पुरालेख

ग़रीब की थाली सजाने में-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (garib ki thali-hindi vyangya kavitaen)

हिन्दी साहित्य,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,समाज,hindi literature,sahityaखड़े हैं गरीब
खाली पेट लिये हुक्मत की रसोई के बाहर
जब भी मांगते हैं रोटी
तो जवाब देते हैं रसोईघर के रसोईये
‘अभी इंतजार करो
अभी तुम्हारी थाली में रोटी सजा रहे हैं,
उसमें समय लगेगा
क्योंकि रोटी के साथ
आज़ादी की खीर भी होगी,
खेल तमाशों का अचार भी होगा,
उससे भी पहले
विज्ञापन करना है ज़माने में,
समय लगेगा उसको पापड़ की तरह सज़ाने में,
तुम्हारी भूख मिटाने से पहले
हम अपने मालिकों की छबि
फरिश्तों की तरह बनाने के लिये
अपनी रसोई सजा रहे हैं।
———–
देश की भूख मिटाना
बन कर रह गया है सपना
मुश्किल यह है कि
रोटी बनाने के नये फैशन आ रहे हैं,
खर्च हो जाता है
नये बर्तन खरीदने में पैसा
पुरानों में रोटी परोसने से लगेगा
नये बज़ट हाल पुराने जैसा,
इधर ज़माने में
गरीब की थाली सजने से पहले ही
नये व्यंजन फैशन में आ रहे हैं,
काम में नयापन जरूरी है

फिर देश की तरक्की देश में अकेले नहीं दिखाना,
ताकतवर देशों में भी नाम है लिखाना,
समय नहीं मिलता
इधर गरीबों और भूखों की पहचान भी बदली है
उनके नये चेहरे फैशन में आ रहे हैं।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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समस्याओं का प्रचार-हास्य व्यंग्य कविताऐं

जब हो जायेगा देश का उद्धार-व्यंग्य क्षणिकाएँ
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मिस्त्री ने कहा ठेकेदार से
‘बाबूजी यह पाईप तो सभी चटके हुए हैं
कैसे लगायें इनको
जनता की समस्या इससे नहीं दूर पायेगी
पानी की लाईन तो जल्दी जायेगी टूट’
ठेकेदार ने कहा
‘कितनी मुश्किल से चटके हुए पाईप लाया हूं
इसके मरम्मत का ठेका भी
लेने की तैयारी मैंने कर ली है पहले ही
तुम तो लगे रहो अपने काम में
नहीं तो तुम्हारी नौकरी जायेगी छूट’
…………………..
समस्याओं को पैदा कर
किया जाता है पहले प्रचार
फिर हल के वादे के साथ
प्रस्तुत होता है विचार

अगर सभी समस्यायें हल हो जायेंगी
तो मुर्दा कौम में जान फूंकने के लिये
बहसें कैसे की जायेंगी
बुद्धिजीवियों के हिट होने का फार्मूला है
जन कल्याण और देश का विकास
कौन कहेगा और कौन सुनेगा
जब हो जायेगा देश का उद्धार

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तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य
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वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
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इंटरनेट पर हिंदी का वैश्विक काल प्रारंभ हो चुका है-संपादकीय

हिंदी में विभिन्न कालों की चर्चा बहुत रही है। सबसे महत्वपूर्ण स्वर्णकाल आया जिसमें हिंदी भाषा के लिये जो लिखा गया वह इतना अनूठा था कि उसकी छबि आज तक नहीं मिट सकी। विश्व की शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसके भाग्य में एसा स्वर्ण काल आया हो। इसके बाद रीतिकाल आया। आजकल आधुनिक काल चल रहा है पर अब इस पर वैश्विक काल की छाया पड़ चुकी है। ऐसी अपेक्षा है कि इस वैश्विक काल में हिंदी का स्वरूप इतना जोरदार रहेगा कि भविष्य में यह अंग्रेजी को चुनौती देती मिलेगी। हिंदी ब्लाग जगत पर कुछ नये लेखक -इसमें आयु की बात नहीं क्योंकि जो इस समय भारत के हिंदी जगत प्रसिद्ध नहीं है पर लिखते हैं जोरदार हैं इसलिये उनको नया ही माना जाना चाहिये-इतना अच्छा और स्तरीय लिख रहे हैं उससे तो यह लगता है कि आगे चलकर उनके पाठ साहित्य का हिस्सा बनेंगे।
उस दिन कहीं साहित्यकार सम्मेलन था। वहां से लौटे एक मित्र ने इस लेखक से कहा-‘आखिर तुम इस तरह के साहित्यकार सम्मेलनों में में क्यों नहीं दिखते? यह ठीक है कि तुम आजकल अखबार वगैरह में नहीं छपते पर लेखक तो हो न! ऐसे सम्मेलनों में आया करो । इससे अन्य साहित्यकारों से मेल मिलाप होगा।’
इस लेखक ने उससे कहा-‘दरअसल अंतर्जाल पर इस तरह का मेल मिलाप अन्य लेखकों के साथ होने की आदत हो गयी हैै। वह लोग हमारा पाठ पढ़कर टिप्पणी लिखते हैं और हम उनके ब्लाग पर टिपियाते हैं।’
लेखक मित्र को इस लेखक के ब्लाग पर लिखने की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। तब उसने कहा-‘यार, मेरे घर में इंटरनेट है पर मुझे चलाना नहीं आता। एक दिन तुम्हारे घर आकर यह सीखूंगा फिर स्वयं भी इंटरनेट पर लिखूंगा।’
हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लिखने वाले लेखकों के लिये इंटरनेट अब भी एक अजूबा है। कुछ लोग जानबूझकर भी इसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाते हैं जैसे कि अंतर्जाल पर लिखने वाले साहित्यकार नहीं है या उनके द्वारा लिख जा रहा विषय स्तरीय नहीं है। कई पुराने साहित्यकार ब्लाग लेखकों को इस तरह संदेश देते हैं जैसे कि वह लेखक नहीं बल्कि कोई टंकित करने वाले लिपिक हों। हां, यहां शब्दों को लिखने की वजह टांके की तरह लगाना पड़ता है और शायद इसी कारण कई लोग इससे परहेज कर रहे हैं। कई पुराने लेखक इसीलिये भी चिढ़े हुए हैं क्योंकि आम लोगों का इंटरनेट की तरफ बढ़ता रुझान उन्हें अपनी रचनाओं से दूर ले जा रहा है।
इस लेखक ने हिंदी साहित्य की करीब करीब सभी प्रसिद्ध लेखकों का अध्ययन किया है। उनमें बहुत सारी बढ़िया कहानियां, व्यंग्य, निबंध, उपन्यास और कवितायें हैं पर हिंदी का व्यापक स्वरूप देखते हुए उनकी संख्या नगण्य ही कहा जा सकता है इसी नगण्यता का लाभ कुछ ऐसे लेखकों को हुआ जिनकी रचनायें समय के अनुसार अपना प्रभाव खो बैठीं। इसके अलावा एक बात जिसने हिंदी लेखन को प्रभावित किया वह यह कि हिंदी भाषा के साहित्य बेचकर कमाने वाले लोगों ने लेखक को अपने बंधुआ लिपिक की तरह उपयोग किया। इसलिये स्वतंत्र और मौलिक लेखक की मोटी धारा यहां कभी नहीं बह सकी। एक पतली धारा बही वह बाजार की इच्छा के विपरीत उन कम प्रसिद्ध लेखकों की वजह से जिन्होंने निष्काम भाव से लिखा पर न किसी ने उनकी रचनायें खरीदी और न उनको बेचने का कौशल आया। क्या आप यकीन करेंगे कि इस लेखक के अनेक साहित्यकार मित्र ऐसे भी हैं जो एक दूसरे पर पैसे के सहारे आगे बढ़ने का आरोप लगाते हैं। ऐसे आरोप प्रत्यारोपों के बीच लिखा भी क्या जा सकता था? इसलिये ही स्वतंत्रता संग्राम, अकालों और पुराने सामाजिक आंदोलनों पर पर लिखा गया साहित्य आज भी जबरन पढ़ने को हम मजबूर होते है। बाजार ने कसम खा रखी है कि वह किसी नये लेखक को प्रसिद्धि के परिदृश्य पर नहीं लायेगा। इसलिये ही केवल उनकी ही किताबें प्रकाशित होती हैं स्वयं पैसा देकर कापियां लेते हैं या फिर उनकी लेखन से इतर जो प्रतिष्ठा होती है और उनके प्रशंसक यह काम करते हैं। एक तरह से हिंदी का आधुनिक काल बाजार के चंगुल में फंसा रहा और वैश्विक काल उसे मुक्त करने जा रहा है।
सच बात तो यह है कि हिंदी के स्वर्णकाल के-जिसे भक्तिकाल भी कहा जाता है-बाद के कालों में हिंदी में कभी चाटुकारिता से तो कभी पाखंड और कल्पना से भरी रचनाओं से सजती गयी और लिखने वालों को पुरस्कार, सम्मान और इनाम मिले तो उन्होंने अपने सृजन को उसी धारा पर ही प्रवाहित किया। ऐसे मेें कुछ लेखकों ने निष्काम भाव से लिखते हुए जमकर लिखा और उन्होंने हिंदी भाषा का विस्तार एक नयी दिशा में करने का प्रयास किया। ऐसे ही निष्काम महान लेखक कम थे पर उन्होंने हिंदी का निर्बाध प्रवाह कर आने समय में इसके विश्व में छा जाने की बुनियाद रखी। इस धारा में इनाम, पुरस्कारों और सम्मानों से सजे लेखकों की तात्कालिक प्रभाव वाली कुछ रचनायें भी आयीं पर अब वह अपना प्रभाव खो चुकी हैं। ऐसे में कुछ ब्लाग लेखक गजब की रचनायें लिख रहे हैं। उनको पढ़कर मन प्रसन्न हो उठता है। सच बात तो यह है कि जिस तरह के विषय और उन पर मौलिक तथा स्वतंत्र लेखन यहां पढ़ने को मिल रहा है वह बाहर नहीं दिखाई देता।
हिंदी ब्लाग जगत पर पढ़ने पर सम सामयिक विषयों पर ऐसे विचार और निष्कर्ष पढ़ने को मिल जाते हैं जिनको व्यवसायिक प्रकाशन छापने की सोच भी नहीं सकते। ब्लाग लेखकों की बेबाक राय को प्रस्तुति कई संपादकों के संपादकीय से अधिक प्रखर और प्रसन्न करने वाली होती है।
अंतर्जाल पर हिंदी का जो आधुनिक कल चल रहा है वह अब वैश्विक काल में परिवर्तित होने वाला है-इसे हम सार्वभौमिक काल भी कह सकते हैं। अनुवाद के जो टूल हैं उससे हिंदी भाषा में लिखी सामग्री
किसी भी अन्य भाषा में पढ़ी जा सकती है। हिंदी लेखन में अभी तक उत्तर भारत के लेखकों का वर्चस्व था पर अब सभी दिशाओं के लेखक अंतर्जाल पर सक्रिय हैं। इसलिये इसके लेखन के स्वरूप में भी अब वैश्विक रूप दिखाई देता है। ऐसा लग रहा है कि कहानियों, व्यंग्यों, निबंधों और कविताओं की रचनाओं में पारंपरिक स्वरूप में-जिसमेें कल्पना और व्यंजना की प्रधानता थी- बदलाव होकर निजत्व और प्रत्यक्षता का बोलबाला रहेगा। हां, कुछ सिद्ध लेखक व्यंजना विद्या का सहारा लेंगे पर उनकी संख्या कम होगी। हां, संक्षिप्पता से प्रस्तुति करना भी का लक्ष्य रहेगा। जिस तरह ब्लाग लेखक यहां लिख रहे हैं उससे तो लगता है कि आगे भी ऐसे लेखक आयेंगे। ऐसा लगता है कि परंपरागत साहित्य के समर्थक चाहे कितना भी ढिंढोरा पीटते रहें पर अंतर्जाल के ब्लाग लेखक-वर्तमान में सक्रिय और आगे आने वाले- ही हिंदी को वैश्विक काल में अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से अग्रता दिलवायेंगे और यकीनन उनकी प्रसिद्ध आने वाले समय में महानतम हिंदी लेखकों में होगी। अनेक ब्लाग लेखक साक्षात्कार, निबंध, कवितायें और कहानियां बहुत मासूमियत से लिख रहे हैं। अभी तो वह यही सोच रहे है कि चलो हिंदी के परांपरागत स्थलों पर उनको उनके लिये स्थान नहीं मिल रहा इसलिये अंतर्जाल पर लिखकर अपना मन हल्का करें पर उनके लिखे पाठों का भाव भविष्य में उनके प्रसिद्धि के पथ पर चलने का संकेत दे रहा है।
कुल मिलाकर अंतर्जाल पर हिंदी का वैश्विक काल प्रारंभ हो चुका है। इसमें हिंदी एक व्यापक रूप के साथ विश्व के परिदृश्य पर आयेगी और इसकी रचनाओं की चर्चा अन्य भाषाओं में जरूर होगी। हां, इसमें एक बात महत्वपूर्ण है कि हिंदी के स्वर्णकाल या भक्तिकाल की छाया भी इस पड़ेगी और हो सकता है कि वैश्विक काल में उस दौरान की गयी रचनाओं को भी उतनी लोकप्रियता विदेशों में भी मिलेगी। अंतर्जाल पर इस ब्लाग/पत्रिका लेखक के अनेक पाठों पर तो ऐसे ही संकेत मिले हैं।
प्रस्तुत हैं इस लेखक और संपादक के अन्य ब्लाग/पत्रिका पर फ्लाप पाठ। वैसे तो इस ब्लाग को पत्रिका की तरह प्रकाशित करने का प्रयास किया जाता है पर समयाभाव के कारण ऐसा नहीं होता। प्रयास किया जायेगा कि अपने समस्त फ्लाप
पाठों का साप्ताहिक संकलन यहां प्रस्तुत किया जाये।
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पहचान का संकट-चिंतन आलेख
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भीड़ में पहचान बनाने की कोशिश! बिल्कुल निरर्थक है। हम सोचते हैं कि कोई हमें देख रहा है। हम यह सोचकर बोलते हैं कि कोई हमें सुन रहा है। यह एक भ्रम हैं। भ्रमों के झुंड में हम फंसे हैं। बंदरों की तरह गुलाटी मारकर लोगों का अपनी तरफ घ्यान खीचंने की कोशिश करते हैं। अपनी बात कहने के लिये चिल्लाते हैं कि शायद कोई उसे सुन रहा है। इसके विपरीत स्थिति भी होती है। हम कुछ नहीं करते क्योंकि कोई देख रहा है क्या कहेगा? कुछ नहीं बोलते! कोई सुन लेगा तो? अपनी अर्कमण्यता और खामोशी से भीड़ से अलग दिखने की कोशिश!

पहचान किसे चाहिये और क्यों? पता नहीं! जब आदमी स्वयं से साक्षात्कार नहीं करता तो अपने को ही नहीं पहचान पाता और उम्मीद यह करता है कि दूसरे उसे पहचाने। आत्ममंथन और चिंतन की प्रक्रिया से दूर होकर भौतिक साधनों की उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है आदमी। वह मिल जायेंगी तो लोग हमें देखेंगे-हमारी पहचान बनेगी। कुछ इसके विपरीत अपनी गरीबी, लाचारी और बीमारी का प्रचार करते हैं कि लोग हम पर तरस खायें। उद्देश्य यही है कि लोग हमें पहचाने।

कुछ लोग इससे भी आगे। वह दूसरों की पहचान बनाने में जुटे हैं। हाय…वह गरीब है…….हाय…..वह बेबस है………….हाय……………..वह बीमार है। सारी दुनियां को स्वर्ग जैसा बनाने का नारा लगाते हुए भीड़ में अपनी पहचान बनाने की कोशश! आत्मसाक्षात्कार करने से घबड़ाते लोग। अपनी देह में सांसों को चला रहे उस आत्मा को देखने से बिदक जाते हैं। उसका न कोई रंग है न रूप है। न वह बोलता है न वह सुनता है। न वह खुश होता है न दुःखी होता है। अपनी आंखों से रंग देखने के आदी, बोलने के लिये बिना चयन के शब्द बाहर प्रस्तुत करने के लिये उतावले और केवल अपने मतलब की सुनने के लिये उत्सुक लोग अपने उस रूप को नहीं देखना चाहते क्योंकि वहां है एक महाशून्य। उसकी तरफ देखते हुए उनका मन घबड़ाता है।
वह महाशून्य जो शक्ति का पुंज है उससे साक्षात्कार करने के बाद जो ऊर्जा आंख, वाणी, कान और पूरी देह को मिलती है उसे वही अनुभव कर सकता है जो उस महाशून्य की शक्ति का ज्ञान रखता है।

ऐसा ज्ञानी अनर्गल प्रलाप नहीं करता। ऐसे सुर जो कान को बाद में नष्ट कर दें उनसे परहेज करता है। ऐसे दृश्य जो आंखों के सामाने आते ही मस्तिष्क का कष्ट देते हैं उनको देखता नहीं है। ऐसा आनंद जो बाद में संताप दे उससे वह दूर रहता है।
जिनको ज्ञान नहीं है। वह क्या करते हैं।
एक ने कहा-‘मेरे सिर में दर्द है’।
दूसरे ने कहा-‘यार, कल मेरे सिर में भी दर्द था।’
किसने कहा और किसने सुना। कोई नहीं जानता। एक ने कहा, दूसरे ने कहा पर सुना किसने?
पहले ने दूसरे से कहा-‘मंदिर चलकर ध्यान करें तो कैसा रहेगा?
दूसरे ने कहा-‘उंह! मजा नहीं आयेगा।
पहले ने कहा-‘अरे, चलो उधर झगड़ा हो रहा है। देखें! शायद मजा आये।
दूसरा एकदम खड़ा हो गया और बोला-हां, चलो देखते हैं। झगड़ा हो रहा है तो जरूर मजा आयेगा।’
दूसरे के द्वंद्व देखने में लोग आनंद उठाते हैं। अपने मन के अंतद्वंद्व दूसरे से छिपाने के लिये यह एक सरल उपाय लगता है।
आत्मसाक्षात्कार के बिना भटकता आदमी आनंदशून्य हो जाता है परिणामतः वह दूसरे को दुःख देकर अपने लिये आनंद जुटाना चाहता है। मगर कितनी देर? थोड़ी देर बाद उसका दुःख दुगना हो जाता है। मन में एक तो पहले से ही मौजूद खालीपन तकलीफ देता है फिर जिससे दुःख देकर स्वयं प्रसन्न हुऐ थे वह आदमी बदला लेने के लिये प्रतिकार स्वरूप दुःख देता है। दुःख का यह अनवरत चक्र इंसान के जीवन का अटूट हिस्सा बना जाता है। इससे बचने का एक ही उपाय है आत्मसाक्षात्कार यानि अपने अंदर स्थित आत्मा को पहचाने। वही हमारी पहचान है। दूसरी जगह दूसरे से दूसरी पहचान ढूंढना जीवन व्यर्थ करना है।
………………………….
महलों में रहने वाले भी ज्यादा पेट नहीं भर पाते-हिन्दी शायरी
आकाश से टपकेगी उम्मीद
ताकते हुए क्यों अपनी आंखें थकाते हो।
कोई दूसरा जलाकर चिराग
तुम्हारी जिंदगी का दूर कर देगा अंधेरा
यह सोचते हुए
क्यों नाउम्मीदी का भय ठहराते हो।।

खड़े हो जिन महलों के नीचे
कचड़ा ही उनकी खिड़कियों से
नीचे फैंका जायेगा
सोने के जेवर हो जायेंगे अलमारी में बंद
कागज का लिफाफा ही
जमीन पर आयेगा
निहारते हुए ऊपर
क्यों अपने आपको थकाते हो।

उधार की रौशनी से
घर को सजाकर
क्यों कर्ज के अंधेरे को बढ़ाते हो
जितना हिस्से में आया है तेल
उसमें ही खेलो अपना खेल
देखकर दूसरों के घर
खुश होना सीख लो
सच यह है कि महलों में रहने वाले लोग भी
झौंपड़ी में रहने वालों
से ज्यादा पेट नहीं भर पाते
तुम उनकी खोखली हंसी पर
क्यों अपना ही खून जलाते हो।

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शब्दों के चिराग-हिंदी शायरी
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यह जिंदगी शब्दों का खेल है
जो समझे वह पास
जो न समझे वही फेल है।
कहीं तीरों की तरह चलते हैं
कहीं वीरों की तरह मचलते हैं
लहु नहीं बहता किसी को लग जाने से
जिसे लगे उसे भी
घाव का पता नहीं लगता
दूसरों को ठगने वाले
को अपने ठगे जाने का
पता देर से लगता
कई बार अर्थ बदलकर
शब्द वार कर जाते हैं
जिसके असर देर से नजर आते हैं
जला पाते हैं वही शब्दों के चिराग
जिनमें अपनी रचना के प्रति समर्पण का तेल है।

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2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

दक्षिण एशिया के साहित्यकार आतंक पर सच लिख भी कहां पाये-आलेख

अभी हाल ही में दक्षिण एशिया के देशों का एक साहित्यकार सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान,श्रीलंका,बंग्लादेश तथा अन्य सदस्य देशों के नामचीन साहित्यकार शामिल हुए। जैसा कि संभावना थी कि इस इलाके में व्याप्त आतंकवाद भी इसमें चर्चा का विषय बना। जब इलाके में आतंकवाद का बोलबाला है तो यह स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार इसी दर्पण की आंख की तरह देखने वाला होता है। इन साहित्यकारों ने आतंकवाद की निंदा की है और अपने देश के हिसाब से ही अपने विचार व्यक्त किये। पाकिस्तान के एक साहित्यकार ने बंग्लादेश में हाल ही में हुए विद्रोह में अपने देश का हाथ होने के आरोप का खंडन किया। बात यहीं पर ही अटक जाती है कि साहित्यकारों को क्या उसी नजरिये पर चलना चाहिये जिस पर उनका समाज या देश चल रहा है।

पहले तो यहां साहित्यकार और पत्रकार का भेद स्पष्ट करना जरूरी है। पत्रकार जो देखता है वही दिखाता और लिखता है पर साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिये। पत्रकार कल्पना नहीं करता और न उसे करना चाहिये पर साहित्यकार को किसी घटना में तर्क के आधार पर कल्पना और अनुमान करने की शक्ति होना चाहिये। अपने समाज और देश के प्रति साहित्यकार की प्रतिबद्धता होना जरूरी है पर उसे अंधभक्ति से दूर रहना चाहिये। दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अपने देश में जो इनाम मिलते हैं वही उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनते हैं पर सच तो यह है कि पूरे क्षे.त्र की हालत एक जैसी है और सभी जगह यह पुरस्कार लेखकों के संबंधों पर अधिक दिये जाते हैं और कई तो ऐसे साहित्यकार भी पुरस्कार पा जाते हैं जिनको समाज में ही अहमियत नहीं दी जाती है। बहरहाल दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अब इस बात का भी मंथन करना चाहिये कि क्या वह वास्तव में ही समाज और देश के लिये महत्ती भूमिका निभा रहे है? दक्षिण एशिया की सभी भाषाओं में बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर उससे सामाजिक सरोकार कितने जुड़े हैं यह भी देखने की बात है।
हम दक्षिण एशिया के साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद पर लिखी गयी सामग्रियों पर ही विचार करें तो लगेगा कि वह यथार्थ से परे हैं। लेखक को कल्पना तो करना चाहिये पर उससे यथार्थ का बोध होता हो न कि वह झूठ लगने लगे। हमने केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही पढ़ा है। सभी को पढ़ना संभव नहीं है पर पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर इस संबंध में पढ़ते है तो लगता है सभी साहित्यकार एक जैसे ही है। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों पर उनकी रचनायें अनुवादों को माध्यम से अधिक नहीं पढ़ने को मिल पाती।
अब साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद की निंदा की गयी पर कितने ऐसे साहित्यकार हैं जो इस बात को समझते हैं कि आतंकवाद भले ही जाति,भाषा,क्षेत्र और धर्म के नाम झंडो तले अपना काम करता है पर वास्तव में वह एक व्यापार है। ऐसा व्यापार जिस पर भावना,श्रृंगार और अलंकार से शब्द सजाकर प्रस्तुत करना कभी कभी एकदम निरर्थक प्रक्रिया लगती है। आतंकवाद एक हाथी है जिसे साहित्यकार आंखें बंदकर पकड़ लेते हैं। कोई उसके सूंड़ को पकल लेता है तो कोई पूंछ-फिर उस पर अपनी व्याख्या करने लगता है। जिस तरह पहले किसी सुंदरी का मुखड़ा गढ़कर उसकी आंखें,नाक,कान,कमर,और बालों पर कवितायें और कहानी लिखी जाती थीं वैसे ही आतंकवाद का विषय उनके हाथ आ गया है। जिस तरह किसी सुंदरी के शारीरिक अंगों पर खूब लिख गया पर उसके व्यवहार,आचरण और ज्ञान पर कवि लिखने से बचते रहे वही हाल आतंकवाद का है। साहित्यकारों और लेखकों ने आतंकवादी घटनाओंे से हुई त्रासदी पर वीभत्स रस से सराबोर रचनायें खूब लिखीं। पाठक का दर्द खूब उबारा पर कभी इन घटनाओं के पीछे जो सौदागर हैं उसकी कल्पना किसी ने नहंी की। प्रसंगवश यहां हम मुंबई के खूंखार आतंकवादी कसाब की चर्चा करते हैं। 58 से अधिक बेकसूर लोगों का हत्यारा कसाब इंसान से कैसे राक्षस बना? क्या किसी पाकिस्तानी लेखक ने उसकी कल्पना करते हुए कोई लघुकथा या कविता लिखी। एक गरीब घर का लड़का जिसे उसका बाप आतंकवादी कैंप में यह कहकर भेजता है कि उसकी दो बहिनों की शादी के लिये पैसे मिलने के लिये यही एक रास्ता है। वह एक मामूली चोर डेढ़ से दो लाख रुपये की लालच में अपने देश के लिये योद्धा बनने को तैयार कैसे हो गया? उसमें इतनी क्रूरता कैसे आयी कि बंदूक हाथ में आते ही उसने 58 जाने बेहिचक ले ली? यही इंसान से राक्षस बना कसाब पकड़े जाने पर चूहे की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगा। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि अब वह अपने किये पर पछता रहा है तब तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर इस राक्षसीय कृत्य के लिये प्रेरित करने वाले कौनसे कारण थे?
कसाब के पीछे जो तत्व हैं उनके सच पर कितने पाकिस्तानी या भारतीय साहित्यकार लिख पाते हैं। कसाब और उसके साथी तो साँस लेते हुए ऐसे इंसान थे जो किन्ही राक्षसों के हथियार बने गये। मुख्य अपराधी कौन हैं? मुख्य अपराधी हैं वह जो इसके लिये धन मुहैया करवा रहे हैं। यह धन देने वाले तमाम तरह के अवैध धंधों में लिप्त हैं और प्रशासन और जनता का ध्यान उन पर न जाये इस तरह के आतंकवाद का प्रायोजन कर रहे हैं। यह सच कितने साहित्यकार लिख पाये? कसाब तो इंसानी रूप में एक बुत है या कहें कि रोबोट है।
पाकिस्तान साहित्यकारों में क्या इतनी हिम्मत है कि वह कसाब को केंद्रीय पात्र बनाकर कोई कहानी लिख सकें? नहीं! दरअसल दक्षिण एशियों के साहित्यकार नायकों पर लिखकर समाज की वाहवाही लूटना चाहते हैं पर खलनायकों के कृत्यों में पीछे समाज की जो स्वयं की कमियां हैं उसे उबारकर लोगों के गुस्से से बचना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि नायकों की विजय के पीछे अगर समाज है तो खलनायक की क्रूरता के पीछे भी इसी समाज के ही तत्व हैं। समाज की की खामियों को छिपाकर उससे अच्छा बताने से तात्कालिक रूप से प्रशंसा मिलती है शायद यही कारण है कि लोग उससे बचने लगे हैं। भारत में हालांकि अनेक लोग समाज की कमियों की व्याख्या करते हैं पर वह भी उसके मूल में नहीं जाते बल्कि सतही तौर पर देखकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। नारी स्वातंत्रय पर लिखने वाले अनेक लेखक तो हास्यास्पद रचनायें लिखते हैं और उससे यह भी पता लगता है कि उनके गहन चिंतन की कमी है।

दक्षिण एशियाई देश भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी,अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के कारण विश्व में पिछडे हुए हैं और इसलिये यहां लोगों में कहीं न कहीं गुस्से की भावना है। दक्षिण एशिया की छबि विश्व में कितनी खराब है यह इस बात से भी पता चलता है कि ईरान के सबसे बड़े दुश्मन इजरायल ने भी उसे अपने लिये कम पाकिस्तान को अधिक संकट माना है जो कि दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। जब हम दक्षिण एशिया की बात करते हैं तो फिर भौगोलिक सीमाओं से उठकर विचार करना चाहिये पर जैसे कि सम्मेलन की समाचार पढ़ने को मिले उससे तो नहीं लगता कि शामिल लोग ऐसा कर पाये। सच बात तो यह है कि समाज और देश को दिशा देने का काम साहित्यकार ही कर पाते हैं क्योंकि वह पुरानी सीमाओं से बाहर निकलकर रचनायें करते हैं। सभी साहित्यकार ऐसा नहीं कर पाते जो पर जो करते हैं वही कालजयी रचनायें दे पाते हैं। अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिति को देखें तो अब ऐसी कालजयी कृतियां कहां लिखी जा रही हैं जिससे समाज या देश में परिवर्तन अपेक्षित हो।
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मधुशाला पसंद है पर मद्यपान नहीं -व्यंग्य

हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने उसे थोड़ा पढ़ा। कुछ लोगों ने जमकर पढ़ा। हमने उसके कुछ अंश एक साहित्यक पत्रिका में पढ़े थे। एक बार किताब हाथ लगी पर उसे पूरा नहीं पढ़ सके और लायब्रेरी में ं वापस जमा कर दी। मधुशाला के कुछ काव्यांश प्रसिद्ध हैं और देश की एकता के लिये उनका उपयेाग जमकर किया जाता है। उनका आशय यह है कि सर्वशक्तिमान के नाम पर बने सभी प्रकार के दरबार आपस में झगड़ा कराते हैं पर मधुशाला सभी को एक जैसा बना देती है। मधुशाला को लेकर उनका भाव संदेशात्मक ही था। एक तरह से कहा जाये तो उन्होने मधुशाला की आड़ में समाज को एकता का संदेश दिया था। हमने अभी तक उसके जितने भी काव्यांश देखे है उनमें मधुशाला पर लिखा गया है पर मद्यपान पर कुछ नहीं बताया गया। सीधी भाषा में कहा जाये तो मधुशाला तक ही उनका संदेश सीमित था पर मद्यपान में उसमें गुण दोषों का उल्लेख नहीं किया गया।
अब यह बताईये कि मधुशाला में मद्यपान नहीं होगा तो क्या अमृतपान होगा?बहुत समय तक लोग एकता के संदेशों में मधुशाला के काव्यांशों का उल्लेख करते हैं पर मद्यपान को लेकर आखें मींच लेते हैं। उनमें वह भी लोग हैं जो मद्यपान नहीं करते। नारों और वाद पर चलने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। मधुशाला पवित्र और एकता का संदेश देने वाली पर मद्यपान…………..यानि देश में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण। इससे आंखें बंद कर लो। चिंतन के दरवाजे मधुशाला से आगे नहीं जाते क्योंकि वहां से मद्यपान का मार्ग प्रारंभ होता है ं।

चलिये मधुशाला को जरा आज के संदर्भ में देख लें। बीयर बार और पब भी आजकल की नयी मधुशाला हैं। जब से यह शब्द प्रचलन में आये हैं तब से मधुशाला की कविताओं का प्रंचार भी कम हो गया है। पिछले दिनों हमने पब का अर्थ जानने का प्रयास किया पर अंग्रेजी डिक्शनरी में नहीं मिला। तब एक ऐसे सभ्य,संस्कृत और आधुनिक शैली जीवन के अभ्यस्त आदमी से इसका अर्थ पूछा तब उन्होंने बताया कि ‘आजकल की नयी प्रकार की कलारी भी कह सकते हो।’ कलारी से अधिक संस्कृत शब्द तो मधुशाला ही है। दरअसल आजकल कलारी शब्द देशी शराब के संबंध में ही प्रयोग किया जाता है। बहरहाल मधुशाला का अर्थ अगर मद्यपान का केंद्र हैं तो पब का भी आशय यही है।

स्व. हरिबंशराय बच्चन की मधुशाला में कई बातें लिखी गयी हैं जिनमें यह भी है कि मधुशाला एक ऐसी जगह है जहां पर जाकर हर जाति,वर्ण,वर्ग,भाषा,धर्म और क्षेत्र का आदमी हम प्याला बन जाता है। उन्होंने यह शायद कहीं नहीं लिखा कि वहां स्त्रियों और पुरुष भी ं एक समान हो जाते है। अगर वह अपने समय में भी ऐसी बातें लिखते तो उनका जमकर विरोध हो जाता क्योंकि उस समय स्त्रियों के वहां जाने का कोई प्रचलन नहीं होता। मधुशाला प्रगतिवादियों की मनपसंदीदा पुस्तक है मगर मुश्किल है कि मद्यपान से आदमी का मनमस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उस समय सारी नैतिकता और नारे एक जगह धरे रह जाते हैंं।

आजकल पब का जमाना है और उसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही जाने लगे हैं। मगर पब मेें ड्रिंक करने पर भी वहीं असर होता है जो कलारी में दारु और मधुशाला में मद्यपान करने से होता है। पहले लोग कलारियों के पास अपना घर बनाने ये किराये पर लेने से इंकार कर देते थे पर आजकल पबों और बारों के पास लेने में उनको कोई संकोच नहीं होता। मगर दारु तो दारु है झगड़े होंगे। पीने वाले करें न न पीने वाले उनसे करें। जिस तरह पबों का प्रचलन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे ‘आधुनिक रूप से’ फसाद होंगें। ऐसा ही कहीं झगड़ा हुआ वहां सर्वशक्तिमान के नाम पर बनी किसी सेना ने महिलाओं से बदतमीजी की। यह बुरी बात है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होना चाहिये पर जिस तरह देश के बुद्धिजीवी और लेखक इस घटना पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं वह गंभीरता की बजाय हास्य का भाव पैदा कर रहा है। हमने देखा कि इनमें कुछ बुद्धिजीवी और लेखक मधुशाला के प्रशंसक रहे हैं पर उनको मद्यपान के दोषों का ज्ञान नहीं है। पहले भी कलारियों पर झगड़े होते थे पर उनमें लोग वर्ण,जाति,भाषा और धर्म का भेद नहीं देखते थे-क्योंकि मधुशाला के संदेश का प्रभाव था और सभी झगड़ा करने वाले ‘हमप्याला’ थे। मगर अभी एक जगह झगड़ा हुआ उसमें पब में गयी महिलाओं से बदतमीजी की गयी। यह एक शर्मनाक घटना है और उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी की जा रही पर अब इस पर चल रही निरर्थक बहस में दो तरह के तर्क प्रस्तुत किया जा रहे हैं।

1.कथित प्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोग इसमें अपनी रीति नीति के अनुसार महिलाओं पर अनाचार का विरोध कर रहे हैं क्योंकि मधुशाला में स्त्रियों और पुरुषों के हमप्याला होने की बात नहीं लिखी।
2.गैरप्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी महिलाओं के शराब पीने पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ दोनों का हमप्याला होने पर आपत्ति उठा रहे हैं।
हम दोनों से सहमत नहीं हैं।

जहां तक घटना का सवाल है तो हमें यह जानकारी भी मिली है कि वहां कुछ पुरुषों के साथ बदतमीजी की गयी थी। इसलिये केवल महिलाओं के अधिकारों की बात करना केवल सतही विचार है। महिलाओं को शराब नहीं पीना चाहिये तो शायद इस देश के कई जातीय समुदायों के लोग सहमत नहीं होंगे क्योकि उनमें महिलायें भी मद्य का अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार सेवन करती हैं। किसी घटना पर इस तरह की सोच इस बात को दर्शाती हैं कि लोगों की सीमित दायरे में कुछ घटनाओं पर लिखने तक ही सीमित हो रहे हैं। मजे की बात यह है कि मधुशाला पढ़ने वाले हमप्यालों के एक होने पर तो सहमत हैं पर झगड़े होने पर तमाम तरह के पुराने भेद ढूंढ कर बहस करने लगते हैं। बहरहाल इस पर हमारी एक कुछ काव्य के रूप में पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

किसी भी घर का बालक हो या बाला
पियक्कड़ हो जाते जो पहुंचे मधुशाला
मत ढूंढों जाति,धर्म,भाषा,और लिंग का भेद
सभी को अमृतपान कराती मधुशाला
नशे में टूट गया, एक जो था गुलदस्ता
हर फूल को अपने से उसने अलग कर डाला
जो खुश होते थे देखकर रोज वह मंजर देखकर
करने लगे आर्तनाद,भूल गये वह थी मधुशाला
मद्यपान की जगह होगी जहां, वहां होंगे फसाद
नाम पब और बार हो या कहें अपनी मधुशाला
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आदमी हो या औरत पीने का मन
किसका नहीं करता
यारों, चंद शराब के कतरों की धारा में
संस्कृति नहीं बहा करती
आस्था और संस्कारों की इमारत
इतनी कमजोर नहीं होती
टूट सकती है शराब की बोतल से
जो संस्कृति वह बहुत दिन
जिंदा रहने की हक भी नहीं रखती
अपने इरादों पर कमजोर रहने वाला इंसान ही
यकीन को जिंदा रखने के लिये जंग की बात करता

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कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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कुछ पल आंसू बहाने के बाद सब भूल जाते हैं-हिंदी शायरी

अच्छा लगता है दूसरों की
जंग की बात सुनकर
पर आसान नहीं है खुद लड़ना
दूसरों के घाव देखकर
भले ही दर्द उभरता है दिल में
पर बहता हो जब अपना खून
तब इंसान को दवा की तलाश में भटकना

अपने हथियार से दूसरों का
खूना बहाना आसान लगता है
पर जब निशाने पर खुद हों तो
मन में खौफ घर करने लगता है
दूसरों के उजड़े घर पर
कुछ पल आंसू बहाने के बाद
सब भूल जाते हैं
पर अपना उजड़ा हो खुद का चमन
तो फिर जिंदगी भर
उसके अहसास तड़पाते हैं
बंद मुट्ठी कुछ पल तो रखी जा सकती है
पर जिंदगी तो खुले हाथ ही जाती जाती है
क्यों घूंसा ताने रहने की सोचना
जब उंगलियों को फिर है खोलना
जंग की उमर अधिक नहीं होती
अमन के बिना जिदंगी साथ नहीं सोती
ओ! जंग के पैगाम बांटने वालों
तुम भी कहां अमन से रह पाओगे
जब दूसरों का खून जमीन पर गिराओगे
क्रिया की प्रतिक्रिया हमेशा होती है
आज न हो तो कल हो
पर सामने कभी न कभी अपनी करनी होती है
मौत का दिन एक है
पर जिंदगी के रंग तो अनेक हैं
जंग में अपने लिये चैन ढूंढने की
ख्वाहिश बेकार है
अमन को ही कुदरत का तोहफा समझना
जंग तो बदरंग कर देती है जिंदगी
कर सको भला काम तो
हमेशा दूसरे के घाव पर मल्हम मलना

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आकाश में चांद को देखकर
उसे पाने की चाह भला किसमें नहीं होती
पर कभी पूरी भी नहीं होती

शायरों ने लिखे उस पर ढेर सारे शेर
हर भाषा में उस पर लिखे गये शब्द ढेर
हसीनों की शक्ल को उससे तोला गया
उसकी तारीफ में एक से बढ़कर एक शब्द बोला गया
सच यह है चांद में
अपनी रोशनी नहीं होती
सूरज से उधार पर आयी चांदनी
रोशनी का कतरा कतरा उस पर बोती
मगर इस जहां में बिकता है ख्वाब
जो कभी पूरे न हों सपने
उनकी कीमत सबसे अधिक होती
सब भागते हैं हकीकत से
क्योंकि वह कभी कड़वी तो
कभी बहुत डरावनी होती
सूरज से आंख मिला सके
भला इतनी ताकत किस इंसान में होती

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