नहीं जगा पाते अब देशप्रेम
फिल्मों के पुराने घिसे पिटे गाने,
हालत देश की देखकर
मन उदास हो जाता है,
स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस
उठते है मन ही मन ताने।
अपने आज़ाद होने के बारे में सुना
पर कभी नहीं हुआ अहसास,
जीवन संघर्ष में नहीं पाया किसी को पास,
आज़ादह और एकता के नारे
हमेशा सुनने को मिलते रहे,
पर अपनों से ही जंग में पिलते रहे,
अपने को हर पग पर गुलाम जैसा पाया,
अपने हाथ अपने मन से नहीं चलाया,
हमेशा रहे आज़ादी और स्वयं के तंत्र से अनजाने
सब उलझे हैं उलझनों में
जो सुलझे हैं,
वह भी लगे दौलत और शौहरत जुटाने की उधेड़बनों में,
देशप्रेम की बात करते हैं,
पर दिखाते नहीं वही कहलाते सयाने।
——–
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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अभिलेख
योग साधना में आसन और प्राणायाम दोनों ही महत्वपूर्ण-हिन्दी धार्मिक विचार लेख(yog sadhna men asan aur pranayam-hindi dharmik vichar article)
अक्सर लोग योग साधना को केवल योगासन तक ही सीमित मानकर उसका विचार करते हैं। जबकि इसके आठ अंग हैं।
योगांगानुष्ठानादशुद्धिये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिंदी में भावार्थ-योग के आठ अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
इसका आशय यही है कि योगसाधना एक व्यापक प्रक्रिया है न कि केवल सुबह किया जाने वाला व्यायाम भर। अनेक लोग योग पर लिखे गये पाठों पर यह अनुरोध करते हैं कि योगासन की प्रक्रिया विस्तार से लिखें। इस संबंध में यही सुझाव है कि इस संबंध में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और उनसे पढ़कर सीखें। इन पुस्तकों में योगासन और प्राणायाम की विधियां दी गयी हैं। योगासन और प्राणायम योगसाधना की बाह्य प्रक्रिया है इसलिये उनको लिखना कोई कठिन काम है पर जो आंतरिक क्रियायें धारणा, ध्यान, और समाधि वह केवल अभ्यास से ही आती हैं।
इस संबंध में भारतीय योग संस्थान की योग मंजरी पुस्तक बहुत सहायक होती है। इस लेखक ने उनके शिविर में ही योगसाधना का प्रशिक्षण लिया। अगर इसके अलावा भी कोई पुस्तक अच्छी लगे तो वह भी पढ़ सकते हैं। कुछ संत लोगों ने भी योगासन और प्राणायाम की पुस्तकें प्रकाशित की हैं जिनको खरीद कर पढ़ें तो कोई बुराई नहीं है।
चूंकि प्राणयाम और योगासन बाह्य प्रक्रियायें इसलिये उनका प्रचार बहुत सहजता से हो जाता है। मूलतः मनुष्य बाह्यमुखी रहता है इसलिये उसे योगासन और प्राणायाम की अन्य लोगों द्वारा हाथ पांव हिलाकर की जाने वाली क्रियायें बहुत प्रभावित करती हैं पर धारणा, ध्यान, तथा समाधि आंतरिक क्रियायें हैं इसलिये उसे समझना कठिन है। अंतर्मुखी लोग ही इसका महत्व जानते हैं। धारणा, ध्यान और समाधि शांत स्थान पर बैठकर की जाने वाली कियायें हैं जिनमें अपने चित की वृत्तियों पर नियंत्रण करने के लिये अपनी देह के साथ मस्तिष्क को भी ढीला छोड़ना जरूरी है।
इसके अलावा कुछ लोग तो केवल योगासन करते हैं या प्राणायम ही करके रह जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में भी लाभ कम होता है। अगर कुछ आसन कर प्राणायाम करें तो बहुत अच्छा रहेगा। प्राणायम से पहले अगर अपने शरीर को खोलने के लिये सूक्ष्म व्यायाम कर लें तो भी बहुत अच्छा है-जैसे अपने पांव की एड़ियां मिलाकर घड़ी की तरह घुमायें, अपने हाथ मिलाकर ऐसे आगे झुककर घुमायें जैसे चक्की चलाई जाती है। अपनी गर्दन को घड़ी की तरह दायें बायें आराम से घुमायें। अपने दोनों हाथों को कंधे पर दायें बायें ऊपर और नीचे घुमायें। अपने दायें पांव को बायें पांव के गुदा मूल पर रखकर ऊपर नीचे करने के बाद उसे अपने दोनों हाथ से पकड़ दायें बायें करें। उसके बाद यही क्रिया दूसरे पांव से करें। इन क्रियायों को आराम से करें। शरीर में कोई खिंचाव न देते सहज भाव से करें। सामान्य व्यायाम और योगासन में यही अंतर है। योगासनों में कभी भी उतावली में आकर शरीर को खींचना नहीं चाहिये। कुछ आसन पूर्ण नहीं हो पाते तो कोई बात नहीं, जितना हो सके उतना ही अच्छा। दूसरे शब्दों में कहें तो सहजता से शरीर और मन से विकार निकालने का सबसे अच्छा उपाय है योग साधना। शेष फिर कभी
लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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बुतों की तरह चलने की काबलियत-हिन्दी व्यंग्य कविता
सिंहासन पर अब लायक इंसान
नहीं पहुंच पाते हैं,
जिनमें काबलियत है बुतों की तरह चलने की
हुक्मरान बन कर सज जाते हैं।
उनकी उंगलियां इशारे करती आती हैं नज़र
कभी कभी जुबां पर बोल भी आते हैं।
पर सच यह है कि
इरादे कोई दूसरा करता
सोचता कोई और है
जमाना तो गुलाम है उनका
दौलत और ताकत है जिनके पास
वही बाकी इंसानों की अदाओं के खरीददार बन जाते हैं।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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गरीब की खुशी पर रोते-हिन्दी व्यंग्य कविता (garib ki khushi par rote-hindi vyangya kavita)
अपनी खुशी पर हंसने की बजाय
दूसरे के सुख रोते
इसलिये इंसान कभी फरिश्ते नहीं होते।
मुखौटे लगा लेते हैं खूबसूरत लफ़्जों का
दरअसल काली नीयत लोग छिपा रहे होते।
दौलत के महल में बसने वाले
खुश दिखते हैं,
मगर गरीब की पल भर की खुशी पर वह भी रोते।
सोने के सिंहासन पर विराजमान
उसके छिन जाने के खौफ के साये में
जीते लोग
कभी किसी के वफादार नहीं होते।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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पसीने की धारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें
कभी मेरे बहते हुए पसीने पर
तुम तरस न खाना,
यह मेरे इरादे पूरे करने के लिये
बह रहा है मीठे जल की तरह,
इसकी बदबू तुम्हें तब सुगंध लगेगी
जब मकसद समझ जाओगे।
सिमट रहा है ज़माना वातानुकुलित कमरे में
सूरज की तपती गर्मी से लड़ने पर
जिंदगी थक कर आराम से सो जाती,
खिले हैं जो फूल चमन में
पसीने से ही सींचे गये
वरना दुनियां दुर्गंध में खो जाती,
जब तक हाथ और पांव से
पसीने की धारा नहीं प्रवाहित कर करोगे
तब अपनी जिंदगी को हाशिए पर ही पाओगे।
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अकल से भैंस कभी बड़ी नहीं होती,
अगर होती तो, खूंटे से नहीं बंधी होती।
यह अलग बात है कि इंसान नहीं समझते
इसलिये उनकी अक्ल भी अमीरों की खूंटी पर टंगी होती।
भैंस चारा खाकर, संतोष कर लेती है,
मगर इंसान की अकल, पत्थरों की प्रियतमा होती।
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इंसान सस्ता हो रहा है-क्षणिकायें
महंगाई आसमान पर चढ़ गयी है,
इसलिये नैतिकता तस्वीर में जड़ गयी है।
चीजों की तरह इंसान भी बिकने लगा है,
मांग आपूर्ति के नियम से अनुसार
जरूरत से ज्यादा है बाज़ार में
इसलिये मेहनत की कीमत पड़ रही है।
———
आधुनिकता के नाम पर
इंसान सस्ता हो रहा है,
मस्ती के नाम पर अनैतिकता की
गुलामी को ढो रहा है।
यौवन की आज़ादी के नाम पर
पेट में पाप के बीज़ बो रहा है।
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चमन में अमन है-हिन्दी व्यंग्य कविता
दहशतगर्द घूम रहे आजाद
उनकी गोलियों से सभी तो नहीं मर गये
फिर भी जिंदा हैं ढेर सारे लोग
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
खेल के नाम पर चल रहा जुआ
जिनकी मर्जी है वही तो खेल रहे हैं
बाकी लोग तो बैठे हैं चैन से
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
कुछ नारियों की आबरु होती तार तार
बाकी तो संभाले हैं घरबार
इसलिये मान लो चमन में अमन हैं।
लुटेरों ने दौलत भेज दी परदेस
पर फिर भी भूखे लोग जिंदा हैं
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
खरीद रखा है शैतानों ने उस हर शख्स को
जो भीड़ पर काबू रख सकता है
अगर उनको रोकने की कोशिश हुई
तो आ जायेगा भूचाल,
छोड़कर भाग जायेंगे तुम्हारे पहरेदार
छोड़कर तलवार और ढाल,
जलने लगेगा हर शहर,
गु्फा से निकले शैतानों का टूटेगा कहर
चलने तो उनका कारवां,
वही हैं यहां के बागवां,
बंद कर लो अपनी आखें,
शैतानो को रोकें ऐसी नहीं रही सलाखें,
उनका व्यापार चल रहा है
इसलिये मान लो चमन में अमन है।
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असली और नकली जांबाज-हिन्दी शायरी
मैदान पर लड़ते कम
किनारे पर खड़े दिखाते दम
कागजी जांबाजो के करतब
कभी अंजाम पर नहीं पहुंचे
पर हर पल उनको अपनी आस्तीने
ऊपर करते हमने देखा है।
कीर्तिमान बहुत सुनते हैं उनके
पर कामयाबी के नाम पर खाली लेखा है।
———-
पत्र प्रारूप पर
हाशिए पर नाम लिखवाकर
वह इतराते हैं,
सच तो यह है कि
कारनामे देते अंजाम देते असली जांबाज
हाशिए पर छपे नाम प्रसिद्धि नहीं पाते हैं।
———-
उनको गलत फहमी है कि
किनारे पर चीखते हुए
तैराकों से अधिक नाम कमा लेंगे।
हाशिऐ पर खिताबों से जड़कर नाम
जमाने पर सिक्का जमा लेंगे।
शायद नहीं जानते कि
किनारे पल भर का सहारा है
असली जंग तो दरिया से लड़ते हैं जांबाज
लोगों की नज़रे लग रहती हैं उन पर
कागज के बीच में लिखा मजमून ही
पढ़ते हैं सभी
हाशिए के नाम बेजान बुत की तरह ही जड़े रहेंगे।
———
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यकीन करना मुश्किल-हिन्दी व्यंग्य कविता
खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
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मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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नैतिकता की बात-हिन्दी व्यंग्य कविता
आपस में जाम टकराते हुए लोग
नैतिकता की बात करने लग जाते हैं,
फिर सुनाते हैं अपनी कमाई के नुस्खे
जैसे दो नंबर की कमाई एक नंबर की हो
सीना फुलाकर उसकी कहानी सुनाते है।।
बहुत अच्छा लगता है
आदर्श और नैतिकता की बात करते हुए
बशर्त है आदमी स्वयं से छिप सकता हो।
वही कहलाता है साफ सुथरा इंसान
जो दूसरों पर इल्जाम लगाने में
कभी देर नहीं करता
पर बात अगर अपने पर आ जाये तो
जमाने का जिम्मेदार बताते हुए
अपना कसूर अपनी नज़र बचा सकता हो।
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कर्जे और किश्तों में जिंदगी-आलेख और कविता (loan and lifr-hindi article and poem)
इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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अंतर्जाल पर दूसरे की लोकप्रियता का लाभ उठाने के प्रयास-हिन्दी लेख
संदर्भ के लिये यह दिलचस्प पाठ अवश्य पढ़ें।
http://nilofer73.blogspot.com/2010/02/blog-post.html
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क्रिकेट खेल के साथ दूसरी बातें भी जुड़ी हैं-हिन्दी आलेख
इससे पूर्व इसी ब्लाग पर लिखे गये लेख का लिंक
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जब फैशन तनाव बने-हिन्दी आलेख (fashan is tension-hindi article)
अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।
एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये। उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये। कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी। उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।
बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’
हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी। उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’
वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’
बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी। अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था। अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’
हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।
हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं। अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’
एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है। हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल नहीं पहन सकती।’
उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।
वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।
दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं। आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।
हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने दहेज में कार मांगी है।’
वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!
बेटे ने बाप को समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता। नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।
बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा। जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे। औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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योग केवल सांस लेने की क्रिया नहीं है-आलेख (yog aur asan-hindi lekh)
वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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