सब चलता है-हास्य व्यंग्य कविताएँ


हम खड़े हैं जहां
छू रहा है चारों तरफ से
डीजल और पेट्रोल का धुआं।
कोई बात नहीं
सब चलता है
यह भी चलेगा
गर्व करो इस पर
आखिर है यह विकास का कुआं।
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उसने नकली घी दिया
इसने नकली नोट दिया।
इस तरह नकल के युग में भी
ईमानदारी को जिंदा किया।
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अपनी बूढ़ी मां को
गंभीर हालत में चिकित्सक के पास
ले जाते हुए उन्होंने अपने बेटे से कहा
‘बेटा! अब तो तुम्हारी दादी का
समय आ गया लगता है।
अपनी मां और बहिन के साथ
तुम भी घर का ध्यान रखना
किस्मत ही जिद्द पर अड़ी हो तो
अलग बात है
वरना तो डाक्टर के नर्सिंग होम में
दाखिले का पर्चा ही
श्मशान में दाखिले के टिकट की तरह लगता है।’

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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