रौशनी और अँधेरे का व्यापार-हास्य कविता

वादों के बादल बरसने का
मौसम जब आता है
यादों पर ग्रहण लग जाता है
जजबातों के सौदागर तय करते हैं कि
कौनसा सा वादा बरसाया जाये
किस याद को लोगों के दिमाग
से भुलाया जाये
तमाम के लगाते नारे रचकर
हवाई किला किया जाता है खडा
जो कभी खुद नहीं चलते
उसके दरवाजे कितने भी हों आकर्षक
रास्ता एक कदम बाद ही
दीवार से टकरा जाता है
लुभावने वाद और वादों के झुंड अपनी जुबान पर लिए
अभिनय करते हुए जजबातों के
व्यापारी चलते हैं साथ लेकर चलते हैं बुझे दिए
अँधेरे का डर दिखाकर
अपना करते हैं व्यापार
कहते हैं कि दूध का जला
छांछ भी फूंक कर पी जाता है
पर यहाँ तो आदमी कई बार
जलने के बाद भी आदमी
फिर पीने के लिए जीभ जलाने आ जाता है
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अँधेरे न होते तो
रौशनी का व्यापार कौन करता
रोशनी ही न होती अंधेरों से कौन डरता
जिन्दगी इसी घूमते पहिये का नाम है
एक करता जेब खाली दूसरा भरता
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नोट-यह पत्रिका कहीं भी लिंक कर दिखाने की अनुमति नहीं है. दीपक भारतदीप, ग्वालियर

One Comment

  1. mehhekk
    Posted January 27, 2008 at 4:25 pm | Permalink

    bahut khub vado ke barasne ka mausam jab aata,yaadon ko grahan lag jata hai.ek dam sahi.


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