7
Feb
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, epatrika, hindi writer, india, kavita, mastram, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, writer, अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी. Tagged: छबि, मनोरंजन, मस्ती, लोकप्रियता, संपादकीय, हिन्दी साहित्य, hindi editorial, image, masti, popular. Leave a Comment
तीन वर्ष से जारी हमारी निजी ‘चिट्ठाचर्चा’ में पहली बार दो ऐसे शब्दों से सामना हुआ जिनके अर्थ और भाव से हम आज तक परिचित नहीं थे। वह हैं ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’। मुश्किल तो यही है कि भाई लोग अंग्रेजी हिज्जे नहीं लिखते जिससे उनका शुद्ध उच्चारण और हिन्दी अर्थ कहीं से पता करें। बहरहाल ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ को दूसरे के नाम की लोकप्रियता का उपयोग अपने हित में भुनाने के प्रयास को कह सकते हैं। ‘साइबर स्कवैटिंग’ का मतलब यह है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के आधार पर अपनी वेबसाईट या ब्लाग का पता और नाम तय करना। ‘टाईपो स्क्वैटिंग’ का मतलब है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के नाम से मिलता जुलता नाम रखना ताकि लोग भ्रमित होकर वहां आयें।
अंतर्जाल पर जब हमने लिखना शुरु किया तब ऐसा प्रयास किया था कि जिससे दूसरे मशहूर नामों का लाभ हमें मिले। तब इस बात का आभास नहीं था कि जिनको सामान्य जीवन को हम गलत समझते आये हैं वही हम करने जा रहे हैं। वैसे इस विषय पर हिन्दी ब्लाग जगत में विवाद भी चल रहा है पर इस पाठ का उससे कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह विषय अत्यंत व्यापक है और इस बारे में नये लेखकों के साथ आम लोगों तक भी यह संदेश पहुंचाना जरूरी है कि इस तरह लोकप्रियता का उपयोग विवाद पैदा कर सकता है।
आपने देखा होगा कि अनेक बार बाजारों में ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं जहां एक ही वस्तु की दुकाने होती हैं। जिनमें एक नाम ‘अमुक’ होता है तो दूसरा ‘न्यू अमुक’ कर लिखता है। अनेक शहरों में चाट, गजक, नमकीन तथा मिठाई की प्रसिद्ध दुकानें होती हैं और उसका उपयोग अन्य लोग ‘न्यू’ या अन्य शब्द जोड़कर करते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि किसी शहर की कोई दुकान अपनी चीज के कारण प्रसिद्ध है तो ठीक उसी नाम से दूसरे शहर में खुल जाती है। अनेक बार उपभोक्ता वहां जाते भी हैं और पूछने पर मालिक लोग उसी की शाखा होने का दावा करते हैं। अब यह अलग बात है कि दूसरे शहर जाने पर जब उस मशहूर दुकान वाले से पूछा जाता है तो इसका खंडन हो जाता है। कोटा की प्याज कचौड़ी मशहूर है और उसे बनाने वाले की दूसरे शहर में कोई दुकान नहीं है पर दूसरे शहरों के कुछ दुकानदार ऐसा दावा करते हैं।
दूसरे की लोकप्रियता भुनाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है पर सचाई यह है कि यह कानूनी या नैतिक रूप से गलत न भी हो पर इससे स्वयं की छबि प्रभावित जरूर होती है-कई लोग तो नकलची तक कह देते हैं। ऐसा करते समय अगर हम यह न सोचें कि दूसरा क्या कहेगा पर यह तो देखें कि हम ऐसा करते हुए दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे में हमारी मेहनत ईमानदार होती है पर फिर भी उसमें नेकनीयती की कमी से हमारी छबि प्रभावित होती है।
जब हम अंतर्जाल पर लोकप्रिय नामों से जुड़ने का प्रयास कर रहे थे तब अपनी गलती का पता नहीं था, और एक वर्ष पहले तक ही यह आभासा हो पाया कि यहां ब्लाग के पते और नाम से अधिक ताकतवर तो उसमें लिखी गयी सामग्री है। पहले कुछ ब्लागों में नाम उपयोग किये तो कहीं पते भी लोकप्रिय नामों से लिये गये। बाद में उनमें से अनेक हटा लिये। इस लेखक के ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर बीस ब्लाग हैं जिनमें अब एक ब्लाग ऐसा बचा है भले ही वह एक लोकप्रिय नाम से मिलता है पर उसकी लोकप्रियता अब भी कम है। प्रसंगवश इसी लेखक ने अपने दो छद्म ब्लाग भी बनाये थे पर यह संयोग ही था कि वह उत्तरप्रदेश के एक प्रसिद्ध लेखक से उसके नाम और पते मेल खा गये। दरअसल वह नाम भी ऐसा ही था जिसे लेकर इस लेखक की नानी उसे बचपन में बुलाती थी। उन पर दो वर्ष से कुछ नहीं लिखा पर आठ दस पाठक उन पर आ ही जाते हैं-उन ब्लाग को लेकर मन में कोई गलती अनुभव भी नहीं होती। अलबत्ता अब तो यह सोच रहे हैं कि उस अपने एक ब्लाग स्पाट के ब्लाग का पता भी बदल दें क्योंकि आगे चलकर लोग यही कहेंगे कि देखो यह दूसरे की लोकप्रियता भुना रहा है।
मुख्य बात यह है कि अंतर्जाल पर अगर तात्कालिक उद्देश्य पूरे करना हों तो यह ठीक हो सकता है पर कालांतर में इसका कोई लाभ नहीं होता। जिनको लंबे समय तक टिकना है उन्हें तो इससे दूर ही रहना चाहिए। अगर आपने वेबसाईट या ब्लाग का नाम किसी दूसरे की लोकप्रियता को बनाया तो वह आपकी छबि को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरी बात यह है कि हम जहां अपने शब्द लिखते हैं उनकी शक्ति का समझना जरूरी है। उस क्षेत्र को एच.टी.एम.एल कहा जाता है। हम जो शीर्षक, सामग्री या लेबल टैग लगाते हैं वह हमारे ब्लाग को सच इंजिनों में ले जाते हैं-एक तरह से शब्द ही चालक हैं अगर आपको किसी की लोकप्रियता का लाभ उठाना है तो बस अपने शीर्षक में ही उसका उपयोग करें कि दूसरे को यह न लगे कि आपने उसके नाम का उपयोग किया है। अगर वह आपका मित्र या जानपहचान वाला हो तो उसकी प्रशंसा में एक दो पाठ लिख दें-उसका नाम शीर्षक के साथ दें। याद रहे यहां किसी की निंदा या आलोचना करते हुए नाम लेने से बचें। ब्लाग का पता या नाम अगर किसी लोकप्रिय नाम पर लिखेंगे तो उससे अपना छबि को स्वतंत्र रूप से नहीं स्थापित कर पायेंगे। फिर उससे आप स्वयं ही संकीर्ण दायरे में यह सोचकर सिमट जायेंगे कि आप तो वैसे ही हिट हैं और नवीन प्रयोग और रचना नहीं कर पायेंगे।
आगरा का पेठा मशहूर है तो भारत की हिन्दी-अभिप्राय है कि सार्वज्निक महत्व के नामों को लेकर झगड़ा नहीं होता। इतना तो चल जाता है पर निजी लोकप्रिय नामों के उपयोग को लेकर अनेक जगह झगड़ा भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि व्यक्ति की निजी लोकप्रियता को तभी भुनाने का प्रयास करें जब आपके पास हूबहू उस नाम के प्रयोग का पुख्ता आधार हो। अगर राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म या अन्य किसी क्षेत्र में कोई प्रसिद्ध नाम है और उसका आप इस्तेमाल करते हैं तो वह कानून का मामला बन सकता है। अभी अंतर्जाल पर ऐसा कोई कानून है कि पता नहीं पर इसका आशय यह नहीं है कि चाहे किसी का नाम भी उपयेाग किया जा सकता है। ब्लाग या वेबसाईट का पता भले ही आसानी से मिल जाये पर किसी मामले पर अदालतें संज्ञान ले सकती हैं। एक बात याद रखिये संस्थान पंजीकृत होते हैं पर निजी लोकप्रियता नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति का नाम कोई उपयोग करने लगे-लोगों की निजी लोकप्रियता की रक्षा न्याय के दायरे में है भले ही उसके लिये कोई कानून न बना हो। संभवतः अदालतों में आत्मुग्धता का तर्क नहीं चले कि ‘यह तो हमें मिल गया, हमने हड़पा नहीं है’। एक प्रसिद्ध नेता के नाम पर बनी वेबसाईट को गलत ठहराया जा चुका है-ऐसा उसी लेख में पढ़ने को मिला जिसमें ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ मिले।
कहने का अभिप्राय यह है कि जितना हो सके अपनी लोकप्रियता अपने पाठों से जुटाने का प्रयास करें। अपने ब्लाग और वेबसाईटों के पतों में लोकप्रिय नामों का उपयोग करने से क्या लाभ? यह काम तो एक पाठ से किया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि अधिक से अधिक सकारात्मक लेखन करें तो स्वतः ही अंतर्जाल पर आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। दुकानों का बोर्ड तो लोग इसलिये बनाते हैं ताकि ग्राहक उसे देखकर आयें। इस प्रयास में होता यह है कि अच्छी चीज बनायें या बेचें पर फिर भी उनकी छबि नकलची की ही होती है। लोग कमाने के लिये झेलते हैं क्योंकि वह रोज बोर्ड बदल नहीं सकते जबकि ब्लाग या वेबसाईट पर तो एक नहीं हजारों बोर्ड शीर्षक बनाकर लगाये जा सकते हैं। इसलिये यहां दूसरे की लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास कर अपनी छबि न बिगाड़े तो ही अच्छा! कानून यह नैतिकता के प्रश्न से बड़ी बात यह है कि हम अपनी छबि वैसे ही बनायें जैसी कि दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
संदर्भ के लिये यह दिलचस्प पाठ अवश्य पढ़ें।
http://nilofer73.blogspot.com/2010/02/blog-post.html
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
27
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट, दीपक भारतदीप, हिंदी, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: क्रिकेट, पाकिस्तान, भारत, मनोरंजन, संपादकीय, हिन्दी साहित्य, cricket match, editorial, hindi article. Leave a Comment
भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने
एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने! सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग अभी भी यह प्रयास कर रहे हैं कि उसके कुछ खिलाड़ियों को यहां बुलाकर पाकिस्तान के लोगों को खुश किया जाये। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
इससे पूर्व इसी ब्लाग पर लिखे गये लेख का लिंक
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com
—————————–
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
25
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in dashboard, epatrika, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, india, inglish, mastram, sahitya patrika, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, चिन्तन, दीपक भारतदीप, विचार, हिन्दी. Tagged: आलेख, कला, मनोरंजन, मस्ती, समाज, हिन्दी साहित्य, hindi article, hindi entertainment, hindi hasya vyangya, masti. Leave a Comment
अखबार में पढ़ने को मिला कि ब्रिटेन में महिलायें क्रिसमस पर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनने के लिये इंजेक्शन लगवा रही हैं। उससे छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता-भारतीय महिलायें इस बात पर ध्यान दें कि अंग्रेजी दवाओं के कुछ बुरे प्रभाव ( साईड इफेक्ट्स) भी होते हैं। हम तो समझते थे कि केवल भारत की औरतें ही ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनकर ही दर्द झेलती हैं अब पता लगा कि यह फैशन भी वहीं से आयातित है जहां से देश की शिक्षा पद्धति आई है।
एक बार हम एक अन्य दंपत्ति के साथ एक शादी में गये। उस समय हमारे पास स्कूटर नहीं था सो टैम्पो से गये। कुछ देर पैदल चलना पड़ा। वह दंपति भी चल तो रहे थे पर महिला बहुत परेशान हो रही थी। उसने हाई हील की चप्पल पहन रखी थी।
बार बार कहती कि ‘इतनी दूर है। रात का समय आटो वाला मिल जाता तो अच्छा रहता। मैं तो थक रही हूं।’
हमारी श्रीमती जी भी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) पहने थी पर वह अधिक ऊंची नहीं थी। उन्होंने उस महिला से कहा कि-‘यह बहुत ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाले जूते या चप्पल पहनने पर होता है। इसलिये मैं कम ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली पहनती हूं।’
वह बोली-‘नहीं, ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से से कोई फर्क नहीं पड़ता।’
बहरहाल उस शादी के दौरान ही उनकी चप्पल की एड़ी निकल गयी। अब यह तो ऐसा संकट आ गया जिसका निदान नहीं था। अगर चप्पल सामान्य ढंग के होती तो घसीटकर चलाई जा सकती थी पर यह तो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) वाली थी। अब वह उसके पति महाशय हमसे बोले-‘यार, जल्दी चलो। अब तो टैम्पो तक आटो से चलना पड़ेगा।’
हमने हामी भर दी। संयोगवश एक दिन हम एक दिन जूते की दुकान पर गये वहां से वहां उसने हमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते दिखाये पर हमने मना कर दिया क्योंकि हमें स्वयं भी यह आभास हो गया था कि जब ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते टूटते हैं तो क्या हाल होता है? उनको देखकर ही हमें अपनी ऐड़ियों में दर्द होता लगा।
हमारे रिश्ते की एक शिक्षा जगत से जुड़ी महिला हैं जो ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूतों की बहुत आलोचक हैं। अनेक बार शादी विवाह में जब वह किसी महिला ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहने देखती हैं तो कहती हैं कि -‘तारीफ करना चाहिये इन महिलाओं की इतनी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनकर चलती हैं। हमें तो बहुत दर्द होता है। इनके लिये भी कोई पुरस्कार होना चाहिए।’
एक दिन ऐसे ही वार्तालाप में अन्य बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि-‘ अरे भई, आज समय बदल गया है। हम तो पैदल घूमते थे पर आजकल की लड़कियों को तो मोटर साइकिल और कार में ही घूमना पड़ता है इसलिये ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल पहनने का दर्द पता ही नहीं लगता। जो बहुत पैदल घूमेंगी वह कभी ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल नहीं पहन सकती।’
उनकी यह बात कुछ जमी। ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते का फैशन परिवहन के आधुनिक साधनों की वजह से बढ़ रहा है। जो पैदल अधिक चलते हैं उनके िलये यह संभव नहीं है कि ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहने।
वैसे भी हमारे देश में जो सड़कों के हाल देखने, सुनने और पड़ने को मिलते हैं उसमें ऊंची ऐड़ी (हाई हील) की चप्पल और जूता पहनकर क्या चला जा सकता है? अरे, सामान्य ऐड़ी वाली चप्पलों से चलना मुश्किल होता है तो फिर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) से खतरा ही बढ़ेगा। बहरहाल फैशन तो फैशन है उस पर हमारा देश के लोग चलने का आदी है। चाहे भले ही कितनी भी तकलीफ हो। हमासरे देश का आदमी अपने हिसाब से फैशन में बदलाव करेगा पर उसका अनुसरण करने से नहीं चूकेगा।
दहेज हमारे यहां फैशन है-कुछ लोग इसे संस्कार भी मान सकते हैं। आज से सौ बरस पहले पता नहीं दहेज में कौनसी शय दी जाती होगी- पीतल की थाली, मिट्टी का मटका, एक खाट, रजाई हाथ से झलने वाला पंख और धोती वगैरह ही न! उसके बाद क्या फैशन आया-बुनाई वाला पलंग, कपड़े सिलने की मशीन और स्टील के बर्तन वगैरह। कहीं साइकिल भी रही होगी पर हमारी नजर में नहीं आयी। अब जाकर कहीं भी देखिये-वाशिंग मशीन, टीवी, पंखा,कूलर,फोम के गद्दे,फ्रिज और मोटर साइकिल या कार अवश्य दहेज के सामान में सजी मिलती है। कहने का मतलब है कि घर का रूप बदल गया। शयें बदल गयी पर दहेज का फैशन नहीं गया। अरे, वह तो रीति है न! उसे नहीं बदलेंगे। जहां माल मिलने का मामला हो वहां अपने देश का आदमी संस्कार और धर्म की बात बहुत जल्दी करने लगता है।
हमारे एक बुजुर्ग थे जिनका चार वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो गया। उनकी पोती की शादी की बात कहीं चल रही थी। मध्यस्थ ने उससे कहा कि ‘लड़के के बाप ने दहेज में कार मांगी है।’
वह बुजुर्ग एकदम भड़क उठे-‘अरे, क्या उसके बाप को भी दहेज में कार मिली थी? जो अपने लड़के की शादी में मांग रहा है!
बेटे ने बाप को समझाकर शांत किया। आखिर में वह कार देनी ही पड़ी। कहने का तात्पर्य यह है कि बाप दादों के संस्कार पर हमारा समाज इतराता बहुत है पर फैशन की आड़ लेने में भी नहीं चूकता। नतीजा यह है कि सारे कर्मकांड ही व्यापार हो गये हैं। शादी विवाह में जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे खाली औपचारिकता निभाने जा रहे हैं।
बहरहाल अभी तक भारतीय महिलाओं को यह पता नहीं था कि कोई इंजेक्शन लगने पर छह महीने तक ऐड़ी में दर्द नहीं होता वरना उसका भी फैशन यहां अब तक शुरु हो गया होता। अब जब अखबारों में छप गया है तो यह आगे फैशन आयेगा। जब लोगों ने फैशन के नाम पर अपने शादी जैसे पवित्र संस्कारों को महत्व कम किया है तो वह अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ से भी बाज नहीं आयेंगे। औरते क्या आदमी भी यही इंजेक्शन लगवाकर ऊंची ऐड़ी (हाई हील) के जूते पहनेंगे। कभी कभी तो लगता है कि यह देश धर्म से अधिक फैशन पर चलता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
13
Jan
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, epatrika, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, mastram, sahitya, sahitya patrika, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, writer, अनुभूति, अभिव्यक्ति, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शब्द, हिंदी पत्रिका, हिंदी साहित्य, हिन्दी. Tagged: अध्यात्म, कला, धर्म, प्राणायाम, समाज, हिंदी साहित्य, हिन्दू, hindi article, pranayam, yagasan. Leave a Comment
वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
———————-
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
28
Dec
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, dashboard, epatrika, family, mastram, sahitya patrika, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, writer, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, इंटरनेट, चिन्तन, दीपक भारतदीप, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: article, आलेख, मनोरंजन, हिन्दी साहित्य, editorial, hindi sahitya, masti, mastram. Leave a Comment
अंतर्जाल पर लिखते हुए तीन वर्ष का समय हो गया। कहना कठिन है कि अपना उद्देश्य कहां तक प्राप्त किया। वैसे ही लिखने को लेकर अपनी सफलता या असफलता का विचार नहीं किया। न ही इस बात पर विचार किया कितने लोगों ने पढ़ा? अलबत्ता अपने जीवन में लिखना शुरु करने से आज तक एक बात का अनुभव किया कि इस संसार में ऐसे मित्र लेखन के क्षेत्र में ही मिलते हैं जो आपके प्रशंसक और आलोचक होने के साथ ही व्यक्तिगत रूप से हितैषी होते हैं। अंतर्जाल पर छद्म नामों को लेकर समस्या न हो तो यह कहना सरल है कि यहां भी इस लेखक को बहुत अच्छे मित्र अधिक संख्या में मिले। कम से कम एक बात में उन्होंने निभाया कि ‘जबरन सफल’ बनाने का कोई प्रयास न कर नये प्रयोगों के लिये प्रेरणा तो दी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभी अपनी सफलता के दावे करना मूर्खता होगी तो अपनी असफलता को लेकर कुंठा पालना उससे भी अधिक मूर्खता! इस लेखक के पांच ब्लाग गूगल की पैज रैंक में चार अंक ले चुके हैं।
1.शब्द लेख सारथी पत्रिका
2.दीपक बापू कहिन
3.ई-पत्रिका
4.शब्द पत्रिका
5.शब्द लेख पत्रिका
कुल बीस ब्लाग/पत्रिका में 12 अन्य तीन अंक लिये हुए हैं। पांच ब्लाग का चार अंक में होना शायद इतना अधिक सफल होना न लगे-क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने को लेकर अनेक भ्रम है-मगर अपने लेखकीय कर्म से एक बात अनुभव कर ली है कि अंग्रेजी पर बहुत कुछ समाग्री इस अंतर्जाल पर है पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ब्लाग या वेबसाईटें हिन्दी से अधिक पाठक जुटाती हैं। ब्लाग/वेबसाईटें की रैंक बताने वाली एक वेबसाईट पर इस लेखक का एक ब्लाग साहित्य श्रेणी में है जो कल चतुर्थ वरीयता तक पहुंचा था और उसके पीछे 106 ब्लागों में बहुत सारे अंग्रेजी के थे। हिन्दी की एक व्यवसायिक वेबसाईट भी उसके बहुत पीछे थी। इस रैंकिंग वाली साईट पर अपने ब्लाग पंजीकृत करने पड़ते हैं इसलिये जो पंजीकृत नहीं है उनसे मुकाबला करना ठीक नहीं हैं पर इतना जरूर है कि हिन्दी के ब्लाग को अंग्रेजी से बढ़त नहीं मिलेगी यह सोचना भी गलत है-इससे यह बात समझ में आती है। इसी वेबसाईट पर अन्य श्रेणियों में भी इस लेखक के ब्लाग पंजीकृत हैं और उन्होंने अंग्रेजी ब्लागों पर बढ़त बनायी है।
अगर देश के हिन्दी विद्वान या संगठित क्षेत्रों की संस्थायें हिन्दी ब्लाग लेखक को अदना समझ रही हैं तो यह उनका अल्पज्ञान है। आधुनिक काल के लेखकों को लेकर भले ही संगठित प्रकाशन संस्थायें अभी भी आशावादी बनी हुईं हैं पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि वैश्विक काल में दाखिल हो चुकी हिन्दी के लिये अब भी स्वर्ण काल या भक्ति काल की रचनायें ऊर्जा प्रदान करेंगी और आधुनिक काल के लेखकों की रचनायें यहां अधिक सफल नहंी होती दिख रही बल्कि अंतर्जाल पर ‘गागर में सागर’ भरने वाले नये लेखक ही अब उसे आगे ले जायेंगे और यकीनन वह उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।
एक रोचक किस्सा है जिसका संबंध अंतर्जाल पर लिखने को लेकर ही है। एक अखबार अक्सर इस लेखक के अध्यात्मिक ब्लाग से रचनायें उठाकर अपने यहां बिना नाम के छाप रहा था। यह अखबार लेखक के घर भी आता था। एक दिन लेखक की नज़र अध्यात्मिक स्तंभ की तरफ गयी तो यह देखकर दंग रह गया था कि वह जस की तस इस लेखक के ब्लाग से उठायी गयी थी। तब इस लेखक ने अन्य दिनों अंक भी चेक किये। उसी अखबार में प्रकाशित एक लेख में उसके स्तंभकार ने ओबामा और गांधी जी पर नोबल पुरस्कार पर लिखे गये इस लेखक के तीन लेखों के अनेक अंशों को जस की तस नहीं छापा तो शब्दों का हेरफेर भी अधिक नहीं थी। दो अक्टूबर गांधी जयंती को लेकर भी इस लेखक के लेख केे अंशों का उसमें उपयोग किया गया था।
इस लेखक ने उसके संपादक को फोन किया। संपादक ने अध्यात्मिक विषयों को लेकर कहा-‘यह तो अच्छी बात है कि आपके संदेशों का प्रसारण सभी जगह हो रहा है।’
इस लेखक ने कहा-‘उससे हम नहीं रोक रहे, मगर लेखक का नाम तो दें।’
उसने बड़ी मासूमियत से कहा-‘उसे वैसे के वैसे नहीं लिया होगा। कुछ तो शब्दों में हेरफेर होगा।’
इस लेखक को हंसी आ गयी। उसने कहा-‘नहीं, वैसे के वैसे ही उठाये गये हैं।
संपादक ने कहा-‘ठीक है! हमने अपने संबंधित संपादक को मना कर देंगे कि वह आपके लेख न ले। ले तो नाम छापे। वैसे हम उसे मना ही कर देंगे कि आपके लेख की कापी न करे।’
उसके बोलने से किसी को दुःख होता पर इस लेखक को हंसी आयी। उस मासूम संपादक ने प्रकाशन माध्यमों में ब्लाग लेखकों की सोच का ज्ञान दिया था और इस मामले में उसे गुरु कहना ठीक रहेगा।
उसकी ईमानदारी पर तारीफ करना चाहिये कि फिर उसने अभी तक ऐसा नहीं किया। अलबत्ता इस लेखक ने उस स्तंभकार की शिकायत नहीं की क्योंकि यह उस संपादक की या अखबार की जिम्मेदारी नहीं थी। फिर स्तंभकार का नाम तो याद रहेगा। अब इस समस्या पर संपादक या स्तंभकार को दोष देना भी गलत लगता है क्योंकि मानवीय प्रवृत्तियों पर भी विचार करना चाहिये। वह संपादक और स्तंभकार मेरी तरह ही सामान्य वर्ग के होंगे। अपने रोजगार से जुड़े होने के कारण शायद वह अंतर्जाल के बारे में इतना नहीं जानते होंगे। जैसा प्रचार माध्यम प्रचारित कर रहे हैं वैसे ही लोग अपने विचार बनाते हैं। यह स्वतंत्र दिखने वाले प्रचार माध्यम क्या हैं, इस पर बहस इस लेख में नहीं करना है पर उनके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद बड़े बड़े लेखक हुए हैं पर बताईये किसने कोई अमरकृति दी है और दी है तो भला वह इनसे जुड़ा रहा है? अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का नियम है कि उतना ही पढ़ो जितना रोजगार के काम आये। जितना पढ़ो उतना ही सोचो वरना कहीं के नहीं रहोगे। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तयशुदा प्रारूप है जिस पर सभी चले रहे हैं और नये प्रयोगों से हर कोई घबड़ाता है। दूसरी बात यह है कि जिसके पास भी थोड़ी बहुत शक्ति है वह उसका उपयोग करना चाहता है। किसी दूसरे को बढ़ाने की मनोवृत्ति अब नहीं रही जिस तरह तीन साल इस लेखक को लगे हैं उतने शायद ही अन्य कोई बर्बाद करना चाहे-क्योंकि इसके लिये यह जरूरी है कि आपका नियमित रोजगार होना चाहिये।
फिल्म, टीवी चैनल और पत्रकारिता में मौलिक लेखकों का अभाव है तो चिंतक के नाम शून्य। चिंतक कौन हैं? जो पुराने विचारों को ही आगे बढ़ा रहे हैं पर नये संदर्भों में व्याख्या करने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की जरूरत है वह कितनों में है? दरअसल हिन्दी में तत्काल कमाने की चाहत ने इसे आर्थिक संरक्षण से परे कर दिया है और जो मिल रहा है वह कोई नया प्रयोग करने की इजाजत नहीं देगा पर अंतर्जाल पर इसकी गुंजायश है अगर आप धन कमाने की इच्छा की बजाय लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। वैसे भी समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिफाफा भेजकर थक जाने से अच्छा है कि यहां टंकित कर थका जाये। इसके अलावा एक बाद दूसरी भी है कि अगर आप किसी पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर हैं तो आपको समाचार पत्र पत्रिकाओं में स्थान नियमित रूप से मिल सकता है वरना तो एकाध बार छपे फिर भूल जाओ। समाचार पत्र पत्रिकाओं में पत्रकार के रूप में कार्यरत लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है यह बात अंतर्जाल पर ही उनके लेखों से पता लगता है पर क्या कोई अन्य प्रकाशन उनको अपने यहां स्थान देगा? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप शिखर पुरुष नहीं हैं तो हिन्दी में लिखकर ही आप लोकप्रिय न हों यह जाने अनजाने पूंजी बाजार ने तय कर लिया है। अंतर्जाल इस चक्र को तोड़ने जा रहा है। एक आम ब्लाग लेखक को कब तक अदना समझेंगे? नयी पीढ़ी के लेखक इधर आयेंगे तब क्या होगा? संभव है कि आगे चलकर लिखने वाले अंतर्जाल पर ही वैसे लिखना प्रारंभ करें जैसे कि पुराने लेखक अपने शैक्षणिक कागजों पर करते थे।
उस स्तंभकार को गुरु मानना चाहिये जिसने इस लेखक के अंश लेकर यही प्रमाणित किया कि ऐसा चिंतन वह नहीं कर सकता था भले ही उसका नाम चमक रहा हो। पाठक इसे अतिश्योक्ति न समझें। गांधीजी, नोबल और ओबामा पर लिखे गये लेख देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि उसमें लिखी गयी बातें पहले किसी ने नहीं लिखी थी। देश का विभाजन और उसके बाद हुई हिंसा पर बहुत लिखा गया पर यह किसने लिखा कि अंग्रेज और उनके पिट्ठुओं की यह योजना थी कि गांधी के देश में हिंसा हो ताकि लोगों को बतायें कि इसका संदेश एक धोखा है। उनको डर था कि वह उनके इष्ट देव की जगह गांधी जी पूरे विश्व में पुजने लगेंगे और इसलिये वह इस देश को हानि पहुंचाकर गांधी जी को महत्वहीन करना चाहते थे।
अखबारों में छपने का मोह वैसे ही नहीं रहा। इतना छप चुके पर यहां लिखने का मतलब यह था कि समझदार लोगों को अपने मन की बात बतायें ताकि उनका विस्तार होता रहे। चिंतन के बारे में क्या कहें? लिखता और सोचता कोई और है हम टाईप करते हैं। एक दृष्टा की तरह जीने की आदत होती जा रही है। हमारे एक निजी मित्र एल.एन. त्रिवेदी ने -जिन्होंने बाद में अनुरक्ति के नाम से ब्लाग बनाया-कहा था कि ‘तुम तो चिंतन लिखा करो कविताओं में मजा नहीं आता।’
सबसे पहले ब्लाग का नाम ही रखा था ‘चिंतन’। उस दिन अंतर्जाल के एक मित्र श्री रवीद्र प्रभात ने भी ‘गंभीर चिंतन’ में हमें विशिष्ट ब्लागर मान लिया तो डर गये। जल्दी अपने को संभाल लिया क्योंकि हम दृष्टा की तरह देखने लगे थे। त्रिवेदी जी और प्रभात जी के बीच में जो था हम उसे देख रहे थे। प्रसंगवश समय पास करने तथा ब्लाग/पत्रिका को अपडेट करने के लिये लिखी गयी कविताओं ने भी कम रंग नहीं जमाया। ऊपर वर्णित पांच ब्लाग में से आखिरी चार वर्डप्रेस के हैं और उनको ऊंचाई पर पहुंचाने में अध्यात्मिक लेखन और इन्हीं कविताओं ने पहुंचाया है। किसी से कोई शिकायत नहीं है। प्रचार माध्यमों में काम रहे पत्रकारों से बस यह आशा करता हूं कि मेरे लेखक को प्रोत्साहित करें तो अच्छा ही है। एक दो अखबार ने अध्यात्मिक ब्लाग छापा है। इसलिये सभी पत्रकार, लेखक, तथा पाठक मित्रों आभार व्यक्त करता हूं। तीन वर्ष पूरे होने पर बस इतना ही।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
22
Dec
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, dashboard, epatrika, hindi hasya, hindi writer, india, inglish, mastram, urdu, vyangya, web bhaskar, अनुभूति, अभिव्यक्ति, चिन्तन, दीपक भारतदीप, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: कला, मनोरंजन, मस्ती, समाज, हिंदी साहित्य, editorial in hindi, hindi article, masti. 1 Comment
एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।
—————————-
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
—————————
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
29
Nov
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, Global dashboard, bharat, darshan, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, sahitya patrika, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, writer, अध्यात्म, अनुभूति, आलेख, आस्था, दीपक भारतदीप, धर्म, हिंदी पत्रिका, हिन्दू. Tagged: adhyatm, धर्म, पुराण, वेद, हिंदी साहित्य, हिंदू, dharm, hindu आध्यात्म, Religion. Leave a Comment
भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
——————————
कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।
हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लिए कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।
वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।
यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये। भक्त करते समय इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि कोई स्वर्ग का टिकट आरक्षित करवा रहे है।
——————————
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
————————————
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
7
Nov
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, dashboard, epatrika, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi shayri, hindi writer, india, inglish, mastram, urdu, vyangya, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, writer, अनुभूति, अभिव्यक्ति, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शब्द, हिंदी कविता, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: दशहरा, मनोरंजन, मस्ती, राम, रावण.hindi poem, हिंदी साहित्य, dashahara, vyangya kavita. Leave a Comment
सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
…………………….
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।
………………………………
पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
………………..
यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप
16
Oct
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, arbic, bharat, epatrika, अनुभूति, अभिव्यक्ति, चिन्तन, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शब्द, हास्य, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: कला, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, शेर, समाज, हिन्दी साहित्य, hindi entetainment, hindi poem, hindi vyangya shayri, parson, parsonal. Leave a Comment
छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
……………………………….
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
30
Sep
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, darshan, epatrika, hindi megzine, hindi writer, hindu, india, inglish, अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट, चिन्तन, दीपक भारतदीप, धर्म, शब्द, संस्कार, हिंदी पत्रिका, हिन्दी, हिन्दू. Tagged: adhyatm chankya niti, अध्यात्म, धर्म, संदेश, हिन्दी साहित्य, हिन्दू, dharm, hindi sahitya. Leave a Comment
नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
—————————–
वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।
हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
…………………………….
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
25
Sep
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, epatrika, friends, hindi hasya, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi shayri, hindi writer, india, inglish, mastram, sahitya patrika, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट, दीपक भारतदीप, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: कला, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, समाज, हिंदी साहित्य, hasya kavita, hindi poem, masti, mastram. Leave a Comment
फंदेबाज मिला रास्ते में
और बोला
‘चलो दीपक बापू
तुम्हें एक सम्मेलन में ले जायें।
वहां सर्वशक्तिमान के एक नये अवतार से मिलायें।
हमारे दोस्त का आयोजन है
इसलिये मिलेगा हमें भक्तों में खास दर्जा,
दर्शन कर लो, उतारें सर्वशक्तिमान का
इस जीवन को देने का कर्जा,
इस बहाने कुछ पुण्य भी कमायें।’
सुनकर पहले चौंके दीपक बापू
फिर टोपी घुमाते हुए बोले
‘कमबख्त,
न यहां दुःख है न सुख है
न सतयुग है न कलियुग है
सब है अनूभूति का खेल
सर्वशक्तिमान ने सब समझा दिया
रौशनी होगी तभी
जब चिराग में होगी बाती और तेल,
मार्ग दो ही हैं
एक योग और दूसरा रोग का
दोनों का कभी नहीं होगा मेल,
दृश्यव्य माया है
सत्य है अदृश्य
दुनियां की चकाचौंध में खोया आदमी
सत्य से भागता है
बस, ख्वाहिशों में ही सोता और जागता है
इस पूर्ण ज्ञान को
सर्वशक्मिान स्वयं बता गये
प्रकृति की कितनी कृपा है
इस धरा पर यह भी समझा गये
अब क्यों लेंगे सर्वशक्तिमान
कोई नया अवतार
इस देश पर इतनी कृपा उनकी है
वही हैं हमारे करतार
अब तो जिनको धंधा चलाना है
वही लाते इस देश में नया अवतार,
कभी देश में ही रचते
या लाते कहीं लाते विदेश से विचार सस्ते
उनकी नीयत है तार तार,
हम तो सभी से कहते हैं
कि अपना अध्यात्म्किक ज्ञान ही संपूर्ण है
किसी दूसरे के चंगुल में न आयें।
ऐसे में तुम्हारे इस अवतारी जाल में
हम कैसे फंस जायें?
यहां तो धर्म के नाम पर
कदम कदम पर
लोग किसी न किसी अवतार का
ऐसे ही जाल बिछायें।
………………………………
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
29
Aug
Posted by दीपक भारतदीप in अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट. Tagged: मनोरंजन, शायरी, शेर, हिंदी साहित्य, hindi kavita, hindi poem, shayri, sher. Leave a Comment
आंधी चलकर फिर रुक जाती है
धरती हिलती नहीं भले कांपती नजर आती है।
मौसम रोज बदलते हैं
उससे तेज भागते हैं, आदमी के इरादे
पर सांसें उसकी भी
कभी न कभी उखड़ जाती हैं
फिर भी जिंदगी वहीं खड़ी रहती है
भले अपना घर और दरवाजे बदलती जाती है।
………………………
उधार के आसरे जीने की
ख्वाहिशें अपनी ही दुश्मन बन जाती हैं।
किश्तों में मिला सुख
भला कब तक साथ निभायेगा
किश्तें ही उसे बहा ले जाती हैं।
……………………….
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
25
Jul
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, epatrika, hasya, hindi kavita, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, india, inglish, mastram, sahitya, sahitya patrika, vyangya, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आस्था, इंटरनेट, कथा साहित्य, दीपक भारतदीप, लघुकथा, व्यंग्य, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: प्रबंधक, फिल्म क्रिकेट, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, हिंदी साहित्य, cricket, hindi film, masti, mastram, vyangya. Leave a Comment
वह अभिनेता अब क्रिकेट टीम का प्रबंधक बन गया था। उसकी टीम में एक मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी भी था जो अपनी बल्लेबाजी के लिये प्रसिद्ध था। वह एक मैच में एक छक्के की सहायता से छह रन बनाकर दूसरा छक्का लगाने के चक्कर में सीमारेखा पर कैच आउट हो गया। अभिनेता ने उससे कहा-‘ क्या जरूरत थी छक्का मारने की?’
उस खिलाड़ी ने रुंआसे होकर कहा-‘पिछले ओवर में मैने छक्का लगाकर ही अपना स्कोर शुरु किया था।
अभिनेता ने कहा-‘पर मैंने तुम्हें केवल एक छक्का मारकर छह रन बनाने के लिये टीम में नहीं लिया है।’
दूसरे मैच में वह क्रिकेट खिलाड़ी दस रन बनाकर एक गेंद को रक्षात्मक रूप से खेलते हुए बोल्ड आउट हो गया। वह पैवेलियन लौटा तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या मैंने तुम्हें गेंद के सामने बल्ला रखने के लिये अपनी टीम में लिया था। वह भी तुम्हें रखना नहीं आता और गेंद जाकर विकेटों में लग गयी।’
तीसरे मैच में वह खिलाड़ी 15 रन बनाकर रनआउठ हो गया तो अभिनेता ने उससे कहा-‘क्या यार, तुम्हें दौड़ना भी नहीं आता। वैसे तुम्हें मैंने दौड़कर रन बनाने के लिये टीम में नहीं रखा बल्कि छक्के और चैके मारकर लोगों का मनोरंजन करने के लिये टीम में रखा है।’
अगले मैच में वह खिलाड़ी बीस रन बनाकर विकेटकीपर द्वारा पीछे से गेंद मारने के कारण आउट (स्टंप आउट) हो गया। तब अभिनेता ने कहा-‘यार, तुम्हारा काम जम नहीं रहा। न गेंद बल्ले पर लगती है और न विकेट में फिर भी तुम आउट हो जाते हो। भई अगर बल्ला गेंद से नहीं लगेगा तो काम चलेगा कैसे?’
उस खिलाड़ी ने दुःखी होकर कहा-‘सर, मैं बहुत कोशिश करता हूं कि अपनी टीम के लिये रन बनाऊं।’
अभिनेता ने अपना रुतवा दिखाते हुए कहा-‘कोशिश! यह किस चिड़िया का नाम है? अरे, भई हमने तो बस कामयाबी का मतलब ही जाना है। देखो फिल्मों में मेरा कितना नाम है और यहां हो कि तुम मेरा डुबो रहे हो। मेरी हर फिल्म हिट हुई क्योंकि मैंने कोशिश नहीं की बल्कि दिल लगाकर काम किया।’
उस क्रिकेट खिलाड़ी के मूंह से निकल गया-‘सर, फिल्म में तो किसी भी दृश्य के सही फिल्मांकन न होने पर रीटेक होता है। यहां हमारे पास रीटेक की कोई सुविधा नहीं होती।’
अभिनेता एक दम चिल्ला पड़ा-‘आउठ! तुम आउट हो जाओ। रीटेक तो यहां भी होगा अगले मैच में तुम्हारे नंबर पर कोई दूसरा होगा। नंबर वही खिलाड़ी दूसरा! हुआ न रीटेक। वाह! क्या आइडिया दिया! धन्यवाद! अब यहां से पधारो।’
वह खिलाड़ी वहां से चला गया। सचिव ने अभिनेता से कहा-‘आपने उसे क्यों निकाला? हो सकता है वह फिर फार्म में आ जाता।’
अभिनेता ने अपने संवाद को फिल्मी ढंग से बोलते हुए कहा-‘उसे सौ बार आउट होना था पर उसकी परवाह नहीं थी। वह जीरो रन भी बनाता तो कोई बात नहीं थी पर उसने अपने संवाद से मेरे को ही आउट कर दिया। मेरे दृश्यों के फिल्मांकन में सबसे अधिक रीटेक होते हैं पर मेरे डाइरेक्टर की हिम्मत नहीं होती कि मुझसे कह सकें पर वह मुझे अपनी असलियत याद दिला रहा था। नहीं! यह मैं नहीं सकता था! वह अगर टीम में रहता तो मेरे अंदर मेरी असलियत का रीटेक बार बार होता। इसलिये उसे चलता करना पड़ा।’
……………………………….
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
7
Jul
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, bharat, darshan, epatrika, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, mastram, sahitya patrika, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, अनुभूति, अभिव्यक्ति, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शब्द, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका, हिंदी साहित्य, हिन्दी. Tagged: दर्द, बेबस, मतलब, मनोरंजन, शायरी, शेर, हिंदी साहित्य, bebas, dard, hindi poem, hindi shayri, sher. Leave a Comment
कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?
उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?
उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?
कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?
आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?
…………………………
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
27
Jun
Posted by दीपक भारतदीप in Deepak Bharatdeep, Global dashboard, bharat, epatrika, hindi megzine, hindi patrika, hindi sahitya, hindi writer, india, inglish, mastram, sahitya patrika, urdu, web bhaskar, web dunia, web express, web gwalior, web jagaram, web madhyapradesh, web naidunia, web navabharat, web panjabkesri, web patrika, writer, अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट, दीपक भारतदीप, विचार, हिंदी पत्रिका, हिन्दी. Tagged: पुलिस, लड़का, लड़की, संपादकीय, समाज, हिंदी साहित्य, child, editorial, hinid article, police. Leave a Comment
भारतीय समाज की भी बड़ी अजीब हालत है। अच्छाई या बुराई में भी वह जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र के भेद करने से बाज नहीं आता। अनेक तरह के वाद विवादों में तमाम तरह के भेद ढूंढते बुद्धिजीवियों ने शायद उन दो घटनाओं को मिलाने का शायद ही प्रयास किया हो जो सदियों पुराने लिंग भेद का एक ऐसा उदाहरण जिससे पता लगता है कि गल्तियों और अपराधों में भी किस तरह हमारे यहां भेद चलता है।
दोनों किस्से टीवी पर ही देखने को मिले थे। एक किस्सा यह था कि कहीं किसी सुनसान सड़क से पुलिस वाले अपनी गाड़ी में बैठकर निकल रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर एक मंदिर पड़ा। जब वह उसके पास से गुजरे तो उन्हें अंदर से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जगह सुनसान थी और इस तरह आवाज सुनाई देना उनको संदेहास्पद लगा। तब वह पूरी टीम अंदर गयी। वहां उनको एक बच्चा अच्छी चादर में लिपटा मिला। उन्होंने उसको उठाया और इधर उधर देखा पर कोई नहीं दिखाई दिया। पुलिस वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उस बच्चे को कोई छोड़ गया है।
अब पुलिस वालों के लिये समस्या यह थी कि उस बच्चे की असली मां को ढूंढे पर उससे पहले बच्चे की सुरक्षा करना जरूरी था। वह उसको अस्पताल ले गये। डाक्टरों ने बताया कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मगर पुलिस वालों को समस्या यही खत्म होने वाली नहीं थी। वह सब पुरुष थे और उस बच्चे के लिये उनको एक अस्थाई मां चाहिये थी। वह भी ढूंढ निकाली और उसे बच्चा संभालने के लिये दिया और फिर शुरु हुआ उनके अन्वेषण का दौर। वह उसकी असली मां को ढूंढना चाहते थे। तय बात है कि इसके लिये उनको उन हालतों पर निगाह डालना जरूरी था जिसमें वह बच्चा मिला। ऐसी स्थिति में पुलिस वाले भी आम इंसानों जैसा सोचें तो कोई आश्चर्य नहीं होता। उन्होंने बच्चा उठाया था कोई अपराधी नहीं पकड़ा था जिससे पूछकर पता लगाते।
पुलिस का समाज से केवल इतना ही सरोकार नहीं होता कि वह इसका हिस्सा है बल्कि उसके लिये उनको समाज के आम इंसान आदतों, प्रवृत्तियों और ख्यालों को भी देखना होता है।
एक पुलिस वाले का बयान हृदयस्पर्शी लगा। उसने कहा कि -‘‘बच्चा किसी अच्छे घर का है शायद अविवाहित माता के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिये उसे छोड़ा गया है। वरना लड़का कोई भला ऐसे कैसे छोड़ सकता है? लड़के को बहुत अच्छी चादर में रखा गया है। उसे अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं।’;
एक जिम्मेदार पुलिस वाले के लिये यह संभव नहीं है कि वह कोई ऐसी बात कैमरे के सामने कहे जो लोगों को नागवार गुजरे। उनकी आंखों से बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतायें साफतौर से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में पुलिस वालों ने बच्चे की सहायता करते हुए ऐसे व्यक्तिगत प्रयास भी किये होंगे जो उनके कर्तव्य का हिस्सा नहीं होंगे। उनकी बातों से बच्चे के प्रति प्रेम साफ झलक रहा था।
पुलिस अधिकारी यह शब्द हमें मर्मस्पर्शी लगे ‘वरना लड़का कौन ऐसे छोड़ता है’। ऐसे लगा कि इन शब्दों के पीछे पूरे समाज का जो अंतद्वद्व हैं वह झलक रहा हो जिसे वह व्यक्त करना चाहते हों।
लगभग कुछ ही देर बाद एक ऐसी ही घटना दूसरे चैनल पर देखने को मिली। वहां एक नवजात लड़की का शव एक कूड़ेदान में मिला। वहां भी पुलिस वालों का कहना था कि ‘संभव है यह लड़की अविवाहित माता के गर्भ से उत्पन्न हुई हो या फिर लड़की होने के कारण उसे यहां फैंक दिया हो।’
इन दोनों घटनाओं के पुलिस क्या कर रही है या क्या करेगी-यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है। इसके बारे में अधिक पढ़ने या सुनने को नहीं मिला। जो लड़का जीवित मिला उसके लिये वह आगे भी ठीक रहे इसके निंरतर सक्रिय रहेंगे ऐसा उनकी बातों से लग रहा था। यहां हम इन दोनों घटनाओं में समाज में व्याप्त लिंग भेद की धारणा पर दृष्टिपात करें तो तो सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि लोग गल्तियां करने पर भी लिंग भेद करते हैं।
एक मां ने अपना लड़का इसलिये ही मंदिर में छोड़ा कि वह उसके काम नहीं आया तो किसी दूसरे के काम आ जायेगा-मंदिर है तो वहां कोई न कोई धर्मप्रिय आयेगा और उस लड़के को बचा लेगा। क्या उसने अच्छी चादर में लपेटकर इसलिये मंदिर में छोड़ा कि जो उसे उठाये उसके सामने बच्चे की रक्षा के लिये तात्कालिक रूप से ढकने के लिये कपड़े की आवश्यकता न हो। क्या उसके मन में यह ख्याल था कि आखिर लड़का है किसी के काम तो आयेगा? कोई तो लड़का पाकर खुश होगा? कोई तो लड़का मिलने पर जश्न मनायेगा?
लड़की को फैंकने वाले परिवारजनों ने क्या यह सोचकर कूड़ेदान में फैंका कि लड़की भला किस काम की? हम अपना त्रास दूसरे पर क्यों डालकर अपने ऊपर पाप लें? क्या उन्होंने सोचा कि लड़की उनके लिये संकट है इसलिये उसे ऐसी जगह फैंके जहां वह बचे ही नहीं ताकि कोई उसकी मां को ढूंढने का प्रयास न करे।
कभी कभी तो लगता है कि बच्चों को गोद लेने और देने की लोगों को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना चाहिये। जिनको बच्चा न हो उन्हें ऐसे बच्चों को गोद लेने की छूट देना चाहिये जिनसे उनके माता या पिता छुटकारा पाना चाहते हैं। दरअसल निःसंतान दंपत्ति बच्चे गोद लेना चाहते हैं पर इसके लिये जो संस्थान और कानून है उनसे जूझना भी उनको एक समस्या लगती है। ऐसे में अगर कोई उनको अपना बच्चा देना चाहे तो उनके लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं होना चाहिये। कहीं अगर किसी नागरिक को बच्चा पड़ा हुआ मिल जाये तो उसे कानून के सहारे वह बच्चा रखने की अनुमति मिलना चाहिये न कि उससे बच्चा लेकर कोई अन्य कार्रवाई हो। पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि बिना विवाह के बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति तो रोकी नहीं जा सकती पर ऐसे बच्चों को निसंतान दंपत्ति को लेने के लिये अधिक कष्टदायी नियम नहीं होना चाहिये। इन दोनों घटनाओं ने लेखक को ऐसी बातें सोचने के लिये मजबूर कर दिया जो आमतौर से लोग सोचते हैं पर कहते नहीं। बहरहाल लड़के और लड़की के परिवारजनों ने लिंग भेद के आधार पर ऐसा किया या परिस्थितियों वश-यह कहना कठिन है पर समाज में जो धारणायें व्याप्त हैं उससे इन घटनाओं में देखने का प्रयास हो सकता है क्योंकि यह कोई अच्छी बात नहीं है कि कोई अपने बच्चे इस तरह पैदा कर छोड़े। खासतौर से जब लड़का मंदिर में और लड़की कुड़ेदान में छोड़ी जायेगी तब इस तरह की बातें भी उठ सकती हैं।
पश्चिमी चकाचैंध ने इस देश की आंखों को चमत्कृत तो किया है पर दिमाग के विचारों की संकीर्णता से मुक्त नहीं किया। पश्चिम में अनेक लड़कियां विवाह पूर्व गर्भ धारण कर लेती हैं पर अपना गर्भ गिरा देती हैं या फिर बच्चा पैदा करती हैं। उनका समाज उन पर कोई आक्षेप नहीं करता इसलिये ही वहां इस तरह बच्चों को फैंकने की घटनायें होने के समाचार कभी भी सुनने को नहीं मिलते।
……………………………………………
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
Recent Comments