यह कौनसी अक्लमंदी है-हास्य कविता

चंद पलों की खुशी की खातिर
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देना
भला कौनसी अक्लमंदी है
सब कुछ करते हैं हम
अपने नाम के लिए
लेते हैं इसका और उसका नाम
हम करतार नहीं है
सब जानते हैं
फिर भी हर पर अपना काम
लिखा हो यही मानते हैं
आजाद लगती हैं अक्ल
पर वह तो रूढियों और रीति रिवाजों को
निभाने के लिए समाज की बंदी है

One Comment

  1. ramesharya
    Posted September 9, 2008 at 9:59 am | Permalink

    bilkul shiriman ji…ye to ekdm bevkufi h…thodi si chij ke liye puri jindgi ko dav pr lga dena kahan ki aklmandi h…


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