भोर में ही शुरू शोर -हिन्दी कविता साहित्य
Posted on January 28, 2008 by दीपक भारतदीप
अभी हुई है भोर
शुरू कर दिया उन्होने शोर
कैसे न होंगे दिन भर बोर
जहाँ मौन रखकर ध्यान करना था
वहाँ लगा रहे हैं दिमाग पर जोर
कुछ सीखना था प्रात:
परमात्मा का नाम लेकर
डाल दिया मुहँ में रोटी का कोर
आदमी सुख तो चाहता है
पर दिल में उसके अहसास के लिए
कोई कोना बाकी नहीं है
चारों तरफ भरा है शोर
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