Posted on February 7, 2008 by दीपक भारतदीप
चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना
भला कौनसी अक्लमंदी है
सब कुछ करते हैं हम
अपने नाम के लिए
लेते हैं इसका और उसका नाम
हम करतार नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी हर पर अपना काम
लिखा हो यही मानते हैं
आजाद लगती हैं अक्ल
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को
निभाने के लिए समाज की बंदी [...]
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Posted on January 28, 2008 by दीपक भारतदीप
बहुत शोर सुनते थे
कोई तरकश चलता
ब्लोग जगत में सजा रहा है
किसी सम्मान की दुकान
देखा तो निकले दस तीर
निकले उसमें थे दस वीर
दावा यह किया कि बस
यही लिखते हैं अंतर्जाल पर अच्छा
बाकी पेश करते हैं कच्चा
बस इनका ब्लोग ही हमें
ब्लोग की तरह हमेशा फबता
कहैं दीपक बापू
चल पडी हैं हिन्दी ब्लोग में
एक और [...]
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Posted on January 28, 2008 by दीपक भारतदीप
अभी हुई है भोर
शुरू कर दिया उन्होने शोर
कैसे न होंगे दिन भर बोर
जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था
वहाँ लगा रहे हैं दिमाग पर जोर
कुछ सीखना था प्रात:
परमात्मा का नाम लेकर
डाल दिया मुहँ में रोटी का कोर
आदमी सुख तो चाहता है
पर दिल में उसके अहसास के लिए
कोई कोना बाकी नहीं है
चारों तरफ भरा है [...]
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Posted on January 27, 2008 by दीपक भारतदीप
जब मैंने शुरू में अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तब पता नहीं था की ब्लोग क्या होता है पर इस पर हमारे लिखे को दूसरे भी पढ़ सकते हैं यह सोचकर मैंने इसे अपनी पत्रिका की तरह उपयोग करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि हम जिन अंतर्जाल पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं [...]
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Posted on January 26, 2008 by दीपक भारतदीप
वह सड़क पर रोज खडा होकर उस लड़की से प्रेम का इजहार करता था और कहता”-आई लव यू।
”कभी कहता-”मेरे प्रपोजल का उत्तर क्यों नहीं देती।’
वह चली जाती और वह देखता रह जाता था। आखिर एक दिन उसने कहा कहा-”मुझे ना कर दो, कम से कम अपना वक्त खराब तो नहीं करूं।”
वह लडकी आगे बढ़ [...]
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