पुरालेख

जब फैशन तनाव बने-हिन्दी आलेख (fashan is tension-hindi article)

अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।

एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये।  उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये।  कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी।  उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।

बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’

हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी।  उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’

वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’

बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी।  अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था।  अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’

हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।

हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं।  अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’

एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है।  हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की  चप्पल नहीं पहन सकती।’

उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।

वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी  अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।

दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं।  आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।

हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने  दहेज में कार मांगी है।’

वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!

बेटे ने बाप को  समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता।  नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।

बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा।  जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे।  औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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गलतियाँ, अपराध और लिंगभेद-आलेख

भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता। अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।
दोनों किस्से टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला। उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया। पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी। वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी। वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर। वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे। तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला। ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है। वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है? लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।
पुलिस अधिकारी यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’

इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा। क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं। दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है। ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये। कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये। इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।
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निरर्थक बहसों में उलझे देश के बुद्धिजीवी-चिंतन आलेख

देश में आतंक के नाम पर निरंतर हिंसक वारदातें हो रहीं है पर आश्चर्य की बात यह है कि इसे धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्रों से ना जोड़ने का आग्रह करने वाले ही इसे जोड़ते भी दिख रहे हैं. यह कैसे संभव है कि आप एक तरफ यह कहें के आतंकियों का कोई धर्म, भाषा और जाति नहीं है दूसरी तरफ उसी उनके समूहों की तरफ से सफाई भी देते फिरें. आश्चर्य की बात है कि अनेक बुद्धजीवी तो भ्रमित हैं. उनके भ्रम का निवारण करना तो बहुत कठिन है.

वैसे तो किसी भी प्रकार कि हिंसा को किसी धर्म,भाषा या जाति से जोड़ना ठीक नहीं पर कुछ लोग ऐसा कहते हुए बड़ी चालाकी से इनका आधार पर बने समूहों का वह प्रशस्ति गान करते हैं. तब फिर एक आम आदमी को यह कैसे समझाया जा सकता है कि इन अपराधिक घटनाओं को सहजता से ले. हालत तो और अधिक खराब होते जा रहे हैं पर कुछ बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक खुराक के लिए सतही विचारों को जिस तरह व्यक्त कर रहे हैं वह चिंताजनक है. उनके विचारों का उन लोगों पर और भे अधिक बुरा प्रभाव पडेगा जो पहले से ही भ्रमित है.

कुछ बुद्धिजीवी तो हद से आगे बाद रहे हैं. वह कथित रूप से सम्राज्यवाद के मुकाबले के लिए एस समुदाय विशेष को अधिक सक्षम मानते हैं. अपने आप में इतना हायास्पद तर्क है जिसका कोई जवाब नहीं है. वैसे तो हम देख रहे है कि देश में बुद्धिजीवि वर्ग विचारधाराओं में बँटा हुआ है और उनकी सोच सीमित दायरों में ही है. इधर अंतरजाल पर कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जो स्वयं अपना मौलिक तो लिखते नहीं पर पुराने बुद्धिजीवियों के ऐसे विचार यहाँ लिख रहे हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वैसे देखा जाए तो पहले प्रचार माध्यम इतने सशक्त नहीं थे तब कहीं भाषण सुनकर या किताब पढ़कर लोग अपनी राय कायम थे. अनेक लोग तब यही समझते थे कि अगर किसी विद्वान ने कहा है तो ठीक ही कहा होगा. अब समय बदल गया है. प्रचार माध्यम की ताकत ने कई ऐसे रहस्यों से परदा उठा दिया है जिनकी जानकारी पहले नहीं होती थी. अब लोग सब कुछ सामने देखकर अपनी राय कायम करते हैं। ऐसे में पुरानी विचारधाराओं के आधार पर उनको प्रभावित नहीं करती।

अमरीकी सम्राज्यवाद भी अपने आप में एक बहुत बड़ा भ्रम है और अब इस देश के लोग तो वैसे ही ऐसी बातों में नहीं आते। अमेरिका कोई एक व्यक्ति, परिवार या समूह का शासन नहीं है। वहां भी गरीबी और बेरोजगारी है-यह बात यहां का आदमी जानता है। अमेरिका अगर आज जिन पर हमला कर रहा है तो वही देश या लोग हैं जो कभी उसके चरणों में समर्पित थे। अमेरिका के रणनीतिकारों ने पता नहीं जानबूझकर अपने दुश्मन बनाये हैं जो उनकी गलतियों से बने हैं यह अलग रूप से विचारा का विषय है पर उसके जिस सम्राज्य का जिक्र लोग यहां कर रहे हैं उन्हें यह बात समझना चाहिये कि वह हमारे देश पर नियंत्रण न कर सका है न करने की ताकत है। अभी तक उसने उन्हीं देशों पर हमले किये हैं जो परमाणु बम से संपन्न नहीं है। उससे भारत की सीधी कोई दुश्मनी नहीं है। वह आज जिन लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहा है पहले ही उसके साथ रहकर मलाई बटोर रहे थे। अब अगर वह उनके खिलाफ आक्रामक हुआ है तो उसमें हम लोगों का क्या सरोकार है?

अमेरिकी सम्राज्य का भ्रम कई वर्षों तक इस देश में चला। अब अमेरिका ऐसे झंझटों में फंसा है जिससे वर्षों तक छुटकारा नहीं मिलने वाला। इराक और अफगानिस्तान से वह निकल नहीं पाया और ईरान में भी फंसने जा रहा है, मगर इससे इसे देश के लोगों का कोई सरोकार नहींं है। ऐसे में उससे लड़ रहे लोगों के समूहों का नाम लेकर व्यर्थ ही यह प्रयास करना है कि वह अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ सक्षम हैं। देश में विस्फोट हों और उससे अपराध से अलग केवल आतंक से अलग विषय में देखना भी एक विचार का विषय है पर उनकी आड़ में ऐसी बहसे तो निरर्थक ही लगती हैं। इन पंक्तियों का लेखक पहले भी अपने ब्लागों परी लिख चुका है कि इन घटनाओं पर अपराध शास्त्र के अनुसार इस विषय पर भी विचार करना चाहिये कि इनसे लाभ किनको हो रहा है। लोग जबरदस्ती धर्म,जातियों और भाषाओं के समूहों का नाम लेकर इस अपराध को जो विशिष्ट स्वरूप दे रहा है उससे पैदा हुआ आकर्षण अन्य लोगों को भी ऐसा ही करने लिये प्रेरित कर सकता है। दरअसल कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आतंक के नाम फैलायी जा रही हिंसा कहीं व्यवसायिक रूप तो नहीं ले चुकी है। यह खौफ का व्यापार किनके लिये फायदेमंद है इसकी जांच होना भी जरूरी है पर इसकी आड़ में धर्म,भाषा और जातियों को लेकर बहस आम आदमी के लिये कोई अच्छा संदेश नहीं देती।
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मनु स्मृति: दंड का उचित उपयोग न करने वाला अपयश का भागी

१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं देता उसे जगत में बहुत अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक भोगता है.
२.सबसे पहले अपराध करने को समझाना चाहिऐ, जब उसका प्रभाव न पड़े तब उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दंड लगाना चाहिए, जब इसका भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दंड देना चाहिऐ. उसके बाद भी प्रभाव न पड़े तो चारों डंडों का प्रयोग करना चाहिए.

हम छोड़ आये अंतर्जाल की वह गलियाँ-हास्य आलेख

जब मैंने शुरू में अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तब पता नहीं था की ब्लोग क्या होता है पर इस पर हमारे लिखे को दूसरे भी पढ़ सकते हैं यह सोचकर मैंने इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि हम जिन अंतर्जाल पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं भेज रहे थे वह अपने अंकों में हमेशा ही स्थान नहीं दे सकतीं थी, और फिर हम कुछ ऐसे सम-सामायिक विषयों पर लिखते हैं जिन्हें साहित्य तो माना ही नहीं जा सकता. इसलिए अपने इसी ब्लोग पर भी नियमित रूप से लिखना शुरू किया. इन सब ब्लोग को एक जगह दिखाने के लिए फोरम बना हुआ था नारद.

हम नारद को अंतर्जाल की पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ पर लिंक देखते थे. इसमें कई लोगों के ब्लोग थे पर हम यह समझे थे कि इनको कोई स्तंभ दिया गया है. तब हमने इसके लिए अपना एक व्यंग्य भेजा. इधर हम ब्लोग स्पॉट और वर्डप्रेस पर भी पता नहीं कैसे जुट गए. पता नहीं हमारी नजर ब्लोग स्पॉट काम के ब्लोग पर पड़ गयी. उसका लेखक कोई मुस्लिम ही था. इस्लाम मजहब के प्रवर्तक हजरत पैगंबर के कार्टून को लेकर जब प्रदर्शन हो रहे थे तब उस संबंध में उस मुस्लिम लेखक ने व्यंग्य लिखा था कि किस तरह इसके लिए भीड़ जुटाई जा रही थी. उसके लेखन में शब्दों की बहुत त्रुटियाँ थीं पर कथ्य इतना दमदार लगा कि हमने सोचा कि यह अपनी अभिव्यक्ति का एक बहुत बढिया साधन है. हमने ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये. उसमें लगभग एक माह लग गया. ब्लोग बना तो समझ में आया कि नारद पर उसे फोरम पर दिखाना जरूरी है-तभी पाठक मिल पायेंगे. हमें इसके लिए प्रयास शुरू किये. हमारा ब्लोग सादा हिन्दी फॉण्ट में था और दूसरे लोग इसे यूनीकोड में लिख रहे थे. दूसरी समस्या यह थी कि हमें तो ब्लोग का पता लिखना ही नहीं आता था. इसी अफरातफरी में हम पता नहीं क्या करते थे कि दूसरों को परेशानी होने लगी. नारद ने हमारा ईमेल बैन करने की धमकी दी. हम चुप कर अपना ब्लोग लिखने लगे. इसी बीच कोई एक महिला की नजर में हमारा ब्लोग आया. उसने बताया कि हमारा लिखा उसकी पढाई में नहीं आ रहा है. तब हमने सोचा कि मजाक कर रही होगी. इसी बीच हमारा ब्लागस्पाट के हिन्दी टूल पर पर नजर पड़ गयी पर उससे हम अपने लेख का पहला पैर लिखते थे ताकि वर्डप्रेस के डैशबोर्ड पर लोगों को पढाई आये. लोगों की नजर पड़ती तो वह उसे खोलते और फिर कहते थे कि बाकी तो कूडा ही दिखाई दे रहा है.तब हमने ब्लागस्पाट कॉम के ही हिन्दी टूल से कवितायेँ लिखकर वर्डप्रेस पर रखने लगे. पहली ही कविता पर ही हमें कमेन्ट मिला. तब तो फिर धीरे-धीर हम यूनीकोड में ही लिखने लगे. इतना लिख गए कि लोग आये कि आप इसे नारद पर पंजीकृत क्यों नहीं करा रहे. तब हमें ईमेल किया और नारद पर एक नहीं तीन ब्लोग पंजीकृत कराये.

इस तरह हम लेखक से ब्लोगर बन गए. शुरूआत में हमें लगा कि शायद यह अभिव्यक्ति का ही भाग है पर बाद में यह साफ समझ में आ गया कि कुछ उत्साही लोगों का समूह है जो इस तरह की चौपाल बनाकर हिन्दी के ब्लोगरों को एकत्रित कर रहा है. हमनें लिखना शुरू किया तो मजा आने लगा. पंजीकरण के १० माह तक निर्बाध रूप से लिखते रहे. वहाँ दरअसल बहुत सारी चीजें हमारे स्वभाव के विपरीत थी पर हम सोचते थे हमें क्या? लोगों का प्यार मिलता रहा तो लिखते चले जा रहे थे. कई बार सोचा कि छोड़ जाएं पर फिर सोचा कि यार इतना सारा प्यार करने वाले लोगों को किस कारण से छोडें. क्या बताएं?फिर सोच रहे थे कि धीरे-धीरे लिखना कम करते चले जाएं पर वह भी नहीं हो रहा था. इससे हमारा रचनात्मक लेखन प्रभावित हो रहा था.

आखिर वह अवसर आया और हमने पतली गली से निकलने का विचार बनाया. इस तरह कि कोई मित्र फिर हमें यह कहने नहीं आये कि तुमने लिखना बंद कर दिया है. वह जगह छोड़ने का कारण यह था कि हमें वहाँ से आगे के लिए कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. ऐसा लगा रहा है कि हम रुक गए हैं. के तरह भीड़ में बैठकर लिख रहे हैं जो कि संभव नहीं है. अब होना यह है कि हमारे लिखे को पाठक एकदम नहीं मिलेंगे पर मिलेंगे जरूर. हालांकि आम पाठक इस पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते पर हम भी क्या करते? वहाँ हमें कोई गंभीरता से पढ़ने वाला नहीं था और इस चक्कर में हमारा ध्यान अपने पाठको से हट रहा था. (क्रमश:)

अपने आंसू धीरे-धीरे बहाओ

शिष्य के हाथ से हुई पिटाई

गुरुजी को मलाल हो गया

जिसको पढ़ाया था दिल से

वह यमराज का दलाल हो गया

गुरुजी को मरते देख

हैरान क्यों हैं लोग

गुरू दक्षिणा के रुप में

लात-घूसों की बरसात होते देख

परेशान क्यों है लोग

यह होना था

आगे भी होगा

चाहत थी फल की बोया बबूल

अब वह पेड युवा हो गया

राम को पूजा दिल से

मंदिर बहुत बनाए

पर कभी दिल में बसाया नहीं

कृष्ण भक्ती की

पर उसे फिर ढूँढा नहीं

गांधी की मूर्ती पर चढाते रहे माला

पर चरित्र अंग्रेजों का

हमारा आदर्श हो गया

कदम-कदम पर रावण है

सीता के हर पग पर है

मृग मारीचिका के रूपमें

स्वर्ण मयी लंका उसे लुभाती है

अब कोई स्त्री हरी नहीं जाती

ख़ुशी से वहां जाती है

सोने का मृग उसका उसका हीरो हो गया

जहाँ देखे कंस बैठा है

अब कोइ नहीं चाहता कान्हा का जन्म

कंस अब उनका इष्ट हो गया

रिश्तों को तोलते रूपये के मोल

ईमान और इंसानियत की

सब तारीफ करते हैं
पर उस राह पर चलने से डरते हैं

बैईमानी और हैवानियत दिखाने का

कोई अवसर नहीं छोड़ते लोग

आदमी ही अब आदमखोर हो गया

घर के चिराग से नहीं लगती आग

हर आदमी शार्ट सर्किट हो गया

किसी अवतार के इन्तजार में हैं सब

जब होगा उसकी फ़ौज के

ईमानदार सिपाही बन जायेंगे

पर तब तक पाप से नाता निभाएंगे

धीरे धीरे ख़ून के आंसू बहाओ

जल्दी में सब न गंवाओ

अभी और भी मौक़े आएंगे

धरती के कण-कण में

घोर कलियुग जो हो गया

आकाश में धरती:फिर स्वर्ग और नरक कहॉ है?

वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर अगर गम्भीरता से विचार करें तो अविश्वास का कोई कारण मुझे तो नज़र नहीं आता । अमेरिकी वैज्ञानिकों की खोज पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी और शायद वही हैं जो आज भी अपने देश का सिर पूरे विश्व में उठाएँ हुए हैं। जब मैं आकाश की तरफ देखता था तो मुझे यह विश्वास होता था कि कहीं न कहीं आकाश में जीवन जरूर होगा, इसके पीछ तर्क थोडा हल्की तरह का अवश्य देता था पर किसी आदमी को समझाने के लिए वह ठीक ही है। वह यह कि हमारे पास एक से ज्यादा स्थानों पर जमीन होती है तो क्या हम उसको निरुप्योगी छोड़ देते हैं , एक जगह मकान में रहते हैं और दूसरी जगह पलट मिल जाये तो या तो उसे बेचे देते हैं या उस पर मकान बनवाकर उसे किराए पर उठा देते हैं, तो जिस परमात्मा ने यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड रचा है क्या वह इस धरती पर जीवन को स्थापित कर बाकी जगह खाली छोड़ सकता है। हमारे लिए जो सौरमंडल है उसमे किसी पर जीवन होगा इसमें मुझे संदेह रहता है, कारण ? मैं धरती को एक बड़ी इमारत की तरह मानता जिसमे खिड़की, रौश्नादन और पानी की टंकी तथा अन्य सुरक्षा कवच की तरह अनेक ग्रह और उपग्रह स्थापित हैं । हाँ, इसकी छतें दिन और रात में बदलती हैं-दिन में सूर्य अपने तेज से और रात को चंद्रमा अपनी शीतलता से जीवन का संचालन करते हैं । जब मैंने आकाश पर धरती के अस्तित्व की खबर देखी, सुनीं और पढी तो एक रोमांच का अनुभव किया क्योंकि बचपन से आकाश की तरफ देखते हुए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह विचार जरूर आता है कि वहां भी ऐसा ही जीवन होगा। दुनियां में कोई भी ऐसा वृतांत सुनाने को नहीं मिलता कि आकाश में कोई जीवन है। हाँ, देवताओं के आकाश में विचारने की पुष्टि होती है और फिर इन्सान के लिए स्वर्ग-नरक या कहें जन्नत-जहन्नुम जैसे कल्पित स्थान आकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर ही गडे गए हैं ताकी आदमी आकाश के बारे में ज्यादा सोचे नहीं- क्योंकि वह अगर आकाश के बारे में सोचेगा तो उसे तथाकथित बुध्दिजीवियों के भ्रमजाल में फंसने का समय ही कहाँ मिलेगा। हमारे धर्म ग्रंथों में आकाश वानियाँ होने तथा देवताओं के धरती पर आने की घटनाओं का वर्णन तो मिलता है पर हमारे जैसा खिन और भी जीवन है ऎसी कोई जानकारी मेरे नजरों के सामने नही आयी है । विश्व के अनेक किताबों में आकाश से प्रथ्वी का जिक्र मिलता है और वहां से धरती पर विमान आने और लोगों के उतरने की अनेक घटनाएँ हैं पर जैसा जीवन यहां है ऐसा कहीं और भी है ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बहरहाल मेरे हिसाब से यह सबसे नवीनतम खोज है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जहाँ तक जीवन के मूल तत्वों का प्रशन है भारतीय दर्शन और पशिचम के विज्ञान में कोई अंतर नहीं है। जीवन के लिए जलवायु का होना जरूरी है और जिस धरती की खोज की गयी है उस पर वैसी ही जलवायु है जैसी यहां पायी जाती है।यह संभावना कम ही है कि उस धरती के लोगों से कोई हमारा जल्दी संपर्क होने वाला है। अगर हो सकता है तो तभी जब वहां हमसे ज्यादा प्र्गातिवान लोग हौं , क्योंकि हमारी वैज्ञानिक क्षमता अभी उन तक अपना संदेश पहुंचाने की नहीं है। पर एक बात जो कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है यह कि अगर उस धरती के लोगों से संपर्क हो गया तो यहां ऐसे कईं भ्रम और विचारधाराएँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी जो बरसों से पीढी -दर-पीढी हमारे मस्तिष्क पर स्थापित रही हैं और उनकी आड़ में तमाम लोग अपने परिवार के लिए राज्यीय, आर्थिक, और धार्मिक सत्ता जुटाते रहे हैं। एक अनजाने भय जो कहीं आकाश में स्थित नहीं है उसका भय दिखाकर सामान्य आदमी को दिखाकर उसका सामाजिक, आर्थिक, बौध्दिक और राजनीतिक शौषण किया जाता रहा है और ऐसा करने वाले आकाश से ही अपनी शक्ति प्राप्त करने का दावा करते हैं। जब आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि आकाश में भी हमारे जैसे गरीब और बीमार लोग रहेते हैं वह स्वर्ग और नरक के अतार्किक सपनों और दुसप्नों से मुक्त हो जाएगा। अभी तक उसे यह बताया जाता है कि आकाश में स्वर्ग है जहां तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं फ्री में मिल जाती हैं अगर वह अपने तथाकथित पथप्रदर्शक की बात मान ले तो! अगर नहीं मानेगा तो उसे नरक का भय दिखाया जाता है। अगर यह संपर्क हो गया तो सभी धर्मों के कर्म कांडों -जो स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी देते हैं-पर पलीता लग जाएगा। क्योंकि आदमी अपने पथ प्रदर्शकों से पूछेगा के आकाश में भी धरती है तो यह स्वर्ग और नरक कहॉ है?यकीनन वह इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और उनके द्वारा बरसों से बुना गया भ्रमजाल टूट जाएगा ।