क्या प्रसिद्धि पाने का विचार बुरा है-इस पत्रिका का द्वितीय अंक


जब आप किसी ऐसे विषय पर लिखते हैं जिसका संबंध लेखकों से होता है तो उसकी प्रतिक्रिया जन सामान्य में कम होने के बावजूद अधिक प्रतिध्वनित होती है। ऐसे विषयों पर चूंकि लेखक ही अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद उनमें वजन अधिक  होता और जन सामान्य तो स्वयं प्रभावित होने के बावजूद मुखर होकर  अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता इसलिये उसकी प्रतिध्वनि का सुनाई देती है।

कल मेरे द्वारा लिखे गये एक लेख-जो हिंदी में उर्दू शब्दों के उपयोग को लेकर था-पर प्रतिक्रियायें आयीं वह ऐसे ब्लाग लेखकों की आयी जो वाकई गंभीर लेखक हैं और इसलिये मैंने अपने अंदर उनकी प्रतिध्वनि अधिक महसूस की। ऐसी बहसें तो कई बरसों से चल रहीं हैं पर निष्कर्ष निकलना कठिन होता है पर इससे लिखने वाले अपनी भाषा पर नियंत्रण रखने का मन बनाते हैं इसलिये भाषा के मूल स्वभाव बने रहने की आशा पैदा होती है।
साहित्य में ऐसी बहसें भले ही निर्णायक न हों पर वह भाषा का स्तर बनाये रखने में सहायक होती हैं पर अन्य क्षेत्रों में ऐसी बहसें केवल मुद्दे बनाये रखने के लिये होती हैं और उनका कोई निष्कर्ष इसलिये नहीं निकाला जाता क्योकि बहस करने वालों की रुचि लोगों को उसमें उलझाकर अपने हित साधने होते हें। मेरा इसी सप्ताह लिखा गया एक लेख-जिसमें मैंने राजनीतिक विषयों पर लिखने के कारण बताये थे-फ्लाप हो गया। उसी तरह एक अन्य लेख-जो मैंने ऐसे ही भेदात्मक दृष्टि वाले विद्वानों पर लिखा था -उसे भी अधिक समर्थन नहीं मिला। मुझे भी लग रहा है कि वह हिट होने लायक नहीं था।
मेरे एक मित्र श्री ललितमोहन त्रिवेदी ने ब्लाग लिखना शूरू किया। उस पर मैंने एक समीक्षा लिखी जिसे वाकई मैंने दिल से लिखा है।
वैसे इस सप्ताह कोई बहुत जोरदार हिट पाठ नहीं आया। पुराने हिट पर ही नाम चल रहा है और अमेरिका-भारत संबंधों पर लिखा गया एक लेख अभी तक लोगों को पढ़ता हुआ देख अच्छा लग रहा है वह आज भी प्रासंगिक है यही कारण है कि मैंने अभी तक इस पर कुछ नहंी लिखा।
इस बार दो व्यंग्य अच्छे लिखे पर वह भी फ्लाप रहे पर आगे पाठक उसे आम पाठक हिट बनायेंगे। एक तो था कीचड़ उछालने पर मिठाई मिलने पर, दूसरा था व्यंग्य को विज्ञापन की तरह सजाने का। इन दोनों को आगे पाठक हिट बनायेंगे इसमें कोई संशय नहीं है।
कुछ कवितायें लिखीं। इनमें कुछ संजीदा थीं तो कुछ हास्य से सराबोर। थोड़े बहुत हिट लेकर मैं संतुष्ट था। आखिर मुझ जैसे लेखक को इससे अधिक हिट मिल भी कहां सकते है।
कुल मिलाकर यह सप्ताह ठीक ठाक ही रहा। अब इस पत्रिका को बहुत गंभीरता से लिखने का विचार बना रहा हूं क्योंकि यहां अंतर्जाल पर मुझे कोई घास भी नहीं डाल रहा। लोग सम्मान तो देंगे नहीं, इसलिये मैंने महाकवि की उपाधि स्वयं ही धारण कर ली। इस पर लिखी कविता पर मेरे एक मित्र की टिप्पणी थी कि‘ अरे, नहीं आप अकेले नहीं। यह पदवी धारण करने वाले’। वह स्वयं भी इसमें शामिल हैं यह बात मुझे मालुम हैं पर स्वयं डरेंगे क्योंकि वह इस अंतर्जाल पर हिंदी के प्रसिद्ध ब्लाग लेखक बन चुके हैं पर हमें तो फोरमों पर अधिक लोग पढ़ते नहीं और आम पाठक कौन हमसे कहने वाला है कि आपने हमसे पूछ बगैर यह उपाधि क्यों धारण कर ली। बहुत समय तक लेखक के रूप में लिखते रहने के बाद मुझे प्रसिद्धि नहीं मिली तो हो सकता है कि संपादक  के रूप में मिल जाये। क्या प्रसिद्धि पाने का विचार कोई बुरा है? मेरे ख्याल से तो नहीं!
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अपनी कुछ कवितायें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं
दीपक भारतदीप

बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में
अपने दिल की तसल्ली के लिये
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते
सभी जानते हैं यह सच कि
अकेले ही चलना है सभी जगह
पर रिश्तों के साथ होने का
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते
कहें महाकवि दीपक बापू
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे
शख्स से दोस्ती
जिससे हमेशा दूर होते
वह तुम ही होते

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इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई
बड़ी नौकरी वाला साहब
छोटे काम वाले देखते रहते हैं
बस माशुका पाने का ख्वाब

वह दिन गये जब
बगीचों में आशिक और हसीना
चले जाते थे
अपने घर की छत पर ही
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट
पर ही चलता है इश्क का काम
कौन कहता है
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब
जाकर कौन देख सकता है
जब करने वाले ही नहीं देख पाते
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को
फंसा लेता है अपने जाल में
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर
मोहब्बत तो बस नाम है
नाम दिल का है
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और
होटल में खाने के बिल का है
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता
होते थे बदनाम
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब
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यूं तुम अपने लिये
कुछ भी मांग लिया करो
सिवाय प्यार के
क्योंकि यह मांगने की नहीं
अहसास कराने की शय है
अगर होती किसी के लिये दिल में जगह कही
आंखों से जाहिर हो जाता है
जिनके दर्द से आंखों में आंसू आयें नहीं
जिनकी खुशी पर होंठ मुस्कराये नहीं
लफ्जों में चाहे कितनी भी जतायें
झूठी हमदर्दी का बयां जगजाहिर हो जाता है
किसी के दिल में लिखा कौन पढ़ पाया
लफ्जों के मतलब गहरे हैं या उथले
सुरों की धारा से पता चल जाता
चाहे जितनी भी कोशिश कर लो
जब तक दिल में है
प्यार को सलामत समझ लो
जो जुबां से निकला तो कभी कभी
वहां से भी बाहर हो जाता है
फिर लौटकर नहीं आता
अहसास भी बदन से निकल कर
बाहर बदहाल हो जाता है
प्यार है वह अहसास जो बस किया जाता है
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गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब तो उसकी परख के लिये
प्रतियोगितायें को अब वह
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन
उससे हमले कराये जाते
मद्धिम संगीत और गीत से
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते

कहें महाकवि दीपक बापू
‘अब गीत और संगीत
में लयताल कहां ढूंढे
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते
महफिलें तो बस नाम है
श्रोता तो वहां भाड़े के स