वैज्ञानिकों ने आसमान एक धरती का अस्तित्त्व खोज निकाला है, उनके दावों पर अगर गम्भीरता से विचार करें तो अविश्वास का कोई कारण मुझे तो नज़र नहीं आता । अमेरिकी वैज्ञानिकों की खोज पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी और शायद वही हैं जो आज भी अपने देश का सिर पूरे विश्व में उठाएँ हुए हैं। जब मैं आकाश की तरफ देखता था तो मुझे यह विश्वास होता था कि कहीं न कहीं आकाश में जीवन जरूर होगा, इसके पीछ तर्क थोडा हल्की तरह का अवश्य देता था पर किसी आदमी को समझाने के लिए वह ठीक ही है। वह यह कि हमारे पास एक से ज्यादा स्थानों पर जमीन होती है तो क्या हम उसको निरुप्योगी छोड़ देते हैं , एक जगह मकान में रहते हैं और दूसरी जगह पलट मिल जाये तो या तो उसे बेचे देते हैं या उस पर मकान बनवाकर उसे किराए पर उठा देते हैं, तो जिस परमात्मा ने यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड रचा है क्या वह इस धरती पर जीवन को स्थापित कर बाकी जगह खाली छोड़ सकता है। हमारे लिए जो सौरमंडल है उसमे किसी पर जीवन होगा इसमें मुझे संदेह रहता है, कारण ? मैं धरती को एक बड़ी इमारत की तरह मानता जिसमे खिड़की, रौश्नादन और पानी की टंकी तथा अन्य सुरक्षा कवच की तरह अनेक ग्रह और उपग्रह स्थापित हैं । हाँ, इसकी छतें दिन और रात में बदलती हैं-दिन में सूर्य अपने तेज से और रात को चंद्रमा अपनी शीतलता से जीवन का संचालन करते हैं । जब मैंने आकाश पर धरती के अस्तित्व की खबर देखी, सुनीं और पढी तो एक रोमांच का अनुभव किया क्योंकि बचपन से आकाश की तरफ देखते हुए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह विचार जरूर आता है कि वहां भी ऐसा ही जीवन होगा। दुनियां में कोई भी ऐसा वृतांत सुनाने को नहीं मिलता कि आकाश में कोई जीवन है। हाँ, देवताओं के आकाश में विचारने की पुष्टि होती है और फिर इन्सान के लिए स्वर्ग-नरक या कहें जन्नत-जहन्नुम जैसे कल्पित स्थान आकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर ही गडे गए हैं ताकी आदमी आकाश के बारे में ज्यादा सोचे नहीं- क्योंकि वह अगर आकाश के बारे में सोचेगा तो उसे तथाकथित बुध्दिजीवियों के भ्रमजाल में फंसने का समय ही कहाँ मिलेगा। हमारे धर्म ग्रंथों में आकाश वानियाँ होने तथा देवताओं के धरती पर आने की घटनाओं का वर्णन तो मिलता है पर हमारे जैसा खिन और भी जीवन है ऎसी कोई जानकारी मेरे नजरों के सामने नही आयी है । विश्व के अनेक किताबों में आकाश से प्रथ्वी का जिक्र मिलता है और वहां से धरती पर विमान आने और लोगों के उतरने की अनेक घटनाएँ हैं पर जैसा जीवन यहां है ऐसा कहीं और भी है ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बहरहाल मेरे हिसाब से यह सबसे नवीनतम खोज है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। जहाँ तक जीवन के मूल तत्वों का प्रशन है भारतीय दर्शन और पशिचम के विज्ञान में कोई अंतर नहीं है। जीवन के लिए जलवायु का होना जरूरी है और जिस धरती की खोज की गयी है उस पर वैसी ही जलवायु है जैसी यहां पायी जाती है।यह संभावना कम ही है कि उस धरती के लोगों से कोई हमारा जल्दी संपर्क होने वाला है। अगर हो सकता है तो तभी जब वहां हमसे ज्यादा प्र्गातिवान लोग हौं , क्योंकि हमारी वैज्ञानिक क्षमता अभी उन तक अपना संदेश पहुंचाने की नहीं है। पर एक बात जो कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है यह कि अगर उस धरती के लोगों से संपर्क हो गया तो यहां ऐसे कईं भ्रम और विचारधाराएँ अपना अस्तित्व खो बैठेंगी जो बरसों से पीढी -दर-पीढी हमारे मस्तिष्क पर स्थापित रही हैं और उनकी आड़ में तमाम लोग अपने परिवार के लिए राज्यीय, आर्थिक, और धार्मिक सत्ता जुटाते रहे हैं। एक अनजाने भय जो कहीं आकाश में स्थित नहीं है उसका भय दिखाकर सामान्य आदमी को दिखाकर उसका सामाजिक, आर्थिक, बौध्दिक और राजनीतिक शौषण किया जाता रहा है और ऐसा करने वाले आकाश से ही अपनी शक्ति प्राप्त करने का दावा करते हैं। जब आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि आकाश में भी हमारे जैसे गरीब और बीमार लोग रहेते हैं वह स्वर्ग और नरक के अतार्किक सपनों और दुसप्नों से मुक्त हो जाएगा। अभी तक उसे यह बताया जाता है कि आकाश में स्वर्ग है जहां तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं फ्री में मिल जाती हैं अगर वह अपने तथाकथित पथप्रदर्शक की बात मान ले तो! अगर नहीं मानेगा तो उसे नरक का भय दिखाया जाता है। अगर यह संपर्क हो गया तो सभी धर्मों के कर्म कांडों -जो स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी देते हैं-पर पलीता लग जाएगा। क्योंकि आदमी अपने पथ प्रदर्शकों से पूछेगा के आकाश में भी धरती है तो यह स्वर्ग और नरक कहॉ है?यकीनन वह इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और उनके द्वारा बरसों से बुना गया भ्रमजाल टूट जाएगा ।
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