पुरालेख

ग़रीब की थाली सजाने में-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (garib ki thali-hindi vyangya kavitaen)

हिन्दी साहित्य,मनोरंजन,मस्ती,संदेश,समाज,hindi literature,sahityaखड़े हैं गरीब
खाली पेट लिये हुक्मत की रसोई के बाहर
जब भी मांगते हैं रोटी
तो जवाब देते हैं रसोईघर के रसोईये
‘अभी इंतजार करो
अभी तुम्हारी थाली में रोटी सजा रहे हैं,
उसमें समय लगेगा
क्योंकि रोटी के साथ
आज़ादी की खीर भी होगी,
खेल तमाशों का अचार भी होगा,
उससे भी पहले
विज्ञापन करना है ज़माने में,
समय लगेगा उसको पापड़ की तरह सज़ाने में,
तुम्हारी भूख मिटाने से पहले
हम अपने मालिकों की छबि
फरिश्तों की तरह बनाने के लिये
अपनी रसोई सजा रहे हैं।
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देश की भूख मिटाना
बन कर रह गया है सपना
मुश्किल यह है कि
रोटी बनाने के नये फैशन आ रहे हैं,
खर्च हो जाता है
नये बर्तन खरीदने में पैसा
पुरानों में रोटी परोसने से लगेगा
नये बज़ट हाल पुराने जैसा,
इधर ज़माने में
गरीब की थाली सजने से पहले ही
नये व्यंजन फैशन में आ रहे हैं,
काम में नयापन जरूरी है

फिर देश की तरक्की देश में अकेले नहीं दिखाना,
ताकतवर देशों में भी नाम है लिखाना,
समय नहीं मिलता
इधर गरीबों और भूखों की पहचान भी बदली है
उनके नये चेहरे फैशन में आ रहे हैं।
——-

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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समस्याओं का प्रचार-हास्य व्यंग्य कविताऐं

जब हो जायेगा देश का उद्धार-व्यंग्य क्षणिकाएँ
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मिस्त्री ने कहा ठेकेदार से
‘बाबूजी यह पाईप तो सभी चटके हुए हैं
कैसे लगायें इनको
जनता की समस्या इससे नहीं दूर पायेगी
पानी की लाईन तो जल्दी जायेगी टूट’
ठेकेदार ने कहा
‘कितनी मुश्किल से चटके हुए पाईप लाया हूं
इसके मरम्मत का ठेका भी
लेने की तैयारी मैंने कर ली है पहले ही
तुम तो लगे रहो अपने काम में
नहीं तो तुम्हारी नौकरी जायेगी छूट’
…………………..
समस्याओं को पैदा कर
किया जाता है पहले प्रचार
फिर हल के वादे के साथ
प्रस्तुत होता है विचार

अगर सभी समस्यायें हल हो जायेंगी
तो मुर्दा कौम में जान फूंकने के लिये
बहसें कैसे की जायेंगी
बुद्धिजीवियों के हिट होने का फार्मूला है
जन कल्याण और देश का विकास
कौन कहेगा और कौन सुनेगा
जब हो जायेगा देश का उद्धार

…………………………..
तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य
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वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
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इंटरनेट पर हिंदी का वैश्विक काल प्रारंभ हो चुका है-संपादकीय

हिंदी में विभिन्न कालों की चर्चा बहुत रही है। सबसे महत्वपूर्ण स्वर्णकाल आया जिसमें हिंदी भाषा के लिये जो लिखा गया वह इतना अनूठा था कि उसकी छबि आज तक नहीं मिट सकी। विश्व की शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसके भाग्य में एसा स्वर्ण काल आया हो। इसके बाद रीतिकाल आया। आजकल आधुनिक काल चल रहा है पर अब इस पर वैश्विक काल की छाया पड़ चुकी है। ऐसी अपेक्षा है कि इस वैश्विक काल में हिंदी का स्वरूप इतना जोरदार रहेगा कि भविष्य में यह अंग्रेजी को चुनौती देती मिलेगी। हिंदी ब्लाग जगत पर कुछ नये लेखक -इसमें आयु की बात नहीं क्योंकि जो इस समय भारत के हिंदी जगत प्रसिद्ध नहीं है पर लिखते हैं जोरदार हैं इसलिये उनको नया ही माना जाना चाहिये-इतना अच्छा और स्तरीय लिख रहे हैं उससे तो यह लगता है कि आगे चलकर उनके पाठ साहित्य का हिस्सा बनेंगे।
उस दिन कहीं साहित्यकार सम्मेलन था। वहां से लौटे एक मित्र ने इस लेखक से कहा-‘आखिर तुम इस तरह के साहित्यकार सम्मेलनों में में क्यों नहीं दिखते? यह ठीक है कि तुम आजकल अखबार वगैरह में नहीं छपते पर लेखक तो हो न! ऐसे सम्मेलनों में आया करो । इससे अन्य साहित्यकारों से मेल मिलाप होगा।’
इस लेखक ने उससे कहा-‘दरअसल अंतर्जाल पर इस तरह का मेल मिलाप अन्य लेखकों के साथ होने की आदत हो गयी हैै। वह लोग हमारा पाठ पढ़कर टिप्पणी लिखते हैं और हम उनके ब्लाग पर टिपियाते हैं।’
लेखक मित्र को इस लेखक के ब्लाग पर लिखने की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। तब उसने कहा-‘यार, मेरे घर में इंटरनेट है पर मुझे चलाना नहीं आता। एक दिन तुम्हारे घर आकर यह सीखूंगा फिर स्वयं भी इंटरनेट पर लिखूंगा।’
हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लिखने वाले लेखकों के लिये इंटरनेट अब भी एक अजूबा है। कुछ लोग जानबूझकर भी इसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाते हैं जैसे कि अंतर्जाल पर लिखने वाले साहित्यकार नहीं है या उनके द्वारा लिख जा रहा विषय स्तरीय नहीं है। कई पुराने साहित्यकार ब्लाग लेखकों को इस तरह संदेश देते हैं जैसे कि वह लेखक नहीं बल्कि कोई टंकित करने वाले लिपिक हों। हां, यहां शब्दों को लिखने की वजह टांके की तरह लगाना पड़ता है और शायद इसी कारण कई लोग इससे परहेज कर रहे हैं। कई पुराने लेखक इसीलिये भी चिढ़े हुए हैं क्योंकि आम लोगों का इंटरनेट की तरफ बढ़ता रुझान उन्हें अपनी रचनाओं से दूर ले जा रहा है।
इस लेखक ने हिंदी साहित्य की करीब करीब सभी प्रसिद्ध लेखकों का अध्ययन किया है। उनमें बहुत सारी बढ़िया कहानियां, व्यंग्य, निबंध, उपन्यास और कवितायें हैं पर हिंदी का व्यापक स्वरूप देखते हुए उनकी संख्या नगण्य ही कहा जा सकता है इसी नगण्यता का लाभ कुछ ऐसे लेखकों को हुआ जिनकी रचनायें समय के अनुसार अपना प्रभाव खो बैठीं। इसके अलावा एक बात जिसने हिंदी लेखन को प्रभावित किया वह यह कि हिंदी भाषा के साहित्य बेचकर कमाने वाले लोगों ने लेखक को अपने बंधुआ लिपिक की तरह उपयोग किया। इसलिये स्वतंत्र और मौलिक लेखक की मोटी धारा यहां कभी नहीं बह सकी। एक पतली धारा बही वह बाजार की इच्छा के विपरीत उन कम प्रसिद्ध लेखकों की वजह से जिन्होंने निष्काम भाव से लिखा पर न किसी ने उनकी रचनायें खरीदी और न उनको बेचने का कौशल आया। क्या आप यकीन करेंगे कि इस लेखक के अनेक साहित्यकार मित्र ऐसे भी हैं जो एक दूसरे पर पैसे के सहारे आगे बढ़ने का आरोप लगाते हैं। ऐसे आरोप प्रत्यारोपों के बीच लिखा भी क्या जा सकता था? इसलिये ही स्वतंत्रता संग्राम, अकालों और पुराने सामाजिक आंदोलनों पर पर लिखा गया साहित्य आज भी जबरन पढ़ने को हम मजबूर होते है। बाजार ने कसम खा रखी है कि वह किसी नये लेखक को प्रसिद्धि के परिदृश्य पर नहीं लायेगा। इसलिये ही केवल उनकी ही किताबें प्रकाशित होती हैं स्वयं पैसा देकर कापियां लेते हैं या फिर उनकी लेखन से इतर जो प्रतिष्ठा होती है और उनके प्रशंसक यह काम करते हैं। एक तरह से हिंदी का आधुनिक काल बाजार के चंगुल में फंसा रहा और वैश्विक काल उसे मुक्त करने जा रहा है।
सच बात तो यह है कि हिंदी के स्वर्णकाल के-जिसे भक्तिकाल भी कहा जाता है-बाद के कालों में हिंदी में कभी चाटुकारिता से तो कभी पाखंड और कल्पना से भरी रचनाओं से सजती गयी और लिखने वालों को पुरस्कार, सम्मान और इनाम मिले तो उन्होंने अपने सृजन को उसी धारा पर ही प्रवाहित किया। ऐसे मेें कुछ लेखकों ने निष्काम भाव से लिखते हुए जमकर लिखा और उन्होंने हिंदी भाषा का विस्तार एक नयी दिशा में करने का प्रयास किया। ऐसे ही निष्काम महान लेखक कम थे पर उन्होंने हिंदी का निर्बाध प्रवाह कर आने समय में इसके विश्व में छा जाने की बुनियाद रखी। इस धारा में इनाम, पुरस्कारों और सम्मानों से सजे लेखकों की तात्कालिक प्रभाव वाली कुछ रचनायें भी आयीं पर अब वह अपना प्रभाव खो चुकी हैं। ऐसे में कुछ ब्लाग लेखक गजब की रचनायें लिख रहे हैं। उनको पढ़कर मन प्रसन्न हो उठता है। सच बात तो यह है कि जिस तरह के विषय और उन पर मौलिक तथा स्वतंत्र लेखन यहां पढ़ने को मिल रहा है वह बाहर नहीं दिखाई देता।
हिंदी ब्लाग जगत पर पढ़ने पर सम सामयिक विषयों पर ऐसे विचार और निष्कर्ष पढ़ने को मिल जाते हैं जिनको व्यवसायिक प्रकाशन छापने की सोच भी नहीं सकते। ब्लाग लेखकों की बेबाक राय को प्रस्तुति कई संपादकों के संपादकीय से अधिक प्रखर और प्रसन्न करने वाली होती है।
अंतर्जाल पर हिंदी का जो आधुनिक कल चल रहा है वह अब वैश्विक काल में परिवर्तित होने वाला है-इसे हम सार्वभौमिक काल भी कह सकते हैं। अनुवाद के जो टूल हैं उससे हिंदी भाषा में लिखी सामग्री
किसी भी अन्य भाषा में पढ़ी जा सकती है। हिंदी लेखन में अभी तक उत्तर भारत के लेखकों का वर्चस्व था पर अब सभी दिशाओं के लेखक अंतर्जाल पर सक्रिय हैं। इसलिये इसके लेखन के स्वरूप में भी अब वैश्विक रूप दिखाई देता है। ऐसा लग रहा है कि कहानियों, व्यंग्यों, निबंधों और कविताओं की रचनाओं में पारंपरिक स्वरूप में-जिसमेें कल्पना और व्यंजना की प्रधानता थी- बदलाव होकर निजत्व और प्रत्यक्षता का बोलबाला रहेगा। हां, कुछ सिद्ध लेखक व्यंजना विद्या का सहारा लेंगे पर उनकी संख्या कम होगी। हां, संक्षिप्पता से प्रस्तुति करना भी का लक्ष्य रहेगा। जिस तरह ब्लाग लेखक यहां लिख रहे हैं उससे तो लगता है कि आगे भी ऐसे लेखक आयेंगे। ऐसा लगता है कि परंपरागत साहित्य के समर्थक चाहे कितना भी ढिंढोरा पीटते रहें पर अंतर्जाल के ब्लाग लेखक-वर्तमान में सक्रिय और आगे आने वाले- ही हिंदी को वैश्विक काल में अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से अग्रता दिलवायेंगे और यकीनन उनकी प्रसिद्ध आने वाले समय में महानतम हिंदी लेखकों में होगी। अनेक ब्लाग लेखक साक्षात्कार, निबंध, कवितायें और कहानियां बहुत मासूमियत से लिख रहे हैं। अभी तो वह यही सोच रहे है कि चलो हिंदी के परांपरागत स्थलों पर उनको उनके लिये स्थान नहीं मिल रहा इसलिये अंतर्जाल पर लिखकर अपना मन हल्का करें पर उनके लिखे पाठों का भाव भविष्य में उनके प्रसिद्धि के पथ पर चलने का संकेत दे रहा है।
कुल मिलाकर अंतर्जाल पर हिंदी का वैश्विक काल प्रारंभ हो चुका है। इसमें हिंदी एक व्यापक रूप के साथ विश्व के परिदृश्य पर आयेगी और इसकी रचनाओं की चर्चा अन्य भाषाओं में जरूर होगी। हां, इसमें एक बात महत्वपूर्ण है कि हिंदी के स्वर्णकाल या भक्तिकाल की छाया भी इस पड़ेगी और हो सकता है कि वैश्विक काल में उस दौरान की गयी रचनाओं को भी उतनी लोकप्रियता विदेशों में भी मिलेगी। अंतर्जाल पर इस ब्लाग/पत्रिका लेखक के अनेक पाठों पर तो ऐसे ही संकेत मिले हैं।
प्रस्तुत हैं इस लेखक और संपादक के अन्य ब्लाग/पत्रिका पर फ्लाप पाठ। वैसे तो इस ब्लाग को पत्रिका की तरह प्रकाशित करने का प्रयास किया जाता है पर समयाभाव के कारण ऐसा नहीं होता। प्रयास किया जायेगा कि अपने समस्त फ्लाप
पाठों का साप्ताहिक संकलन यहां प्रस्तुत किया जाये।
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पहचान का संकट-चिंतन आलेख
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भीड़ में पहचान बनाने की कोशिश! बिल्कुल निरर्थक है। हम सोचते हैं कि कोई हमें देख रहा है। हम यह सोचकर बोलते हैं कि कोई हमें सुन रहा है। यह एक भ्रम हैं। भ्रमों के झुंड में हम फंसे हैं। बंदरों की तरह गुलाटी मारकर लोगों का अपनी तरफ घ्यान खीचंने की कोशिश करते हैं। अपनी बात कहने के लिये चिल्लाते हैं कि शायद कोई उसे सुन रहा है। इसके विपरीत स्थिति भी होती है। हम कुछ नहीं करते क्योंकि कोई देख रहा है क्या कहेगा? कुछ नहीं बोलते! कोई सुन लेगा तो? अपनी अर्कमण्यता और खामोशी से भीड़ से अलग दिखने की कोशिश!

पहचान किसे चाहिये और क्यों? पता नहीं! जब आदमी स्वयं से साक्षात्कार नहीं करता तो अपने को ही नहीं पहचान पाता और उम्मीद यह करता है कि दूसरे उसे पहचाने। आत्ममंथन और चिंतन की प्रक्रिया से दूर होकर भौतिक साधनों की उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है आदमी। वह मिल जायेंगी तो लोग हमें देखेंगे-हमारी पहचान बनेगी। कुछ इसके विपरीत अपनी गरीबी, लाचारी और बीमारी का प्रचार करते हैं कि लोग हम पर तरस खायें। उद्देश्य यही है कि लोग हमें पहचाने।

कुछ लोग इससे भी आगे। वह दूसरों की पहचान बनाने में जुटे हैं। हाय…वह गरीब है…….हाय…..वह बेबस है………….हाय……………..वह बीमार है। सारी दुनियां को स्वर्ग जैसा बनाने का नारा लगाते हुए भीड़ में अपनी पहचान बनाने की कोशश! आत्मसाक्षात्कार करने से घबड़ाते लोग। अपनी देह में सांसों को चला रहे उस आत्मा को देखने से बिदक जाते हैं। उसका न कोई रंग है न रूप है। न वह बोलता है न वह सुनता है। न वह खुश होता है न दुःखी होता है। अपनी आंखों से रंग देखने के आदी, बोलने के लिये बिना चयन के शब्द बाहर प्रस्तुत करने के लिये उतावले और केवल अपने मतलब की सुनने के लिये उत्सुक लोग अपने उस रूप को नहीं देखना चाहते क्योंकि वहां है एक महाशून्य। उसकी तरफ देखते हुए उनका मन घबड़ाता है।
वह महाशून्य जो शक्ति का पुंज है उससे साक्षात्कार करने के बाद जो ऊर्जा आंख, वाणी, कान और पूरी देह को मिलती है उसे वही अनुभव कर सकता है जो उस महाशून्य की शक्ति का ज्ञान रखता है।

ऐसा ज्ञानी अनर्गल प्रलाप नहीं करता। ऐसे सुर जो कान को बाद में नष्ट कर दें उनसे परहेज करता है। ऐसे दृश्य जो आंखों के सामाने आते ही मस्तिष्क का कष्ट देते हैं उनको देखता नहीं है। ऐसा आनंद जो बाद में संताप दे उससे वह दूर रहता है।
जिनको ज्ञान नहीं है। वह क्या करते हैं।
एक ने कहा-‘मेरे सिर में दर्द है’।
दूसरे ने कहा-‘यार, कल मेरे सिर में भी दर्द था।’
किसने कहा और किसने सुना। कोई नहीं जानता। एक ने कहा, दूसरे ने कहा पर सुना किसने?
पहले ने दूसरे से कहा-‘मंदिर चलकर ध्यान करें तो कैसा रहेगा?
दूसरे ने कहा-‘उंह! मजा नहीं आयेगा।
पहले ने कहा-‘अरे, चलो उधर झगड़ा हो रहा है। देखें! शायद मजा आये।
दूसरा एकदम खड़ा हो गया और बोला-हां, चलो देखते हैं। झगड़ा हो रहा है तो जरूर मजा आयेगा।’
दूसरे के द्वंद्व देखने में लोग आनंद उठाते हैं। अपने मन के अंतद्वंद्व दूसरे से छिपाने के लिये यह एक सरल उपाय लगता है।
आत्मसाक्षात्कार के बिना भटकता आदमी आनंदशून्य हो जाता है परिणामतः वह दूसरे को दुःख देकर अपने लिये आनंद जुटाना चाहता है। मगर कितनी देर? थोड़ी देर बाद उसका दुःख दुगना हो जाता है। मन में एक तो पहले से ही मौजूद खालीपन तकलीफ देता है फिर जिससे दुःख देकर स्वयं प्रसन्न हुऐ थे वह आदमी बदला लेने के लिये प्रतिकार स्वरूप दुःख देता है। दुःख का यह अनवरत चक्र इंसान के जीवन का अटूट हिस्सा बना जाता है। इससे बचने का एक ही उपाय है आत्मसाक्षात्कार यानि अपने अंदर स्थित आत्मा को पहचाने। वही हमारी पहचान है। दूसरी जगह दूसरे से दूसरी पहचान ढूंढना जीवन व्यर्थ करना है।
………………………….
महलों में रहने वाले भी ज्यादा पेट नहीं भर पाते-हिन्दी शायरी
आकाश से टपकेगी उम्मीद
ताकते हुए क्यों अपनी आंखें थकाते हो।
कोई दूसरा जलाकर चिराग
तुम्हारी जिंदगी का दूर कर देगा अंधेरा
यह सोचते हुए
क्यों नाउम्मीदी का भय ठहराते हो।।

खड़े हो जिन महलों के नीचे
कचड़ा ही उनकी खिड़कियों से
नीचे फैंका जायेगा
सोने के जेवर हो जायेंगे अलमारी में बंद
कागज का लिफाफा ही
जमीन पर आयेगा
निहारते हुए ऊपर
क्यों अपने आपको थकाते हो।

उधार की रौशनी से
घर को सजाकर
क्यों कर्ज के अंधेरे को बढ़ाते हो
जितना हिस्से में आया है तेल
उसमें ही खेलो अपना खेल
देखकर दूसरों के घर
खुश होना सीख लो
सच यह है कि महलों में रहने वाले लोग भी
झौंपड़ी में रहने वालों
से ज्यादा पेट नहीं भर पाते
तुम उनकी खोखली हंसी पर
क्यों अपना ही खून जलाते हो।

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शब्दों के चिराग-हिंदी शायरी
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यह जिंदगी शब्दों का खेल है
जो समझे वह पास
जो न समझे वही फेल है।
कहीं तीरों की तरह चलते हैं
कहीं वीरों की तरह मचलते हैं
लहु नहीं बहता किसी को लग जाने से
जिसे लगे उसे भी
घाव का पता नहीं लगता
दूसरों को ठगने वाले
को अपने ठगे जाने का
पता देर से लगता
कई बार अर्थ बदलकर
शब्द वार कर जाते हैं
जिसके असर देर से नजर आते हैं
जला पाते हैं वही शब्दों के चिराग
जिनमें अपनी रचना के प्रति समर्पण का तेल है।

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2.दीपक भारतदीप का चिंतन
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

दक्षिण एशिया के साहित्यकार आतंक पर सच लिख भी कहां पाये-आलेख

अभी हाल ही में दक्षिण एशिया के देशों का एक साहित्यकार सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान,श्रीलंका,बंग्लादेश तथा अन्य सदस्य देशों के नामचीन साहित्यकार शामिल हुए। जैसा कि संभावना थी कि इस इलाके में व्याप्त आतंकवाद भी इसमें चर्चा का विषय बना। जब इलाके में आतंकवाद का बोलबाला है तो यह स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार इसी दर्पण की आंख की तरह देखने वाला होता है। इन साहित्यकारों ने आतंकवाद की निंदा की है और अपने देश के हिसाब से ही अपने विचार व्यक्त किये। पाकिस्तान के एक साहित्यकार ने बंग्लादेश में हाल ही में हुए विद्रोह में अपने देश का हाथ होने के आरोप का खंडन किया। बात यहीं पर ही अटक जाती है कि साहित्यकारों को क्या उसी नजरिये पर चलना चाहिये जिस पर उनका समाज या देश चल रहा है।

पहले तो यहां साहित्यकार और पत्रकार का भेद स्पष्ट करना जरूरी है। पत्रकार जो देखता है वही दिखाता और लिखता है पर साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिये। पत्रकार कल्पना नहीं करता और न उसे करना चाहिये पर साहित्यकार को किसी घटना में तर्क के आधार पर कल्पना और अनुमान करने की शक्ति होना चाहिये। अपने समाज और देश के प्रति साहित्यकार की प्रतिबद्धता होना जरूरी है पर उसे अंधभक्ति से दूर रहना चाहिये। दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अपने देश में जो इनाम मिलते हैं वही उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनते हैं पर सच तो यह है कि पूरे क्षे.त्र की हालत एक जैसी है और सभी जगह यह पुरस्कार लेखकों के संबंधों पर अधिक दिये जाते हैं और कई तो ऐसे साहित्यकार भी पुरस्कार पा जाते हैं जिनको समाज में ही अहमियत नहीं दी जाती है। बहरहाल दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अब इस बात का भी मंथन करना चाहिये कि क्या वह वास्तव में ही समाज और देश के लिये महत्ती भूमिका निभा रहे है? दक्षिण एशिया की सभी भाषाओं में बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर उससे सामाजिक सरोकार कितने जुड़े हैं यह भी देखने की बात है।
हम दक्षिण एशिया के साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद पर लिखी गयी सामग्रियों पर ही विचार करें तो लगेगा कि वह यथार्थ से परे हैं। लेखक को कल्पना तो करना चाहिये पर उससे यथार्थ का बोध होता हो न कि वह झूठ लगने लगे। हमने केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही पढ़ा है। सभी को पढ़ना संभव नहीं है पर पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर इस संबंध में पढ़ते है तो लगता है सभी साहित्यकार एक जैसे ही है। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों पर उनकी रचनायें अनुवादों को माध्यम से अधिक नहीं पढ़ने को मिल पाती।
अब साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद की निंदा की गयी पर कितने ऐसे साहित्यकार हैं जो इस बात को समझते हैं कि आतंकवाद भले ही जाति,भाषा,क्षेत्र और धर्म के नाम झंडो तले अपना काम करता है पर वास्तव में वह एक व्यापार है। ऐसा व्यापार जिस पर भावना,श्रृंगार और अलंकार से शब्द सजाकर प्रस्तुत करना कभी कभी एकदम निरर्थक प्रक्रिया लगती है। आतंकवाद एक हाथी है जिसे साहित्यकार आंखें बंदकर पकड़ लेते हैं। कोई उसके सूंड़ को पकल लेता है तो कोई पूंछ-फिर उस पर अपनी व्याख्या करने लगता है। जिस तरह पहले किसी सुंदरी का मुखड़ा गढ़कर उसकी आंखें,नाक,कान,कमर,और बालों पर कवितायें और कहानी लिखी जाती थीं वैसे ही आतंकवाद का विषय उनके हाथ आ गया है। जिस तरह किसी सुंदरी के शारीरिक अंगों पर खूब लिख गया पर उसके व्यवहार,आचरण और ज्ञान पर कवि लिखने से बचते रहे वही हाल आतंकवाद का है। साहित्यकारों और लेखकों ने आतंकवादी घटनाओंे से हुई त्रासदी पर वीभत्स रस से सराबोर रचनायें खूब लिखीं। पाठक का दर्द खूब उबारा पर कभी इन घटनाओं के पीछे जो सौदागर हैं उसकी कल्पना किसी ने नहंी की। प्रसंगवश यहां हम मुंबई के खूंखार आतंकवादी कसाब की चर्चा करते हैं। 58 से अधिक बेकसूर लोगों का हत्यारा कसाब इंसान से कैसे राक्षस बना? क्या किसी पाकिस्तानी लेखक ने उसकी कल्पना करते हुए कोई लघुकथा या कविता लिखी। एक गरीब घर का लड़का जिसे उसका बाप आतंकवादी कैंप में यह कहकर भेजता है कि उसकी दो बहिनों की शादी के लिये पैसे मिलने के लिये यही एक रास्ता है। वह एक मामूली चोर डेढ़ से दो लाख रुपये की लालच में अपने देश के लिये योद्धा बनने को तैयार कैसे हो गया? उसमें इतनी क्रूरता कैसे आयी कि बंदूक हाथ में आते ही उसने 58 जाने बेहिचक ले ली? यही इंसान से राक्षस बना कसाब पकड़े जाने पर चूहे की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगा। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि अब वह अपने किये पर पछता रहा है तब तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर इस राक्षसीय कृत्य के लिये प्रेरित करने वाले कौनसे कारण थे?
कसाब के पीछे जो तत्व हैं उनके सच पर कितने पाकिस्तानी या भारतीय साहित्यकार लिख पाते हैं। कसाब और उसके साथी तो साँस लेते हुए ऐसे इंसान थे जो किन्ही राक्षसों के हथियार बने गये। मुख्य अपराधी कौन हैं? मुख्य अपराधी हैं वह जो इसके लिये धन मुहैया करवा रहे हैं। यह धन देने वाले तमाम तरह के अवैध धंधों में लिप्त हैं और प्रशासन और जनता का ध्यान उन पर न जाये इस तरह के आतंकवाद का प्रायोजन कर रहे हैं। यह सच कितने साहित्यकार लिख पाये? कसाब तो इंसानी रूप में एक बुत है या कहें कि रोबोट है।
पाकिस्तान साहित्यकारों में क्या इतनी हिम्मत है कि वह कसाब को केंद्रीय पात्र बनाकर कोई कहानी लिख सकें? नहीं! दरअसल दक्षिण एशियों के साहित्यकार नायकों पर लिखकर समाज की वाहवाही लूटना चाहते हैं पर खलनायकों के कृत्यों में पीछे समाज की जो स्वयं की कमियां हैं उसे उबारकर लोगों के गुस्से से बचना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि नायकों की विजय के पीछे अगर समाज है तो खलनायक की क्रूरता के पीछे भी इसी समाज के ही तत्व हैं। समाज की की खामियों को छिपाकर उससे अच्छा बताने से तात्कालिक रूप से प्रशंसा मिलती है शायद यही कारण है कि लोग उससे बचने लगे हैं। भारत में हालांकि अनेक लोग समाज की कमियों की व्याख्या करते हैं पर वह भी उसके मूल में नहीं जाते बल्कि सतही तौर पर देखकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। नारी स्वातंत्रय पर लिखने वाले अनेक लेखक तो हास्यास्पद रचनायें लिखते हैं और उससे यह भी पता लगता है कि उनके गहन चिंतन की कमी है।

दक्षिण एशियाई देश भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी,अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के कारण विश्व में पिछडे हुए हैं और इसलिये यहां लोगों में कहीं न कहीं गुस्से की भावना है। दक्षिण एशिया की छबि विश्व में कितनी खराब है यह इस बात से भी पता चलता है कि ईरान के सबसे बड़े दुश्मन इजरायल ने भी उसे अपने लिये कम पाकिस्तान को अधिक संकट माना है जो कि दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। जब हम दक्षिण एशिया की बात करते हैं तो फिर भौगोलिक सीमाओं से उठकर विचार करना चाहिये पर जैसे कि सम्मेलन की समाचार पढ़ने को मिले उससे तो नहीं लगता कि शामिल लोग ऐसा कर पाये। सच बात तो यह है कि समाज और देश को दिशा देने का काम साहित्यकार ही कर पाते हैं क्योंकि वह पुरानी सीमाओं से बाहर निकलकर रचनायें करते हैं। सभी साहित्यकार ऐसा नहीं कर पाते जो पर जो करते हैं वही कालजयी रचनायें दे पाते हैं। अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिति को देखें तो अब ऐसी कालजयी कृतियां कहां लिखी जा रही हैं जिससे समाज या देश में परिवर्तन अपेक्षित हो।
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मधुशाला पसंद है पर मद्यपान नहीं -व्यंग्य

हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने उसे थोड़ा पढ़ा। कुछ लोगों ने जमकर पढ़ा। हमने उसके कुछ अंश एक साहित्यक पत्रिका में पढ़े थे। एक बार किताब हाथ लगी पर उसे पूरा नहीं पढ़ सके और लायब्रेरी में ं वापस जमा कर दी। मधुशाला के कुछ काव्यांश प्रसिद्ध हैं और देश की एकता के लिये उनका उपयेाग जमकर किया जाता है। उनका आशय यह है कि सर्वशक्तिमान के नाम पर बने सभी प्रकार के दरबार आपस में झगड़ा कराते हैं पर मधुशाला सभी को एक जैसा बना देती है। मधुशाला को लेकर उनका भाव संदेशात्मक ही था। एक तरह से कहा जाये तो उन्होने मधुशाला की आड़ में समाज को एकता का संदेश दिया था। हमने अभी तक उसके जितने भी काव्यांश देखे है उनमें मधुशाला पर लिखा गया है पर मद्यपान पर कुछ नहीं बताया गया। सीधी भाषा में कहा जाये तो मधुशाला तक ही उनका संदेश सीमित था पर मद्यपान में उसमें गुण दोषों का उल्लेख नहीं किया गया।
अब यह बताईये कि मधुशाला में मद्यपान नहीं होगा तो क्या अमृतपान होगा?बहुत समय तक लोग एकता के संदेशों में मधुशाला के काव्यांशों का उल्लेख करते हैं पर मद्यपान को लेकर आखें मींच लेते हैं। उनमें वह भी लोग हैं जो मद्यपान नहीं करते। नारों और वाद पर चलने का यह सबसे अच्छा उदाहरण है। मधुशाला पवित्र और एकता का संदेश देने वाली पर मद्यपान…………..यानि देश में गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण। इससे आंखें बंद कर लो। चिंतन के दरवाजे मधुशाला से आगे नहीं जाते क्योंकि वहां से मद्यपान का मार्ग प्रारंभ होता है ं।

चलिये मधुशाला को जरा आज के संदर्भ में देख लें। बीयर बार और पब भी आजकल की नयी मधुशाला हैं। जब से यह शब्द प्रचलन में आये हैं तब से मधुशाला की कविताओं का प्रंचार भी कम हो गया है। पिछले दिनों हमने पब का अर्थ जानने का प्रयास किया पर अंग्रेजी डिक्शनरी में नहीं मिला। तब एक ऐसे सभ्य,संस्कृत और आधुनिक शैली जीवन के अभ्यस्त आदमी से इसका अर्थ पूछा तब उन्होंने बताया कि ‘आजकल की नयी प्रकार की कलारी भी कह सकते हो।’ कलारी से अधिक संस्कृत शब्द तो मधुशाला ही है। दरअसल आजकल कलारी शब्द देशी शराब के संबंध में ही प्रयोग किया जाता है। बहरहाल मधुशाला का अर्थ अगर मद्यपान का केंद्र हैं तो पब का भी आशय यही है।

स्व. हरिबंशराय बच्चन की मधुशाला में कई बातें लिखी गयी हैं जिनमें यह भी है कि मधुशाला एक ऐसी जगह है जहां पर जाकर हर जाति,वर्ण,वर्ग,भाषा,धर्म और क्षेत्र का आदमी हम प्याला बन जाता है। उन्होंने यह शायद कहीं नहीं लिखा कि वहां स्त्रियों और पुरुष भी ं एक समान हो जाते है। अगर वह अपने समय में भी ऐसी बातें लिखते तो उनका जमकर विरोध हो जाता क्योंकि उस समय स्त्रियों के वहां जाने का कोई प्रचलन नहीं होता। मधुशाला प्रगतिवादियों की मनपसंदीदा पुस्तक है मगर मुश्किल है कि मद्यपान से आदमी का मनमस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उस समय सारी नैतिकता और नारे एक जगह धरे रह जाते हैंं।

आजकल पब का जमाना है और उसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही जाने लगे हैं। मगर पब मेें ड्रिंक करने पर भी वहीं असर होता है जो कलारी में दारु और मधुशाला में मद्यपान करने से होता है। पहले लोग कलारियों के पास अपना घर बनाने ये किराये पर लेने से इंकार कर देते थे पर आजकल पबों और बारों के पास लेने में उनको कोई संकोच नहीं होता। मगर दारु तो दारु है झगड़े होंगे। पीने वाले करें न न पीने वाले उनसे करें। जिस तरह पबों का प्रचलन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे ‘आधुनिक रूप से’ फसाद होंगें। ऐसा ही कहीं झगड़ा हुआ वहां सर्वशक्तिमान के नाम पर बनी किसी सेना ने महिलाओं से बदतमीजी की। यह बुरी बात है। इसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होना चाहिये पर जिस तरह देश के बुद्धिजीवी और लेखक इस घटना पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं वह गंभीरता की बजाय हास्य का भाव पैदा कर रहा है। हमने देखा कि इनमें कुछ बुद्धिजीवी और लेखक मधुशाला के प्रशंसक रहे हैं पर उनको मद्यपान के दोषों का ज्ञान नहीं है। पहले भी कलारियों पर झगड़े होते थे पर उनमें लोग वर्ण,जाति,भाषा और धर्म का भेद नहीं देखते थे-क्योंकि मधुशाला के संदेश का प्रभाव था और सभी झगड़ा करने वाले ‘हमप्याला’ थे। मगर अभी एक जगह झगड़ा हुआ उसमें पब में गयी महिलाओं से बदतमीजी की गयी। यह एक शर्मनाक घटना है और उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी की जा रही पर अब इस पर चल रही निरर्थक बहस में दो तरह के तर्क प्रस्तुत किया जा रहे हैं।

1.कथित प्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोग इसमें अपनी रीति नीति के अनुसार महिलाओं पर अनाचार का विरोध कर रहे हैं क्योंकि मधुशाला में स्त्रियों और पुरुषों के हमप्याला होने की बात नहीं लिखी।
2.गैरप्रगतिवादी लेखक और बुद्धिजीवी महिलाओं के शराब पीने पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ दोनों का हमप्याला होने पर आपत्ति उठा रहे हैं।
हम दोनों से सहमत नहीं हैं।

जहां तक घटना का सवाल है तो हमें यह जानकारी भी मिली है कि वहां कुछ पुरुषों के साथ बदतमीजी की गयी थी। इसलिये केवल महिलाओं के अधिकारों की बात करना केवल सतही विचार है। महिलाओं को शराब नहीं पीना चाहिये तो शायद इस देश के कई जातीय समुदायों के लोग सहमत नहीं होंगे क्योकि उनमें महिलायें भी मद्य का अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार सेवन करती हैं। किसी घटना पर इस तरह की सोच इस बात को दर्शाती हैं कि लोगों की सीमित दायरे में कुछ घटनाओं पर लिखने तक ही सीमित हो रहे हैं। मजे की बात यह है कि मधुशाला पढ़ने वाले हमप्यालों के एक होने पर तो सहमत हैं पर झगड़े होने पर तमाम तरह के पुराने भेद ढूंढ कर बहस करने लगते हैं। बहरहाल इस पर हमारी एक कुछ काव्य के रूप में पंक्तियां प्रस्तुत हैं।

किसी भी घर का बालक हो या बाला
पियक्कड़ हो जाते जो पहुंचे मधुशाला
मत ढूंढों जाति,धर्म,भाषा,और लिंग का भेद
सभी को अमृतपान कराती मधुशाला
नशे में टूट गया, एक जो था गुलदस्ता
हर फूल को अपने से उसने अलग कर डाला
जो खुश होते थे देखकर रोज वह मंजर देखकर
करने लगे आर्तनाद,भूल गये वह थी मधुशाला
मद्यपान की जगह होगी जहां, वहां होंगे फसाद
नाम पब और बार हो या कहें अपनी मधुशाला
……………………………………………

आदमी हो या औरत पीने का मन
किसका नहीं करता
यारों, चंद शराब के कतरों की धारा में
संस्कृति नहीं बहा करती
आस्था और संस्कारों की इमारत
इतनी कमजोर नहीं होती
टूट सकती है शराब की बोतल से
जो संस्कृति वह बहुत दिन
जिंदा रहने की हक भी नहीं रखती
अपने इरादों पर कमजोर रहने वाला इंसान ही
यकीन को जिंदा रखने के लिये जंग की बात करता

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कभी नहीं लगने देंगे नैया पार-व्यंग्य कविता

बना लिया है पूरी दुनिया को
उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार
चला रहे सभी जगह अपना व्यापार
पर टुकड़ों में बांटा है अपना अधिकार
इसलिये देश,धर्म,जाति और भाषा के नाम पर
इंसानों को भी
जमीन पर लकीरें खींचकर बांटते हैं
उसकी अक्ल पर कब्जा रहे
इसलिये चर्चा के लिये
रोज नये मसले छांटते हैं
थामे रखना अपनी सोच अपने पास
कहीं उनको मत बतला देना
वह डुबा सकते हैं तुम्हारी नैया
कभी नहीं लगने देंगे पार
इंसानी खिदमत का दिखावा कर
वह चलाते हैं अपना व्यापार

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कुछ पल आंसू बहाने के बाद सब भूल जाते हैं-हिंदी शायरी

अच्छा लगता है दूसरों की
जंग की बात सुनकर
पर आसान नहीं है खुद लड़ना
दूसरों के घाव देखकर
भले ही दर्द उभरता है दिल में
पर बहता हो जब अपना खून
तब इंसान को दवा की तलाश में भटकना

अपने हथियार से दूसरों का
खूना बहाना आसान लगता है
पर जब निशाने पर खुद हों तो
मन में खौफ घर करने लगता है
दूसरों के उजड़े घर पर
कुछ पल आंसू बहाने के बाद
सब भूल जाते हैं
पर अपना उजड़ा हो खुद का चमन
तो फिर जिंदगी भर
उसके अहसास तड़पाते हैं
बंद मुट्ठी कुछ पल तो रखी जा सकती है
पर जिंदगी तो खुले हाथ ही जाती जाती है
क्यों घूंसा ताने रहने की सोचना
जब उंगलियों को फिर है खोलना
जंग की उमर अधिक नहीं होती
अमन के बिना जिदंगी साथ नहीं सोती
ओ! जंग के पैगाम बांटने वालों
तुम भी कहां अमन से रह पाओगे
जब दूसरों का खून जमीन पर गिराओगे
क्रिया की प्रतिक्रिया हमेशा होती है
आज न हो तो कल हो
पर सामने कभी न कभी अपनी करनी होती है
मौत का दिन एक है
पर जिंदगी के रंग तो अनेक हैं
जंग में अपने लिये चैन ढूंढने की
ख्वाहिश बेकार है
अमन को ही कुदरत का तोहफा समझना
जंग तो बदरंग कर देती है जिंदगी
कर सको भला काम तो
हमेशा दूसरे के घाव पर मल्हम मलना

…………………………………
आकाश में चांद को देखकर
उसे पाने की चाह भला किसमें नहीं होती
पर कभी पूरी भी नहीं होती

शायरों ने लिखे उस पर ढेर सारे शेर
हर भाषा में उस पर लिखे गये शब्द ढेर
हसीनों की शक्ल को उससे तोला गया
उसकी तारीफ में एक से बढ़कर एक शब्द बोला गया
सच यह है चांद में
अपनी रोशनी नहीं होती
सूरज से उधार पर आयी चांदनी
रोशनी का कतरा कतरा उस पर बोती
मगर इस जहां में बिकता है ख्वाब
जो कभी पूरे न हों सपने
उनकी कीमत सबसे अधिक होती
सब भागते हैं हकीकत से
क्योंकि वह कभी कड़वी तो
कभी बहुत डरावनी होती
सूरज से आंख मिला सके
भला इतनी ताकत किस इंसान में होती

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जिसका नहीं कोई सगा, उससे कभी होता नहीं दगा- व्यंग्य कविता

उन आंखों से क्या, दया की चाहत करना
जिनमें शर्म-ओ-हया का पानी सूख गया हो
उन होठों से क्या, मीठे बोल की उम्मीद करना
जिनकी जुबान से प्यार का शब्द रूठ गया हो
उस जमाने से क्या, मदद मांगना
नाम के दोस्त तो बहुत हैं
पर निभाने का मतलब कौन जानता है
मतलब के लिये सब हो जाते साथ
उससे अधिक कौन किसे मानता है
वफा की उम्मीद उनसे क्या करना
जिन्होंने अपना यकीन खुद लूट लिया हो
दगा किसी का सगा नहीं
पर जिसका नहीं कोई सगा
उससे कभी होता नहीं दगा
अपने बनते है कुछ पल के लिये लोग
काम निकल गया तो भूल जाते हैं
वह क्या याद करेंगे फिर
जिन्होंने हमेशा भूलने का घूंट पिया हो

जिनका कोई नहीं बनता अपना
विश्वासघात का खतरा उनको नहीं होता
जुटाते हैं जो भीड़ अपने साथ
रखते हैं उसका स्वार्थ अपने हाथ
पूरा करें या नहीं, ललचाते जरूर हैं
अपने हाथ उठाकर,क्या उनसे मांगना
जिन्होंने ओढ़ ली है बनावटी हरियाली
पर अपना पूरा जीवन ठूंठ की तरह जिया हो

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इधर से उधर-हास्य कविता

अंतरजाल पर एक दूसरे के ब्लोग पर
कमेन्ट लिखते-लिखते
दोनों के दिल मिल गए अपने आप
दोनों युवा थे और कविता लिखने के शौकीन भी
होना था मिलन कभी न कभी
प्रेमी ब्लोगर एक असली नाम से तो
चार छद्म नाम से कमेन्ट लगाता
और प्रेमिका के ब्लोग को हिट कराता
अपना लिखना भूल गया
उसके ब्लोग पर कमेन्ट लगाता
और खुश होता अपने ही आप

एक दिन प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘ कुछ और रचनाएं भी लिखा करो
वरना ब्लोग जगत में बदनाम हो जाओगे
‘केवल कमेन्ट दागने वाला ब्लोगर’कहलाओगे
इससे होगा मुझे भारी संताप

प्रेमिका का आग्रह शिरोधार्य कर
वह लिखने में जुट गया
हो गया मशहूर सब जगह
कमेन्ट लिखने का व्यवहार उसका छूट गया
एक प्रतिद्वंदी ब्लोगर को आया ताव
उसके हिट होने और अपने फ्लॉप होने का
उसके दिल में था घाव
बदला लेने को था बेताब
उसने उसकी प्रेमिका के ब्लोग पर
लगाना शुरू किया कमेन्ट
एक अपने और आठ छद्म नाम से
उसके ब्लोग को हिट कराता
अपनी बेतुकी कवितायेँ करने लगा
उसको हर बार भेंट
प्रेमिका का दिल भी गया पलट
दूसरे में गया दिल गया भटक
पहले ब्लोगर को कमेन्ट देने का
उसका सिलसिला बंद हुआ अपने आप

उधर पहले ब्लोगर ने उसको जब अपने
ब्लोग पर बहुत दिन तक नही देखा
तब उसके ब्लोग का दरवाजा खटखटाया
दूसरे ब्लोगर के कमेन्ट को देखकर
उसे सब समझ में आया
मन में हुआ भारी संताप
उसने भेजा प्रेमिका को सन्देश
‘यह क्या कर रही हो
मुझे लिखने में उलझाकर
तुम कमेन्ट में उलझ रही हो
सच्चे और झूठे प्रेम को तुम
अंतर नही समाज रही
धोखा खाओगी अपने आप’

प्रेमिका ने भेजा सन्देश
‘तुम्हारी रचना से तो उसकी कमेन्ट अच्छी
तुम्हारी रचना दर्द बाँटती हैं
उसकी कवितायेँ दुख के बादल छांटती हैं
अब तो मेरा उस पर ही दिल आ गया
तुम अपना दिल कहीं और लगाना
मत देना अपने को विरह का संताप
सब ठीक हो जायेगा अपने आप

नोट- यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.

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प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं-हिंदी शायरी

उगते सूरज को करें सभी नमन
डूबते से कभी नजर न मिलाएं
कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी
अपने चारों और फैले
पद, पैसा और प्रतिष्ठा की रोशनी को
अपनी ही ऊर्जा से
चमकने वाली समझ बैठता
जब गिरता है तो उसे सब तरफ
अंधेरा नजर आता है
जिस पर करता था भरोसा
वही दुश्मन नजर आता है
फिर भी उस समय देता है
जमाने को दोष
सच से मूँह छिपाता है
जिन्हें सच का ज्ञान है वह ढूंढते हैं
दिल का ही चैन और अमन
शिखर के ऊपर हों या
जमीन पर हों उनके पाँव
किसी भी क्षण में न पछताएँ
—————————–
प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं
घृणा और विवाद फैलाता
खुद आदमी सब जगह
प्रेम की भाषा कभी समझता नहीं
दोष देता है जमाने को
अपने अहंकार को छोड़ता नहीं
———————–

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निरर्थक बहसों में उलझे देश के बुद्धिजीवी-चिंतन आलेख

देश में आतंक के नाम पर निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्रों से ना जोड़ने का आग्रह करने वाले ही इसे जोड़ते भी दिख रहे हैं. यह कैसे संभव है कि आप एक तरफ यह कहें के आतंकियों का कोई धर्म, भाषा और जाति नहीं है दूसरी तरफ उसी उनके समूहों की तरफ से सफाई भी देते फिरें. आश्चर्य की बात है कि अनेक बुद्धजीवी तो भ्रमित हैं. उनके भ्रम का निवारण करना तो बहुत कठिन है.

वैसे तो किसी भी प्रकार कि हिंसा को किसी धर्म,भाषा या जाति से जोड़ना ठीक नहीं पर कुछ लोग ऐसा कहते हुए बड़ी चालाकी से इनका आधार पर बने समूहों का वह प्रशस्ति गान करते हैं. तब फिर एक आम आदमी को यह कैसे समझाया जा सकता है कि इन अपराधिक घटनाओं को सहजता से ले. हालत तो और अधिक खराब होते जा रहे हैं पर कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक खुराक के लिए सतही विचारों को जिस तरह व्यक्त कर रहे हैं वह चिंताजनक है. उनके विचारों का उन लोगों पर और भे अधिक बुरा प्रभाव पडेगा जो पहले से ही भ्रमित है.

कुछ बुद्धिजीवी तो हद से आगे बाद रहे हैं. वह कथित रूप से सम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए एस समुदाय विशेष को अधिक सक्षम मानते हैं. अपने आप में इतना हायास्पद तर्क है जिसका कोई जवाब नहीं है. वैसे तो हम देख रहे है कि देश में बुद्धिजीवि वर्ग विचारधाराओं में बँटा हुआ है और उनकी सोच सीमित दायरों में ही है. इधर अंतरजाल पर कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जो स्वयं अपना मौलिक तो लिखते नहीं पर पुराने बुद्धिजीवियों के ऐसे विचार यहाँ लिख रहे हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वैसे देखा जाए तो पहले प्रचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे तब कहीं भाषण सुनकर या किताब पढ़कर लोग अपनी राय कायम थे. अनेक लोग तब यही समझते थे कि अगर किसी विद्वान ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा. अब समय बदल गया है. प्रचार माध्यम की ताकत ने कई ऐसे रहस्यों से परदा उठा दिया है जिनकी जानकारी पहले नहीं होती थी. अब लोग सब कुछ सामने देखकर अपनी राय कायम करते हैं। ऐसे में पुरानी विचारधाराओं के आधार पर उनको प्रभावित नहीं करती।

अमरीकी सम्राज्यवाद भी अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है और अब इस देश के लोग तो वैसे ही ऐसी बातों में नहीं आते। अमेरिका कोई एक व्यक्ति, परिवार या समूह का शासन नहीं है। वहां भी गरीबी और बेरोजगारी है-यह बात यहां का आदमी जानता है। अमेरिका अगर आज जिन पर हमला कर रहा है तो वही देश या लोग हैं जो कभी उसके चरणों में समर्पित थे। अमेरिका के रणनीतिकारों ने पता नहीं जानबूझकर अपने दुश्मन बनाये हैं जो उनकी गलतियों से बने हैं यह अलग रूप से विचारा का विषय है पर उसके जिस सम्राज्य का जिक्र लोग यहां कर रहे हैं उन्हें यह बात समझना चाहिये कि वह हमारे देश पर नियंत्रण न कर सका है न करने की ताकत है। अभी तक उसने उन्हीं देशों पर हमले किये हैं जो परमाणु बम से संपन्न नहीं है। उससे भारत की सीधी कोई दुश्मनी नहीं है। वह आज जिन लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहा है पहले ही उसके साथ रहकर मलाई बटोर रहे थे। अब अगर वह उनके खिलाफ आक्रामक हुआ है तो उसमें हम लोगों का क्या सरोकार है?

अमेरिकी सम्राज्य का भ्रम कई वर्षों तक इस देश में चला। अब अमेरिका ऐसे झंझटों में फंसा है जिससे वर्षों तक छुटकारा नहीं मिलने वाला। इराक और अफगानिस्तान से वह निकल नहीं पाया और ईरान में भी फंसने जा रहा है, मगर इससे इसे देश के लोगों का कोई सरोकार नहींं है। ऐसे में उससे लड़ रहे लोगों के समूहों का नाम लेकर व्यर्थ ही यह प्रयास करना है कि वह अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ सक्षम हैं। देश में विस्फोट हों और उससे अपराध से अलग केवल आतंक से अलग विषय में देखना भी एक विचार का विषय है पर उनकी आड़ में ऐसी बहसे तो निरर्थक ही लगती हैं। इन पंक्तियों का लेखक पहले भी अपने ब्लागों परी लिख चुका है कि इन घटनाओं पर अपराध शास्त्र के अनुसार इस विषय पर भी विचार करना चाहिये कि इनसे लाभ किनको हो रहा है। लोग जबरदस्ती धर्म,जातियों और भाषाओं के समूहों का नाम लेकर इस अपराध को जो विशिष्ट स्वरूप दे रहा है उससे पैदा हुआ आकर्षण अन्य लोगों को भी ऐसा ही करने लिये प्रेरित कर सकता है। दरअसल कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आतंक के नाम फैलायी जा रही हिंसा कहीं व्यवसायिक रूप तो नहीं ले चुकी है। यह खौफ का व्यापार किनके लिये फायदेमंद है इसकी जांच होना भी जरूरी है पर इसकी आड़ में धर्म,भाषा और जातियों को लेकर बहस आम आदमी के लिये कोई अच्छा संदेश नहीं देती।
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ब्रहमाण्ड का रहस्य जानने का प्रयास नाकाम तो होना ही था-व्यंग्य

महामशीन के रूप में चर्चित महादानवीय मशीन का प्रयोग अब रुक गया है। अगर आज के सभ्य समाज में महिमा मंडित विज्ञान के भ्रम का चरम रूप देखना है तो इस मशीन को देखा जा सकता है। बात अगर ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानने की है तो वह केवल पंचतत्वों की कार्य परिधि में नहीं देखा जा सकता है। छठा तत्व है वह सत्य जो इनमें प्रविष्ट होकर फिर निकल गया पर यह पांच तत्व-आकाश, प्रथ्वी,जल,वायु, अग्नि-उसके बचे अंशों से विस्तार पा गये। इस संबंध में पहले ही अपने लेख में कह चुका हूं कि वह सत्य तत्व विज्ञान के किसी भी प्रयास से यहां नहीं लाया जा सकता। उसे कभी देखा तो नहीं पर अनुभव किया जा सकता है और उसके लिये एक ही उपाय है ध्यान। ध्यान में ही वह शक्ति है जो उस सत्य की अनुभूति की जा सकती है।

दरअसल ज्ञान के बाद जो विज्ञान की कार्य शुरु होता है उसमें उपयोग किये जाने वाले साधन शक्तिशाली होते हैं पर वह यही प्रथ्वी पर उत्पन्न वस्तुओं से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। ब्रह्माण्ड के जन्म का रहस्य भारतीय अध्यात्म ग्रंथों में वर्णित है साथ ही यह भी कि उस सत्य की महिमा और वर्णन अत्यंत व्यापक है जिसे कोई ज्ञानी ही अनुभव कर सकता है। ब्रह्माण्ड का रहस्य ने जिन पांच तत्वों से अपनी मशीन बनाई उसमें वह छठा तत्व कभी भी शामिल नहीं कर सकते अतः उन्हें अपने ज्ञान से ही उसका रहस्य समझना होगा। बेकार में इतना धन और परिश्रम कर रहे हैं।

मैंने अपने लेख में लिखा था कि अब वर्तमान में वैज्ञानिकों के पास बस एक ही बड़ा लक्ष्य रह गया है कि वह सूर्य की ऊर्जा का संग्रह करने वाला कोई ऐसा संयत्र बनायें जिससे पैट्रोल और परमाणु सामग्री के बिना ही वर्तमान विश्व का संचालन हो। वैसे उन्होंने अभी तक जो साधन बनाये हैं वह अधिक उपयोग नहीं है इसलिये विश्व अभी पैट्रोल पर अधिक निर्भर है। इस संबंध में मेरा लिखा गया लेख पुनः प्रस्तुत है।

ब्रह्माण्ड को जानने के लिये महादानव का प्रयास-व्यंग्य आलेख hasya vyangya
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महामशीन का महाप्रयोग हो गया। कुछ समय तक उसे महादानव कहकर भी प्रचारित कर प्रचार माध्यमों ने आम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। संभवतः लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था इसलिये उसका नकारात्मक प्रचार कर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने उस महामशीन का नाम प्रतिष्ठित किया। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि नाम करने के लिये बदनाम होने को भी कुछ लोग तैयार हो जाते हैं। कहते हैं कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है‘। शायद इसी तर्ज पर तमाम तरह की बातें की गयीं।

भारतीय संचार माध्यमों को भी अपने लिये चार दिन तक खूब सक्रियता दिखाकर अपने ग्राहकों को संतुष्ट करने का सुंदर अवसर मिला। विज्ञान की फतह-हां, यही शब्द प्रयोग किया है प्रचार माध्यमों ने उस सफल प्रयोग के लिये। पहले महादानव अब महादूत बन गया लगता है। आजकल यह भी एक तरीका हो गया है कि पहले किसी को दानव बनाओ फिर देवदूत। इससे किसी विषय को लंबा खींचने का अवसर तो मिलता ही है उससे वह व्यक्ति भी संतुष्ट हो जाता है जिससे बदनाम किया गया पर ऐक बेजान मशीन को जिस तरह प्रचारित किया गया उसे प्रचार के बाजार में सक्रिय लोगों की तारीफ करने का मन करता है।

अब बात करें उस महादानव या महामशीन की जिसे आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गयी है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पति के रहस्य को जानना चाहते हैं। आश्चर्य है कि जो विषय विज्ञान की परिधि से कोसों दूर है वह उस पर काम कर रहे हैं। दुनियां की कोई शय उस रहस्य को नहीं देख सकती। जीवन से पहले और मृत्यु के बाद के रहस्य विज्ञान की शक्ति से बाहर हैं। उन्हें वही ज्ञानी जान सकता है जिसने अपनी इस देह से तपस्या की हो। यह काम हमारे ऋषि और मुनि कर चुके हैं। उन्होंेने इस ब्रह्माण्ड की उत्पति का रहस्य पहले ही बता दिया है।

उसकी संक्षिप्त कहानी इस तरह है कि सत्य बरसों तक ऐसे ही पड़ा हुआ था। उसे इतना समय व्यतीत हो गया कि वह स्वयं को असत्य समझने लगा तब वह प्रयोग करने निकला। पांच तत्व (प्रथ्वी,आकाश.जल.आकाश.और वायु) कणों के रूप में-जिन्हें आधुनिक भाषा में अणु भी कह सकते हैं-उसके समक्ष पड़े हुए थे। वह उनमें दाखिल हो गया तो उस देखने, सुनने सूंघने, और स्पर्श करने का अवसर मिला। वह इन तत्वों से निकल आया पर उसके अंश इसमें छूट गये और वह पांचों तत्व बृहद रूप लेते गये। उनके आपसी संपर्क से ब्रहमाण्ड का सृजन हुआ। यह कथा व्यापक है और इस पर चर्चा आगे भी की जा सकती है।

हमारे देश के ज्ञानी महापुरुषों ने पहले ही इसे जान लिया है। अब विज्ञान की बात करे लें। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों तक ही कार्य कर सकता है। उन्होंने इस महाप्रयोग में जिन भी चीजों का उपयोग किया वह कहीं न कहीं इसी धरती पर मौजूद हैं। यानि पांच तत्वों में एक तत्व। फिर जल, वायु और अग्नि का भी उन्होंने उपयोग किया होगा। चलो यह भी मान लिया। उन्होंनें आकाशीय तत्व के रूप में गैसों का भी प्रयोग किया होगा। हां, इसके बिना सब संभव नहीं है। मगर वह सत्य का तत्व जो निर्गुण, निराकार, और अदृश्य है उसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। उसे कोई छू नहीं सकता, उसे कोई देख नहीं सकता और जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है उस सत्य तत्व का प्रयोग केवल कोई तपस्वी ही कर सकता है। उस सत्य तत्व की केवल अनुभूति की जा सकती है और उसके लिये ध्यान और योग की प्रक्रिया है। जो इन प्रक्रियाओं से गुजरते हैं वही उसकी अनुभूति कर पाते हैं।

भारतीय अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति इस सत्य का जानता है फिर यह कौनसे ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने का प्रयास कर रहे है। यह अलग बात है कि अंग्रेजी की शिक्षा पद्धति ने लोगों को अपना अध्यात्मक भुला दिया है पर फिर भी कुछ लोग हैं जो इस सत्य का धारण किये रहते हैं। आधुनिक विज्ञान मंगल और बृहस्पति तक पहुंच गया है। हो सकता है वह सूर्य तक भी पहुंच जाये। वह ब्रह्माण्ड के अंतिम सिरे तक पहुंच जाये पर वह सत्य उसे नहीं दिखाई देगा। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के साथ ही विज्ञान का भी पोषक है। श्रीमद्भागवत गीता में विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। क्योंकि धर्म की रक्षा के लिये अस्त्रों और शस्त्रों का प्रयोग अवश्यंभावी होता है इसलिये विज्ञान का विरोध करना तो मूर्खता है पर उसकी सीमाऐं हैं यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
हमारे देश ने एक समय योग साधना और ध्यान को नकार दिया था। पश्चिम से आयातित इलाज को ही प्राथमिकता दी जाने लगी। अब यह रहस्य तो सभी जगह उजागर है कि आधुनिक चिकित्सा के पास रोग को रोकने की क्षमता है पर मिटाने की नहीं। इसलिये अब डाक्टर ही अपने मरीजों को योगसाधना करने का मशविरा देते हैं। यानि भारतीय ज्ञान की अपनी महिमा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिम विज्ञान ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया है जबकि उसका तो कोई वजन है ही नहीं। आदमी मर जाता है तो उसका इतना वजन इसलिये कम हो जाता है क्योंकि कुछ हवा पानी म्ृत्यु के समय निकल जाता है। भारतीय और पश्चिम के विज्ञान बारंबार कहते हैं कि उनको ं ब्रह्माण्ड का रहस्य जानना है मगर पांच तत्वों के मेल से बने इस ब्रह्माण्ड को जानने के लिये क्या वैज्ञानिकों से किसी छठे तत्व को भी अपने प्रयोग को शामिल किया था। अरे, भई वह छठा तत्व किसी की पकड़ में नहीं आ सकता।

दुनियां का सबसे बड़ा प्रयोग-यही नाम उसे दे रहे हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों के पास कोई काम नहीं बचा है। हमारे हिसाब से वैज्ञानिकों के पास एक काम है जिस पर वह नाकाम हो रहे हैं। वह यह कि बिना तेल के कार,स्कूटर,वायुयान और घर की बिजली जल सके इस पर उनको काम करना चाहिये। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसकी तरफ अनेक वैज्ञानिक इशारा करते हैं। अगर वैज्ञानिको को करना ही है तो ऐसे यंत्र बनाये जो कि सूर्य से इस धरती पर आने वाली ऊर्जा का संयच तीव्र गति से कर सकें और बिना तेल और लकड़ी के लोगों का खाना बन सके। अभी तक तो धरती पर मौजूद तेल,गैस और अन्य रसायनों के भंडारों से ही सारा संसार चल रहा है। मतलब यह कि अभी धरती पर ही विजय नहीं पायी और आकाश में ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने चले हैं। अनेक लोग बिचारे रोज अखबार और टीवी इसलिये ही खोलकर देखते हैं कि कहीं कोई ऐसी चीज बनी गयी क्या जिससे बिना तेल और बिजली के उनका काम चल सके। स्कूटर चलाने के लिये अभी भी पैट्रोल पंप पर जाना पड़ता है और गैस के लिये फोन करना पड़ता हैं। कंप्यूटर चलाने के लिये लाईट खोलना पड़ती है। यह सब सौर ऊर्जा से हो जाये तो फिर माने कि विश्व के वैज्ञानिकों ने तरक्की की है।

जहां तक इन पश्चिमी वैज्ञानिकों की बात है वह अनेक तरह के अविष्कारों से नये नये साधन बना चुके हैं पर ऊर्जा के मामले में फैल हैं। परमाणु ऊर्जा का नाम बहुत है पर उसे केवल बम की वजह से जाना जाता है जो अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये थे। अगर उससे कुछ बिजली बनी भी है तो वह कोई समस्या का हल नहीं हैं। बात तो तब मानी जाये जैसे स्कूटर हर कोई आदमी चला लेता है वैसे ही उसके पास ऐसे साधन भी हों कि वह घर बैठे ही सूर्य से ऊर्जा एकत्रित कर उसे चला सके। कहीं ऐसा तो नहीं पश्चिम के वैज्ञानिक केवल उसी स्तर तक काम करते हों जहां तक आम आदमी सुविधाओं का दास बने और स्वतंत्र रूप से विचरण न कर सकें। इस महाप्रयोग का प्रचार कितना भी हो पर वह छठा तत्व-जिसे वैज्ञानिक जानने का प्रयास ही नहीं कर रहे-विज्ञान के कार्य करने की परिधि से बाहर है, यह बात तय है।
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शायद ऐसे ही सजता है अखबार-हास्य कविता

हादसों की ख़बरों से भरा हुआ अख़बार
ढूंढ रहे हैं शब्द लोग
अपने दिल को लुभाने वाले
विज्ञापनों से सजा रंगीन पृष्ठ
ढेर सारे शब्दों की पंक्तियों से
गुजर जाती हैं दृष्टि
पर बैचेनी बढाते जाते हैं शब्द
कहीं सूखे हैं अकाल से
तो कहीं उफनते हैं वर्षा से नदी और नाले
कही चटके हैं किसी घर के ताले
कही पकड़े हैं नकली माल बनाने वाले
चमकता लगता है
बहुत सारे हादसों से अख़बार

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श्रीगीता की अन्य धार्मिक ग्रंथों से तुलना करना ठीक नहीं-चिंतन hindu religion

धर्म को लेकर अब अधिक चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्वों के बारे में कम उससे मानने वाले लोगों के आचरण पर ही अधिक तथ्य रखे जा रहे हैं। आजकल तो चारों तरफ बहस हो रही है और एकता करने के लिये शोर मचाया जा रहा है। वाद और नारों के जाल में फंसे बुद्धिजीवियों की अपनी सीमायें हैं और भारतीय अध्यात्म ज्ञान से रहित होते हुए भी धर्म पर ऐसे बोलते हैं जैसे कि उनका लिखा या बोला ही अंतिम सत्य है। अभी एक जगह तीन धर्मों की पुस्तकों की चर्चा करते उनको भूल जाने और आपस में भाईचारा लाने की बात एक नारे के रूप में कही गयी-इसमें भारतीय अध्यात्म की मुख्य स्त्रोत गीता का नाम भी था। दो अन्य धर्मों की पुस्तकों का नाम भी था पर यहां हम केवल श्रीगीता के मसले पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि आजकल जो वातावरण है कि उसमें किसी दूसरे धर्म की चर्चा करने पर वाद प्रतिवाद का जो दौर शुरु होता है तो वह किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता।
श्रीगीता अन्य धार्मिक ग्रंथों के मुकाबले शब्दों के मामले में कम है पर इस जीवन सृष्टि का सभी तत्वों का संपूर्ण सार केवल उसी में है। यह दुनियां की एकमात्र ऐसा ज्ञान संग्रह है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान की भी चर्चा है। इसे पढ़ने और समझने वाले ज्ञानी ही जानते हैं कि अत्यंत सरल शब्दों में जीवन और सृष्टि के रहस्यों का वर्णन करने वाले इस ग्रंथ में कोई लंबा चैड़ा ज्ञान नहीं है जो किसी के समझ मेें नही आये पर इसके महत्व को प्रतिपादित करने वाले ही इसके असली संदेश गोल कर जाते हैं ताकि वह सुनने वालों की नजरों में ज्ञानी भी कहलायें और दूसरा कोई ज्ञानी बनकर उनको चुनौती भी न दे।

जहां तक श्रीगीता के ज्ञान का प्रश्न है तो उसमें
1.कहीं भी हिंसा का समर्थन नहीं किया गया।
2.उसमें मनुष्य को योग और भक्ति के द्वारा स्वयं ही शक्ति संपन्न होने की प्रेरणा दी गयी है।
3.उसमें विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है ताकि धर्म की रक्षा हो सके। एक तरह से मानव समाज के नित नये स्वरूपों के साथ जुड़ने के लिये प्रेरित किया गया है क्योंकि उसमें वर्णित ज्ञान की रक्षा तभी संभव है।
4.व्यक्ति किस और कितने तरह के होते हैं इसके लिये उसमें पहचान बताई गयी है और श्रेष्ठ मनुष्य के लिये जो मानदंड बताये गये हैं वह एक आईने का काम करते हैं।

उसमें कहीं भी
1. चमत्कारों के आकर्षण का वर्णन नहीं है
2. मनुष्य द्वारा मनुष्य को हेय देखने का संदेश नहीं दिया गया।
3.किसी प्रकार की पूजा पद्धति या देवता की उपासना या किसी व्यक्ति की महिमा का बखान नहीं किया गया। न ही किसी कर्मकांड या रूढि़यों की स्थापना उसमें की गयी है।
श्रीगीता की किसी अन्य पुस्तक से तुलना करना ही हैरानी की बात है। इस तरह वाद पर चलने और नारे लगाने वाले केवल अखबार पढ़ कर ही अपनी विचारधारा बना लेते हैं। देखा जाये तो अन्य सभी धार्मिक पुस्तक से श्रीमद्भागवत गीता की तुलना ही नहीं हैं। जिन लोगों को लगता है कि श्रीगीता का भुलाने से राष्ट्र में एकता स्थापित हो जायेगी तो उनको यह भी समझ लेना चाहिये कि बात केवल पुस्तक के नाम की नहीं बल्कि उसके ज्ञान उसे धारण करने की भी है। अन्य धार्मिक पुस्तकें इतनी बड़ी हैं कि आज के संघर्षमय युग में किसी को उसे फुरसत ही नहीं है और जो पढ़ते हैं वह अपने हिसाब से दूसरों को उनके निजी जीवन में निर्णय लेने के लिये पे्ररित करते हैं। कई बार तो पारिवारिक विवादों में भी उनसे उदाहरण लिये जाते हैं। कई धार्मिक पुस्तकें तो केवल समाज को सांसरिक संबंधों के बारे में संदेश देती हैं और साथ ही उनके सामने कर्मकांडों के निर्वहन की शर्त भी रखती हैं जबकि श्रीगीता के संदेशों में ऐसा नहीं है।
समस्या श्रीगीता को भूलने की नहीं बल्कि उसका ज्ञान धारण न करना ही हैं। धार्मिक पुस्तकों पर प्रतिकूल टिप्पणियां होने से सामान्य आदमी बौखला जाता है और अल्पज्ञानी उसमें से ज्ञान के अंश निकालकर उसके महत्व का प्रतिपादित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह केवल सुनता है और पूछने पर यही कहता है कि -‘पहले पढ़ लो फिर आकर बात करना।’
श्रीगीता के ज्ञान के बाद महाभारत युद्ध हुआ था पर उसमें श्रीभगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यह ‘युद्ध तू मेरे लिये कर और उसका परिणाम मेरे ऊपर छोड़’
उन्होंने अपना वादा निभाया। अर्जुन को पाप का भागी नहीं बनने दिया क्योंकि उनके उस भक्त ने अपनी देह का त्याग किसी का तीर खाकर नहीं छोड़ी, जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने परमधाम गमन से पहले उसी हिंसा के प्रतिकार में एक बहेलिये का तीर अपने पांव पर लेकर यह स्पष्ट संदेश मानव समाज को दिया कि अहिंसा ही भविष्य की सभ्यताओं के लिये श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने महाभारत में स्वयं कहीं भी हिंसा नहीं की पर उसका परिणाम स्वयं ही लेकर यह साबित किया कि वह एक योगेश्वर थे।
सच तो यह है कि लोग केवल भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं पर उनके जीवन चरित्र से कुछ नहीं सीखते। लोगों को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने नकारा बना दिया है। वह केवल बहसें करते हैं वह भी अर्थहीन। किसी निष्कर्ष पर तो आज तक कोई पहुंचा ही नहीं है-जिस तरह की बहसें चल रही हैं उससे तो लगता भी नहीं है कि किसी नतीजे पर पहुंचेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के उपदेशों का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही करने का निर्देश दिया है क्योंकि उस पर केवल चलने के लिये पहले यह जरूरी है कि उनकी निष्काम भक्ति की जाये।
आखिरी बात यह है कि अन्य धार्मिक ग्रंथ कथित रूप से कहते हैं कि ‘प्रेम करो’,‘अहिंसा धर्म का पालन करो’, परमार्थ करो और अपनी नीयत साफ रखो’, पर वह यह नहीं बताते है कि पांच तत्वों से बनी इस देह में जो शारीरिक,मानसिक और वैचारिक विकार एकत्रित होते हैं उनका निष्कासन कैसे हो? जब तक यह विकार है आदमी प्रेम कर ही नहीं सकता, हिंसा तो हमेशा उसके मन में रहेगी और परमार्थ भी करेगा तो दिखावे का।

श्रीगीता उसका उपाय बताती है कि उसके लिये लिये योगसाधना, ध्यान और गायत्री मंत्र का जाप करो। उससे शरीर के विकार निकल जाते हैं और आदमी स्वतः भी निष्काम भक्ति के भाव को प्राप्त होता है। उसे प्रेम करने के लिये सीखने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही परमार्थ करने के लिये वह किसी के संदेश का इंतजार नहीं करता। दूसरे धर्म ग्रंथो में आंखों से अच्छा देखने, कानों से सुनने और मन में अच्छा विचार करने का उपदेश देते हैं पर श्रीगीता तो मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने का तरीका बताती है जिससे वह स्वचालित ढंग से इन सब बातों के लिये प्रेरित होता है। उसे किसी से कुछ सीखने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।

बाकी धर्म ग्रंथों की क्या महत्ता है यह तो उनको पढ़ने वाले जाने पर श्रीगीता को पढ़ने वाले इसके बारे में प्रतिकुल टिप्पणी होने पर भी नहीं बौखलाते क्योंकि वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। स्पष्ट है कि जिस वातावरण में सामान्य आदमी रह रहा है, भोजन कर रहा है या पानी पी रहा है उसका उस प्रभाव होगा उसी के अनुसार ही वह दूसरे से अनुकूल प्रतिकूल व्यवहार करेगा। रहने वाले तो श्रीगीता का अध्ययन करने वाले भी कोई आसमान में नहीं रहते वह भी यहां पर्यावरण प्रदूषण झेल रहे हैं पर वह जब अपने सामने समस्याओं का जंगल देखते हैं तो यही कहते हैं कि ‘मुझे अपने पर नियंत्रण रखना चाहिये दूसरा ऐसा करे यह जरूरी नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कितना है उतना ही तो वह करेगा।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

आतंकी हिंसा पर बुद्धिजीवियों की निरर्थक बहस-संपादकीय

एक शवयात्रा में दो आदमी पीछे जा रहे थे
एक ने कहा-‘बेकार आदमी था। किसी के काम का नहीं था’
दूसरे ने कहा-‘नहीं कैसी बात करते हो। वह दरियादिल आदमी थी। मेरे तो दस काम किये। कभी काम के लिये मना नहीं किया।
दूसरे ने कहा-‘मेरे भी उसने दस काम किये पर एक काम के लिये मना लिया। इसलिये ही तो कहता हूं कि वह ठीक आदमी नहीं था। अगर होता तो एक काम के लिये मना क्यों करता?’

उनके पीछे एक आदमी चल रहा था। उसने पूछा‘-आप यहा तो बताओ। उसका देहावसान कैसे हुआ। क्या बीमार थे? क्या बीमारी थी?’
दोनों ने कहा‘-हमें इससे क्या मतलब हमें तो शवयात्रा में दिखावे के लिये शामिल हुए हैं।’
वह तीसरा आदमी चुपचाप उनके पीछे चलता रहा।’
उसने देखा कि दोनों के साथ उनके समर्थक भी जुड़ते जा रहे थे। कोई मृतक की बुराई करता कोई प्रशंसा। तीसरा आदमी सबसे मृत्यु की वजह पूछता पर कोई नहीं बताता। एक ने तो कह दिया कि अगर हमारी चर्चा में शामिल नहीं होना तो आगे जाकर मुर्दे को कंधा दे। देख नहीं रहा हमारे उस्ताद लोग बहस में उलझे हैं।’
यह कहानी एक तरह देश में चल रही अनेक बहसों के परिणामों का प्रतीक है। देश में बढ़ती कथित आंतकी हिंसा घटनाओं के बाद प्रचार माध्यमों में अनेक तरह की सामग्री देखने को मिलती है। बस वही रुटीन है। ऐसी घटनाओं के बाद सभी प्रचार माध्यम रटी रटाई बातों पर चल पड़ते हैं। अखबारों में तमाम तरह के लेख प्रकाशित होते हैं। इन घटनाओं के पीछे ऐसी कौनसी बात है जो किसी की समझ में नहीं आ रही और इनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।
अभी दिल्ली में हुए हादसे के बाद अगर प्रचार माध्यमों-जिनमें अंतर्जाल पर ब्लाग भी शामिल हैं-में आये आलेखों को देखा जाये तो एक बात साफ हो जाती है कि लोगों की सोच वहीं तक ही सीमित है जहां तक वह देख पाते हैं या जो उनको बताया जाता है। न तो उनमें मौलिक चिंतन करने की क्षमता है और न ही कल्पना शक्ति।

वैसे तो तमाम तरह की खोजबीन का दावा अनेक लोग करते हैं पर इन आतंकी हिंसक घटनाओं के पीछे का राजफाश कोई नहीं कर पाता। नारों और वाद पर चलते बुद्धिजीवी भी गोल गोल घूमते हुए रटी रटाई बातें लिखते हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया कि जिसमें भारतीय पढ़ खूब लेते हैं पर फिर भूल जाते हैं।
आतंकी हिंसा अपराध है और अपराध शास्त्र के अनुसार तीन कारणों से लोग गलत काम करते हैं-जड़ (धन), जोरु (स्त्री) और जमीन। वैसे तो अपराध शास्त्र के विद्वान बहुत होंगे पर हर आम आदमी को उसका मूल सिद्धांत पता है कि इन तीन कारणों से ही अपराध होते हैं।’

अब सवाल यह है कि आतंकी हिंसा क्या अपराध शास्त्र से बाहर हैं और लोग मानकर चले रहे हैं कि यह अपराध से अलग कोई घटना है। देखा जाये तो आतंकी हिंसा के विरुद्ध सब हैं पर बहसें हो रही हैं धर्म,भाषा और जाति के लेकर। इतिहास सुनाया जा रहा है और वाद और नारे लग रहे हैं। देश के बुद्धिजीवियों पर तरस आता है। आतंकी हिंसा में सबसे अधिक कष्ट उन लोगों का होता है जिनका नजदीकी मारा जाता है। उनसे हमदर्दी दिखाने की बजाय लोग ऐसी बहसें करते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं है। और तो छोडि़ये लोगों ने इस आतंकी हिंसा को भी सभ्य शब्द दे दिया‘आतंकवाद’। फिर वह किसी दूसरे वाद को लेकर फिकरे कस रहे हैं?

ऐसी चर्चायें दो चार दिन चलतीं हैं फिर बंद हो जातीं हैं। जिनके परिवार का सदस्य मारा गया उनकी पीड़ा की तो बाद में कोई खबर नहीं लेता। इसी बीच कोई अन्य घटना हो जाती है और फिर शुरू हो जाती है बहस। कोई इस बात में दिलचस्पी नहीं लेता कि आख्रि इस हिंसा में किसका फायदा है? यकीनन यह फायदा आर्थिक ही है। सच तो यह है कि यह एक तरह का व्यवसाय बन गया लगता है। अगर नहीं तो इस सवाल का जवाब क्या है कि कोई इन घटनाओं के लिये कैसे पैसे उपलब्ध कराता है। जो लोग इन कामों में लिप्त हैं वह कोई अमीर नहीं होते बल्कि चंद रुपयों के लिये वह यह सब करते हैं। तय बात है कि यह धन ऐसे लोग देते हैं जिनको इस हिंसा से प्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है। यह फायदा उनको ऐसे व्यवसायों से होता है जो समाज के लिये बुरे माने जाते हैं और उसे निरंतर बनाये रखने के लिये समाज और प्रशासन का ध्यान बंटाये रखना उनके लिये जरूरी है और यह आतंकी हिंसा उनके लिये मददगार हो।
कुछ जानकार लोगों ने दबी जबान से ही सही यह बात लिखी थी कि जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब वहां से भारत और पाकिस्तान के बीच दो नंबर का व्यापार दोगुना बढ़ गया। कभी इस पर अधिक बहस नहीं हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों और सरकारों का ध्यान बंटाने के लिये इस तरह की घटनायें करवायीं जाती हों।
जहां तक किसी समूह विशेष से जोड़ने का सवाल है तो ऐसी हिंसा कई जगह हो रही है और उसमें जाति, धर्म, भाषा ओर वर्ण के आधार पर बने समूह लिप्त हैं। यह सच है कि जब कहीं ऐसी घटना होती है तो उसकी जांच स्थानीय स्तर पर होती है पर राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय अपराध विशेषज्ञों को अब इस बात पर दृष्टिपात करना चाहिये कि इसके लिये धन कौन दे रहा है और उसका फायदा क्या है?’

धर्म, जाति, और भाषा के नाम पर समूह बने भ्रम की राह पर चले रहे हैं और तय बात है कि इसी का लाभ उठाकर आर्थिक लाभ उठाने का प्रयास कई तरह से हो रहा है-यह अलग से चर्चा का विषय है पर ऐसे मामलों में हम उनका नाम लेकर अपराधियों का ही महिमा मंडल करते हैं। अगर इनके आर्थिक स्त्रोतो पर नजर रखते हुए काम किया जाये तभी इन पर नियंत्रण किया जा सकता है।
धर्म,जाति,भाषा और वर्ण के आधार पर कौन कितना अपने समूह का है सब जानते हैं। अमरीका ने पहले इस बात के प्रयास किये कि इनके इस प्रकार के हिंसातंत्र को प्रायोजित करने वाले आर्थिक स्त्रोतों पर ही वह हमला करेगा पर लगता है कि वह इराक युद्ध में उलझकर स्वयं भी भूल गया। यह धन अपने हाथ से कौन दे रहा है उसका पता लग जाये तो फिर यह पता लगाना भी जरूरी है कि उसके पास पैसा कहां से आया? इनके पास पैसा उन्हीं व्यवसायों से जुड़ लोगों से आता होगा जिनमें धर्म के दूने जैसा लाभ है। यह हो सकता है कि ऐसा व्यवसाय करने वाले सीधे आतंकी हिंसा करने वालों को पैसा न दें पर उनसे पैसा लेने वाले कुछ लोग इसलिये भी ऐसी हिंसा करा सकते हैं कि इससे एक तो उनको धन देन वाले चुपचाप धन देते रहें और दूसरा दो नंबर का काम करने वालों का धंधा भी चलता रहे।

जड़,जोरू और जमीन से अलग कोई अपराध नहीं होता। चाहे देशभर के बुद्धिजीवी शीर्षासन कर कहें तब भी वह बात जंचती नहीं। विचारधाराओं और कार्यशैली पर विभिन्न समूहों में मतभेद हो सकते हैं पर किसी में ऐसी ताकत नहीं है जो बिना पैसे कोई लड़ने निकल पड़े और पैसा वही देगा जिसका कोई आर्थिक फायदा होगा। कहीं कहीं आदमी डर के कारण चंदा या हफ्ता देता है पर वह इसलिये क्योंकि तब वह अपने अंदर शारीरिक सुरक्षा का भाव उत्पन्न होने के साथ उसका व्यापार भी चलता है। इधर यह भी हो रहा है कि अपराधियों का महिमा मंडन भी कम नहीं हो रहा। यही कारण है कि लोग प्रचार के लिये भी ऐसा करते हैं जो अंततः उनके आर्थिक लाभ के रूप में ही परिवर्तित होता है। जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनके प्रचारकों को प्रचार माध्यम उनकी तरफ से सफाई देते हुए दिखाते हैं। सच तो यह है कि आतंकी हिंसा की आड़ में अनेक लोगों ने नाम और नामा कमाया है और यह सब पैसा कहीं न कहीं देश के लोगों की जेब से ही गया है। हालांकि इनके आर्थिक स्त्रोतों का पता स्थानीय स्तर पर नहीं लग सकता। इसके लिये आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय लोग इसके लिये सक्रिय हों। इसके लिये जरूरी है कि देश में चल रहे दो नंबर के व्यवसायियों में कौन किस किस को धन देते हैं और उसका उनको क्या लाभ है यह देखा जाना जरूरी है। अनेक अपराधी पकड़ जाते हैं पर असली तत्व दृष्टिगोचर नहीं होते। हो सकता है कि हिंसा करने वाले कंपनियों के रूप में सक्रिय हों पर उनके कर्ताधर्ता का पता लगाना जरूरी है।

बुद्धिजीवी लोग इन हिंसक घटनाओं से उत्पन्न बिना मतलब के विषयों पर चर्चा के इस पर बहस क्यों नहीं करते कि आखिर इसका लाभ किसको कैसे हो सकता है। अगर यही बहसों का हाल रहा तो एक दिन देश को आतंकवाद के मसले पर विश्व में मिल रही सहानुभूति समाप्त हो जायेगी ओर यह यहां का आंतरिक मामला मान लिया जायेगा और विदेशों में देश के अपराधियों को शरण मिलती रहेगी। अगर कोई अपराध विशेषज्ञ इसे अलग प्रकार का अपराध मानता है तो फिर कुछ कहना बेकार है पर ऐसा कहने वाले बहुत कम मिलेंगे अगर मिल जाये तो लार्ड मैकाले की प्रशंसा अवश्य करें जिसने इस देश के लोगों की बुद्धि कोई हमेशा के लिये कुंठित कर दिया। ऐसे विषयों पर अपराध विज्ञानियों को चर्चा करना चाहिये पर यहां केवल विचारधाराओं के आधार चलने वाले बुद्धिजीवी बहस करते हैं तब यही लगता है कि वह केवल तयशुदा वाद और नारों पर ही चलते हैं।
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