पुरालेख

देशप्रेम और सयाने-हिन्दी व्यंग्य कविता (deshprem aur sayane-hindi vyangya poem)

नहीं जगा पाते अब देशप्रेम
फिल्मों के पुराने घिसे पिटे गाने,
हालत देश की देखकर
मन उदास हो जाता है,
स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस
उठते है मन ही मन ताने।
अपने आज़ाद होने के बारे में सुना
पर कभी नहीं हुआ अहसास,
जीवन संघर्ष में नहीं पाया किसी को पास,
आज़ादह और एकता के नारे
हमेशा सुनने को मिलते रहे,
पर अपनों से ही जंग में पिलते रहे,
अपने को हर पग पर गुलाम जैसा पाया,
अपने हाथ अपने मन से नहीं चलाया,
हमेशा रहे आज़ादी और स्वयं के तंत्र से अनजाने
सब उलझे हैं उलझनों में
जो सुलझे हैं,
वह भी लगे दौलत और शौहरत जुटाने की उधेड़बनों में,
देशप्रेम की बात करते हैं,
पर दिखाते नहीं वही कहलाते सयाने।
——–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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रीटेक-हास्य व्यंग्य (film & cricket ka reteke-hindi vyangya)

वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

रात के पिटे पैदल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

गुजु उस्ताद सुबह ही दिख गया। पहले हम उसके मोहल्ले में रहते थे अब कालोनी में मकान बना लिया सो उससे दूर हो गये, मगर हमारे काम पर जाने का रास्ता उसी मोहल्ले से जाता है। गुजु उस्ताद को भी हमारी तरह क्रिकेट देखने का शौक था पर इधर क्रिकेट मैचों पर फिक्सिंग वगैरह के आरोप लगे तो हम इससे विरक्त हो गये पर गुजु उस्ताद का शौक लगातार बना रहा।
हम रास्ते पर खड़ा देखकर कई बार उसे नमस्कार कर निकलते तो कई बार वही कर लेता। कई बार दोनों ही एक दूसरे को देखकर मूंह फेर लेते हैं। हां, क्रिकेट मैच के दिन हम अगर जरूरी समझते हैं तो रुक कर उससे बात कर लेते हैं। आज भी रुके।
वह देखते हुए बोला-‘हां, मुझे पता है कल भारत हार गया है और तुम जरूर जले पर नमक छिड़कने का काम करोगे। देशभक्ति नाम की चीज तो अब तुम में बची कहां है?’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो? हम तुम्हें पहले भी बता चुके हैं क्रिकेट खेल में हमारी देशभक्ति को बिल्कुल नहीं आजमाना। हां, यह बताओ कल हुआ क्या?’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘तुमने मैच तो जरूर देखा होगा। चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये। आंखें कितनी बूढ़ी हो जायें सुंदरी देख कर वही नजरें टिकाने से बाज नहीं आती।’
हमने कहा-‘नहीं मैच तो हम देख रहे थे। पहले लगा कि भारतीय टीम है पर जब तीसरा विकेट गिरा तो ध्यान आया कि यह तो बीसीसीआई की टीम है। अब काहे की देशभक्ति दिखा रहे हो? इस तरह मूंह लटका घूम रहे हो जैसे कि तुम्हारा माल असाबब लुट गया है। क्या यह पहला मौका है कि बीसीसीआई की टीम हारी है?’
गुजु उस्ताद-‘यार, पिछली बार बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपनी टीम विश्व विजेता बनी थी और अब उसकी यह गत! देखते हुए दुःख होता है।’
हमने चैंकते हुए कहा-‘अपनी टीम! इससे तुम्हारा क्या आशय है? अरे, भई अपना राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। यह तो बीसीसीआई यानि इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम है। हार गयी तो हार गयी।’
गुजु उस्ताद-‘काहे को दिल को तसल्ली दे रहे हो कि हाकी राष्ट्रीय खेल है। हमें पता है तुम कभी हाकी खेलते थे पर साथ ही यह भी कि तुम ही लंबे समय तक क्रिकेट खेल देखते रहे। 1983 में विश्व कप जीतने पर तुमने ही अखबार में इसी भारतीय टीम की तारीफ में लेख लिखे थे। बोलो तो कटिंग लाकर दिखा दूं। हां, कुछ झूठे लोगों ने इस खेल को बदनाम किया तो तुम बरसाती मेंढक की तरह भाग गये। मगर यह क्रिकेट खेल इस देश का धर्म है। हां, इसमें तुम जैसे हाकी धर्म वाले अल्पसंख्यक जरूर हैं जो मजा लेने के लिये घुस आये और फिर बदनाम होता देखकर भाग खड़े हुए।’
हमने कहा-‘यह किसने कहा क्रिकेट इस देश का धर्म है?’
गुजु उस्ताद ने हमसे कहा-‘क्या टीवी देखते हो या नहीं। एफ. एम. रेडियो सुनते हो कि नहीं? सभी यही कह रहे हैं।
हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि कल हमने बीसीसीआई टीम का तीसरा विकेट गिरते ही मैच बंद कर दिया। सोचा सुबह अखबार में परिणाम का समाचार देख लेंगे। मगर आजकल थोड़ी पूजा वगैरह कर रहे हैं इसलिये सोचा कि क्यों सुबह खराब करें। अगर बीसीसीआई की टीम हार गयी तो दुःख तो होगा क्योंकि यह देश से भाग लेने वाली अकेली टीम थी। पिछली प्रतियोगिता में तो अपने देश से चार पांच टीमें थी जिसमें भारत के खिलाड़ी भी शामिल थे तब देखने का मन नहीं कर रहा था। इस बार पता नहीं क्यों एक ही टीम उतारी।’
गुजु उस्ताद-‘महाराज, यह विश्व कप है इसमें एक ही टीम जाती है। यह कोई क्लब वाले मैच नहीं है। लगता है कि क्रिकेट को लेकर तुम्हारे अंदर स्मृति दोष हो गया है। फिर काहे दोबारा क्रिकेट मैच देखना काहे शुरु किया। लगता है तुम विधर्मी लोगों की नजर टीम को लग गयी।’
हमने कहा-‘वह कल टीवी में एक एंकर चिल्ला रही थी ‘युवराज ने लगाये थे पिछली बार छह छक्के और आज उस बालर को नींद नहीं आयी होगी‘। हमने यह देखना चाहा कि वह बालर कहीं उनींदी आंखों से बाल तो नहीं कर रहा है पर वह तो जमकर सोया हुआ लग रहा था। गजब की बालिंग कर रहा था। फिर युवराज नहीं आया तो हमने सोचा कि शायद टीम में नहीं होगा। इसलिये फिर सो गये। चलो ठीक है!’
गुजु उस्ताद ने घूर कर पूछा-‘क्या ठीक है। टीम का हारना?’
हमने कहा-‘नहीं यार, सुना ही बीसीसीआई की टीम अब प्रतियोगिता से बाहर हो गये इसलिये अब नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। कल भी बारह बजे सोया था। आज देर से जागा हूं। वैसे तुम ज्यादा नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र भी बहुत हो चली है। यह क्रिकेट तो ऐसा ही खेल है। कुछ नाम वाला तो कुछ बदनाम है।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘देखो! अब आगे मत बोलना। मुझसे सहानुभूति जताने के लिये रुके हो?मुझे पता है कि बाहर से क्रिकेट का धर्म निभाते नजर आते हो पर अंदर तो तुम अपनी हाकी की गाते है। अगर कोई शुद्ध क्रिकेट खेलने वाला होता तो उसे बताता मगर तो तुम हाकी वाले और कुछ कह दिया तो हाल ही कहोगे कि ‘हम हाकी खेलने वाले अल्पसंख्यक हैं इसलिये क्रिकेट वाले हम पर रुतबा जमाते हैं।’
हमने कहा-‘यार, सभी खेल धर्म तो एक ही जैसे है। सभी खेल स्वास्थ्य और मन के लिये बहुत अच्छे हैं। हम तो खेल निरपेक्ष हैं। आजकल तो शतरंज भी खेल लेते हैं।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात नहीं मानता। मुझे याद है जब क्रिकेट की बात मेरा तुम्हारा झगड़ा हुआ था तब मैं तुम्हें मारने के लिये बैट लाया तो तुम हाकी ले आये। इसलिये यह तो कहना ही नहीं कि क्रिकेट से तुम्हारा लगाव है।’
हमने सोचा गुजु उस्ताद बहुत अधिक अप्रसन्न होकर बोल रहे थे। तब हमने विषयांतर करते हुए कहा-‘पर अपनी टीम तो बहुत अच्छी है। हारी कैसे?’
गुजु उस्ताद बोले-‘तुम जाओ महाराज, हमने रात खराब की है और तुम दिन मत खराब करो। अभी तो नींद से उठे हैं और फिर हाकी धर्म वाले की शक्ल देख ली।’
हमने चुपचाप निकलने में वहां से खैर समझी। हमने सोचा रात के यह पिटे हुए पैदल कहीं चलते चलते वजीर जैसे आक्रामक बन गये तो फिर झगड़ा हो जायेगा। सच बात तो यह है कि गुजु उस्ताद ही वह शख्स हैं जिन पर हम क्रिकेट से जुड़ी कटोक्तियां कह जाते हैं बाकी के सामने तो मुश्किल ही होता है। लोग गुस्सा होने पर देशभक्ति का मामला बीच में ले आते हैं। हालांकि यह सब बाजार का ही कमाल है जो क्ल्ब के मैचों के वक्त देशभक्ति की बात को भुलवा कर बड़े शहरों के नाम पर भावनायें भड़काते हुए अपना माल बेचता है तो विश्व कप हो तो देश के नाम पर भी यही करता है। मगर भावनायें तो भावनायें हैं। हम ठहरे हाकी वाले-जहां तक देश का सवाल है तो उसमें भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है फिर काहे झगड़ा लेते फिरें।
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ईमानदारी पर सम्मेलन -हास्य व्यंग्य

दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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भारत के शिक्षित लोगों का बौद्धिक अंतर्द्वंद्व -आलेख

भारत का शिक्षित वर्ग हमेशा ही मानसिक द्वंद्व में फंसा दिखता है जो पश्चात्य सभ्यता के समर्थन और विरोध में उस समय अभिव्यक्त होता है जब कोई खास दिन हैं-जैसे वैलंटाईन डे, फ्रैंड्स डे और मदर फादर डे। दरअसल यह अंतद्वंद्व इसलिये दृष्टिगोचर होता है क्योंकि दो तरह के सस्कारों के साथ ही शिक्षित वर्ग बचपन से आगे बढ़ता है। एक तरफ उसको घर में अपने प्राचीनतम संस्कारों के साथ जीवन व्यतीत करना होता है पर अपने शैक्षणिक स्थानों में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान उसे पश्चात््य संस्कृति का सामना भी करना होता है। स्थिति यह है कि घर में शायद कोई नववर्ष न कहता हो पर वह बाहर जाकर अनेक लोगों के साथ उसकी औपचारिकता निभाता है। एक तरफ विदेशी तरफ संस्कृति का विरोध करने वाले दूसरी तरफ अपने बच्चों को किश्चियन कान्वेंट स्कूलों में भेजने को लालायित रहते हैं। क्या यह मूर्खतापूर्ण बात नहीं है कि एक तरफ आपने बच्चे को अंग्रेजी में दक्ष देखना चाहते हैं दूसरी तरफ आप उसकी संस्कृति से उसे परे देखना चाहते हैं। सच बात तो यह है भाषा का भाव से गहरा संबंध होता है और अगर आप यह चाहते हैं कि अंग्रेजी में बच्चा दक्ष हो और हिंदी में पैदल रह जाये तो फिर भारतीय सस्कृति में उसके रचे बचे होने की आशा नहीं करना चाहिये।
इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक गतिविधियों का आर्थिक आधारों से गहरा संबंध है। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था दो स्वरूपों में बंट चुकी है-एक परंपरागत और दूसरी आधुनिक। चाहे लाख विकास का दावा कर लिया जाये पर अभी भी हमारे देश के लोगों के रोजगार का आधार परंपरागत आधारों-कृषि,पशुपालन,लघु उद्योग तथा छोटे व्यवसाय-पर टिका है। हम जिस बेरोजगारी की बात करते हैं वह शिक्षित वर्ग में ही अधिक है। परंपरागत आधारों वाली अर्थव्यवस्था के अधिकांशतः स्त्रोत शहरों में बहुत छोटे हैं या उससे दूर हैं। इसके विपरीत आधुनिक आधारों वाले आर्थिक स्त्रोत- माल, कारखाने, बैंक, कंपनियां तथा अन्य कार्यालय-शहरों में स्थित हैंं और उनकी चमक दमक लोगों को आकर्षित करती हैं। इस आधुनिक अर्थव्यवसथा में नौकरी पेशा लोग अपनी हैसियत के अनुसार आधुनिक संस्कृति से जुड़कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं और उसे देखकर परंपरागवादी लोग अपनी चिंतायें कहीं शांति तो कहीं उग्रता से व्यक्त करते हैं। तमाम तरह के अखबार और टीवी चैनल-अब अंतर्जाल पर वेबसाईट और ब्लाग लेखक भी-इस पर क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहन देते हैं। इसमें कोई आपत्ति नजर नहीं आती पर ऐसे में रचनात्मकता का दायरा सिमट जाने से उन लोगों को कष्ट होता है जो व्यापक दृष्टिकोण रखने के साथ ही वास्तविकताओं को समझने वाले हैं। कहने के कहा जाता है कि यह नयी पीढ़ी का ढंग है पर वास्तविकता यह है कि उसका संबंध केवल आधुनिक व्यवस्था से जुड़े लोगों तक ही सीमित है जबकि परपंरागत अर्थव्यवस्था से जुड़ी पीढ़ी इस पाश्चात्य संस्कृति से अभी भी कोसों दूर है भले ही उसकी शिक्षा आधुनिक स्कूलों में हुई है।

एक मजेदार बात यह है कि हम कहते हैं कि बाजार अपने लाभ के लिये केवल पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार कर रहा है पर यह भी एक तरह का भ्रम है। असल बात यह है कि हमारे अंदर अपनी संस्कृति और संस्कार इस तरह बचपन में भर गये होते हैं कि हमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रचार तो दिखाई देता है पर अपनी सभ्यता का बाजारीकरण कभी नहीं दिखता। जैसे ही वैलंटाईन बीता वैसे ही अनेक प्रचार माध्यम बंसत के गुणगान पर उतर आये। अनेक बार राखी दिवाली और होली के अवसर पर क्या हमारे देश के प्रचार माध्यम कोई कसर नहीं उठाये रखते। फिर जब कोई खास अवसर नहीं है तब अनेक चमत्कारी स्थानों का वर्णन पढ़ने और देखने को मिलता है। ज्योतिष का कार्यक्रम तो सभी चैनल चलाते हैं और अखबारों में इस संबंध में स्तंभ हम लोग बरसों से ही देखते आ रहे है। हम अपने धर्म, संस्कार और संस्कृति के बाजारीकरण की अनुभूति इसलिये नहीं कर पाते क्योंकि हम उसकों नित्य देखने के आदी हो गये हैं। इसके विपरीत पश्चात्य संस्कृति के पर्व कभी कभार आते हैं। अब जैसे मदर डे और फदर डे की बात ही लें। हमारे यहां माता पिता का सम्मान प्रतिदिन किया जाने वाला व्यवहार है। इसके लिये किसी दिन की अनिवार्यता नहीं है। व्यक्ति निर्माण में गुरु, माता पिता और दादा दादी का बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। इतना ही नहीं व्यक्ति का निर्माण करने वाले सभी लोग सतत इसके लिये प्रयासरत रहते हैं। यही कारण है कि हमारी संस्कृति और संस्कारों के नष्ट होने की कल्पना करना व्यर्थ है। खासतौर से तब जब हमारा आर्थिक आधार अभी भी परंपरागत स्त्रोतों के इर्दगिर्द ही सिमटा हो। आप देखें कि चारों तरफ औद्योगिक मंदी का समय है पर हमारे परंपरागत स्त्रोत उससे परे दिखाई देते हैं। हालांकि औद्योगिक मंदी आने वाले समय में देश के लिये खतरनाक साबित होगी पर परंपरागत स्त्रोत अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम हैं और उनको कहीं से सहायता भी नहीं मिलने वाली है।

पिछले पंद्रह दिनों से पाश्चात्य सभ्यता को लेकर हुई बहस अब वैलंटाईन डे के बाद थम गयी है। यही कारण है कि अब बसंत, महाशिवरात्रि और होली पर चर्चायें शुरु हो गयी हैं। तय बात है कि इसके पीछे भी बाजार का उद्देश्य है। सच कहा जाये जिस बाजार पर हम अपनी सस्कृति को तहस नहस होने का आरोप लगाते हैं वही उसे बचाने के लिये भी आगे आता है। यह अर्थव्यवस्था और संस्कृति का खेल है जिसे समझने की जरूरत है।
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दक्षिण एशिया के साहित्यकार आतंक पर सच लिख भी कहां पाये-आलेख

अभी हाल ही में दक्षिण एशिया के देशों का एक साहित्यकार सम्मेलन संपन्न हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान,श्रीलंका,बंग्लादेश तथा अन्य सदस्य देशों के नामचीन साहित्यकार शामिल हुए। जैसा कि संभावना थी कि इस इलाके में व्याप्त आतंकवाद भी इसमें चर्चा का विषय बना। जब इलाके में आतंकवाद का बोलबाला है तो यह स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है तो साहित्यकार इसी दर्पण की आंख की तरह देखने वाला होता है। इन साहित्यकारों ने आतंकवाद की निंदा की है और अपने देश के हिसाब से ही अपने विचार व्यक्त किये। पाकिस्तान के एक साहित्यकार ने बंग्लादेश में हाल ही में हुए विद्रोह में अपने देश का हाथ होने के आरोप का खंडन किया। बात यहीं पर ही अटक जाती है कि साहित्यकारों को क्या उसी नजरिये पर चलना चाहिये जिस पर उनका समाज या देश चल रहा है।

पहले तो यहां साहित्यकार और पत्रकार का भेद स्पष्ट करना जरूरी है। पत्रकार जो देखता है वही दिखाता और लिखता है पर साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिये। पत्रकार कल्पना नहीं करता और न उसे करना चाहिये पर साहित्यकार को किसी घटना में तर्क के आधार पर कल्पना और अनुमान करने की शक्ति होना चाहिये। अपने समाज और देश के प्रति साहित्यकार की प्रतिबद्धता होना जरूरी है पर उसे अंधभक्ति से दूर रहना चाहिये। दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अपने देश में जो इनाम मिलते हैं वही उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनते हैं पर सच तो यह है कि पूरे क्षे.त्र की हालत एक जैसी है और सभी जगह यह पुरस्कार लेखकों के संबंधों पर अधिक दिये जाते हैं और कई तो ऐसे साहित्यकार भी पुरस्कार पा जाते हैं जिनको समाज में ही अहमियत नहीं दी जाती है। बहरहाल दक्षिण एशिया के साहित्यकारों को अब इस बात का भी मंथन करना चाहिये कि क्या वह वास्तव में ही समाज और देश के लिये महत्ती भूमिका निभा रहे है? दक्षिण एशिया की सभी भाषाओं में बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर उससे सामाजिक सरोकार कितने जुड़े हैं यह भी देखने की बात है।
हम दक्षिण एशिया के साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद पर लिखी गयी सामग्रियों पर ही विचार करें तो लगेगा कि वह यथार्थ से परे हैं। लेखक को कल्पना तो करना चाहिये पर उससे यथार्थ का बोध होता हो न कि वह झूठ लगने लगे। हमने केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही पढ़ा है। सभी को पढ़ना संभव नहीं है पर पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर इस संबंध में पढ़ते है तो लगता है सभी साहित्यकार एक जैसे ही है। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों पर उनकी रचनायें अनुवादों को माध्यम से अधिक नहीं पढ़ने को मिल पाती।
अब साहित्यकारों द्वारा आतंकवाद की निंदा की गयी पर कितने ऐसे साहित्यकार हैं जो इस बात को समझते हैं कि आतंकवाद भले ही जाति,भाषा,क्षेत्र और धर्म के नाम झंडो तले अपना काम करता है पर वास्तव में वह एक व्यापार है। ऐसा व्यापार जिस पर भावना,श्रृंगार और अलंकार से शब्द सजाकर प्रस्तुत करना कभी कभी एकदम निरर्थक प्रक्रिया लगती है। आतंकवाद एक हाथी है जिसे साहित्यकार आंखें बंदकर पकड़ लेते हैं। कोई उसके सूंड़ को पकल लेता है तो कोई पूंछ-फिर उस पर अपनी व्याख्या करने लगता है। जिस तरह पहले किसी सुंदरी का मुखड़ा गढ़कर उसकी आंखें,नाक,कान,कमर,और बालों पर कवितायें और कहानी लिखी जाती थीं वैसे ही आतंकवाद का विषय उनके हाथ आ गया है। जिस तरह किसी सुंदरी के शारीरिक अंगों पर खूब लिख गया पर उसके व्यवहार,आचरण और ज्ञान पर कवि लिखने से बचते रहे वही हाल आतंकवाद का है। साहित्यकारों और लेखकों ने आतंकवादी घटनाओंे से हुई त्रासदी पर वीभत्स रस से सराबोर रचनायें खूब लिखीं। पाठक का दर्द खूब उबारा पर कभी इन घटनाओं के पीछे जो सौदागर हैं उसकी कल्पना किसी ने नहंी की। प्रसंगवश यहां हम मुंबई के खूंखार आतंकवादी कसाब की चर्चा करते हैं। 58 से अधिक बेकसूर लोगों का हत्यारा कसाब इंसान से कैसे राक्षस बना? क्या किसी पाकिस्तानी लेखक ने उसकी कल्पना करते हुए कोई लघुकथा या कविता लिखी। एक गरीब घर का लड़का जिसे उसका बाप आतंकवादी कैंप में यह कहकर भेजता है कि उसकी दो बहिनों की शादी के लिये पैसे मिलने के लिये यही एक रास्ता है। वह एक मामूली चोर डेढ़ से दो लाख रुपये की लालच में अपने देश के लिये योद्धा बनने को तैयार कैसे हो गया? उसमें इतनी क्रूरता कैसे आयी कि बंदूक हाथ में आते ही उसने 58 जाने बेहिचक ले ली? यही इंसान से राक्षस बना कसाब पकड़े जाने पर चूहे की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगा। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि अब वह अपने किये पर पछता रहा है तब तो यह सवाल उठता ही है कि आखिर इस राक्षसीय कृत्य के लिये प्रेरित करने वाले कौनसे कारण थे?
कसाब के पीछे जो तत्व हैं उनके सच पर कितने पाकिस्तानी या भारतीय साहित्यकार लिख पाते हैं। कसाब और उसके साथी तो साँस लेते हुए ऐसे इंसान थे जो किन्ही राक्षसों के हथियार बने गये। मुख्य अपराधी कौन हैं? मुख्य अपराधी हैं वह जो इसके लिये धन मुहैया करवा रहे हैं। यह धन देने वाले तमाम तरह के अवैध धंधों में लिप्त हैं और प्रशासन और जनता का ध्यान उन पर न जाये इस तरह के आतंकवाद का प्रायोजन कर रहे हैं। यह सच कितने साहित्यकार लिख पाये? कसाब तो इंसानी रूप में एक बुत है या कहें कि रोबोट है।
पाकिस्तान साहित्यकारों में क्या इतनी हिम्मत है कि वह कसाब को केंद्रीय पात्र बनाकर कोई कहानी लिख सकें? नहीं! दरअसल दक्षिण एशियों के साहित्यकार नायकों पर लिखकर समाज की वाहवाही लूटना चाहते हैं पर खलनायकों के कृत्यों में पीछे समाज की जो स्वयं की कमियां हैं उसे उबारकर लोगों के गुस्से से बचना चाहते हैं। सच बात तो यह है कि नायकों की विजय के पीछे अगर समाज है तो खलनायक की क्रूरता के पीछे भी इसी समाज के ही तत्व हैं। समाज की की खामियों को छिपाकर उससे अच्छा बताने से तात्कालिक रूप से प्रशंसा मिलती है शायद यही कारण है कि लोग उससे बचने लगे हैं। भारत में हालांकि अनेक लोग समाज की कमियों की व्याख्या करते हैं पर वह भी उसके मूल में नहीं जाते बल्कि सतही तौर पर देखकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। नारी स्वातंत्रय पर लिखने वाले अनेक लेखक तो हास्यास्पद रचनायें लिखते हैं और उससे यह भी पता लगता है कि उनके गहन चिंतन की कमी है।

दक्षिण एशियाई देश भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी,अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के कारण विश्व में पिछडे हुए हैं और इसलिये यहां लोगों में कहीं न कहीं गुस्से की भावना है। दक्षिण एशिया की छबि विश्व में कितनी खराब है यह इस बात से भी पता चलता है कि ईरान के सबसे बड़े दुश्मन इजरायल ने भी उसे अपने लिये कम पाकिस्तान को अधिक संकट माना है जो कि दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। जब हम दक्षिण एशिया की बात करते हैं तो फिर भौगोलिक सीमाओं से उठकर विचार करना चाहिये पर जैसे कि सम्मेलन की समाचार पढ़ने को मिले उससे तो नहीं लगता कि शामिल लोग ऐसा कर पाये। सच बात तो यह है कि समाज और देश को दिशा देने का काम साहित्यकार ही कर पाते हैं क्योंकि वह पुरानी सीमाओं से बाहर निकलकर रचनायें करते हैं। सभी साहित्यकार ऐसा नहीं कर पाते जो पर जो करते हैं वही कालजयी रचनायें दे पाते हैं। अगर हम दक्षिण एशिया की स्थिति को देखें तो अब ऐसी कालजयी कृतियां कहां लिखी जा रही हैं जिससे समाज या देश में परिवर्तन अपेक्षित हो।
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अपने दर्द से छिपना हर इन्सान की होती आदत -व्यंग्य कविता

उसने कहा कवि से
‘तू क्यों कविता लिखता है
सारे जमाने का दर्द समेट कर
अपने शब्दों में
अपनी ही पीड़ाओं से स्वयं छिपता है
बजती होंगी तेरी कविताओं पर
सम्मेलनों में तालियां
पर पीठ पीछे पड़ती है गालियां
कई लोगों के साथ तेरे शब्दों का भंडार भी
कूड़े के ढेर में दिखता है
भला शब्दों के सहारे भी
कभी दुनियां का सच टिकता है
जो तू कविता लिखता है’

कहा कवि ने
‘हर इंसान की तरह मेरी भी आदत है
अपने दर्द से छिपना
पर मैं हंसता नहीं किसी का दर्द देखकर
बात तो अपनी ही कहता हंू
शब्दों में वही होता है जो मैं सहता हूं
भले ही लगे दूसरे के दर्द पर लिखना
कवियों पर लोग फब्बितयां कसते हैं
पर खुद अपनी पीड़ाओं के आंसू
अंदर पीते हुए
दूसरे के दर्द पर सभी हंसते हैं
फिर अपने ही बुने जाल में फंसते हैं
लोग छिप रहे हैं अपने पापों से
अपनी ही हंसने की इच्छाओं के पूरे होने की
उम्मीद कर रहे हैं दूसरे के स्यापों से
अगर हल्का हो जाता है उनका दर्द
तो देते रहें कवियों का गालियां
फिर सम्मेलनों में वही बजाते हैं तालियां
पर कवि अपनी बात से किसी को नहीं रुलाते
अपने आंसु छिपाकर दूसरे को हंसाते
भाग रहा है जमाना अपने आप से
खौफ खाता है एकालाप से
लोगों को नहीं आती दिल की बात कहने की कला
इसलिये कवियों की कवितायें लगती हैंं बला
अपना दर्द दूसरे का बताकर
कवि अपना बोझ हल्का कर जाते हैं
बोझिल लोग इसलिये उनसे चिढ़ खाते हैं
दर्द बहुत है
इसलिये कवि भी बहुत लिखते हैं
शिकायत बेकार है लोगों की
दर्द का व्यापार करने की
उनकी बदौलत ही तो
बाजार में दर्द बिकता है
इसलिये कवि लिखता है

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