पुरालेख

शैतान मरता नहीं है-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (sahitan marta nahin hai-hindi satire poem)

हर बार लगा कि शैतान के ताबूत में
आखिरी कील ठोक दी गयी है,
फिर भी वह दुनियां में
अपनी हाजिरी रोज दर्ज कराता है,
मुश्किल यह है कि
इंसानों के दिल में ही उसका घर है
भले ही किसी को नज़र नहीं आता है।
———-
बार बार खबर आती है कि
शैतान मर गया है
मगर वह फिर नाम और वेश
बदलकर सामने आता है,
कमबख्त,
कई इंसान उसे पत्थर मारते मारते
मर गये
यह सोचकर कि
उन्होंने अपना फर्ज अदा किया
मगर जिंदा रहा वह उन्हीं के शरीर में
छोड़ गये वह उसे
शैतान दूसरे में चला जाता है।
————

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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इंसान सस्ता हो रहा है-क्षणिकायें

महंगाई आसमान पर चढ़ गयी है,
इसलिये नैतिकता तस्वीर में जड़ गयी है।
चीजों की तरह इंसान भी बिकने लगा है,
मांग आपूर्ति के नियम से अनुसार
जरूरत से ज्यादा है बाज़ार में
इसलिये मेहनत की कीमत पड़ रही है।
———
आधुनिकता के नाम पर
इंसान सस्ता हो रहा है,
मस्ती के नाम पर अनैतिकता की
गुलामी को ढो रहा है।
यौवन की आज़ादी के नाम पर
पेट में पाप के बीज़ बो रहा है।
———-

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएँगे-व्यंग्य कविता

उनकी अदाओं को देखकर
वफाओं का आसरा हमने किया.
उतरे नहीं उम्मीद पर वह खरे
फिर भी कसूर खुद अपने को हमने दिया.
दिल ही दिल में उस्ताद माना उनको
अपनी बेवफाई से उन्होंने
वफ़ा और यकीन को मोल हमें बता दिया.
————————
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए
कदम कदम पर जंग लड़ते लोग
किसी को भरोसा कैसे निभाएँगे.
मयस्सर नहीं जिनको चैन का एक भी पल
किसी दूसरे की बेचैनी क्या मिटायेंगे.
वादे कर मुकरने की आदत
हो गयी पूरे ज़माने की
नीयत हो गयी दूसरे के दर्द पर कमाने की
ऐसे में कौन लोग किसके खिलाफ
धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएंगे.
———————

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प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं-हिंदी शायरी

उगते सूरज को करें सभी नमन
डूबते से कभी नजर न मिलाएं
कामयाबी के शिखर पर पहुँचा आदमी
अपने चारों और फैले
पद, पैसा और प्रतिष्ठा की रोशनी को
अपनी ही ऊर्जा से
चमकने वाली समझ बैठता
जब गिरता है तो उसे सब तरफ
अंधेरा नजर आता है
जिस पर करता था भरोसा
वही दुश्मन नजर आता है
फिर भी उस समय देता है
जमाने को दोष
सच से मूँह छिपाता है
जिन्हें सच का ज्ञान है वह ढूंढते हैं
दिल का ही चैन और अमन
शिखर के ऊपर हों या
जमीन पर हों उनके पाँव
किसी भी क्षण में न पछताएँ
—————————–
प्रेम को ढूँढे पर मिलता नहीं
घृणा और विवाद फैलाता
खुद आदमी सब जगह
प्रेम की भाषा कभी समझता नहीं
दोष देता है जमाने को
अपने अहंकार को छोड़ता नहीं
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आदमी के सामने ही हो जाता अंधेरे का व्यापार-व्यंग्य एवं कविता( hasya vyangya)

एक नया कवि मंच पर कविता सुनाने के लिये बुलाया गया तो उसने आते ही कहा‘,आज मैं अपनी एक कविता सुनाने जा रहा हूं। यह जोरदार कविता है। सुनिये-
अरे, पुराने घाघ कवियों
रोज रोज मंचों पर क्यों चले आते हो
अपनी पुरानी रचनायें सुनाते हो
सब हो गये बोर तुमसे
अब यहां से रिटायर हो जाओ
ताकि नये लोग आ सकें
पुराने और कबाड़ के माल जैसे लगते हो
तुम यहां से रुखसत हो जाओ’’

लोगों ने बहुत जोर से तालियां बजाईं। वाह वाह की आवाज से पूरा मैदान गूंज उठा। मंच पर बाकी कवि सन्नाटे में बैठे रहे। वह कवि भी माइक से हट गया तो दर्शक चिल्लाये-‘अरे, भई अपनी कविता तो सुनाओ। तब तो इन पुराने कवियों को रुखसत करें।’

नये कवि ने कहा-‘यह कविता नहीं तो और क्या थी? कितनी देर तक तो वाह वाह करते रहे।
एक दर्शक चिल्लाया-‘वाह वाह तो सभी के लिये करते हैं पर तुम्हारे लिये इसलिये की कि तुम अधिक देर तक नयी कवितायें सुनाओगे। यह तो चुटकी बजाकर चले गये। इससे तो यह पुराने भले थे।

नये कवि ने कहा-‘पहले यह सब हट जायें तभी तो सुनाऊंगा। वैसे अभी मैं यह एक ही कविता लिखी है जो सुना दी। फिर आगे लिखकर सुनाऊंगा।’

दर्शकों ने हाय हाय शुरू की दी। कुछ तो उसे मंच पर ही लड़ने दौड़े वह वहां से भाग निकला। तक हालत को संभालने के लिये एक पुराने कवि ने अपनी नयी रचनायें सुनाना शुरू कर दी।

‘नया नया कर सब चले आते
पुराने पर सभी मूंह फेर जाते
जब नया हो जाता फ्लाप
पुराने का ही होता है जाप
पुराने चावल और शराब का
मजा खाने और पीने में कुुछ और न होता
तो शायद हर जगह पुराना
शायर पिट रहा होता
नया चार लाईनों के हिट लूट रहा होता
अपने नयेपन इतराते हैं बहुत लोग
नहीं जानते क्या है मजा और क्या है रोग
अहसास ही है बस नये और पुराने का
नाम ही खाली जमाने का
शोर मचाकर कविता लिखी जा सकती
तो यहां हर कोई कवि होता
दर्द सभी को है पर
हर कोई शब्दों में उसे नहीं पिरोता
आधुनिक जमाने में तीस पर ही
कई बुढ़ापे के रोगों का होते शिकार
जवान दिखते हैं वह जो हैं साठ के पार
नये और पुराने आदमी में भेद करना
अब कठिन हो गया है
पुरानी गाड़ी खरीदते हैं कबाड़ में
और छह महीने चल चुकी कार को
कहते हैं सैकेंड हैंड
बजाते हैं खुशी का बैंड
आदमी के चक्षुओं के सामने ही
हो जाता है अंधेरे का व्यापार

उसकी कविता सुनकर नये कवि के पीछ भागने वाले श्रोता और दर्शक रुक गये और पूरा मैदान वाह वाह से गूंज उठा।
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hindi sher, शेर, हिन्दी शायरी, हिन्दी साहित्य

सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये दहशत का खिलौना-हिंदी शायरी

दहशत की भी सब जगह
चलती फिरती दुकान हो गयी
विज्ञापन का कोई झंझट नहीं
उनकी करतूतों की खबर सरेआम हो गयी

कहीं विचारधारा का बोर्ड लगा है
कहीं भाषा का नाम टंगा है
कहीं धर्म के नाम से रंगा है
जज्बातों का तो बस नाम है
सारी दुनियां मशहूरी उनके नाम हो गयी

बिना पैसे खिलौना नहीं आता
उनके हाथ में बम कैसे चला आता
फुलझड़ी में हाथ कांपता है गरीब बच्चे का
उनके हाथ बंदूक कैसे आती
गोलियां क्या सड़क पड़ उग आती
सवाल कोई नहीं पूछता
चर्चाएं सब जगह हो जाती
गंवाता है आम इंसान अपनी जान
कमाता कौन है, आता नहीं उसका नाम
दहशत कोई चीज नहीं जो बिके
पर फिर भी खरीदने वाले बहुत हैं
सपने भी भला जमीन पर होते कहां
पर वह भी तो हमेशा खूब बिके
हाथ में किसी के नहीं खरीददार उनके भी बहुत हैं
शायद मुश्किल हो गया है
सपनों में अब लोगों को बहलाना
इसलिये दहशत से चाहते हैं दहलाना
आदमी के दिल और दिमाग से खेलने के लिये
सौदागरों को कोई तो चाहिए बेचने के लिये खिलौना
इसलिये एक मंडी दहशत के नाम हो गयी
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मकानों की छत बड़ी नहीं बनानी थी-हास्य कविता

वर्षा ऋतु का की पहली फुहार
प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार
‘चले आओ,
घर पर अकेली हूं
चंद लम्हे सुनाओ अपनी बात
आज से शुरू हो गयी बरसात
मन में जल रही है तन्हाई की ज्वाला
आओ अपने मन भावन शब्दों से
इस मौसम में बैठकर करें कुछ अच्छी बात
अगर वक्त निकल गया तो
तुम्हें दिल से निकालते हुए दूंगी दुत्कार’

प्रेमी पहुंचा मोटर सायकिल पर
दनादनाता हुआ उसके घर के बाहर
चंद लोग खड़े थे वहां
बरसात से बचने के लिये
प्रेमिका के घर की छत का छाता बनाकर
जिसमें था उसका चाचा भी था शामिल
जिसने भतीजे को रुकते देखकर कहा
‘तुम हो लायक भतीजे जो
चाचा को देखकर रुक गये
लेकर चलना मुझे अपने साथ
जब थम जाये बरसात
आजकल इस कलियुग में ऐसे भतीजे
कहां मिलते हैं
मुझे आ रहा है तुम पर दुलार’

प्रेमी का दिल बैठ गया
अब नहीं हो सकता था प्यार
जिसने उकसाया था वही बाधक बनी
पहली बरसात की फुहार
उधर से मोबाइल पर आई प्रेमिका की फिर पुकार
प्रेमी बोला
‘भले ही मौसम सुहाना हो गया
पर इस तरह मिलने का फैशन भी पुराना हो गया है
करेंगे अब नया सिलसिला शुरू
तुम होटल में पहुंच जाओ यार
इस समय तो तुम तो घर में हो
मैं नीचे छत को ही छाता बनाकर
अपने चाचा के साथ खड़ा हूं
बीच धारा में अड़ा हूं
जब होगी बरसात मुझे भी जाना होगा
फिर लौटकर आना होगा
करना होगा तुम्हें इंतजार’

प्रेमिका इशारे में समझ गयी और बोली
‘जब तक चाचा को छोड़कर आओगे
मुझे अपने से दूर पाओगे
कहीं मेरे परिवार वाले भी इसी तरह फंसे है
करती हूं मैं अपने वेटिंग में पड़े
नंबर एक को पुकार
तुम मत करना अब मेरे को दुलार’

थोड़ी देर में देखा प्रेमी ने
वेटिंग में नंबर वन पर खड़ा उसका विरोधी
कंफर्म होने की खुशी में कार पर आया
और सीना तानकर दरवाजे से प्रवेश पाया
उदास प्रेमी ने चाचा को देखकर कहा
‘आप भी कहां आकर खड़े हुए
नहीं ले सकते थे भीगने का मजा
इस छत के नीचे खड़े होने पर
ऐसा लग रहा है जैसे पा रहे हों सजा
झेलना चाहिए थी आपको
बरसात की पहली फुहार’

चाचा ने कहा
‘ठीक है दोनों ही चलते हैं
मोटर सायकिल पर जल्दी पहुंच जायेंगे
कुछ भीगने का मजा भी उठायेंगे
आखिर है बरसात की पहली फुहार’

प्रेमी भतीजे ने मोटर साइकिल
चालू करते हुए आसमान में देखा
और कहा-
‘ऊपर वाले बरसात बनानी तो
मकानों की छत बड़ी नहीं बनाना था
जो बनती हैं किसी का छाता
तो किसी की छाती पर आग बरसाती हैं
चाहे होती हो बरसात की पहली फुहार
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