस की कल्पना को प्रसिद्ध तो कर ही दिया है। लाल, पीला, नीला, सफेद, काला, हरा, पीला और पता नहीं कितने रंग हैं। हरे रंग मेें भी बहुत सारे रंग हैं पर अक्ल और ताकत की ख्वाहिश रखने वाले कोई एक रंग सर्वशक्तिमान की पहचान बताते हैं। सभी की किताबेें हैं जिसमें हर शब्द और लकीर सर्वशक्तिमान के मूंह से निकली प्रचारित की जाती है। अपने तयशुदा रंग के कपड़े रोज पहनते हैं और वह किताब अपने हाथ में पकड़ कर उसे पढ़ते हुए दुसरों को सुनाते हैं। राजा हो या प्रजा उनके दरवाजे पर आकर सलाम ठोकते है। राजा इसलिये आता है क्योंकि प्रजा वहां आती है और उसे निंयत्रित करने के लिये ऐसे सिद्ध, पीर, फकीर, साधु, संत-इसके अलावा कोई दूसरा शब्द जो सर्वशक्तिमान से किसी की करीबी दिखाता हो-बहुत काम आते हैं। प्रजा इसलिये इनके पिंजर में आती है क्योंकि राजा आता है और पता नहीं कब उससे काम पड़ जाये और यह पिंजर में बंद अजूबा उसमें सहायक बने।
यह अजूबे कभी अपने पिंजर ने बाहर नहीं आते। जिस रंग के कपड़े पहन लिये तो फिर दूसरा नहीं पहन सकते। जिस किताब को पकड़ लिया उसकी लकीर में ही हर नजीर ढूंढते और फिर बताते हैं। वह किताब अपने लिये नहीं दूसरे को मार्ग बताने के लिये पढ़ते हैं। खुद पिंजडे में बंद हैं पर दूसरे को मार्ग बताते हैं। दाढ़ी बढ़ा ली। कुछ मनोविशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ी दाढ़ी वैसे भी दूसरे पर प्रभाव छोड़ती है-अर्थात आप ज्ञानी या दानी न भी हों तो उसके होने का अहसास सभी को होता है। वह दाढ़ी नहीं बनाते क्योंकि उनकी छबि इससे खराब होती है। इस दुनियां में एक भय उन पर शासन करता है कि राजा और प्रजा कहीं उनसे विरक्त न हो जायें।

कभी दृष्टा बनकर सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप के दरबार में पहुंच जाओ और महसूस करो कि चिड़ियाघर में आ गये हो। देखो वहां पर एक ही रंग के कपड़े और किताब के पिंजर में बंद उस अजूबे को जो तुम्हें सर्वशक्तिमान का मार्ग बताता है। दुनियां बनाने वाले ने अनेक रंग बनाये हैं और उसके बंदों ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं पर एक ही रंग और किताब की लकीरों के पिंजर में बंद वह अजूबे वहां से भी राजा और प्रजा के बीच दलाली करते नजर आते हैं। अगर तुम आजाद होकर सोचोगे तभी उनका पिंजर दिखाई देगा नहीं तो उनके हाथ में बंद उससे भी छोटे पिंजर में तुम अपने को फंसा देखोगे वैसे ही जैसे पिंजड़े में बंद शेर के पास जाकर कोई आदमी अपना हाथ उसके मूंह में दे बैठता है और फिर……….जो होता है वह तो सर्वशक्तिमान की मर्जी होती है।
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