पुरालेख

अपनों की परवाह नहीं, परायों के लिए दीवानापन -व्यंग्य आलेख

मंदी से बाजार के ताकतवर सौदागर अधिक परेशान हो गये हैं। सभी जानते हैं कि प्रचार माध्यमों पर कही अप्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष रूप से इन्हीं अमीरों और सौदागरों का नियंत्रण हैं। मंदी जो इस दुनियां भर के अमीरों के लिये एक संकट बन गयी है उससे भारत भी बचा नहीं है क्योंकि गरीबों के लिये यह दुनियां भले ही उदार नहीं है पर उनके लिये तो पूरी धरती एक समान है। भारत में वैसे कहीं किसी प्रकार की मंदी नहीं है। खाने पीने और नहाने धोने का का सामान लगातार महंगा होता जा रहा है। जहां तक देश के आयात निर्यात संतुलन का प्रश्न है तो वह भी कभी अनुकूल नहीं रहा। भारत के सामान्यतः उत्पाद भारत में ही बिक पाते हैं और अभी भी निरंतर बिक रहे हैं। फिर यहां के अमीर क्यों हैरान हैं? बड़े अमीरों के कारखानों में बनने वाले उत्पादों के विज्ञापन पर यहां के प्रचार माध्यम जीवित हैं और इसलिये वही प्रचार माध्यम भी अब कुछ विचलित दिख रहे हैं उनको लग रहा है कि कहीं इस देश के अमीरों का मंदी का संकट दूर नहीं हुआ तो फिर उनके विज्ञापन भी गये काम से। इसलिये वह कोई ऐसा महानायक ढूंढ रहे हैं जो उससे दूर कर सके।

फिल्म,क्रिकेट और विदेशी सम्मानों से सुसज्जित महानायकों को तो अपने देश के प्रचार माध्यम खूब भुनाता है। एक बार एक व्यक्ति ने एक प्रचारक महोदय से सवाल किया कि ‘भई, आप लोग इस देश में ऐसे लोगों को नायक बनाकर क्यों प्रचारित करते हैं जिनका व्यक्तिगत आचरण दागदार हैं। अपने देश के ही ऐसे लोगों को क्यों नहीं नायक दिखाकर प्रचारित करते जो इस देश में ही छोटे छोटे शहरों में बड़े काम कर दिखाते हैं और उनका आचरण भी अच्छा होता है?
प्रचारक महोदय का जवाब था-‘आचरण निजी मामला है। हम प्रचारकों का काम नायक बनाना नहीं बल्कि नायकों को महानायक बनाना है वह भी केवल इसलिये क्योंकि उसके दम पर हमें अपने विज्ञापन का काम चलाना है। हमारे द्वारा प्रचारित विज्ञापनों का नायक है उसके लिये हम ऐसी खबरों प्रचारित करते हैं कि जिससे वह महानायक बन जाये क्योंकि उनके अभिनीत विज्ञापन भी तो हम दिखाते हैं।’

वैसे तो हमारे देश के प्रचार माध्यमों के पास फिल्म,क्रिकेट,साहित्य,कला और समाज सेवा मेें अनेक माडल हैं जो विज्ञापनों में काम करते हैं जिनके बारे में वह खबरें देते रहते हैं। बाजार के नियंत्रकों की ताकत बहुत बड़ी होती हैं। कब किसी क्रिकेट खिलाड़ी को रैंप पर नचवा दें और उससे भी काम न चले तो फिल्म में अभिनय ही करवा लें-कल ही वर्तमान टीम के एक क्रिकेट खिलाड़ी को एक लाफ्टर शो में कामेडी करवा डाली। मतलब फिल्म,समाज सेवा,साहित्य,चित्रकारी और कला में प्रचार माध्यमों ने अपना एक एजेंडा बना लिया हैं। एक फिल्मी शायर हैं वह राजनीति विषय पर भी बोलते हैं तो संगीत प्रतिस्पर्धा में निर्णायक भी बनते हैं। कभी कभी कोई हादसा हो जाये तो उस पर दुःख व्यक्त करने के लिये भी आ जाते हैं। आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है? जवाब में दो बातें हैं। एक तो राजनीति और संगीत में उनकी योग्यता प्रमाणित नहीं हैं दूसरा यह कि वह कम से तीन चार विज्ञापनों में आते हैं और यही कारण है उनका अनेक प्रकार की चर्चाओं में आने का।

मगर यह देशी नायक-जिनकी आम आदमी में कोई अधिक इज्जत नहीं है-इस बाजार को मंदी से उबार नहीं सकते क्योंकि वह तो उनके लिये दोहन का क्षेत्र है न कि विकास का। येनकेन प्रकरेण विज्ञापन मिलते हैं इसलिये ही वह अपना चेहरा दिखाने आ जाते हैं या कहा जाये कि बाजार प्रबंधकों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि विज्ञापन के नायक ही सर्वज्ञ के के रूप में प्रस्तुत किये जायें। मगर यह सब उत्पाद बिकवाने वाले माडल हैं न कि मंदी दूर भगानेे वाले।

कल अपने देश के प्रचार माध्यम एक ऐसे महानायक से मंदी का संकट दूर करने की अपेक्षा कर रहे थे जो इस देश का नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति पर लगातार दो दिनों से देश के प्रचार माध्यम अपना दृष्टिकोण केंद्रित किये हुए थे। हैरानी है कि आखिर क्या हो गया है इस देश के बुद्धिजीवियों को। नया जमाना कहीं आया है और शोर यहां मच रहा है। कल एक सज्जन कह रहे थे कि यार, जो भी अखबार खोलता हूं या टीवी समाचार चैनल देखता हूं तो ऐसा लगता है कि अमेरिका यहीं कहीं कोई अपना प्रांत है। अरे, बरसों से अमेरिका का राष्ट्रपति चुनने के समाचार हमने देखे और सुने हैं पर इस देश के प्रचार माध्यम इतने बदहवास कभी नहीं देखे। टीवी समाचार चैनल तो ऐसे हो गये थे कि इस देश में उस समय कोई बड़ी खबर नहीं थी। समाचारों में वैसे ही उनके लाफ्टर शो,फिल्म और क्रिकेट की मनोरंजक खबरों से बने रहते हैं और ऐसे में उनके प्रसारण से ऐसा लग रहा था कि कोई नयी चीज उनके हाथ लग गयी है।’
दूसरे ने टिप्पणी की कि‘क्या करें प्रचार माध्यम भी। मंदी की वजह से उनके विज्ञापन कम होने का खतरा है और उनको लगता है कि अमेरिका का नया राष्ट्रपति शायद मंदी का दौर खत्म कर देगा इसलिये उसकी तरफ देख रहे हैं इसलिये हमें भी दिखा रहे हैं।’
लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण करते हुए ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि बौद्धिक रूप से यह देश इतना कमजोर हो जायेगा। जहां विदेश के महानायक ही चमकते नजर आयेंगे। अमेरिका विश्व का संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर अनेक विशेषज्ञ अब उसके भविष्य पर संदेह व्यक्त करते हैं। वजह इराक और अफगानिस्तान के युद्ध में वह इस तरह फंसा है कि न वह वहां रह सकता है और छोड़ सकता है। दूसरी बात यह है कि उसने कभी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र का मुकाबला नहीं किया ऐसे में भारतीय बुद्धिजीवी आये दिन उससे डरने वाले बयान देते हैं।

बहरहाल अमेरिका के लिये आने वाला समय बहुत संघर्षमय है और उसने जिस तरह नादान दोस्त पाले हैं उससे तो उसके लिये संकट ही बना है और उससे उबरना आसान नहीं है। अमेरिका के बारे में इतने सारे भ्रम भारतीय बुद्धिजीवियों को हैं यह अब जाकर पता चला। कई लोग तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे नया राष्ट्रपति उनके बचपन का मित्र है और इसलिये हमारे देश का भला कर देगा।’
सभी जानते हैं कि अमेरिका के लिये सबसे बड़े मित्र उसके हित हैं। अपने हित के लिये वह चाहे जिसे अपना मित्र बना लेता है और फिर छोड़ देता है। वहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और उनकी अफसरशाही वैसी है जिसके बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क शासन चलाते हैं।’ याद रहे एडमस्मिथ के समय भारत वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था और होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहता। बहरहाल भारत के उन बुद्धिजीवियों और ज्ञानियों को आगे निराशा होने वाली है जो नये राष्ट्रपति के प्रति आशावादी है क्योंकि वहां क्लर्क -जिसे हम विशेषज्ञ अधिकारी भी कह सकते हैं-ही अपना काम करेंगे। रहा मंदी का सवाल तो यह विश्वव्यापी मंदी अनेक कारणों से प्रभावित है और उसे संभालना अकेला अमेरिका के बूते की नहीं है। भले ही अपने देश के प्रचार माध्यम और बुद्धिजीवी कितनी भी दीवानगी प्रदर्शित करें।
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प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं-हिंदी शायरी

उगते सूरज को करें सभी नमन
डूबते से कभी नजर न मिलाएं
कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी
अपने चारों और फैले
पद, पैसा और प्रतिष्ठा की रोशनी को
अपनी ही ऊर्जा से
चमकने वाली समझ बैठता
जब गिरता है तो उसे सब तरफ
अंधेरा नजर आता है
जिस पर करता था भरोसा
वही दुश्मन नजर आता है
फिर भी उस समय देता है
जमाने को दोष
सच से मूँह छिपाता है
जिन्हें सच का ज्ञान है वह ढूंढते हैं
दिल का ही चैन और अमन
शिखर के ऊपर हों या
जमीन पर हों उनके पाँव
किसी भी क्षण में न पछताएँ
—————————–
प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं
घृणा और विवाद फैलाता
खुद आदमी सब जगह
प्रेम की भाषा कभी समझता नहीं
दोष देता है जमाने को
अपने अहंकार को छोड़ता नहीं
———————–

prem ki bhasha,aadmi,knowledge of true,poem on love,vivad,dosh,sach ka gyan,anhkar,samay,zamin aur asman,zameen aur aasman,

चाणक्य नीतिःजिनके पास दिमाग है ताकत भी होती उनके पास

१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती है.
२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पता. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली सिंह को कुएँ में गिराकर मार डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.
३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

इस सप्ताह के चुनींदा फ्लाप पाठ इस पत्रिका पर प्रस्तुत हैं

सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य

जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीं रख लेती।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’

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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’

मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’

बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे।

एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’

उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।
मैंने हंसते हुए कहा-‘तो रख लो।’
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफादारी से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’

मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफादारी से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम

मिट्टी और मांस की मूर्ति-लघुकथा

मूर्तिकार फुटपाथ पर अपने हाथ से बनी मिट्टी की भगवान के विभिन्न रूपों वाली छोटी बड़ी मूर्तियां बेच रहा था तो एक प्रेमी युगल उसके पास अपना समय पास करने के लिये पहुंच गया।
लड़के ने तमाम तरह की मूर्तियां देखने के बाद कहा-‘अच्छा यह बताओ। मैं तुम्हारी महंगी से महंगी मूर्ति खरीद लेता हूं तो क्या उसका फल मुझे उतना ही महंगा मिल जायेगा। क्या मुझे भगवान उतनी ही आसानी से मिल जायेंगे।’

ऐसा कहकर वह अपनी प्रेमिका की तरफ देखकर हंसने लगा तो मूर्तिकार ने कहा-‘मैं मूर्तियां बेचता हूं फल की गारंटी नहीं। वैसे खरीदना क्या बाबूजी! तस्वीरें देखने से आंखों में बस नहीं जाती और बस जायें तो दिल तक नहीं पहुंच पाती। अगर आपके मन में सच्चाई है तो खरीदने की जरूरत नहीं कुछ देर देखकर ही दिल में ही बसा लो। बिना पैसे खर्च किये ही फल मिल जायेगा, पर इसके लिये आपके दिल में कोई कूड़ा कड़कट बसा हो उसे बाहर निकालना पड़ेगा। किसी बाहर रखी मांस की मूर्ति को अगर आपने दिल में रखा है तो फिर इसे अपने दिल में नहीं बसा सकेंगे क्योंकि मांस तो कचड़ा हो जाता है पर मिट्टी नहीं।’
लड़के का मूंह उतर गया और वह अपनी प्रेमिका को लेकर वहां से हट गया

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प्यार में भी भला कभी वादे किये जाते हैं-हिंदी शायरी

जन्नत में बिताने के लिये सुहानी रात
आसमान से चांद सितारे तोड़कर लाने की बात
प्यार के संदेश देने वाले ऐसे ही
किये जाते हैं
बातों पर कर ले भरोसा
शिकार यूं ही फंसाये जाते हैं
प्यार किस चिडिया का नाम
कोई नहीं जान पाया
रोया वह भी जिसने प्यार का फल चखा
तरसा वह भी जिसने नहीं खाया
प्यार का जो गीत गाते
कोई ऊपर वाले का तो
कोई जमीन पर बसी सूरतों के नाम
अपनी जुबान पर लाते
कोई नाम को योगी
तो कोई दिल का रोगी
धोखे को प्यार की तरह तोहफे में देते सभी
जो भला दिल में बसता है
किसी को कैसे दिया जा सकता है
सर्वशक्तिमान से ही किया जा सकता है
उस प्यार के में भी भला
कभी वादे किये जाते हैं
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चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी

शाम होते ही
सूरज के डूबने के बाद
काली घटा घिर आयी
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी
मन उदास था बहुत
घर पहुंचते हुए
छोटे चिराग ने दिया
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी
…………………………………..

अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से निकल जातीं-हिन्दी शायरी
यूं

तो वक्त गुजरता चला जाता
पर आदमी साथ चलते पलों को ही
अपना जीवन समझ पाता
गुजरे पल हो जाते विस्मृत
नहीं हिसाब वह रख पाता

कभी दुःख तो कभी होता सुख
कभी कमाना तो कभी लुट जाना
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से
निकल जातीं
जिसमें जी रहा है
वही केवल सत्य नजर आती
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही
अपने को लड़ता पाता

हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश सोने की लंका
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता
तो कभी कुछ पाकर बहकता
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता

तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही
मुक्त नजर आता
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया
चलाती है वह चारों तरफ
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता
……………………………….

आम पाठक की प्रतिक्रिया की बन सकती है अंतर्जाल लेखकों की प्रेरणा-संपादकीय

इस सप्ताह मैंने कोई ऐसा पाठ या रचना नहीं लिखी जिसकी चर्चा की जा सके। वजह यह रही कि बरसात के मौसम में विद्युत प्रवाह की समस्या और फिर शादी विवाह में जाने के कारण व्यस्तता रही। ऐसे में कुछ कवितायें लिखी जिनको कोई अधिक हिट नहीं मिल सके। संभवतः पाठक भी ऐसी ही समस्याओं से जूझ रहे होंगे। ब्लाग जगत में मेरे लिये कोई खास सप्ताह नहीं रहा। वैसे धीरे-धीरे मन अब ऊब रहा है क्योंकि पाठक संख्या में वृद्धि अब भी नहीं हो पा रही। पांच सौ से छह सौ के बीच कुल पाठक मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं को देख रहे हैं और यह क्रम करीब छह माह से बना हुआ है। पिछले सप्ताह एक दिन यह आंकड़ा सात सौ के पार पहुंचता लग रहा था पर नहीं हो पाया। शायद 695 तक ही पहुंचा था।

बहरहाल अब उन ब्लाग पर जिन पर पहले अध्यात्म से संबंधित पाठ रखता था- अब वहां बंद कर दिये है-वहां अभी तक अध्यात्म के पाठ अधिक पाठक संख्या लेते नजर आ रहे थे अब हास्य कविताएं और व्यंग्य भी अपने लिये अधिक पाठक जुटाने में लगे हैंं। मेरे दिमाग में कई प्रकार का गंभीर चिंतन है और कुछ अलग से कागज पर भी लिखा हुआ है पर, पर वह बड़े हैं और यहां बड़ा लिखने पर लोग उसकी उपेक्षा कर देते हैं। इसलिये अपनी कहानियां, व्यंग्य और चिंतन अभी भी यहां टाईप नहीं कर रहा। एक बात तय है कि जब तक हाथ से लिखकर यहां टाईप नहीं करूंगा तक अच्छी रचनायें नहीं आयेंगी। इसलिये आम पाठकों की तरफ से भी अब प्रयास होने चाहिये कि लेखक प्रोत्साहित हो सके। इसलिये हर पढ़ने वाले को कमेंट भी देना चाहिये और लेखक द्वारा जब उसके वास्तविक होने की पुष्टि के लिये संदेश किसी भी रूप में भेजा जाये तो उसका जवाब मिले। वरना यह मानकर चलना पड़ता है कि किसी दोस्त ने ही छद्म नाम से यह दिया है।
इस सप्ताह की कुछ रचनायें यहां दे रहा हूं।
दीपक भारतदीप

कुछ गूगल के हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद टूल से भी पूछ लो-व्यंग्य
जो कोई नहीं कर सका वह गूगल का हिंदी अंग्रेजी टूल करा लेगा। वह काम हैं हिंदी के लेखकों से शुद्ध हिंंदी लिखवाने का। दरअसल आजकल मैं अपने वर्डप्रेस के शीर्षक हिंदी में कराने के लिये उसके पास जाता हूं। कई बार अनेक कवितायें भी ले जाता हूं। उसकी वजह यह है कि हिंदी में तो लगातार फ्लाप रहने के बाद सोचता हूं कि शायद मेरे पाठ अंग्रेजों को पसंद आयें। इसके लिये यह जरूरी है कि उनका अंग्रेजी अनुवाद साफ सुथरा होना चाहिये। अब हिट होने के लिये कुछ तो करना ही है। अब देश के अखबार नोटिस नहीं ले रहे तो हो सकता है कि विदेशी अखबारों में चर्चा हो जाये तो फिर यहां हिट होने से कौन रोक सकता है? फिर तो अपने आप लोग आयेंगे। तमाम तरह के साक्षात्कार के लिये प्रयास करेंगे।

इसलिये उस टूल से अनुवाद के बाद उनको मैं पढ़ता हूं पर वह अनेक ऐसे शब्दों को नकार देता है जो दूसरी भाषाओं से लिये गये होते हैं या जबरन दो हिंदी शब्द मिलाकर एक कर लिखे जाते हैं। इसका अनुवाद सही नहीं है पर जितना है वह अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हो ही जाता है। उसकी सबसे मांग शुद्ध हिंदी है। उस दिन चिट्ठा चर्चा में एक शब्द आया था जालोपलब्ध। मैंने इसका विरोध करते हुए सुझा दिया जाललब्ध। इस टूल पर प्रमाणीकरण के लिये गया पर उसने दोनों शब्दों को उठाकर फैंक दिया और मैं मासूमों की तरह उनको टूटे कांच की तरह देखता रहा। तब मैंने जाल पर उपलब्ध शब्द प्रयोग किया तब उसने सही शब्द दिया-जैसे शाबाशी दे रहा हो। मतलब वह इसके लिये तैयार नहीं है कि तीन शब्दों को मिलाकर उसक पास अनुवाद के लिये लाया जाये।

इधर बहुत सारे विवाद चल रहे हैं। कोई कहता है कि हिंदी में सरल शब्द ढूंढो और कोई कहता है कि हिंदी में उर्दू शब्दों का प्रयोग बेहिचक हो। कोई कहता हैं कि उर्दू शब्दों में नुक्ता हो। कोई कहता है कि जरूरत नहीं। इन बहसों में हमारे अंतर्जाल लेखक-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल हूं-इस बात पर विचार नहीं करते कि कुछ गूगल के हिंदी अग्रेजी टूल से भी तो पूछें कि उसे यह सब स्वीकार है कि नहीं।
आप कहेंगे कि इससे हमें क्या लेना देना? भई, हिंदी में भी अंतर्जाल पर लिखकर हिट होने की बात तो अब भूल जाओ। भाई लोग, अब बाहर के लेखकों के लिये क्लर्क का काम भी करने लगे हैं। उनकी रचनायें यहां लिख कर ला रहे हैं और बताते हैं कि उन जैसा लिखो। अब इनमें कई लेखक ऐसे हैं जिनका नाम कोई नहीं जानता पर उनको ऐसे चेले चपाटे मिल गये हैं जो उनकी रचनाओं को अपने मौलिक लेखन क्षमता के अभाव में अपना नाम चलाने के लिये इस अंतर्जाल पर ला रहे हैं। सो ऐसे में एक ही चारा बचता है कि अंतर्जाल पर अंग्रेजी वाले भी हिंदी वालों को पढ़ने लगें और अगर वह प्रसिद्धि मिल जाये तो ही संभव है कि यहां भी हिट मिलने लगें।

मैं यह मजाक में नहीं कह रहा हूं। यह सच है कि भाषा की दीवारें ढह रहीं हैं और ऐसे में अपने लिखे के दम पर ही आगे जाने का मार्ग यही है कि हम इस तरह लिखें कि उसका अनुवाद बहुत अच्छी तरह हो सके। हालांकि मैंने प्रारंभ में कुछ पाठ वहां जाकर देखे पर फिर छोड़ दिया क्योंकि उस समय कुछ अधिक हिट आने लगे थे। अब फिर वेैसी कि वैसी ही हालत हो गयी है और अब सोच रहा हूं कि पुनः गूगल के हिंदी अंग्रजी टूल पर ही जाकर अपने पाठ देखेंे जायें वरना यहां तो पहले से ही अनजान लेखकों को यहां पढ़कर अपना माथा पीटना पड़ेगा। अखबार फिर उन लेखकों और उनको लिखने वाले ब्लाग लेखकों के नाम छापेंगे। अगर अपना नाम कहीं विदेश में चमक जायेगा तो यहां अपने आप हिट मिल जायेंगे। वैसे भी यहां हिंदी वाले अंग्रेजी की वेबसाईटें देखना चाहते है और उनके लिये हिंदी में पढ़ना एक तरह से समय खराब करना है ऐसे में हो सकता है कि जब यहां प्रचार हो जाये कि अंग्रेजी वाले भी हिंदी में लिखे पाठों को पढ़ रहे है तब हो सकता है कि उनमें रुचि जागे। यहां के लोग विदेशियों की प्रेरणा पर चलते हैं स्वयं का विवेक तो बहुत बाद में उपयोग करते हैं।

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चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी
शाम होते ही
सूरज के डूबने के बाद
काली घटा घिर आयी
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी
मन उदास था बहुत
घर पहुंचते हुए
छोटे चिराग ने दिया
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी
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रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल

दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम

अपने अंदर ढूंढे, मिलता तभी चैन है-हिंदी शायरी
घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंढे तभी मिलता चैन है
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रह जाते बस जख्मों के निशान-हिन्दी शायरी

मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आसान
नहीं होता पांव में पड़े
छालों के दर्द का भान
पर समय भी होता है बलवान
दिल के मचे तूफानों का
कौन पता लगा सकता है
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी
उड़ा ले जाते हैं
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते
जो सवालों को दिये जायें
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान
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जब तक प्यार नहीं था
उनसे हम अनजान थे
जो किया तो जाना
वह कई दर्द साथ लेकर आये
जो अब हमारी बने पहचान थे
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मनु स्मृति: दंड का उचित उपयोग न करने वाला अपयश का भागी

१. जो व्यक्ति ऐसे लोगों को दंड देता है जिन्हें दंड नहीं देना चाहिए तथा जिनको देना चाहिऐ उनको नहीं देता उसे जगत में बहुत अपयश मिलता है और मरने के बाद वह नरक भोगता है.
२.सबसे पहले अपराध करने को समझाना चाहिऐ, जब उसका प्रभाव न पड़े तब उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. जब इससे भी वह न समझे तो उस पर अर्थ दंड लगाना चाहिए, जब इसका भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़े तो उसे शारीरिक दंड देना चाहिऐ. उसके बाद भी प्रभाव न पड़े तो चारों डंडों का प्रयोग करना चाहिए.