श्रीगीता की अन्य धार्मिक ग्रंथों से तुलना करना ठीक नहीं-चिंतन hindu religion


धर्म को लेकर अब अधिक चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्वों के बारे में कम उससे मानने वाले लोगों के आचरण पर ही अधिक तथ्य रखे जा रहे हैं। आजकल तो चारों तरफ बहस हो रही है और एकता करने के लिये शोर मचाया जा रहा है। वाद और नारों के जाल में फंसे बुद्धिजीवियों की अपनी सीमायें हैं और भारतीय अध्यात्म ज्ञान से रहित होते हुए भी धर्म पर ऐसे बोलते हैं जैसे कि उनका लिखा या बोला ही अंतिम सत्य है। अभी एक जगह तीन धर्मों की पुस्तकों की चर्चा करते उनको भूल जाने और आपस में भाईचारा लाने की बात एक नारे के रूप में कही गयी-इसमें भारतीय अध्यात्म की मुख्य स्त्रोत गीता का नाम भी था। दो अन्य धर्मों की पुस्तकों का नाम भी था पर यहां हम केवल श्रीगीता के मसले पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि आजकल जो वातावरण है कि उसमें किसी दूसरे धर्म की चर्चा करने पर वाद प्रतिवाद का जो दौर शुरु होता है तो वह किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता।
श्रीगीता अन्य धार्मिक ग्रंथों के मुकाबले शब्दों के मामले में कम है पर इस जीवन सृष्टि का सभी तत्वों का संपूर्ण सार केवल उसी में है। यह दुनियां की एकमात्र ऐसा ज्ञान संग्रह है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान की भी चर्चा है। इसे पढ़ने और समझने वाले ज्ञानी ही जानते हैं कि अत्यंत सरल शब्दों में जीवन और सृष्टि के रहस्यों का वर्णन करने वाले इस ग्रंथ में कोई लंबा चैड़ा ज्ञान नहीं है जो किसी के समझ मेें नही आये पर इसके महत्व को प्रतिपादित करने वाले ही इसके असली संदेश गोल कर जाते हैं ताकि वह सुनने वालों की नजरों में ज्ञानी भी कहलायें और दूसरा कोई ज्ञानी बनकर उनको चुनौती भी न दे।

जहां तक श्रीगीता के ज्ञान का प्रश्न है तो उसमें
1.कहीं भी हिंसा का समर्थन नहीं किया गया।
2.उसमें मनुष्य को योग और भक्ति के द्वारा स्वयं ही शक्ति संपन्न होने की प्रेरणा दी गयी है।
3.उसमें विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है ताकि धर्म की रक्षा हो सके। एक तरह से मानव समाज के नित नये स्वरूपों के साथ जुड़ने के लिये प्रेरित किया गया है क्योंकि उसमें वर्णित ज्ञान की रक्षा तभी संभव है।
4.व्यक्ति किस और कितने तरह के होते हैं इसके लिये उसमें पहचान बताई गयी है और श्रेष्ठ मनुष्य के लिये जो मानदंड बताये गये हैं वह एक आईने का काम करते हैं।

उसमें कहीं भी
1. चमत्कारों के आकर्षण का वर्णन नहीं है
2. मनुष्य द्वारा मनुष्य को हेय देखने का संदेश नहीं दिया गया।
3.किसी प्रकार की पूजा पद्धति या देवता की उपासना या किसी व्यक्ति की महिमा का बखान नहीं किया गया। न ही किसी कर्मकांड या रूढि़यों की स्थापना उसमें की गयी है।
श्रीगीता की किसी अन्य पुस्तक से तुलना करना ही हैरानी की बात है। इस तरह वाद पर चलने और नारे लगाने वाले केवल अखबार पढ़ कर ही अपनी विचारधारा बना लेते हैं। देखा जाये तो अन्य सभी धार्मिक पुस्तक से श्रीमद्भागवत गीता की तुलना ही नहीं हैं। जिन लोगों को लगता है कि श्रीगीता का भुलाने से राष्ट्र में एकता स्थापित हो जायेगी तो उनको यह भी समझ लेना चाहिये कि बात केवल पुस्तक के नाम की नहीं बल्कि उसके ज्ञान उसे धारण करने की भी है। अन्य धार्मिक पुस्तकें इतनी बड़ी हैं कि आज के संघर्षमय युग में किसी को उसे फुरसत ही नहीं है और जो पढ़ते हैं वह अपने हिसाब से दूसरों को उनके निजी जीवन में निर्णय लेने के लिये पे्ररित करते हैं। कई बार तो पारिवारिक विवादों में भी उनसे उदाहरण लिये जाते हैं। कई धार्मिक पुस्तकें तो केवल समाज को सांसरिक संबंधों के बारे में संदेश देती हैं और साथ ही उनके सामने कर्मकांडों के निर्वहन की शर्त भी रखती हैं जबकि श्रीगीता के संदेशों में ऐसा नहीं है।
समस्या श्रीगीता को भूलने की नहीं बल्कि उसका ज्ञान धारण न करना ही हैं। धार्मिक पुस्तकों पर प्रतिकूल टिप्पणियां होने से सामान्य आदमी बौखला जाता है और अल्पज्ञानी उसमें से ज्ञान के अंश निकालकर उसके महत्व का प्रतिपादित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह केवल सुनता है और पूछने पर यही कहता है कि -‘पहले पढ़ लो फिर आकर बात करना।’
श्रीगीता के ज्ञान के बाद महाभारत युद्ध हुआ था पर उसमें श्रीभगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यह ‘युद्ध तू मेरे लिये कर और उसका परिणाम मेरे ऊपर छोड़’
उन्होंने अपना वादा निभाया। अर्जुन को पाप का भागी नहीं बनने दिया क्योंकि उनके उस भक्त ने अपनी देह का त्याग किसी का तीर खाकर नहीं छोड़ी, जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने परमधाम गमन से पहले उसी हिंसा के प्रतिकार में एक बहेलिये का तीर अपने पांव पर लेकर यह स्पष्ट संदेश मानव समाज को दिया कि अहिंसा ही भविष्य की सभ्यताओं के लिये श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने महाभारत में स्वयं कहीं भी हिंसा नहीं की पर उसका परिणाम स्वयं ही लेकर यह साबित किया कि वह एक योगेश्वर थे।
सच तो यह है कि लोग केवल भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं पर उनके जीवन चरित्र से कुछ नहीं सीखते। लोगों को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने नकारा बना दिया है। वह केवल बहसें करते हैं वह भी अर्थहीन। किसी निष्कर्ष पर तो आज तक कोई पहुंचा ही नहीं है-जिस तरह की बहसें चल रही हैं उससे तो लगता भी नहीं है कि किसी नतीजे पर पहुंचेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के उपदेशों का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही करने का निर्देश दिया है क्योंकि उस पर केवल चलने के लिये पहले यह जरूरी है कि उनकी निष्काम भक्ति की जाये।
आखिरी बात यह है कि अन्य धार्मिक ग्रंथ कथित रूप से कहते हैं कि ‘प्रेम करो’,‘अहिंसा धर्म का पालन करो’, परमार्थ करो और अपनी नीयत साफ रखो’, पर वह यह नहीं बताते है कि पांच तत्वों से बनी इस देह में जो शारीरिक,मानसिक और वैचारिक विकार एकत्रित होते हैं उनका निष्कासन कैसे हो? जब तक यह विकार है आदमी प्रेम कर ही नहीं सकता, हिंसा तो हमेशा उसके मन में रहेगी और परमार्थ भी करेगा तो दिखावे का।

श्रीगीता उसका उपाय बताती है कि उसके लिये लिये योगसाधना, ध्यान और गायत्री मंत्र का जाप करो। उससे शरीर के विकार निकल जाते हैं और आदमी स्वतः भी निष्काम भक्ति के भाव को प्राप्त होता है। उसे प्रेम करने के लिये सीखने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही परमार्थ करने के लिये वह किसी के संदेश का इंतजार नहीं करता। दूसरे धर्म ग्रंथो में आंखों से अच्छा देखने, कानों से सुनने और मन में अच्छा विचार करने का उपदेश देते हैं पर श्रीगीता तो मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने का तरीका बताती है जिससे वह स्वचालित ढंग से इन सब बातों के लिये प्रेरित होता है। उसे किसी से कुछ सीखने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।

बाकी धर्म ग्रंथों की क्या महत्ता है यह तो उनको पढ़ने वाले जाने पर श्रीगीता को पढ़ने वाले इसके बारे में प्रतिकुल टिप्पणी होने पर भी नहीं बौखलाते क्योंकि वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। स्पष्ट है कि जिस वातावरण में सामान्य आदमी रह रहा है, भोजन कर रहा है या पानी पी रहा है उसका उस प्रभाव होगा उसी के अनुसार ही वह दूसरे से अनुकूल प्रतिकूल व्यवहार करेगा। रहने वाले तो श्रीगीता का अध्ययन करने वाले भी कोई आसमान में नहीं रहते वह भी यहां पर्यावरण प्रदूषण झेल रहे हैं पर वह जब अपने सामने समस्याओं का जंगल देखते हैं तो यही कहते हैं कि ‘मुझे अपने पर नियंत्रण रखना चाहिये दूसरा ऐसा करे यह जरूरी नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कितना है उतना ही तो वह करेगा।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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